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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 869 में से

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पृष्ठ 88

७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चखा वह दूसरों को कैसे स्वाद चखाएगा ? इसलिए जो पूर्ण अनुभवी है, वही सद्भाव से शिष्य का उद्धार करता
है। इसी तरह गुरुत्व के अनेक प्रकार हैं। लेकिन जो शिष्य को अपरोक्षानुभव प्राप्त कराता है उसी को
'सद्गुरुस्वामी' कहते हैं। जिसके भाषण से 'असत्' असंतता का तत्वतः निःशेष अस्त हो जाता है तथा 'सत्'
का उदय होता है उसे ही वेदशास्त्रों ने सद्गुरुत्व कहा है। जो मंत्र तंत्र का उपदेश करते हैं वे भी पूज्यत्व की
दृष्टि से श्रेष्ठ ही होते हैं लेकिन जिसमें 'पूज्य' और 'पूजक' का भेद नहीं होता वही वास्तव में 'सद्गुरु स्वामी'
है। किसी में शुद्ध ब्रह्मज्ञान रहता है, ब्रह्मस्वरूप को देखकर उसका मन उसमें रम जाता है, द्वैत की भावना
समाप्त होकर चारों वाचाएँ मौन हो जाती हैं, सारी इन्द्रियाँ तटस्थ हो जाती हैं, प्राण जहाँ पंगु हो जाता है, अत्यन्त
अद्भुत परब्रह्म को देखकर जिसके देहभाव में तटस्थता आ जाती है, ऐसा जो भी कोई आत्मानुभवी रहता है,
उससे शिष्य विनती करता है लेकिन वह उससे न कुछ पूछता है और न कुछ बताता ही है। वह तटस्थ भाव से
मौन ही रहता है। किसी को ब्रह्म का अनुभव होता है, उसका बाध्य-बाधकता का भ्रम भी नष्ट हुआ रहता है,
द्वैतभाव भी समाप्त हुआ रहता है, संसार में जिसके लिए कोई विषमभाव नहीं रहता लेकिन उसका व्यवहार कुछ
विचित्र-सा रहता है। उसमें चिड़चिड़ापन रहता है, वह कुछ अजीब-सा काम करता रहता है, साथ ही वह अपने
स्वभाव में कुछ ऐसी उग्रता का प्रदर्शन करता है कि कोई उसके निकट नहीं जा सकता। वह अपने में ही हँसता
रहता है, परमार्थ को ध्वनि से अभिव्यक्त करता है लेकिन उससे शिष्य को किसी भी बात का बोध नहीं होता।
वह दुश्चिंता में पड़ जाता है। ऐसा जो ब्रह्मज्ञानी होता है, उसकी ब्रह्मस्थिति लोगों की समझ में नहीं आती। ऐसी
अवस्था में उसके पास ज्ञानप्राप्ति के लिए भक्तिभाव से कौन जाएगा ? हे राजा अब तुम्हें सद्गुरु के वास्तविक
लक्षण बताता हूँ। यदि अंतःकरण में श्रद्धाभाव लेकर सुनोगे तो सुखी हो जाओगे। जो काया, वाचा तथा मन से
दीनजनों पर कृपालु रहता है, शिष्य के भवबन्धन तोड़ देता है, जो अहंकार का अस्तित्व नष्ट करता है, उसी
प्रकार जो शब्दज्ञान में पारंगत रहते हुए सर्वदा ब्रह्मानन्द में लीन रहता है, वह अपने शिष्य का उसकी भक्ति के
अनुरूप प्रबोधन करने में समर्थ होता है। शिष्य की भक्ति के अनुसार उसे वैसा अनुभव देता है लेकिन मन में
गुरुता का जरा भी अहंकार नहीं रहने देता। शिष्य से सेवा लेने की कल्पना वह स्वप्न में भी नहीं करता, बल्कि
वह स्वयं ही शिष्य की सेवा करता है और उसे पूज्य मानता है। शिष्य को पुत्र के समान मानना चाहिए ऐसा
स्मृतिवचन है, उसके अनुसार वह शिष्य को गौण न मानकर उसकी ओर ब्रह्मभाव से ही देखता है। शिष्य अपनी
भक्ति के कारण उसकी सेवा करता है, लेकिन वह उसे सेवक नहीं मानता। जिसके लिए सभी भूत भगवद्रूप हैं
वह शिष्य को सेवक के रूप में कैसे देखेगा ? मैं एक महान योगी हूँ, ऐसी शेखी भी वह नहीं बघारता। गुरुता का
अहंकार कभी उभरने नहीं देता। स्वप्न में भी अपने निर्वाह का संकट शिष्य पर नहीं डालता। इतना ही नहीं
बल्कि शिष्य पर संकट आने पर वह तत्काल उसका निस्तारण करता है। मैं एक अकर्ता निजात्मयोगी हूँ यह
कहकर वह विषयों का न भोग ही करता है न उन्हें पूर्ण रूप से त्याग देने का ही आग्रह करता है। प्रारब्ध के
अनुसार जो भी भोग आते हैं उन्हें देह को सौंप कर वह स्वयं परब्रह्म योग में मग्न रहता है। देह पालकी में चढ़े
अथवा विष्ठा में गिरे लेकिन उसके लिए दोनों का ही सुख या दुःख नहीं रहता। देह में रहते हुए भी उसे देह का
अहंकार नहीं होता और घर में रहते हुए भी घर की आसक्ति नहीं रहती, अन्त में लौकिक दृष्टि से लोगों में रह
कर वह लोगों जैसा व्यवहार करता है। स्त्री उसे मेरा पति, पुत्र मेरा पिता और शिष्य उसे मेरा गुरु कहते हैं
लेकिन वह उन सबमें निराले ही ढंग से व्यवहार करता है। इस प्रकार पूरी तरह व्यवहार तथा आचरण कर वह
भक्ति करता है। भूतमात्र में हरि का ही दर्शन करना चाहिए, उसी का भजन करना चाहिए यही उपदेश वह अपने