श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ६९
होंगे उनके लिए माया को पार करने का कोई सरल उपाय हो तो बताइये। पहले कवि ने संक्षेप में बतलाया है
कि 'तन्माययाऽतोबुध आभजेति' गुरु और ब्रह्म एकरूप हैं ऐसी अभेद भाव से भक्ति करने पर माया को पार
किया जा सकता है। उस भक्ति का स्पष्ट लक्षण मालूम हो और माया को तरने का भी उपाय मालूम हो, यही
इस प्रश्न को पूछने का कारण है। उसी उपाय का सुगम साधन बताने के लिए अन्तरिक्ष का छोटा बेटा 'प्रबुद्ध'
बोलने लगा।
प्रबुद्ध उवाच
कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च।
पश्येत्पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १८ ॥
जो प्रबुद्ध अर्थात् ज्ञानी होता है, वही माया से तरने की बात पूरी तरह से जानता है। हम भी प्रबुद्ध अर्थात्
ज्ञानसम्पन्न होने पर माया के बन्धन से छूट सकते हैं। मन में विषय का छन्द रहना यही मुख्य बन्धन है।
इसलिए जो विषय का अर्थात् विषयासक्ति का त्याग करता है वही प्रबुद्ध अर्थात् ज्ञानी है। यही आशय अब
स्पष्ट करके बताता हूँ, सुनिए। यदि मन विषय में लुब्ध होकर रह गया और पूर्ण वैराग्य नहीं हुआ तो माया को
पार करना सम्भव नहीं होगा। इसलिए वैराग्य की ओर प्रवृत्ति मुड़े इसलिए विषयों की निन्दा करते हैं। विषय
नाशवान हैं, किन्तु मूर्ख उसे ही बड़ा सुख मानते हैं, लेकिन वह सुख ही दुःखदायी होता है। विशेषरूप से
स्त्रीविषयक इच्छा से ही माया पीछा करती है। पास का धन खर्च कर सुख के लिए स्त्री को लाकर उसे घर की
मालकिन बनाकर रखते हैं, लेकिन वही स्त्री करोड़ों दुःखों का भोग कराती है। संसार में स्त्री की अभिलाषा से
ही माया को बल प्राप्त होता है। स्त्री कामना से ही संसार बढ़ता है, स्त्री कामना से महद् दुःख प्राप्त होता है।
सारांश, स्त्री कामना से सारा संसार मोहित हो गया है। बड़े प्रेम से स्त्री को पीढ़ी पर बिठाते ही वह संसार को
करोड़ों गुना बढ़ाती है। स्त्रीकामना ही महामोह की गाँठ बाँध कर दुःख के सागर में ढकेल देती है। जो माता नौ
महीने उसे अपने उदर में पालती है, उसे दूर कर पत्नी को परम निकट का मानते हैं। इस प्रकार माया
स्त्रीकामना से प्रबल होती है। जो अपने मुँह का ग्रास उसे खिलाती है, उसकी गन्दगी साफ करती है उस माता
की अपेक्षा स्त्री माया के कारण जगत में अपनी बन जाती है। मिलने को तो हजारों स्त्रियाँ मिल सकती हैं
लेकिन पूरे त्रिभुवन में माँ खोज कर भी नहीं मिलेगी। यह बात जिन ज्ञानियों को मालूम रहती है, वे भी स्त्री को
सिर पर बिठाते हैं। माँ की सेवा करने से भुक्ति और मुक्ति मिलती है और स्त्री की सेवा करने से नरकप्राप्ति
होती है यह बात भी जो शास्त्रज्ञ जानते हैं, वे भी स्त्री की कामना से माता की उपेक्षा करते हैं। इस प्रकार
स्त्रीकामना के विस्तार से माया सारे त्रिभुवन में फैल रही है। उसने ज्ञान सम्पन्न लोगों को भी भ्रम में डाल रखा
है। सचमुच स्त्रीकामासक्ति ही महामाया है। देखो! विषय को सुख मानकर काम्य कर्म करने से लोग अत्यन्त
दुःखी होते हैं क्योंकि काम्य कर्म दुःखदायक ही है। स्त्री कामना के कारण गृहासक्ति बढ़ती है और गृहासक्ति
के कारण प्राणी स्वयं ही अपने को कष्ट में डाल देता है। हे राजाधिराज! उन कष्टों के कारण अन्त में क्या
स्थिति होती है, वह भी तुम्हें बताता हूँ। निर्मल पानी लेकर दीवार पोंछने लगो तो पानी का निर्मलपन नष्ट होकर
वह गन्दा हो जाता है, हाथ कीचड़ से सन जाते हैं और दीवार का पलस्तर खराब होकर वह खुरदुरा हो जाता
है। उसी प्रकार ब्रह्मदेव आदि देवताओं को भी विषयसुख से सुख नहीं प्राप्त होता। ऐसे विषय को जो आनन्द
मानते हैं, वे महामूर्ख अथवा पशु ही हैं।