श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ७१
और कलह करने लगते हैं। उसके मन में रात-दिन द्वेष जगाते हैं। जिस प्रकार इस लोक में मण्डलवर्ती राजा
राज्य के लालच से कलह करते हैं उसी प्रकार स्वर्ग में रहने वालों में भी कलह मचा रहता है और उस द्वेष से वे
अत्यन्त दुःखी रहते हैं। कहीं मेरा पतन न हो जाए इस भय से उनका झुकाव कलह और द्वेष की ओर रहता है।
इससे उनका अर्जित किया हुआ पुण्य नष्ट हो जाता है और बेचारे याज्ञिक अधोमुख होकर धराशायी हो जाते हैं।
(अर्थात् पृथ्वी पर जन्म लेते हैं) इस प्रकार जो स्वर्गसुख को आनन्द मानते हैं वे शुद्ध पशु हैं क्योंकि वहाँ द्वेष
और विनाश होता है और कलह तो नित्य चलता रहता है। वे किये हुए विषय का ही नित्य सेवन करते रहते हैं
किन्तु उनके मन की कभी तृप्ति नहीं होती। फिर भी यह मिथ्या है यह बात उनकी समझ में नहीं आती। यह भी
माया की ही मोहिनी शक्ति है। जिस प्रकार वेश्या धन लेने के बाद ग्राहक को दुत्कार कर निकाल देती है, उसी
प्रकार जो विषय से लिपट कर रहता है, उसे अधिक से अधिक दुःख प्राप्त होता है। इसलिए हे राजा ! जो दोनों
लोकों का भोग साधने में लगे रहे वे माया के योग से फँसते चले गये और उनका अधिकांश जीवन व्यर्थ गया
ऐसा समझो। कर्मभूमि में नरदेह खर्च करना यही भाग्य का सम्पूर्ण सार है। देवतागण भी नरदेह की कामना करते
हैं लेकिन वे भी विषय के चक्कर में व्यर्थ हो जाते हैं। इस प्रकार विषयासक्ति ने अपनी माया से कितने लोगों
को ठगा होगा इसका हिसाब कौन जाने ? इसलिए विषय की विरक्ति उत्पन्न करने के लिए गुरुभक्ति करनी
चाहिए। वही कथा
तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥ २१॥
विषय क्षणिक हैं यह जानकर पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति के लिए पूर्ण श्रद्धा धारण कर अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाना चाहिए। हे राजा ! केवल सद्गुरु वचन से ही मैं यह माया तर जाऊँगा ऐसे निश्चय से वह
एकनिष्ठ भक्ति धारण कर अपने इष्ट की प्राप्ति के लिए मुमुक्षु उसके चरणों में लगता है। जिसे 'गुरु' कहते हैं
उनके भी अनेक प्रकार हैं। हे राजा ! वे प्रकार भी तुम्हें बताता हूँ। सुनो! एक वेदाध्ययन कराने वाले गुरु होते हैं,
कोई भाषण देने में निपुण होते हैं, कोई ज्योतिष शास्त्र में निपुण होते हैं, लेकिन बुद्धिमान लोग उन्हें 'गुरु' नहीं
कहते। कोई आगमोक्त मंत्रों की उपासना करते हैं, शिष्य को मंत्र देते हैं और उसका विधिपूर्वक जप करने के
लिए कहते हैं। किन्तु उससे आत्मानुभव की प्राप्ति कब होगी इसे गुरु शिष्य दोनों को ही मालूम नहीं रहता। कोई
वायुधारणा (प्राणायाम आदि) सिखलाते हैं कोई अन्य प्रकार के ध्यान करके बताते हैं। कोई हठयोग की आदत
डालते हैं। कोई मुद्रा लगाना सिखलाते हैं। कोई ब्रह्मसंवाद में पटु हैं तो कोई तत्व निरूपण में कुशल हैं और कोई
वैराग्य सम्बन्धी भाषण इतने उत्तम ढंग से करते हैं कि उससे दोनों भोगों से घृणा हो जाती है। वे शुद्ध ब्रह्म का
निरूपण इस प्रकार करते हैं कि उसे सुनकर मनुष्य में प्रेम के सोते फूट पड़ते हैं। किन्तु अपने अंतःकरण का भ्रम
कैसे जाएगा इसका मर्म उनकी समझ में नहीं आता। घानी में डाला हुआ गन्ना जिस प्रकार नीचे के बर्तन में रस
भरता रहता है और स्वयं घानी में करकराता रहता है उसी प्रकार केवल शब्द ज्ञानी ज्ञान के निरूपण में उत्तम
वक्ता रहता है। वह अपने वक्तृत्व से लोगों का अच्छा मनोरंजन करता है लेकिन स्वयं अलिप्त रहता है उसकी
रोजी रोटी अच्छी तरह से चलती रहती है। उसे लोगों में मनचाही प्रतिष्ठा मिलती है लेकिन ऐसे गुरु से उच्चश्रेणी
की आत्मप्राप्ति की उत्कंठा पूरी नहीं होती। जिस प्रकार केवल 'अमृत' का उच्चार करने भर से उसकी रुचि नहीं
मालूम होती, उसी प्रकार शाब्दिक ज्ञान से उसे अनुभव का लाभ नहीं मिल पाता। जिसने स्वयं ही स्वाद नहीं