श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिए भी रुके बिना सौ वर्ष तक निरन्तर बरसता रहता है। बिजली अपने तेज से सम्पूर्ण आकाश को जला डालती
है। उसके गर्जन से काल की भी घिग्घी बँध जाती है। इस प्रकार प्रलयकाल में मेघ उन्मत्त हो जाते हैं। इससे
अपार जल का संचय होता है। वह इतना अधिक हो जाता है कि जहाँ से मेघ बरसते हैं, उसे भी मिलाकर
समस्त त्रैलोक्य जलमय हो जाता है। ऐसे उस मेघ को 'सावर्तक मेघ' कहते हैं। उसकी वृष्टि अद्भुत रहती है।
उस समय तीर्थ, क्षेत्र, पवित्रोदक, नदियाँ और समुद्र सब एक हो जाते हैं। चन्द्र, सूर्य आदि के साथ तीनों लोक
उस जल में डूब जाते हैं। अरे! ऐसे उस ऐक्यसमुद्र में परमेश्वर का विराट् देह भी विलीन हो जाता है। हे राजा!
उस समय साकार जैसी कोई वस्तु शेष नहीं रहती।
ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप।
अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२॥
श्लोक १२—प्रलयकाल में महाभयंकर पानी ऐसे उल्हास से उछलता है कि वह समस्त दृश्य पदार्थों का
विनाश कर डालता है। उस समय विराट् पुरुष का शरीर भी पिघल जाता है। ईंधन समाप्त होने पर जिस प्रकार
अग्नि अपने पूर्व स्वरूपं में चला जाता है, उसी प्रकार विराट् शरीर का अभिमानी 'वैराज' पुरुष अव्यक्त में
अर्थात् प्रकृति में प्रवेश करता है। जो कोई ब्रह्मलोक में रहने वाले होते हैं, उन्हें महाप्रलय के समय ब्रह्मदेव के
ही साथ मुक्ति मिलती है ऐसा श्रुतिस्मृति का वचन है। जिसे 'वैराजपुरुष' कहते हैं वह 'हिरण्यगर्भ' ही है। उसे
भी प्रलयकाल में अव्यक्त में प्रवेश करना पड़ता है। तो फिर ब्रह्मदेव के साथ वहाँ के लोगों को मुक्ति मिलती है,
ऐसा जो श्रुति में कहा गया है, उस वचन की क्या व्यवस्था की जाए? (अन्तरिक्ष बताते हैं-) राजा जनक ने
जिस माया का स्वरूप पूछा है, उस माया की शक्ति इतनी दुर्धर है कि यदि भगवद्भक्ति न की जाए तो ब्रह्मदेव
को भी वह मुक्ति नहीं मिलने देती। ब्रह्मलोक प्राप्त होने पर भी यदि भगवद्भक्ति न की जाए तो मुक्ति दुर्लभ
है। निश्चय ही भक्ति के पास मुक्ति दासी की तरह रहती है। भगवद्भजन न किया जाए तो ब्रह्मदेव को भी मुक्ति
नहीं मिलती तो परमार्थ में लगे अन्य ज्ञानाभिमानी लोगों की क्या बात की जाए ? जिसे जिस पद का अभिमान
रहता है, उसके लिए वही दृढ़ बन्धन होता है। इसलिए त्रिभुवन में मोक्ष दुर्लभ हो गया है। इसलिए स्वयं शंकर
भी अपने कैलास पद का अभिमान छोड़कर दिन रात महाश्मशान में (काशी क्षेत्र में) रहकर भगवद्भजन में
लीन रहता है। इसलिए हे राजराजेश्वर ! ब्रह्मलोक प्राप्त होने पर जो वहाँ भी भगवद्भक्ति करते हैं, उन्हें ही प्रलय
के अन्त में मुक्ति प्राप्त होती है। ब्रह्मलोक में रहकर जो हरि की भक्ति नहीं करते, वे पुनरावृत्ति के फेर में फँस
जाते हैं। ऐसी माया की शक्ति अत्यन्त दुर्धर है। सारांश यह कि यदि भक्ति न की हो तो मुक्ति किस बात की ?
इसी अर्थ का ब्रह्मदेव का वचन (भागवत में) दो श्लोकों में है। उसका भावार्थ यह है, "ज्ञानाभिमानियों का
पतन होता है और भक्तों को संसार बन्धन की कभी बाधा नहीं होती। श्लोक इस प्रकार है—"
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्त भावादविशुद्धबुद्धयः ।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ १॥
तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद्भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः ।
त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभु ॥ २॥
(भागवत, द० स्कं० पूर्वार्द्ध अ २)
भगवद्भक्ति न करने पर ज्ञानीजनों को भी मुक्ति नहीं मिलती। इसी अर्थ के दृष्टांत के लिए ब्रह्मदेव का