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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 869 में से

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पृष्ठ 83

तृतीय अध्याय ६७
भाषण यहाँ दिया हुआ है। जन्म में श्रेष्ठ ब्राह्मणजन्म और वह भी वेदशास्त्र सम्पन्न, ऐसा होने पर भी
भगवद्भजन न करने पर उसका भी निश्चित रूप से पतन होता है। भक्तों की समस्त प्राणियों के प्रति
भगवद्भावना ही होती है, इसलिए वहाँ विघ्नों को स्थान ही नहीं मिलता क्योंकि विघ्न का अर्थ है हानि। लेकिन
वही उनके लिए उपाय बन जाता है क्योंकि भावार्थ के लिए ईश्वर सदा सहायक होता है। भक्ति के बिना मुक्ति
की चाह कर प्रयत्न करने से वह प्रयत्न निष्फल होता है। अस्तु। अब वर्तमान प्रकरण (प्रलय) के सम्बन्ध में
बात करें। बैराजपुरुष भी अव्यक्त में प्रवेश करता है। वैराज का अव्यक्त में प्रवेश होते ही महाभूत विलास
(अथवा विनाश) शुरु होता है और भूतों का ह्रास् होने लगता है। राजा! उनका 'अनुप्रवेश' अर्थात् एक में दूसरे
का विलय किस प्रकार होता है उसे क्रम से सुनाता हूँ।
वायुना हृतगन्धाः भूः सलिलत्वाय कल्पते।
सलिलं तद्धृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते॥ १३॥
प्रलयवायु का प्रक्षोभक क्रोध पृथ्वी का गन्ध हरण कर लेता है। इसलिए पृथ्वी वहीं घुलकर चारों ओर
पानी ही पानी हो जाता है। इसके बाद वायु का भयंकर क्षोभ होकर वह जल का रस नष्ट कर डालता है।
इसलिए प्रलय के महातेज में धीरे-धीरे जल का ह्रास हो जाता है। उस तेज के स्वाभाविक गुण से, वायुबल से
तम अर्थात् अन्धकार फैल जाता है। उस समय आकाश में प्रलय वायु ही भर जाता है। उस प्रलय वायु का स्पर्श
गुण और चपलता को आकाश स्वाहा कर देता है। अर्थात् सम्पूर्ण वायु का आकाश में विलय होता है।
ह्तरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते।
हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते॥ १४॥
कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लोयत।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप।
प्रविशन्ति ह्यहङ्कारं स्वगुणैरहमात्मनि॥ १५॥
आकाश के शब्दगुण को वह प्रलयकाल पूरी तरह निगल लेता है। तब तामस अभिमान क्षुब्ध होकर
समस्त आकाश को पी जाता है। दशेन्द्रियों का समुदाय राजस अहंकार में प्रवेश करता है और चित्त चतुष्ट का
मेला सात्विक अहंकार में प्रवेश करता है। हे राजश्रेष्ठ! इन्द्रियों की अधिष्ठात्री देवताएँ मिलकर सात्विक
अहंकार में प्रवेश करती हैं, यह जान लो। इसके बाद त्रिगुणों के साथ वे तीनों अहंकार महत्तत्व में मिल जाते
हैं और जिस प्रकार कन्या अपने बालबच्चों को लेकर अपने मैके आ जाती है, उसी प्रकार महत्तत्व भी माया से
मिल जाते हैं। मुर्गी जिस प्रकार अपने चूजों को अपने पंखों के नीचे छिपा लेती है और लगता है कि वह
अकेली बैठी है उसी प्रकार कल्पांत के समय माया अकेली बच रहती है। इस प्रकार उत्पत्ति-स्थिति और
प्रलय तक माया के तीन रूप दिखला दिये। ऐसी वह त्रिगुणात्मक माया मिथ्याभूत अर्थात् न होते हुए भी
दिखाई देनेवाली है। बच्चे जिस प्रकार खेल खेलते समय दिन में ही 'रात हो गयी' कहते हैं, उसी प्रकार पूर्ण
स्वरूप में माया की त्रिविध कल्पना करते हैं।
एषा माया भगवतः स्रर्गस्थित्यन्तकारिणी।
त्रिवर्णा वर्णितास्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ १६॥