श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभैनात्ममृत्युना।
गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥१९॥
रात-रात भर मर कर कष्ट किया लेकिन उससे कौड़ी की भी प्राप्ति नहीं हुई। सारांश, धन प्राप्त करने के
लिए प्राणान्त कष्ट करने पड़ते हैं और ऐसे कष्ट से धन प्राप्त भी किया तो वह महादुःख का ही कारण बनता है।
धन अनर्थ का मूल है। अपने सर्वनाश का भी वही कारण है। धन न रहने पर उसे प्राप्त करने के लिए परिश्रम
करना पड़ता है। मिलने पर उसके सुरक्षा की चिन्ता करनी पड़ती है। प्राणि के लिए रात दिन हृदयरोग ही लग
जाता है। द्रव्य का लोभ अविश्वास से रहने के लिए बाध्य करता है। माँ-बाप से चोरी करना सिखलाता है।
स्त्री-पुत्रों में कलह शुरू कराता है। इष्टमित्रों को दूर करता है। ऐसा यह धन का स्वाभाविक गुण है। धन के
पास आधिव्याधि, धन के पास दुष्ट बुद्धि, धन के पास लोभ और क्रोध होता है, धन के पास असत्य सदैव रहता
है, धन के पास अनेक विकल्प होते हैं, धन पाप का केन्द्र बिन्दु होता है। सारांश, धन पूर्णरूपेण दुःख रूप ही
है। वही धन दानधर्म में खर्च करने से उसका उत्तम फल मिलता है लेकिन लालची व्यक्ति को वह नरक ले
जाता है। इस धन की तरह खराब वस्तु सारे त्रिभुवन में कोई नहीं है। नलिका में रखे चने की लालच में बन्दर
नलिका में हाथ डालकर अपना हाथ फँसा लेता है। उसी प्रकार कनककांता की अभिलाषा ही नरदेह को उस
दशा में पहुँचाती है। देखो, धन सहज ही नहीं मिल जाता और अगर मिल भी जाय तो अनीति से मिलने के
कारण हानिकारक होता है। इसलिए धन में सचमुच ही सुख नहीं है। लोग काफी सम्पत्ति खर्च कर बड़े शौक से
घर बनवाते हैं, लेकिन वह टिकाऊ न होने के कारण जल्दी ही गिर जाता है और धन के साथ-साथ जीवन भी
व्यर्थ चला जाता है। जीवन नष्ट कर, वीर्य खर्च कर पुत्र उत्पन्न करता है, वह पुत्र मर जाता है और दुःसह दुःख
के सागर में डूब जाता है। गृहस्थी में सभी सुहृद जब तक उनका स्वार्थ रहता है तब तक सगे-सम्बन्धी होकर
रहते हैं। लेकिन जब स्वार्थ का विरोध होने लगता है तो शत्रु बनकर चोट करने से नहीं चूकते। बड़ी हवस के
साथ गौ, घोड़े आदि अनेक प्रकार के पशु एकत्र करते हैं, इतने में वे पशु मर जाते हैं। उस दुःख से गृहस्थों को
कष्ट होता है। जब हमारा देह ही अशाश्वत है तो उससे खड़ा किया हुआ प्रपंच कैसे शाश्वत हो सकता है ? सारे
जगत को ही काल ने ग्रस लिया है। इस लोक में सभी विषय के ही जाल में फँसे हुए हैं। मनुष्यदेह कर्मभूमि में
आया हुआ है। यहाँ यज्ञ आदि कर्म करके उन कर्मों ने स्वर्ग को भी जीत लिया ऐसा कहते हैं। लेकिन जब यहाँ
इहलोक नश्वर है तो स्वर्ग भी वैसे ही नश्वर होगा।
एवं लोक परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम्।
सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥२०॥
मन में विषय भोग की इच्छा धारण कर इस जगत में यज्ञ करते हैं और पर्याप्त पुण्य प्राप्त कर उस पुण्य के
योग से स्वर्ग जाते हैं। स्वर्गसुख का अधिपति इन्द्र है लेकिन वह भी कहीं मेरा पतन न हो जाए इस भय से
आक्रान्त रहता है। तपस्वी लोगों पर वह विघ्न ढाता है। कुल मिलाकर स्वर्ग की स्थिति हानिकारक ही है। इस
प्रकार अपने पुण्य से स्वर्ग प्राप्ति होती है इसलिए उस स्वर्गलोक को 'पुण्यजित लोक' कहते हैं। लेकिन
पुण्यक्षय होते ही उनका भी क्षय होता है। इसलिए स्वर्ग के श्रेष्ठ पुण्यवानों को भय लगा रहता है। गाँठ में उत्तम
पुण्य होने पर स्वर्ग के भोग में अच्छा सुख प्राप्त होगा, यह कहना भी निखालस गलत है। हे राजा! उस स्वर्ग के
दुःख बताता हूँ, सुनो। जिनके पुण्य समसमान होते हैं, उन्हें समसमान पदों की प्राप्ति होती है। वे परस्पर स्पर्धा