श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीन लोकों में उत्तम, मध्यम और अधम, तीन अवस्थाएँ यथा जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति, स्वर्ग-मृत्यु-पाताल
ये तीन लोक, संचित-प्रारब्ध-क्रियमाण ये तीन कर्म, सत्त्व-रज-तम ये तीन गुण ये सब माया के कार्य हैं—
ध्येय-ध्याता-ध्यान; पूज्य-पूजक-पूजन; ज्ञेय-ज्ञाता-ज्ञान यह त्रिपुटी भी माया की ही है। दृश्य-द्रष्टा-दर्शन;
कर्म-कर्ता-क्रियाचरण; भोग्य-भोक्ता-भोजन, यह त्रिपुटी भी माया की ही है, यह समझ लो। शब्द-श्रोता-श्रवण;
घ्रेय-घ्राता-घ्राण; रस-रसना-रसास्वाद, यह त्रिपुटी भी माया की ही है। कर, क्रिया और कर्ता; चरण, चाल और
चलता; वाक-वाचा-वदविता ये तीन अवस्थाएँ भी माया की ही हैं। अहं, सोहं और जड़मूढ़ता; साधक, साधन
•और साध्यता; देवी, देव और परिवार देवता, ये तीन प्रकार भी माया के ही हैं। देह, देही और देहाभिमान; भव,
भवमय और भवबन्धन; मुक्त, मुमुक्षु और अज्ञानी यह घटना भी माया की है। सुख, दुःख और जड़त्व; व्याधि,
समाधि और व्युत्थान; उत्पत्ति, स्थिति और मृत्यु इन सारे लक्षणों से माया का ही विकास होता है। आकाश में
चारों ओर नीले रंग का आभास होता है लेकिन वहाँ नीले रंग का अस्तित्व भी नहीं होता, उसी प्रकार
आत्मस्वरूप में माया का मिथ्या आभास होता है। मृगजल जिस प्रकार प्रत्यक्ष दिखाई देता है, लेकिन वह केवल
चिलचिलाती धूप ही रहती है, उसी प्रकार स्वरूप में माया प्रबल हुई दिखाई देती है, लेकिन मूल में कुछ भी
विभासित नहीं होता। माया मिथ्या है लेकिन कल्पना के कारण वह प्रबल मालूम होती है। उसका विनाश किया
जा सके ऐसा उसका स्वरूप ही नहीं है। पर नामरूप की तड़क-भड़क से उसने ब्रह्मादिकों को पागल बना रखा
है। उसने ही मिथ्या त्रिपुटी के विस्तार से सम्पूर्ण त्रैलोक्य को बन्धन में डाला हुआ दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार
दीपक के साथ छाया दिखाई देती है, लेकिन उसे नष्ट करने जाओ तो वह दिखाई नहीं देती उसी प्रकार
स्वस्वरूप में माया मिथ्या है और उसका विनाश करना देवताओं के लिए भी कठिन हो गया है। जिस प्रकार देह
के साथ छाया मिथ्या रहती है, उसी प्रकार ब्रह्मा में माया मिथ्या है। वह कल्पना के कारण ही विस्तार पाती है
इसलिए वेदशास्त्र उसे 'अजेय' मानते हैं। राजा! जहाँ कल्पना बढ़ती है वहीं माया का मूल है। राजा! जिसे
कल्पना कहते हैं, वही मुख्य माया है, इसे ध्यान में रखो। माया का निरूपण करते समय इससे अच्छा रूपक नहीं
मिलेगा। त्रिविध लक्षणों से युक्त माया तुम्हें विशद रूप से बतायी। राजा! अब तुम्हें और क्या श्रवण करने की
इच्छा है? माया भयंकर है और उसे पार करना कठिन है, यह सुनकर ऋत्विज, ब्राह्मण और सभा के सभी लोग
थर-थर काँपने लगे। राजा को भी आश्चर्य हुआ। माया का स्वरूप विचित्र है, ज्ञानी लोग भी उसका निवारण
करने में समर्थ नहीं हैं। जिसके जाल में ब्रह्मदेवादिक भी फँसे हुए हैं वहाँ दूसरों की क्या बिसात है? माया ने शिव
का भी आकलन कर उसे जीवदशा में ला दिया है। ऐसी इस माया को साधारण जन भी पार कर सकें ऐसा उपाय
इनसे पूछिए। राजा ने इसी आशय से उनसे आग्रहपूर्वक प्रश्न किया।
राजोवाच
यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः।
तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्॥ १७॥
हरि की माया अत्यन्त कठिन है, यह सुनकर राजा को हँसी आ गयी। वह मिथ्या ही सही लेकिन
देहाभिमानी को बाधक होने में समर्थ बनी। माया दुस्तर है यह शास्त्र प्रसिद्ध है लेकिन जो सीधे-सादे, भोले-
भाले हैं और बुद्धि से मन्द हैं, वे किस उपाय से तर सकेंगे इसका कोई निश्चित उपाय बताइए। जो अपने मन
को वश में नहीं कर पाये हैं किन्तु जिनका संसार सागर को पार करने का दृढ़ निश्चय है, ऐसे भोले-भाले लोग