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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

उनतीसवाँ अध्याय ७९१
भी अच्छा नहीं लगता; परमार्थ की ओर उन्मुख होकर, वैराग्य के कारण जिसमें सद्भक्ति उत्पन्न हुई हो, भोजन के
समय अतिथि, पति और पुत्र जिसे एकसमान दिखायी देते हों, जिसके मन में धन का लोभ न हो, उसी को
परमार्थ का अधिकार है। जन्म-मरण से मुक्ति मिले यही जिसके मन की तिलमिलाहट हो और क्या मेरे संसार
का पाश तोड़ने वाला कोई धर्मदाता मिलेगा इस प्रकार जिसके मन में सद्गुरु प्राप्ति की लगन लगी हुई हो,
परमार्थ के लिये भक्तिभाव से जो अपनी काया, वाचा, मन, धन और जीवन को न्योछावर कर देती है, उद्धव!
इस प्रकार जो स्त्री निष्ठा से परमार्थ के प्रति उद्यत होती है, उसे उपदेश देने में कभी भी दोष नहीं लगेगा।
क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री अथवा शूद्र इनकी दृढ़ श्रद्धा देखकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से शिष्यों के दोष का निर्मूलन
होता है। ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से यदि गुरु को ही दोष लगता हो तो शिष्य का उद्धार कौन करेगा ? यह बात
ही असंबद्ध है। उपदेश करते समय पात्र की शुद्धता परखने के लिये ही मैंने इन दोषों का उल्लेख किया था। इन्हें
जाँच कर उपदेश करने से दोष नहीं रहता। यह ज्ञान प्राप्त करने के बाद, संसार में जानने के लिये कुछ भी नहीं
रह जाता; संसार समाप्त हो जाता है और दोष की बात ही नहीं रह जाती।
नैतद् विज्ञाय जिज्ञासोर्ज्ञातव्यमवशिष्यते।
पीत्वा पीयूषममृतं पातव्यं नावशिष्यते ॥ ३२ ॥
इस ग्रन्थ का ज्ञान जान लेने के बाद मुमुक्षु अथवा साधकों को जानने लायक कुछ शेष नहीं रहता। जिस
प्रकार अमृतपान करने के बाद और कुछ प्राशन करने की आवश्यकता नहीं रह जाती, उसी प्रकार यह ज्ञान प्राप्त
करने के बाद ज्ञातव्य और ज्ञातापन समूल नष्ट हो जाता है। (आशंका) धर्मार्थ काम मोक्ष के कितने साधन हैं,
उनका पता नहीं है। ऐसा होते हुए आपने केवल एक ही कैसे बताया ? (उत्तर) उद्धव ! जो अनेक साधन बताये
हैं, उन्हें अभक्त लोग सहन करते हैं। किन्तु मेरे भक्तों के लिये एक मैं ही साधन हूँ।
ज्ञाने कर्मणि योगे च वार्तायां दण्डधारणे।
यावानर्थो नृणां तात तावांस्तेऽहं चतुर्विधः ॥ ३३ ॥
मोक्ष के लिये 'ज्ञान' यह साधन है; धर्म के लिये 'स्वधर्माचरण' साधन है; संन्यासी के लिये दण्डधारण
साधन है; और उपजीविका के लिये 'व्यापार' साधन है। इहलोक और पारलौकिक सुख के लिये 'योगयाग'
करते हैं। चारों पुरुषार्थों के लिये अभक्तों को ही ये साधन बताये गये हैं। इन साधनों के संकट सहने पर भी उन्हें
उसमें सहजता से सिद्धि नहीं प्राप्त होती। अनेक विकलता के दोष उभर आते हैं, फिर देवता भी विघ्न उपस्थित
कर उनका छल करते हैं। वैसा मेरे भक्तों के साथ नहीं होता। मेरा अनन्य भजन करने पर चारों पुरुषार्थ उसकी
ही शरण में आते हैं और देवतागण भी उसके पैर छूते हैं। उद्धव ! जो अनन्यभाव से मेरी शरण में आते हैं उनका
धर्म और अर्थ मैं ही हो जाता हूँ, उनका काम भी मैं ही होता हूँ और उनका सम्पूर्ण मोक्ष भी मैं ही होता हूँ।
उद्धव ! अभक्तों को पुण्य भोगों के क्षय से पुनरावृत्ति प्राप्त होती है और भक्तों को भोग भोगते हुए भी नित्यमुक्ति
रहती है। मेरी भक्ति की इतनी योग्यता है, यह जान लो। देव का यह भाषण सुनकर कर उद्धव का प्रेम उफन
उठा; उस प्रेम पर श्रीकृष्ण भी लुब्ध हुए और हर्षपूर्वक बोलने लगे। हे उद्धव ! साक्षात भगवान जो मैं हूँ, वही
तुम्हारे चारों पुरुषार्थ हैं। इस प्रकार आनन्द से बोलकर उन्होंने प्रेम से उसे आलिंगन दिया। इस प्रकार हर्ष से
आलिंगन देते ही कृष्ण अपना कृष्णपन भूल गये और उद्धव स्वानंद में निमग्न होकर अपना उद्धवपन भूल गया।
आलिंगन का चमत्कार ऐसा हुआ कि दोनों का दूजापन समाप्त हो गया और वे परिपूर्ण चैतन्यस्वरूप और

७९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वानंदघन बन गये। फिर हेतु दब गया, वेद मौन हो गये; और एक में एक मिलकर देव और भक्त एक हो गये।
तब धर्माधर्म का अस्त हो गया। क्रिया के साथ कर्म नष्ट हो गया और भ्रम और विभ्रम का नाम भी शेष नहीं
रहा। भेद अभेद को ले गया। बोध अपने साथ आत्मबोध को ले गया और आनन्द का आनन्द लजा गया। उद्धव
ऐसे स्वरूप में पहुँच गया। 'मैं परब्रह्म स्वरूप हो गया' यह भी मुख्य रूप से भ्रम ही रहता है। श्रीकृष्ण के
आलिंगन का यह विशेष गुण है कि उससे उद्धव निरुपम ब्रह्मस्वरूप हो गया। तदुपरान्त सर्वज्ञ श्रीकृष्ण ने उद्धव
का आलिंगन छुड़ा कर उसे ऐक्यज्ञान से ही उसके भक्त होने का ज्ञान कराया। तब उद्धव को बड़ा आश्चर्य
हुआ। क्षणभर के लिये वह तटस्थ खड़ा रहा। फिर बोला, यह आत्मस्वरूप स्वतः सिद्ध अपने पास होते हुए,
लोगों को मालूम नहीं होता, फिर वह साधकों के हाथ कैसे लगेगा? उद्धव के मन की बात जानकर उसका
निश्चित उपाय श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे।
तदाऽमृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयाऽऽत्मभूयाय च कल्पते वै ॥ ३४॥
धर्म, अर्थ, काम-मोक्षप्राप्ति के जो साधन बताये गये हैं, उन सबको छोड़कर जो अनन्य भाव से, विश्वास
से और भक्ति से मेरी शरण में आते हैं, उन्हें हे उद्धव! तुमने अभी-अभी अनुभव की हुई स्वरूप स्थिति अर्थात्
आत्मप्रतीति प्राप्त होती है, यह निश्चित रूप से जान लो। धर्मार्थ कामवासना होते हुए भी मेरी भक्ति में लगने से
मैं उनकी वह वासना भी पूर्ण कर उन्हें सायुज्य पद तक पहुँचाता हूँ। भक्तों को यदि स्वधर्म कर्म में रुचि हो और
यदि वह उन कर्मों को मेरे भजन मार्ग में लगाता है, तो उस स्वधर्म में अकर्मता किस प्रकार होती है इसका मैं
अपने भक्तों को उपदेश करता हूँ। अथवा, यदि कोई भक्त सुखोपभोग की इच्छा करता है तो उस सुख का
उपभोग करते समय किस प्रकार निष्काम रहना चाहिये, इस ज्ञान का मर्म भी मैं आत्माराम उन्हें बताता हूँ। कोई
भक्त दरिद्र होने के कारण यदि विपुल धन माँगता है तो मैं उन्हें अपना षडगुणैश्वर्य ही अर्पण करता हूँ। भक्त
यदि सर्वभूतों में मेरी भक्ति रखता है और अनन्य प्रीति से मेरा भजन करता है तो चारों मुक्ति उसकी शरण में
आती हैं, क्योंकि मेरे भक्तों को मुक्ति स्वतः सिद्ध होती है। वैद्य यदि सचमुच ही धन्वंतरी, अर्थात् प्रवीण हो तो
वह रोगी की वासना पूर्ण कर, उसकी मनचाही चीज उसे खाने को देकर भी, अपनी रासायनिक कुशलता से उसे
बचा लेता है। उसी प्रकार भक्त की धर्म-अर्थ-काम ये वासनायें पूर्ण करके भी मैं उसे सायुज्य पद तक पहुँचाता
हूँ। उद्धव! नाना प्रकार के साधनों का अभिमान छोड़ जो मेरी शरण में आता है, उसे भी पूर्ण स्वरूप की प्राप्ति
होती है, यह निश्चित रूप से जान लो। भक्त मन में सकाम हो और वह यदि अनन्य भाव से मेरी भक्ति करे, तो
उसकी वह इच्छा पूर्ण कर मैं उसे मुक्ति प्रदान करता हूँ। भक्तों की अधोगति कभी नहीं होती। जिस प्रकार
बालक किसी हठ के कारण माँ के पैर पकड़ लेता है तो वह चाहे जितना पैसा खर्च करके भी उसे वह चीज ला
देती है। उसी प्रकार मेरी अनन्यभक्ति करते समय, भक्त मन में जो भी इच्छा करता है उसे पूर्ण कर मैं उसे मुक्ति
दिलाता हूँ किन्तु उसकी अधोगति नहीं होने देता। बच्चे का दुःख देखकर जिस प्रकार माँ छटपटाती है, उसी
प्रकार मेरे भक्त का दुःख मुझसे नहीं सहा जाता। उसकी भोगेच्छा पूर्ण कर उसे मुक्ति दिलाने की शक्ति क्या
मुझमें नहीं है? मैं श्रीपति भक्तों का रखवाला होने के कारण कभी उनकी अधोगति नहीं होने देता। मेरा नाम
अकस्मात भी यदि अंतकाल में मुख में आ जाय, तो जब रंक को भी सायुज्य प्राप्ति होती है तो मेरी अनन्यभक्ति
करने पर भक्तों की दुर्गति कैसे होगी? मेरा भक्त कृपादृष्टि से जिसकी ओर देखे, उसे भी मेरी भक्ति प्राप्त होती

उनतीसवाँ अध्याय ७९३
है। फिर मेरे भक्तों की अधोगति कैसे होगी? मैंने स्वयं गर्भवास भोग कर अंबरीष को मुक्त किया और
हिरण्यकश्यपु का विदारण कर प्रह्लाद का संरक्षण किया। मैंने हाथ में चक्र लेकर परीक्षित का गर्भ में संरक्षण
किया। मैं भक्तों की कल्पांत में भी अधोगति नहीं होने दूँगा। मेरे भक्त के नाम पर मैं तृण का भी उद्धार करता हूँ।
फिर जो जीवभाव से मेरा भजन करते हैं, उन भक्तों की अवनति कैसे होगी? काया, वाचा, मन तथा धन न
छिपाकर जो अनन्यभाव से मेरी शरण में आते हैं, उनके कुशलक्षेम का भार मैं श्रीकृष्ण स्वयं सहन करता हूँ।
ऐसी अनन्यभक्ति की महिमा का वर्णन करते समय श्रीकृष्ण को भी उल्हास प्राप्त हुआ जिससे उद्धव को भी प्रेम
का ज्वार आया, उसके सारे शरीर से पसीना चुहचुहाने लगा और उसके शरीर पर रोमांच उभर आये। भक्ति की
यह महिमा सुनकर तथा उद्धव का वह पूर्ण प्रेम देखकर शुक्राचार्य को भी आनन्द हुआ और वे आत्मानंद में
झूमने लगे। अत्यन्त हर्षपूर्वक उन्होंने परीक्षित से कहा, भक्त त्रिभुवन में धन्य हैं। उन्हें सर्वतोपरी मुक्ति होने की
बात श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने मुख से कही है। भक्ति की महिमा जिस प्रकार अगाध है, उसी प्रकार उद्धव का प्रेम
भी अगाध ही था। उद्धव के उस प्रेम का लक्षण श्रीशुक्राचार्य स्वयं ही बताते हैं।
श्रीशुकउवाच
स एवमादर्शितयोगमार्गस्तदोत्तमश्लोकवचो निशम्य।
बद्धाञ्जलिः प्रोत्युपरुद्धकण्ठो न किंचिदूचेऽश्रुपरिप्लुताक्षः॥ ३५॥
विष्टभ्य चित्तं प्रणयावधूर्णं धैर्येण राजन् बहुमन्य मानः।
कृताञ्जलिः प्राह यदुप्रवीरं शीर्ष्णा स्पृशंस्तच्चरणारविन्दम्॥ ३६॥
जो ज्ञाताओं का ज्ञाननिधि है, जो आत्मज्ञान का सागर है, जो आनन्द की क्षीराब्धि है, वह श्रीशुक आत्मानंद
से सन्तुष्ट होकर बोलने लगा। हे श्रवण सौभाग्य चक्रवर्ति परीक्षित राजा! बताता हूँ, सुनो। देव, दानव, मानव
जिसका वर्णन करते हैं और महासिद्ध भी जिसकी स्तुति करते हैं; जिसका वेद निरन्तर गायन करते हैं, योगी वृन्द
भी जिसकी कीर्ति की प्रशंसा करते हैं, उस श्रीकृष्ण ने परम प्रीति से भक्ति की निर्मल स्तुति की सचमुच अनन्य
भक्ति की अपेक्षा अन्य कोई सुख नहीं है। देवताओं को भी भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ लगती है। भक्तियोग का समूल,
सप्रेम और शुद्ध योगमार्ग श्रीकृष्ण ने उद्धव को श्रीमुख से सम्पूर्ण बताया और उद्धव ने उसे ध्यानपूर्वक सुना।
भक्ति का वह निरूपण सुनकर उद्धव का मन द्रवित हो उठा, आँखें अश्रुओं से भींग गयी और स्वानंद की बाढ़
आ गयी। शरीर रोमांचित हो उठा, चित्त को हर्ष हुआ, गला भर आया और शरीर पर स्वेदबिन्दु चमकने लगे।
प्राण अपनी जगह स्थिर रह गया, शरीर थोड़ा काँपने लगा, आँखें अर्धोन्मीलित होने लगीं। औत्सुक के अत्यन्त
प्रेम से आत्मानंद में चित्तवृत्ति स्थिर हो जाने के कारण उद्धव का देह विलीन होने लगा लेकिन प्रारब्ध ने ही
उसकी रक्षा की। जिस प्रकार पानी में डूबती हुई नौका को डोर ही सँभाले रखती है, उसी प्रकार विलीन होने को
उद्यत उद्धव को प्रारब्ध ने ही रोक कर रखा। फिर उसने अत्यन्त धैर्यपूर्वक प्रेम के आवेग को रोका और उसे
कृतकृत्य होने का विश्वास हुआ। श्रीकृष्ण ने मेरा उद्धार किया यह बहुत बड़ा उपकार किया, अब किस तरह
उसकी पूर्ति की जाय? वह मन ही मन इस प्रकार का विचार करने लगा। गुरु को यदि चिन्तामणि दिया जाय तो
वह गुरु की चिन्ता ही बढ़ाता है। गुरु ने तो अचिंत्य वस्तु दी है, उसकी पूर्ति कभी नहीं होगी। गुरु को यदि
कल्पतरु दें तो वह कल्पना ही बढ़ाता है। गुरु ने तो निर्विकल्पता प्रदान की है अतः उसकी पूर्ति उससे भी नहीं
होगी। गुरु को पारस दें तो वह धातु को स्पर्श कर उसे सुवर्ण बनाता है; किन्तु गुरु के चरणस्पर्श से ब्रह्मस्वरूप

७९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्राप्त होता है, अतः पारस देने से भी उसकी पूर्ति नहीं हो पायेगी। गुरु को यदि कामधेनु लाकर दें तो वह धन
देकर कामना बढ़ाती है और गुरु तो निष्काम बुद्धि से निर्गुणदान देते हैं अतः उसकी पूर्ति के लिये कामधेनु भी
उपयुक्त नहीं है। त्रिभुवन की सारी उत्तम सम्पत्ति यदि गुरु को दें तो वह मायिक है। जिन्होंने अमायिक वस्तु दी
है उसकी पूर्ति किससे होगी? देह से यदि गुरु के उपकार की पूर्ति की जाय तो देह तो नश्वर है। नश्वर से
अनश्वर की पूर्ति तो नहीं हो पायेगी। जिसने बड़ी चाह से दाहिने हाथ का शंख दिया उसे फूटी कौड़ी देकर उस
उपकार की पूर्ति कर सन्तुष्ट हो उसी प्रकार यह देहभाव वाली बात है। यदि गुरु को प्राण देकर उनके उपकार
की पूर्ति करें तो वह तो मिथ्या है। जिसने सत्य ब्रह्म हमें दिया है उसे मिथ्या देते समय लज्जा नहीं आती ?
जिसने अमूल्य रत्न दिया है, उसे वंध्यापुत्र दें; उसी प्रकार जीवभाव मिथ्या होने के कारण उससे उपकार की पूर्ति
नहीं होगी। इस प्रकार काया, वाचा, मन, धन और प्राण अर्पण करने से भी गुरु के उपकार की पूर्ति नहीं होगी,
यह उद्धव ने अच्छी तरह जान लिया। जिसमें अणुमात्र का भी दुःख नहीं है ऐसा आत्मसुख जिसने दिया, उस
गुरु के उपकार की पूर्ति करने में शिष्य के पास कोई रास्ता नहीं है। इसलिये उद्धव ने साष्टांग दण्डवत किया
और श्रीकृष्ण के चरणों को पूरी तरह मस्तक पर धारण किया। देखो! पहले श्रीकृष्ण ने ही 'तुम्हारा शोक और
मोह समाप्त हो गया न' ऐसा प्रश्न उद्धव से किया था। इसलिये उद्धव को आश्चर्य हुआ था और उसे उत्तर देने
का होश ही नहीं रहा। इसलिये अब उसके चरणों का वन्दन कर, हाथ जोड़कर, उत्तर देने के लिये वह श्रीकृष्ण
के मुख की ओर देखने लगा। चन्द्रमा के किरण सेवन करने पर जिस प्रकार चकोर तृप्त हो कर ढकार देता है,
उसी प्रकार उद्धव भी श्रीकृष्ण सुख पर निर्भर होकर क्या उत्तर देगा, देखिये।
उद्धव उवाच
विद्रावितो मोहमहान्धकारो य आश्रितो मे तव संनिधानात्।
विभावसोः किं नु समीपगस्य शीतं तमो भीः प्रभवन्त्यजाद्य ॥ ३७॥
जो समस्त देवताओं में श्रेष्ठ, जो यादवों में अग्रगण्य, जो अविद्या रात्रि का सूर्य, जो ब्रह्मवेत्ताओं का
शिरोमणि है ऐसे श्रीकृष्ण को स्वानंद की स्फूर्ति से अपनी स्थिति का वर्णन करते समय उद्धव मुख्य रूप से
श्रीहरि की स्तुति करने लगा। उसने कहा, विचार करने से लगता है कि ब्रह्मदेव यह सबका आदिकर्त्ता है; लेकिन
वह भी वास्तव में 'अज' इस नाम से नारायण की नाभि से उत्पन्न हुआ। तो तुम कमलनाभि नारायण ही
मायासंबलित ब्रह्म हो। उस माया के आद्य कारण तुम हो; इसलिये आद्य स्वरूप तुम पर ही शोभित होता है।
अविद्या की महारात्रि में, मोहरूपी अन्धकार में भी फँसा हुआ था। उसमें से बाहर आने के लिये किसी दूसरे का
सामर्थ्य काम न आता। इसलिये तुम्हारे वचनरूपी सूर्य से शोकमोहरूपी अन्धकार को नष्ट कर अत्यन्त चमत्कार
से मुझे बाहर निकाला। तुम्हारे निकट अविद्या का ठौर ही नहीं है। श्रीकृष्ण! तुम्हारे रहते मोह ममता का क्या
प्रभाव होगा? घनघोर अँधेरी रात्रि में जो शीत से ठिठुर रहा हो उसे यदि आग मिल जाय तो जाड़ा और अन्धकार
दोनों तत्काल भाग जाते हैं। उस अग्नि को यदि सदा साथ में ही रखा जाय तो शीत और अँधेरे के भय की कभी
पीड़ा नहीं होगी। तुम्हारे सान्निध्य का यह फल है। इस प्रकार मोह ममता से माया 'लोगों को संसारपाश में बाँध
लेती है; लेकिन तुम्हारे पास आते ही वह अपने आप अदृश्य हो जाती है। जन्म-मरण के दुःख पहले भी अनेक
बार भोगे हैं; लेकिन जिसे तुम्हारा सान्निध्य प्राप्त होता है, उसे वह भय समूल मिथ्या लगता है। तुम्हारे सान्निध्य
से माया का समूल निर्दलन होता है। इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं कर रहा है।

उनतीसवाँ अध्याय ७९५
प्रत्यर्पितो मे भवतानुकम्पिना भृत्याय विज्ञानमयः प्रदीपः।
हित्वा कृतज्ञस्तव पादमूलं कोऽन्यत् समीयाच्छरणं त्वदीयम्॥ ३८ ॥
केवल तुम्हारा सान्निध्य ही अज्ञान का निघातक है, और यह बात सात्त्विक भक्तों को भली-भाँति मालूम
है। औरों की बात तो है ही लेकिन स्वयं मैंने भी अनुभव लिया है। अविद्या को समाप्त करने के लिये
सत्संगति ही समर्थ है। सत्संग में भी तुम्हारी संगत अत्यन्त पवित्र है। दीनों का उद्धार करने के लिये तुमने ही
यह आत्मज्ञान प्रकट किया है। मेरा बहाना बनाकर दीन जनों का उद्धार हो अज्ञान का विनाश हो, इसलिये
तुमने ज्ञानदीप पूरी तरह प्रज्वलित किया। उपदेश के लिये श्रद्धा उत्पन्न होना आवश्यक है। वही कसोरे में भरा
हुआ तेल है। विवेक वैराग्य धारण करना यह उसमें की बाती है। वहाँ ज्ञानधन चित्रभापूर्ण महाद्वीप प्रज्वलित
किया हुआ है। नैराश्य ही वैराग्यधारण है। उसमें ही ज्ञानदीप पूर्णरूप से प्रज्वलित होता है और आशा ही उस
दीप को बुझाना है। दीप बुझाने के बाद वहाँ चारों ओर अँधेरा छा जाता है। उस दीप को कर्णद्वार में रखा तो
उसका अंतर्बाह्य प्रकाश फैल गया। अज्ञान-अन्धकार नष्ट होकर वह दीपक स्वयं से प्रदीप्त हो गया। उस
अंतर्बाह्य सप्रकाश से तुम्हारा स्वरूप स्पष्ट दिखायी देने लगा। इस प्रकार हृषीकेश ने स्वयं ही अपना स्वरूप
मुझे अनायास अर्पण किया। तुमने अंतर्यामित्व से अपना स्वरूप मुझे पहले ही दिया था, किन्तु अपना भजन
प्रकट हो इसलिये तुमने उसे समेट लिया। तुम्हारे सच्चे भजन का लक्षण यह है कि सभी भूतों के प्रति
भगवद्भजन करें। इस प्रकार तुम सचमुच प्रसन्न होकर पहले अर्पण किया हुआ ज्ञान ही पुनः अर्पण करते हो।
आत्मभजन की वृद्धि कर मेरा ही ज्ञान मुझे अर्पण करते हो। इसे ही ज्ञानी लोग 'प्रत्यर्पण' कहते हैं। अपनी
भक्ति बढ़ाकर मेरा ही ज्ञान मुझे प्रदान किया जिससे माया और विकल्पवृत्ति मुझे स्पर्श भी नहीं करती। जो
स्वरूप स्थिति तुमने दी उसे कल्पांत में भी छिपाया नहीं जा सकता। इस प्रकार हे श्रीकृष्ण! तुमने सचमुच
बड़ी कृपा की। इस प्रकार तुम अत्यन्त कृपालु हो और अपने दासों के प्रति सदय हो। तुम्हें छोड़कर अनाड़ी
लोग दूसरों का भजन करने दौड़ते हैं। स्वामी श्रीकृष्ण को छोड़कर जो दूसरे के भजन में लगता है, उसे
हरिभजन पर विश्वास नहीं है, वह शुद्ध पशु ही नहीं, अपितु पशुओं में भी निरा गधा है। तुमने लोगों पर जो
उपकार किया है, अव्यंग इन्द्रिय देकर ज्ञान का अधिकार दिया है, यह उपकार जो मनुष्य भूल जायगा वह
सचमुच ही कृतघ्न है। जो कोई तुम्हारा उपकार जानता है, वह काया, वाचा, मन और धन देकर किसी अन्य
को नहीं भजता, इस बात का मुझे विश्वास हो गया। मेरे बहाने तुमने जो आत्मज्ञान प्रकट किया, उसके श्रवण
से, मनन से और कीर्तन से पूरे संसार का उद्धार होगा। इस प्रकार तुम पूर्ण कृपालु हो, इसीलिये मेरा
संसारबंधन तोड़ दिया, इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं कर रहा है।
वृक्णश्च मे सुदृढः स्नेहपाशो दाशार्हवृष्ण्यन्धकसात्वतेषु।
प्रसारितः सृष्टिविवृद्धये त्वया स्वमायया ह्यात्मसुबोधहेतिना ॥ ३९ ॥
तुमने माया से लोग उत्पन्न किये हैं, सृष्टि को बढ़ाने के लिये स्त्री, पुत्र, सुहृद, सज्जन इनके प्रति स्नेह पूरी
तरह बढ़ा दिया है। मैंने यादवकुल में जन्म लिया। उसमें वृष्णि, अंधक, सात्वत आदि सारे भाई, आत्मीयता के
कारण मुझे प्रिय लगते थे। लेकिन मेरे बचपन में मैं खेलते समय जब मुझे तुम्हारा ध्यान लगा हुआ था, उसी
समय, इन भाईयों तथा स्त्रीपुत्रों के स्नेहपाश का बन्धन तुमने ही तोड़ डाला है। जिस प्रकार मदारी खेल
दिखलाने के पहले अपनी मोहिनी विद्या का असर फैलाता है, उस प्रभाव को दूर करने की सामर्थ्य केवल उस

७९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मदारी में ही होता है, उसी प्रकार तुम्हारी यह माया तुम्हारे ही वश में रहती है, उसके स्नेहपाश भयंकर हैं, उसने
लोगों को बद्ध करके रखा है। तुमने मेरे वे पाश पहले ही तोड़ दिये हैं। जब मेरी बाल्यावस्था थी, तभी तुमने मुझ
पर कृपा की थी। संसार बन्धन काटने वाला शस्त्र तुमने धार तेज कर मेरे हाथ में दिया है। अब इस शस्त्र के बल
पर मैं संसार का बन्धन भी तोड़ सकूँ, इतनी तुमने दयालु होकर मुझ पर कृपा की है। संसार जो दुःखरूप था वह
मेरे लिये सुखरूप हो गया। इस प्रकार तुमने कृपा का वरदहस्त रखकर मेरा सचमुच उद्धार किया। इससे मैं
कृतकृत्य हो गया हूँ, लेकिन अब मैं तुमसे कुछ माँगने वाला हूँ, उसे देने की श्रीकृष्ण कृपा करें। इतना कह कर
वह श्रीकृष्ण के चरणों में गिर गया।
नमोऽस्तु ते महायोगिन् प्रपन्नमनुशाधि माम्।
यथात्वच्चरणाम्भोजे रतिः स्यादनपायिनी ॥४०॥
जो घटना सम्भव नहीं होता, उसे सम्भव कर देते हो, अलौकिक चमत्कार दिखाते हो, चैतन्य और जड़
देह का विवाह कराकर माया से उनका उत्तम संसार बसा देते हो। जो योगियों के लिये भी कठिन है, जिसने
ब्रह्मदेव और शंकर को भी छला, वह माया तुम्हारी दासी है। तुम परात्पर महायोगी हो। तुम्हारी उस कृपा के
कारण ही मैं आज कृतकृत्य हुआ। संसार भय आदि दुःखों का भान ही न रहकर मैं सर्वदा स्वानंद में ही निमग्न
रहता हूँ। दृश्य, द्रष्टा, दर्शन यह त्रिपुटी भी नहीं है और त्रिगुण में नहीं हैं; आत्मबोध से पूर्णानंद प्राप्त होने के
कारण 'मैं' 'तू'पन के भाव का विलय हो गया। आत्मज्ञान के कारण स्वानंद पूर्ण हो गया यह कहना भी मायिक
है क्योंकि, परादि चारों वाणियाँ मूक हो गयीं, इसीलिये वेदवाद मौन हो गये। कार्य, कारण और कर्त्तव्यता मेरे
लिये नहीं रह गये। फिर भी हे श्रीकृष्णनाथ! मैं अब तुमसे कुछ तो माँगूँगा। माँ जिस प्रकार बालक का हठ
आत्मीयता से सुनती है, उसी प्रकार मेरी माँग भी तुम सुन लो। यह मेरी अन्तिम माँग है। भगवान इसे ध्यान
देकर सुनें, यह कह कर उसने श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन कर विचित्र-सी माँग प्रस्तुत की। मुझे भ्रम था कि
जीवन्मुक्ति बड़ी मधुर पीड़ा होगी, लेकिन उसमें मुझे तुम्हारी भक्ति नहीं दिखायी देती। इसलिये वह शुष्क मुक्ति
मुझे नहीं चाहिये। इसलिये मैं पुनः तुम्हारी शरण में आया हूँ। सद्गुरु के वचन से शिष्य को तत्काल मुक्ति
मिलती है, लेकिन जिसमें सद्गुरु की भक्ति नहीं है, उस मुक्ति को आग लगे। मुझे वह नहीं चाहिये। इसलिये मैं
पुनः तुम्हारी शरण में आया हूँ; मुझे तुम अपना गुरु भजन दो। पहले अनेकों ने भक्ति की, उन्हें मैंने मुक्ति ही दी,
लेकिन उनमें से किसी ने मुक्ति के बाद भक्ति नहीं माँगी ऐसा यदि कहोगे तो पहले जिन्होंने तुम्हारी भक्ति की
थी उन्हें तुमने मुक्ति देकर फँसाया लेकिन तुम्हारी यह चातुरी मेरे साथ नहीं चलेगी। क्योंकि जिनकी वृत्ति
अहंकारशून्य होकर जो सहज ही आत्मारामस्वरूप हो गये, वे भी तुम्हारी निष्काम भक्ति करते हैं। तुम्हारे स्वरूप
का यही धर्म है। अतः तुम्हारी गुरुभक्ति के बजाय मुक्ति माँगना यह केवल भ्रम है। तुम्हारी वह मुक्ति मुझे नहीं
चाहिये। मुझे गुरुभक्ति ही दो। जब स्वयं ही मुक्ति प्राप्त हो गयी, उसे अब भक्ति नहीं दी जा सकती, ऐसा यदि
तुम कहोगे तो ऐसी बातें मुझे न समझाओ। तुम्हारा सामर्थ्य मैं अच्छी तरह जानता हूँ। जो कभी हो नहीं सकता,
उसे तुम सम्भव कर देते हो; जो हिल नहीं सकता उसे हिला देते हो; जो किसी से नहीं हो सकता वह तुम कर
देते हो, तुम्हारे सामर्थ्य का अन्त नहीं है। हे श्रीराम! सेतु बाँधने के लिये तुमने डूबते हुए पत्थरों को तैरा दिया
और उसके ऊपर से वानर सेना को ले गये। जंगल में रहने वाले और पेड़ के पत्ते खाने वाले वे वानर उनकी
दासी चारों मुक्त हो गये और बड़े-बड़े देवता भी उन्हें नमन करने लगे। जो व्यभिचारिणी तथा गोबर में खेलने

उनतीसवाँ अध्याय ७९७
वाली ग्वालिनें थीं उनके पैरों पर मोक्ष आ लगा और उनकी चरण रज को ब्रह्मदेव ने भी दण्डवत किया। तुम
परमात्मा परमेश्वर हो, यह बात उन ग्वालिनों को तथा वानरों को नहीं मालूम थी। फिर भी तुम्हारी भक्ति ही
उन्हें सचमुच परब्रह्मस्वरूप के कारण मालूम हुई। इस प्रकार तुम्हारा भजन अगाध है, उसकी महिमा भी समझ
से बाहर है; तुम्हारा देवत्व यदि भक्ति के ही अधीन है, तो फिर मोक्ष में अधिक क्या है? भक्ति से ही मुक्ति का
जन्म हुआ, भक्ति के कारण ही वह बढ़ी; वही मुक्ति यदि भक्ति के विनाश का कारण बनती है तो ऐसी
मातृघातक मुक्ति को मैं स्पर्श भी नहीं करूँगा। जिससे मुक्ति पर आया हुआ दोष दूर होकर वह अत्यन्त पवित्र
होगी, ऐसी एक गुप्त बात मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रीकृष्ण ! उसे कृपया ध्यानपूर्वक सुनें। वह गुप्त बात यही है कि
मोक्ष प्राप्त होते हुए भी आप मुझे अपना गुरुभजन भी दें, उससे मुक्ति भी पावन होगी। इतना कहकर उसने
श्रीकृष्ण को साष्टांग दण्डवत किया। उद्धव ने श्रीकृष्ण के चरण अपने मस्तक पर रखे, वह उसे छोड़ ही नहीं
रहा था। इससे श्रीकृष्ण आश्चर्यचकित हो गया और उसे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उद्धव ने कहा, मैं मुक्त हो गया
यह जानकर भी मैं तुम्हारा भजन नहीं छोड़ूँगा। मुझ पर ऐसी ही कृपा करो। पूर्ण मुक्तता प्राप्त होने के बाद मुझे
सद्गुरु भजन का लाभ नहीं मिलेगा, लेकिन मुझे इस विघ्न की बाधा न हो ऐसी भक्ति मुझे बतायें। तुम कहोगे
कि कोटि-कोटि जन्म लेने पर भी जब मुक्ति नहीं मिल पाती, उस मुक्ति को ही तुम विघ्न कहते हो ? तुम पक्के
मूर्ख हो। लेकिन जिसके कारण तुम्हारा भजन छूट रहा हो, उसे मैं बहुत बड़ा विघ्न समझता हूँ। हे श्रीकृष्ण !
तुम्हारी भक्ति के बिना मिली हुई मुक्ति मुझे स्वादहीन लगती है। हे श्रीकृष्ण ! ऐसी कृपा करो कि मेरी
नित्यमुक्तता भी न टूटे और अहेतुक भक्तिमार्ग भी चलता रहे। इसमें जरा भी संकोच न करो। तुम कहोगे, मैंने
तुम्हें नित्य मुक्ति दी; लेकिन मुक्ति तो मेरे पास तैयार ही थी। वह तुमने मुझे दी यह कहना व्यर्थ है। दातृत्व का
यह व्यर्थ का ही अहंकार है। अब मैं आपसे भक्ति माँग रहा हूँ, उसे आप दें तभी आप सच्चे दाता हैं, इसी को
मैं आपकी उदारता कहूँगा। लेकिन प्रसन्न होकर मुझे भक्ति दिलाने में आपको उत्साह नहीं दिखायी देता। कृष्ण !
आप मेरे प्रति अत्यन्त कंजूस हो गये हैं। सद्गुरु भक्ति को नष्ट करने वाली जीवन्मुक्ति हमें बिलकुल नहीं
चाहिये। उसे मुक्ति कहना यह भी भ्रांति है। हे श्रीकृष्ण ! जब बद्धता ही नहीं है, तो फिर मुक्ति कहाँ से आयी ?
अतः ऐसी मिथ्या मुक्ति को मैं स्पर्श भी नहीं करूँगा। मेरी गुरुभक्ति ही मुझे दे दो। पहले तुमने जिन्हें मुक्ति
दिलायी थी, उन्हें भी तुमने ऐसा ही ठगा था। मुझे इस प्रकार की झूठी आशा मत दिलाओ। मोक्ष से ऊपर जो
भक्ति है वही मुझे दीजिये। यह कह कर उसने साष्टांग दण्डवत किया और उसके दोनों चरण पकड़ लिये। तब
श्रीकृष्ण के प्रेम को भी ज्वार आ गया और वह उद्धव पर अत्यन्त प्रसन्न हो उठा। मोक्ष से भी श्रेष्ठ जो
गुरुभक्ति, वही उद्धव ने अनेक युक्तियों से माँगी और उस समय उसने जो भाषण किया उससे श्रीकृष्ण अत्यन्त
सन्तुष्ट हुआ। प्रेमसुख में वह झूमने लगा। उसी सुखमय स्थिति में उसने भक्ति और मुक्ति दोनों ही उद्धव को
अर्पण की। संसार में उद्धव ही पुण्य शुद्ध है; संसार में उद्धव ही सबसे धन्य है क्योंकि श्रीकृष्ण ने उसे मोक्ष से
भी श्रेष्ठ गुरुभजन अर्पित किया। गुरु और ब्रह्म दोनों एक ही हैं, यह भी पूरी तरह सद्गुरु ही सिखाते हैं।
इसलिये मोक्ष से भी श्रेष्ठ जो गुरुभजन है, उसका सच्छिष्य को दोष नहीं लगता। पहले श्रीकृष्ण ने सन्तुष्ट
होकर अपने भक्तों को उन्होंने माँगी हुई मुक्ति दी थी। लेकिन उन्हें इस भक्ति का आकलन ही नहीं हुआ।
लेकिन उद्धव ने उन सब पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की। मुक्ति के मस्तक पर भक्ति को बिठाया और दुर्गम स्थिति
माँगी जो श्रीकृष्ण ने उसे दी। उद्धव ! मुक्ति से भी श्रेष्ठ जो भक्ति है, वही मेरे अवतारों की अवतारशक्ति है।
उसी के योग से मैं श्रीपति उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कर अन्त में अलिप्त ही रहता हूँ और सचमुच इसी के

सामर्थ्य से मैं कर्म करके भी अकर्ता और भोग करके भी अभोक्ता बना रहता हूँ। यह योग जिसकी समझ में
नहीं आता उसे यह संसार दुःखस्वरूप हो जाता है; लेकिन मेरे पास यह योग अखण्ड होने के कारण मैं संसार
में रहते हुए भी सुखस्वरूप ही हूँ। यह योग शंकर जानता है और मैं जानता हूँ। वह योग दुर्गम होने के कारण
दूसरों की समझ में नहीं आता। यह गुप्त बात श्रीकृष्ण ने बतायी और वह उद्धव के मन में बैठ गयी। आत्मज्ञान
से दोनों में एकरूपता हो गयी और उसे भजन की महत्ता मालूम हो गयी। मुक्ति का आधार भक्ति है, यह बात
उद्धव की समझ में अच्छी तरह आ गयी। इससे उसे जो आनन्द हुआ वह उसके हृदय में नहीं समा रहा था।
वह स्वानंद से भर गया। बालक के हठ के कारण जिस प्रकार माँ उसे अपने आभूषण पहनाती है, उसी प्रकार
श्रीकृष्ण ने उद्धव को अपनी अवतार स्थिति अर्पण की। न मन ने सुना, न बुद्धि ने देखा और भगवान ने आकाश
से भी चुरा कर भगवान ने अपना स्वरूप उद्धव को अर्पण किया। जो ब्रह्मवेत्ता को भी नहीं दिखायी देता,
जिसका आकलन वेदों को भी नहीं होता, वह स्थिति श्रीकृष्ण ने कृपा के बल से उद्धव को दी। देखो! पहले
जब श्रीकृष्ण ने पूछा था, उस समय 'मेरा उद्धार हो गया' ऐसा उद्धव ने कहा था और अब उसने भजनभाव
माँगा। इसका गूढ़ अर्थ भगवान ही जानें। मुक्ति से ऊपर की भक्ति माँगने के कारण, श्रीकृष्ण की अवतारशक्ति
अर्थात् माया नियंत्रण की पूर्णस्थिति उद्धव के हाथ में सहज ही आ गयी। माया का मिथ्यत्व पूरी तरह जान कर
ही उसकी प्रेरणा और आवरण यह जो 'मायानियंत्रण' का लक्षण है वही श्रीकृष्ण ने स्वयं दिया। शतरंज के
खेल में जिस प्रकार किसी तरह का पूर्वकर्म न होने पर भी राजा, प्रधान, हाथी, घोड़े, प्यादा ये सब मारामारी पर
उतर आते हैं, जबकि सबमें लकड़ी एक ही होती है। दोनों ओर की सेनाओं में लकड़ी एक ही होती है, फिर
कौन किसका शत्रु है ? लेकिन सचमुच बैर न होते हुए भी युद्ध में निर्जीव में ही मारामारी होती है। हाथी, घोड़ा,
प्रधान मरा ऐसा कहा जाता है, लेकिन क्या इसमें किसी का प्राण जाता है ? अथवा जो प्यादा है, वह प्रधान बन
जाता है, तो क्या उसे अकूत सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है ? सचमुच, प्राण न होते हुए भी मारने की बात करते हैं
और चिल्लाते है। एक की जय और दूसरे की पराजय होती है। लेकिन उन गोटियों को इसका कोई ज्ञान नहीं
होता। गोटियाँ मर जाती हैं तो उनमें से कौन धर्मात्मा वैकुण्ठ जाता है और कौन नरक भोगता है ? उसी प्रकार
बन्धन और मोक्ष की बातें समूल मिथ्या हैं। सारांश, शतरंज की ही तरह जिसका संसार में ध्यान रहता है वही
अवतारों का अवतार है और वही सचमुच भगवान है। वेदोक्ति भी मिथ्या ही है, बन्धन और मुक्ति भी मिथ्या ही
हैं, यह जानते हुए भी वह वेद विहित धर्म के अनुसार चलता है, यही मुक्ति से भी श्रेष्ठ भक्ति है। संसार से
मुक्त होकर अनेक नित्यमुक्त हुए हैं; उनके लिये यह भक्ति असाध्य है। उन्हें इस अगम्य स्थिति की कल्पना भी
नहीं होगी। उद्धव ! जिसके पास मेरी ऐसी स्थिति होगी, वही मोक्ष से श्रेष्ठ वाली भक्ति करेगा। औरों के लिये
वह सोच से परे है। इस प्रकार उद्धव को अगाध गति प्राप्त हुई। उसे लोकोपकार की दृष्टि से ब्रह्मशाप से बचाने
के लिये श्रीकृष्ण ने स्वयं उपाय ढूँढ़ा। नारद के पास ब्रह्मज्ञान था, फिर भी उसे ब्रह्मशाप का बन्धन था, उस
शाप के कारण वह भ्रमण करता रहता था। एक स्थान पर वह कहीं रहता ही नहीं था। ब्रह्मज्ञान होने पर भी
ब्रह्मशाप का भयानक भय नहीं चूकता। यह जानकर ही श्रीकृष्ण ने ब्रह्मज्ञान का उपदेश देकर उद्धव को दूर
हटाया। उद्धव का जन्म यादव वंश में हुआ था और यादव ब्रह्मशाप से मरने वाले थे। उससे उद्धव को बचाने के
लिये उन्होंने उसे बदरिकाश्रम में भेजा। उद्धव को जो ज्ञान प्राप्त हुआ था, उससे बदरिकाश्रम पवित्र था, ऐसी
बात नहीं थी किन्तु ब्रह्मशाप के भय से ही उसे श्रीकृष्ण ने दूर भगाया। उद्धव सरीखा मूल्यवान रत्न, जिसे पूर्ण
स्थिति मालूम थी, उसे बचाने के लिये श्रीकृष्ण ने स्वयं ही बदरिकाश्रम भेजा।

उनतीसवाँ अध्याय ७९९
श्रीभगवानुवाच
गच्छोद्धव मयाऽऽदिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम्।
तव मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनैः शुचिः॥४१॥
न बुद्धि भेदं जनयेत् अज्ञानांलोक संग्रहम्।
जोषयेत सर्व कर्माणि विद्वान्युक्त समाचरन्॥
श्रीकृष्ण गम्भीर वाणी में बोले, उद्धव! तुम्हें अब ब्रह्मज्ञान हो गया और तुम्हारा स्नेहपाश बन्धन भी टूट
गया, अब तुम मेरी आज्ञा से बदरिकाश्रम जाओ। उस बदरिकाश्रम की महिमा लोकसंग्रह तथा जड़-मूढ़ जनों के
उद्धार के लिये श्रीकृष्ण अपने मुख से बताते हैं। वह बदरिकाश्रम मेरा स्थान है। वहाँ मैं नित्य अनुष्ठान करता
हूँ। उस स्थान का दूर से दर्शन करने पर भी कलिकल्मष का नाश होता है। उस पर्वत के स्पर्शमात्र से मनुष्य
पवित्र हो जाता है, उस बद्री के नामस्मरण से भी बड़े-बड़े दोषों का विलय हो जाता है। वहाँ भी मेरे चरणों का
तीर्थ 'अलकनंदा' नामक नदी के नाम से प्रवाहित हो रहा है। उसके स्पर्शमात्र से लोग पवित्र हो जाते हैं। वहाँ
श्रद्धापूर्वक स्नान करने से संसार बंधन नहीं रहता और जो उसका आचमन करता है उसका पितरों के साथ उद्धार
हो जाता है। ऐसा मेरा बदरिकाश्रम है। वह अत्यन्त पवित्र है। उद्धव! अब शायद तुम यह कहोगे कि आपने यह
स्थान कब बनाया ? तो उसका भी वर्णन सुनो। मैंने रजोगुण वाले लोग उत्पन्न किये। वे सुखविलास में निमग्न हो
गये। वे भोगासक्ति में डूब गये। तब मैंने दो रूपों में अवतार लिया। रवि और चन्द्र जिस प्रकार अन्धकार का पूर्ण
विनाश करते हैं, उसी प्रकार मैं भी नर-नारायण बना और बदरिकाश्रम में नित्य उदित होने लगा। वहाँ मैंने भक्ति,
वैराग्य तथा ज्ञान का स्वयं आचरण कर प्रकाशन किया। ऐसा वह बदरिकाश्रम मेरा स्थान है तथा वहाँ मैं अभी
भी भक्ति, ज्ञान, वैराग्य का अनुष्ठान करता रहता हूँ। नरनारायण के रूप में जिस पर्वत पर मैंने अवतार लिया,
वहाँ तोड़े हुए बैर के समान मेरी भक्ति फलती-फूलती रहती है। इसीलिये मैंने उसका नाम बदरिकाश्रम रखा है।
यहाँ संसार का सारा भ्रम समाप्त हो जाता है, इतना वह पवित्र है। इसलिये तुम अब बदरिकाश्रम जाओ। लेकिन
उद्धव! तुम्हारे मन में यह विचार आयेगा कि अब तीर्थ जाने की क्या आवश्यकता है ? तुमने मोक्ष से भी श्रेष्ठ
भक्ति दी, जिससे मैं अत्यन्त कृतकृत्य हो गया हूँ, अब तीर्थ जाने की मुझे जरा भी इच्छा नहीं है। लेकिन मेरी
आज्ञा है कि तुम वहाँ अवश्य जाओ। इतना सुनते ही उद्धव ने मौन धारण कर श्रीकृष्ण की आज्ञा का वंदन
किया। सद्भाव से वन्दन कर बदरिकाश्रम का दर्शन करने से वह नर का नारायण हो जाता है, इतनी उस स्थान
की महिमा है। उद्धव! तुझमें पूर्ण ज्ञान है, इसके साथ ही तुम मेरा भजन करते हो; इससे तुम्हारे चरण-स्पर्श से
वह बदरिकाश्रम भी पवित्र हो जायेगा। श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव को रुलाई आ गयी; उसने दौड़कर
श्रीकृष्ण चरणों का वन्दन किया और वहाँ जाने का आश्वासन दिया। ब्रह्मशाप से होने वाले नाश से बचाने के
लिये श्रीकृष्ण ने उसे पूर्ण उपदेश कर बदरिकाश्रम जाने को बाध्य किया। उद्धव ज्ञानियों में रत्न था, ब्रह्मशाप से
बचने के लिये उद्धव को बदरिकाश्रम भेजा। अन्यथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के बाद कृष्ण किसी को तीर्थाटन करने
के लिये नहीं कहेंगे। उद्धव का भवबन्धन बचपन में ही समाप्त हो गया था। श्रीकृष्ण ने जानबूझ कर उसे
बदरिकाश्रम भेजा और कहा कि इससे बहुत बड़ा लोकोपकार होगा। तुम्हारे धर्म से समस्त अज्ञानियों का उद्धार
होगा। अब तुम पूछो कि उस तीर्थ में जाने के बाद वहाँ किस तरह रहा जाय ? तो उस सम्बन्ध में लोककल्याण
के लिये तुम्हें निर्णय बताता हूँ। उद्धव! तुम्हारा आचरण ही जनता को उपदेश मालूम होगा। इसलिये वैराग्य,

८०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्ति, ज्ञान और स्वधर्माचरण का त्याग न करो। उद्धव! मुझे ही देखो न। इस त्रिभुवन में मेरा कोई कार्य नहीं है।
लेकिन लोगों को मार्ग दिखाने के लिये मैं स्वधर्माचरण के अनुसार व्यवहार करता हूँ। इस पर तुम कहोगे कि पूरे
त्रैलोक्य की जिम्मेदारी तुम्हारी है इसलिये लोगों को व्यवहार सिखाने के लिये आप स्वधर्म पर चलते हैं। लेकिन
मैं अब निजधाम जा रहा हूँ इसलिये मेरी परिपूर्ण स्थिति तुम्हें अर्पण कर दी, इसलिये अब लोकसंग्रह के लिये
तुम पूरी तरह विरक्त होकर रहो। अभेद भक्ति, वैराग्य, ज्ञान का स्वयं आचरण कर, अन्य लोगों से वैसा ही
आचरण कराने का ही नाम है, लोकसंग्रह। उद्धव! मेरे ज्ञान की प्राप्ति होने के कारण तुम त्रिभुवन में भी वन्दनीय
हो गये हो। इसलिये तुम जैसा आचरण करोगे, उसी के अनुसार लोग व्यवहार करेंगे। अब तुम्हारे ही बहाने
लोकसंग्रह के लिये साढ़े-तीन श्लोकों का निरूपण करता हूँ। उसी के अनुसार तुम व्यवहार करो। तुम
बदरिकाश्रम जाओगे तो वहाँ अनेक तीर्थ दिखायी देंगे लेकिन उनमें अलकनंदा ही प्रमुख है। वह गंगा ही है;
उसके दर्शन मात्र से सभी दोषों का परिहार होता है।
ईक्ष्यालकनन्दाया विधूताशेषकल्मषः।
वसानो वल्कलान्यङ्ग वन्यभुक्सुखनिःस्पृहः ॥ ४२ ॥
उस अलकनंदा का स्नान कर शास्त्रोक्त पद्धति से तीर्थविधान करें और फिर वहाँ रहें। अब, कैसे रहा जाय
उसके सम्बन्ध में सुनो। वस्त्रों का त्याग कर वल्कल पहनें। वन के फलों का भक्षण कर उद्वेगरहित वृत्ति से रहें।
लोगों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने के लिये पूरी तरह निःस्पृहता का व्यवहार करें और निजसुख से वहाँ रहते
हुए शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों के प्रति सहिष्णुता दिखायें।
तितिक्षुर्द्वन्द्वमात्राणां सुशीलः संयतेन्द्रियः।
शान्तः समाहितधिया ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ४३ ॥
तुम ज्ञानविज्ञान सम्पन्न हो, अतः तुम्हें द्वंद्वों की बाधा होना सम्भव नहीं है। लेकिन लोकहित की दृष्टि से
शीतोष्णादि द्वंद्वों की सहनशीलता अवश्य दिखायें। तुम्हें विषय की आसक्ति नहीं है। फिर भी इन्द्रिय और विषय
का नियंत्रण करें। अपनी सुशीलता प्रकट कर आत्मशान्ति का प्रदर्शन करें। आत्मबुद्धि का समाधान कैसा होता है
उसे सहज ढंग से प्रकट करें और मुझसे जो ज्ञान तुमने प्राप्त किया है, उसका अनुभव लोगों को दिखायें।
मत्तोऽनुशिक्षितं यत्ते विविक्तमनुभावयन्।
मय्यावेशितवाक्चित्तो मद्धर्मनिरतो भव॥
यदि तुम इस प्रकार रहोगे तो अनेक लोग तुम्हारी शरण में आयेंगे क्योंकि मेरा ज्ञान तुम्हें प्राप्त होने की बात
सबको ज्ञात है। हम ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर केवल अपना उद्धार कर लें और दीनजनों का उद्धार न करें तो उसमें ज्ञाता
की कमी दिखायी देती है। कुछ लोग ब्रह्मज्ञान का सम्पादन कर, शिष्य को भी उसका उपदेश करते हैं, किन्तु वह
उन्हें ठीक तरह बोध नहीं करा पाते; उनकी वह निष्ठा हीन और निर्वीर्य है। ठीक से बोध न होने के कारण शिष्य
छटपटाता रहता है और गुरु अपने गुरुत्व के कारण बड़बड़ाता रहता है। घर में ही इतनी बड़ी त्रुटि। उपदेश का
यह प्रकार अबद्ध है। दूसरे के अंतःकरण में बोध का प्रकाश फैलाना सरल कार्य नहीं है। उद्धव! सचमुच इसी का
नाम है ब्रह्मज्ञान की पूर्ण प्राप्ति। स्वयं तरकर दूसरे को तारना यही ज्ञान की महानता है। मैंने वह तुम्हें सौंपी है।
इसलिये मेरे कहने के अनुसार ठीक तरह से व्यवहार कर लोगों का उद्धार करते रहो। शिष्यरूपी उत्तम खेत में

उनतीसवाँ अध्याय ८०१
जिसके ब्रह्मज्ञान की फसल नहीं फलती, उसका वह ज्ञान पूरा नहीं है। जिस प्रकार पके हुए फलों के वृक्ष के पास
पक्षी अपने आप एकत्र होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मस्थिति अपने पूर्णत्व पर पहुँचती है उस समय शिष्यों का वहाँ
जमघट होने लगता है। शब्दों से ब्रह्मज्ञान का उपदेश करते हैं लेकिन यदि वह मन को रुचता नहीं है तो वह
ब्रह्मज्ञान निर्वीर्य है। उद्धव ! जानते हो, ऐसा क्यों होता है ? ब्रह्मज्ञान का अनुभव होते ही उससे देह में ज्ञातव्य का
बोध होता है और उससे ज्ञानाभिमान उत्पन्न होता है। इससे ज्ञान का सामर्थ्य कम हो जाता है। ज्ञाता जितना
निरहंकारी होगा, उतना ही ज्ञान का सामर्थ्य बढ़ता है। उसकी कृपा होते ही सच्छिष्य को तत्काल बोध होता है।
उद्धव ! तुम्हें मेरा ज्ञान प्राप्त हुआ है, उसका शिष्यों को उपदेश करो ताकि वे तुम्हारा सम्मान करें। फिर भी तुम
ज्ञानाभिमान न करो। शिष्य जो सम्मान दे रहे हैं, उसे न लेने से अपरिपक्वता दिखायी देती है और लेने से
ज्ञानाभिमान बढ़ता है। यह भी ज्ञाता का विघ्न ही है। इसलिये शिष्य जो सम्मान दे रहे हैं उसे बिना झिझक के
लेना चाहिये लेकिन ज्ञानाभिमान नहीं करना चाहिये। यही ज्ञाता का मुख्य लक्षण है। तुम्हें मेरा पूर्ण ज्ञान प्राप्त
हुआ है अतः एकान्त हो या लौकिक में हो, तुम निरभिमान स्थिति में ही रहो। सदा स्वानंदस्फूर्ति रहने दो। इस
निरभिमान स्थिति का उपदेश शिष्यों को भी करो क्योंकि निरभिमान होने जैसी स्थिति से उत्कृष्ट स्थिति त्रिभुवन
में और कोई नहीं है। इस उपदेश का लक्षण है, वाणी में मेरे नाम का कीर्तन, शरीर से मेरा नित्य भजन और मन
को सदा मेरे स्वरूप में निमग्न रखना। ज्ञानी कहने से अभिमान नहीं होना चाहिये और मूर्ख कहने से क्रुद्ध नहीं
होना चाहिये। स्वयं उद्वेगरहित अवस्था में रहना चाहिये। यही ज्ञाता की उत्तम स्थिति है। इस प्रकार नित्य
अभिमानरहित रहकर, भक्तियुक्त वैराग्य तथा ज्ञान का स्वयं आचरण कर सच्छिष्यों को वैसा ही उपदेश करते
रहना चाहिये। जो शिष्य तुम्हारी शरण में आयें उन्हें नीच न समझो। शिष्य को भी पूज्य समझना गुरुत्व की पूर्णता
का लक्षण है। जिस प्रकार सद्गुरु को समस्त प्राणिमात्र में निरन्तर ब्रह्म के ही दर्शन होते हैं, यदि उनमें शिष्य
भिन्न-भिन्न दिखायी देने लगें तो क्या उनकी ब्रह्मस्थिति भाग गयी ? इसलिये शिष्य अपने से क्षुद्र है ऐसा कभी
नहीं समझना चाहिये। शिष्य भी पूर्ण ब्रह्मरूप है ऐसा मानना चाहिये, यही गुरु का प्रमुख लक्षण है। जिस प्रकार
माँ को अपने नन्हे बालक से दुलार रहता है, उसी प्रकार गुरु को शिष्य के सच्चे हित का ख्याल रहना चाहिये।
इसी को शुद्ध 'सद्गुरुत्व' कहते हैं। शिष्य के लक्षण के बारे में पहले ही बताया जा चुका है। वैसा अधिकारी
शिष्य जहाँ भी दिखायी पड़े, उसे सचमुच उपदेश करो। तुम्हें अब तक जो कुछ पढ़ाया, वह सब शिष्योपदेश के
ही लिये था, ऐसा समझ लो। वास्तव में तुम तो मूलतयः गुणातीत हो इसलिये यह तुम पर लागू नहीं होता।
अतिव्रज्य गीतस्तिस्रो मामेष्यसि ततः परम्॥ ४४॥
इस प्रकार ज्ञान का उपदेश करोगे तो तुम्हारी गुणातीतता तो भंग नहीं होगी; बल्कि तुम जिसे उपदेश करोगे
वह भी त्रिगुणावस्था पर विजय प्राप्त करेगा। पहले बताये हुए उपदेश के अनुसार जो शिष्य सदा व्यवहार करेंगे,
वे भी गुरुकृपा से त्रिगुण की जो तीन वृत्तियाँ हैं उन्हें पार कर जायेंगे। तीन गुणों के तीन प्रकार हैं। दृश्य, द्रष्टा
और दर्शन; जागृति, सुषुप्ति और स्वप्न; ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान। कार्य, कारण और कर्त्ता; भोज्य, भोजन और भोक्ता;
शत्रु, मित्र और उदासीन; ये तीन गुणों की तीन अवस्थाएँ हैं जो बाधक हैं। किन्तु इस उपदेश से सच्छिष्य मेरा
भजन कर त्रिगुणों के त्रिगुण का नाश कर स्वयं मेरा स्वरूप बन जायेंगे। मेरे स्वरूप में न गुण हैं न गुणवृत्ति ही
है। इसलिये भक्त सद्भाव से गुणातीत स्थिति तक पहुँच कर सहज स्वानंद प्राप्त करते हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव को
ऐसी आज्ञा की। इसके बाद की उसकी अवस्था की महिमा का वर्णन परीक्षित को स्वयं शुक्राचार्य किस प्रकार
करते हैं, देखें।

८०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीशुक उवाच
स एवमुक्तो हरिमेधसोद्धवः प्रदक्षिणं तं परिसृत्य पादयोः।
शिरो निधायाशुकलाभिरार्द्रधीर्न्यषिञ्चदद्वन्द्वपरोऽप्यपक्रमे ॥ ४५ ॥
जो निजमुक्ति के कारण नित्य निष्काम है; जिसने परब्रह्म का अनुभव लिया है; उस श्रीशुक्राचार्य को उद्धव
का प्रेम वर्णन करने में अत्यन्त उल्हास प्राप्त हुआ। उसने कहा, हे परीक्षित्! श्रीकृष्ण ने इस प्रकार उद्धव को
आज्ञा की; उसका प्रेम अद्भुत था, उसका वर्णन में कर रहा हूँ, सुनो। उद्धव भले ही गुणातीत हो गया हो लेकिन
उसे गुरुचरण से विलक्षण प्रेम था। उसका सद्गुरु श्रीकृष्णनाथ तो साक्षात परब्रह्म ही था। वह हरि के चरण
छोड़ना नहीं चाहता था, हरि के प्रति उसकी पूर्ण श्रद्धा थी, इसलिये उस ज्ञानसम्पन्न उद्धव को 'हरिमेधा' कहा
गया है। जो अपनी इच्छा से हरि का ध्यान करता है, उसके ध्यान के साथ उसका मन भी हरि हरण करता है; जो
हरि के समाधान का विचार करता है, उसकी बुद्धि का हरि हरण करता है। जो हरि का चिन्तन करता है, उसके
चित्त का हरि हरण करता है; जो हरि का स्मरण करता है उसका सारा संसार ही हरि हरण करता है। उस हरि के
प्रति मुक्तिपद पर पहुँचे उद्धव की सप्रेम श्रद्धा थी इसलिये उसे 'हरिमेधा' कहते थे। जो गुणातीत पद पर पहुँच
गये उन्हें भी जिसकी भक्ति प्रिय थी, उस श्रीकृष्ण ने उद्धव का जाना निश्चित किया। किन्तु बदरिकाश्रम दूर का
पल्ला था। एक बार वहाँ जाने के बाद उससे पुनः भेंट नहीं होगी इस विचार से उसका मन व्याकुल हो उठा।
यद्यपि वह सुख-दुःख से मुक्त हो चुका था, फिर भी प्रयाणकाल में उसने व्याकुल मन से श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा
की। चरणों पर मस्तक रखते समय उसकी आँखों से प्रेमाश्रु की धारा फूट पड़ी। उस धारा से श्रीकृष्ण के चरण
धुल गये।
सुदुस्त्यजस्नेहवियोगकातरो न शक्नुवंस्तं परिहातुमातुरः ।
कृच्छ्रं ययौ मूर्धनि भर्तृपादुके विभ्रन्नमस्कृत्य ययौ पुनः पुनः ॥ ४६ ॥
अन्य लोगों का स्नेह बाधक रहता है, किन्तु वेदांत विचार उनसे साधकों को छुड़ाता है; लेकिन श्रीकृष्ण
का स्नेह वैसा नहीं है। वह सुखदायक और प्रिय रहता है। उद्धव के लिये स्वाभाविक तौर पर गुरु और परब्रह्म
दोनों एक ही थे और लोगों को दोनों में 'ऐक्य' भावना करनी होती है; लेकिन उद्धव के लिये वह स्वतःसिद्ध
था। इस प्रकार का यह स्नेह उद्धव के लिये अत्यन्त सुखदायी था। इसलिये श्रीकृष्ण को छोड़ते समय गुरुप्रेम
के कारण वह भी व्याकुल हो उठा। स्नेह, द्वेष अथवा विषय कामना से जो भी कोई श्रीकृष्ण पर लुब्ध हुआ,
उन्हें परमानन्द ही प्राप्त हुआ। ऐसे श्रीकृष्ण को कौन छोड़ना चाहेगा? अविधि से श्रीकृष्ण से रत हुए लोग भी
जब ब्रह्मादि देवताओं के लिये वंदनीय हो गये तो फिर उद्धव तो गुरुप्रेम पर न्योछावर ही था, वह श्रीकृष्ण को
कैसे छोड़ेगा ? जिसे गुरुभक्ति परब्रह्मतुल्य लगती है, उसके लिये जीवन्मुक्ति तृणप्राय है; मिली हुई मुक्ति का भी
वे त्याग कर देते हैं और अनन्यभाव से गुरुभक्ति की शरण में चले जाते हैं। सद्गुरु की आज्ञा का उल्लंघन न
किया जाय इसलिये बदरिकाश्रम जाना चाहिये यह बात सच है; किन्तु श्रीकृष्ण का प्रेम अत्यन्त मधुर है वह
उसे जाने से रोक रहा था। इस प्रकार उद्धव दोतर्फा संकट में पड़ गया। श्रीकृष्ण के प्रेम से उसका पेट फटने
लगा; उसे बदरिकाश्रम का मार्ग ही नहीं दीख रहा था। श्रीकृष्ण को यदि छोड़ दें तो वह निजधाम चला
जाएगा, मुझे पुनः दिखायी नहीं देगा; इसलिये उसका गला रुंध गया। जल से भरे नूतन मेघ की तरह श्यामवर्ण,
कमलनयन आनन्दमूर्ति श्रीकृष्ण पूर्णत्व से परिपूर्ण ब्रह्म है। मुकुट, कुण्डल, कमरबंद, पीले रंग का टीका धारण

उनतीसवाँ अध्याय ८०३
किया हुआ, गले में एक लड़ी का पदक और कंठ में कौस्तुभमणि। पैरों में पैंजनी की रुनझुन, बाहों में बाजुबंद
और कटि पर शोभा देने वाला पीत रंग का पीताम्बर, पैरों तक लटकी हुई वनमाला ऐसा अत्यन्त सुन्दर
घनश्याम देखकर मन तृप्त हो जाता था। श्रीकृष्ण का ऐसा दर्शन पुनः प्राप्त नहीं होगा इसलिये उद्धव प्रेमविह्वल
हो उठा। उद्धव पूर्णब्रह्म हो चुका था। उसे सगुण की इतनी चाह कैसे हो गयी? क्योंकि कृष्णप्रभा से प्रकाशित
होने वाली चिद्धन आत्मवस्तु श्रीकृष्ण ही था। घी जमा हुआ हो या पतला हो, लेकिन वह घी के गुण से वंचित
नहीं होता; उसी प्रकार सगुणानर्गुणत्त्व के साँचे में ढली हुई परब्रह्म की मूर्ति साक्षात् श्रीकृष्ण ही थे। सगुण रूप
त्याज्य है और निर्गुण रूप पूज्य है यह विचार भी आज की स्थिति का है। जो तृण-पाषाण को भी ब्रह्मरूप
मानता है, वह सगुण रूप का कभी भी तिरस्कार नहीं करेगा। इस प्रकार उद्धव को सगुण के लिये सगुण और
निर्गुण ये दोनों ही रूप समान थे किन्तु गुरु की दृष्टि से श्रीकृष्ण पर उसका अत्यन्त प्रेम था। इसलिये उसे
छोड़कर जाने में उद्धव अत्यन्त विह्वल हो उठा। किन्तु आज्ञा का उल्लंघन करना नहीं चाहता था, इसलिये
बदरिकाश्रम जाने के लिये उद्यत हुआ तो श्रीकृष्ण को छोड़कर जाने में अत्यन्त कष्ट हुआ। जाने से पहले वह
श्रीकृष्ण के चरणों पर लोट गया। पैरों को आलिंगन में बाँधकर उसे हृदय से कसकर बाँध लिया लेकिन वहाँ
से निकल कर जाने का साहस नहीं हुआ। यदि मैं यहाँ से चला गया तो पुनः श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं होंगे। इस
विचार से उसकी अवस्था अत्यन्त कठिन हो गयी और उसके पैर ठिठक कर वहीं रह गये। कृष्ण के चरणामृत
से ही मैं तृप्त हो गया हूँ। मुझे अब महातीर्थों की आवश्यकता नहीं है। ऐसा होते हुए भी मेरा प्रारब्ध मुझे
श्रीकृष्ण का वियोग करा रहा है। इतना कहकर वह थर-थर काँपने लगा; उसका गला रुंध गया, आँखों में
आँसू भर आये और वह बार-बार सुबकने लगा। वह रोमांचित होकर पसीने से तर हो गया। वह जाने के लिये
बिलकुल तैयार हो गया; श्रीकृष्ण के चरणों पर गिरता, फिर वहाँ से चला जाता और पुनः आकर चरणों पर
लोट जाता। उद्धव का वह श्रद्धा भाव देखकर श्रीकृष्ण परमानंद से सन्तुष्ट हो गये। वे मन ही मन बोले, मेरे
प्रति इसका अत्यन्त स्नेह है; और गुरुत्व भावना से तो वह अनन्य हो गया है। श्रीकृष्ण को उस पर दया आयी
और उसने अपने चरणों की पादुकाएँ उद्धव को सौंप दीं। उसने उन्हें अपने मस्तक से लगाया। उसे मस्तक से
लगाते ही उद्धव भूल गया कि मैं कृष्ण से दूर जा रहा हूँ। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उसे उपदेश दिया। वे पादुकाएँ
मस्तक पर रखते ही उसकी व्याकुलता अपने आप शान्त हो गयी और वह श्रीकृष्ण को नमस्कार कर उनसे
आज्ञा लेकर जाने के लिये निकला। त्रिवार प्रदक्षिणा कर उसने श्रीकृष्ण का मुखावलोकन किया; उसके चरणों
को नमस्कार किया और उसकी आज्ञा से चला गया। अब तृतीय स्कंध की कथा सुनें—उद्धव को विदुर का
दर्शन हुआ, दोनों ने एक-दूसरे को आलिंगन देकर कुशल क्षेम पूछा। तब कृष्ण के निधन की वार्ता सुनाते
समय उद्धव की चर्या पर दुःख की हलकी सी छटा भी नहीं दिखायी दी। इससे विदुर ने भाँप लिया कि इसे
ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ है। मरता गुरु हो और रोता हुआ चेला हो तो समझ लो कि ज्ञान व्यर्थ गया। इस पार
कृपामूर्ति श्रीकृष्ण प्रसन्न हुआ, इसलिये इसकी मोह ममता वाली वृत्ति समाप्त हो गयी, इसलिये यह परमानंद में
निमग्न होकर आत्मस्वरूप में झूम रहा है। शब्दों को स्पर्श किये बिना ही वह बोल रहा है, पृथ्वी का स्पर्श
किये बिना ही यह सहज रूप से चल रहा है, नामरूप में रहकर भी नामरूप को स्पर्श नहीं करता; जिह्वा के
बिना ही रसास्वादन करता है; नेत्रों के बिना ही देखता रहता है; इन्द्रियों के बिना ही निर्मल सुख का
निजात्मतृप्ति से भोग कर रहा है। निर्विकल्प आत्मज्ञान; तिसपर भक्ति, ज्ञान, वैराग्य! उद्धव की ऐसी स्थिति
देखकर विदुर के मन को अत्यन्त संतोष हुआ। फिर उसने उद्धव से विनती की कि हे भगवन्! श्रीकृष्ण तुझ

andवारिधि? Wait, let's look: कारुण्यthen space, thenवारिधिwith a visarga or danda? Let's look at the end of line 7: कारुण्य वारिधिfollowed by।(single danda). Wait, is there a visarga afterवारिधि? Look at वारिधि: there seems to be a visarga : or just danda? Wait, it looks likeवारिधिः।orवारिधि ।? Wait, let's look closely at वारिधि: वा रि धि ।. There is a single danda ।`.

  • Now let's check the first word of line 7 again:
    Is it संबंध श्लोक?
    Wait, if the verse is:
    क्वाहं कीटकवत्तुच्छः क्व च कारुण्यवारिधिः ।
    तेनाहं स्मारितोऽस्म्यथ मुमुर्षुः केशवं यथा ॥ १ ॥
    Wait, is this verse composed by Eknath himself, or from somewhere?
    Eknath often wrote Sanskrit summary verses or connecting verses in his Bhagavata!
    And what does the text before it say?
    Let's look at the label:
    Is it `

उनतीसवाँ अध्याय ८०५
पहुँचा और उसे प्रदक्षिणा कर उसके चरणों के पास बैठ गया और मैत्रेय का ज्ञान सुनकर और कृष्ण का निर्वाण
देखकर उद्धव वहाँ से चला गया। हे परीक्षित! वह वृत्तांत सुनो।
ततस्तमन्तर्हृदि संनिवेश्य गतो महाभागवतो विशालाम्।
यथोपदिष्टं जगदेकबन्धुना तपः समास्थाय हरेरगाद् गतिम्॥४७॥
जो संसार का विश्रामस्थल है; जो पुरुषों में पुरुषोत्तम है; उस आत्माराम को हृदय में धारण कर उद्धव प्रेम
से चला गया। कृष्ण की पूर्ण स्थिति को निश्चयपूर्वक हृदय में धारण कर उद्धव स्वानंद स्थिति में विशाल तीर्थ
के लिये चल पड़ा। उद्धव स्वानंद की स्थिति में पहुँच गया था इसलिये वह जहाँ जाता था वहाँ के लोग भक्ति,
ज्ञान और वैराग्य से पावन हो जाते थे। जैसी भी विवेकशक्ति और विरक्ति दिखायी देती, उसी के अनुसार
बोधकशक्ति से ज्ञान और भक्ति का उपदेश करते हुए वह त्रिभुवन का उद्धार करता चला गया। जिनकी उद्धव से
भेंट होती, उनका हरिभजन में मिलना होता, संसार का भय वह उनकी दृष्टि में लाता ही नहीं था, इतना वह श्रेष्ठ
उपदेशक था। भगवद्भक्ति जो भी करते हैं उन्हें 'भागवत' कहते हैं; उद्धव मुक्ति प्राप्त करके भी भजन करता
था, इसलिये वह 'महाभागवत' है। उद्धव ने जिस भक्ति को स्वीकार किया था, उसकी तो नित्यमुक्ति दासी थी;
इसलिये उद्धव की स्थिति को महाभागवत स्थिति कहना चाहिये। अत्यन्त निर्मल शान्ति और अत्यन्त प्रांजल
आत्मानुभव, और मोक्ष के बाद भी भजनशीलता, ऐसा उद्धव अत्यन्त श्रेष्ठ भक्त था। ऐसी विशालता होते हुए भी
वह 'विशाल' तीर्थ पहुँचा। अब उस तीर्थ को विशाल क्यों कहते हैं, उसकी भी कथा सुनाता हूँ। जहाँ केवल
श्रद्धा से ही चित्त की शुद्धि होती है, श्रवण मात्र से ही बुद्धि निर्विकल्प होती है और 'नारायण' नाम से मोक्षसिद्धि
होती है; अतः बदरिकाश्रम को विशाल कहते हैं। वहाँ लोककल्याण के लिये नारायण आज भी अनुष्ठान कर रहे
हैं। मोक्षमार्ग पर लगने वाले पर उसकी पूर्ण कृपा होती है। इस प्रकार बदरिकाश्रम को 'विशालत्व' प्राप्त हुआ
है। जहाँ अल्प तप से ही बड़ा फल प्राप्त होता है, अल्प ध्यान से परिपूर्ण ज्ञान होता है, अल्प विरक्ति से ही मोक्ष
प्राप्त होता है; ऐसा बदरिकाश्रम विशाल रूप से फलप्रद होता रहता है। जो अन्तर्यामी गोविन्द, जो संसार का
सुहृद और बन्धु है, उसी प्रकार जो प्रसिद्ध आत्माराम है, जिससे उद्धव को आत्मज्ञान हुआ उस श्रीकृष्ण ने जैसा
उपदेश किया था, उसी के अनुसार उद्धव वहाँ रहा। इससे लोगों को परमार्थ निष्ठा पर विश्वास हुआ। उद्धव की
स्थिति, उसकी ज्ञानभक्ति, उसकी विरक्ति लोगों के लिये उपदेशस्वरूप हो गयी। गुरु ही जहाँ विषयासक्त होता है
वहाँ शिष्य को विरक्ति कैसे आयेगी? गुरु की प्रवृत्ति ही जहाँ अधर्म की हो वहाँ शिष्य को निवृत्ति कभी नहीं
होगी। इसलिये उद्धव जैसा आचरण कर रहा था, उसी प्रकार सभी लोग आचरण करने लगे। इस प्रकार उद्धव
बदरिकाश्रम में विरक्त होकर रहा। कृष्ण उसे जिस प्रकार पढ़ा कर गया था, उसी के अनुसार वह व्यवहार करने
लगा। उसके धर्म से सारे लोग परमार्थी और विरक्त बन गये। परब्रह्म की सच्ची प्राप्ति कराकर श्रीकृष्ण निजधाम
चले गये थे। वही ब्रह्मस्थिति उद्धव में रात-दिन विद्यमान थी। आसन लगाकर बैठने या जाने पर भी उसका
ब्रह्मत्व टूटता नहीं था। विरक्ति और भोगासक्ति ये दोनों ही शरीर पर दिखायी देती हैं, किन्तु उद्धव की ब्रह्मस्वरूप
स्थिति इन दोनों से परे थी। वह विरक्ति में होते हुए भी विरक्त नहीं था और भोग में रहते हुए भी भोगासक्त नहीं
था; इन दोनों से परे वह सदा ब्रह्मस्वरूप ही था। उसी में प्रारब्ध क्षय से देह की मृत्यु होने पर भी उद्धव ब्रह्म में
पूर्ण ब्रह्म ही होकर रहा था। जन्म और मरण वह जानता ही नहीं था। श्रीकृष्ण ने उद्धव के देह की देहबुद्धि पूरी
तरह नष्ट करके उसे निःसन्देह ब्रह्मस्वरूप का अनुभव दृढ़ कर दिया था। हे परीक्षित! ऐसे उद्धव को देह के

८०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अन्त में विदेह कैवल्य की प्राप्ति हुई यह कहना वक्ता का भ्रम है। सोने का कंगन बनाओ या उसे तोड़ो लेकिन
यह सब सोने को नहीं मालूम होता, उसी प्रकार जन्म और मरण केवल देह के ही लिये है। उद्धव परिपूर्ण
परब्रह्म था। देह में रहते हुए भी वह नित्यमुक्त विदेही ही था। उसे देह के अन्त में विदेह मोक्षप्राप्ति हुई, यह
कहना भी केवल लौकिकता है। देह जाये या रहे, उस सम्बन्ध में ज्ञाताओं को कोई दुःख नहीं होता। उनकी
ब्रह्मभावना अखण्ड और अनस्यूत रहती है। देह को दैव चलाता है और मरण भी दैव ही लाता है। ज्ञाता ब्रह्म में
ही पूर्णब्रह्म होकर रहने के कारण, जन्म और मरण उसे मालूम नहीं होता। देह रहे या जाये, मैं परब्रह्म ही हूँ।
जिस प्रकार डोर में साँप का मिथ्यापन डोर के ही कारण मिथ्या होता है। जहाँ का मृगजल घट गया वहाँ की
भूमि सूख गयी, ऐसा यदि कहें तो क्या जहाँ जल भरा रहता है वहाँ की भूमि गीली रहती है ? उसी प्रकार देह
की वर्तमान स्थिति समूल मिथ्या है ऐसा प्रतीत होता है तो उस देह का अन्त होने पर विदेह कैवल्य की प्राप्ति
हो, ऐसा नहीं होता। इस प्रकार बदरिकाश्रम में अनेक दिन रहने के बाद उसी निजदेह के अन्त में वह भगवद्गति
को प्राप्त हो गया। यह कहना भी केवल लौकिक दृष्टि से ही है। वह प्रारम्भ से अन्त तक परब्रह्मस्वरूप ही था,
वह अपने स्वाभाविक स्वरूप से मिल गया। उद्धव की भगवद्भक्ति और अंतकाल की उसकी स्थिति का विचार
कर शुक्राचार्य को अत्यन्त आनन्द हुआ और वे कृष्ण कृपा का वर्णन करने लगे।
य एतदानन्दसमुद्रसम्भृतं ज्ञानामृतं भागवताय भाषितम्।
कृष्णेन योगेश्वरसेविताङ्घ्रिणा सच्छ्रद्धयाऽऽसेव्य जगद् विमुच्यते ॥ ४८ ॥
जो योगेश्वर योगमार्ग से (अथवा ज्ञानमार्ग से) जीवन्मुक्ति तक पहुँचते हैं, वे भी कृष्ण चरणों की सेवा
करते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण की मूर्ति पूज्य है। उनके चरणों पर सनकादिक सरीखे संत तल्लीन रहते हैं, ब्रह्मदेव जैसे
देवता भी उनके आगे रंक की तरह प्रतीक्षारत रहते हैं। उस श्रीकृष्ण ने स्वानंद की स्थिति में अपनी भक्ति प्रकट
की। उद्धव पर उसकी अत्यन्त कृपा थी इसीलिये उसने अपने मुख से उसे सुनायी। भगवद्भक्ति यही एक
महासागर है; उसमें धैर्य मंदराचल है; और गुरु-शिष्य यही मंथन करने को तत्पर होने वाले सुर और असुर हैं।
श्रद्धा और विश्वास ये मथनी को खम्भे से बाँधने वाली दो डोरियाँ हैं और बोध नामक मजबूत रस्सी से उन्होंने
मंथन करना शुरू किया। उसी मंथन में पहले 'अहं ज्ञाता' अर्थात मैं ज्ञानी नामक अहंकाररूपी हलाहल की
उत्पत्ति हुई। उसे विवेकरूपी शंकर ने कंठ में धारण कर, पुनः 'मैं' का अहंकार नहीं होगा इसलिये निगल
लिया। इस प्रकार अभिमानरहित होकर मंथन कर भक्तिसाररूपी अमृत निकाला ओर.उसे श्रीकृष्ण ने कृपा कर
उद्धव को अर्पण किया। धर्म, अर्थ, काम और मुक्ति इन चार पुरुषार्थों से भी श्रेष्ठ भक्तिसारामृत उद्धव के हाथ में
दिया। निजबोध का पात्र निजानुभव से स्वच्छ धोकर उसमें यह सारामृत भरकर उद्धव को उसका प्राशन कराया।
उससे उद्धव तृप्त हुआ, त्रिविध तापों से मुक्त हुआ परमसुख से सुखी हुआ और ब्रह्मस्वरूप में परब्रह्म से ही
मिला। इस प्रकार उद्धव भक्तिसारामृत प्राशन कर परम सन्तुष्ट हुआ। श्रीकृष्ण निजभक्तों पर इस प्रकार कृपा
करता था। कृष्ण और उद्धव का यह पूरा संवाद अर्थात भक्तिसारामृत रूपी गुह्यज्ञान, इसका जो श्रवण, मनन और
अनवरत चिन्तन से सेवन करेगा, उसके भय से संसारबंधन दूर भाग जायेगा। स्वप्न में भी उसे जन्म-मरण का
दर्शन नहीं होगा। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उसकी संगति में रहकर जो इस कथा की भक्ति में रंग
जायेंगे उन्हें भी, हे परीक्षित् ! संसार बंधन की कल्पांत में भी बाधा नहीं होती। जिसकी इस कथा पर पूर्ण श्रद्धा
होगी, जिसे इस कथा की लगन होगी, जो इस कथा का अनुष्ठान करेगा वह सारे संसार का उद्धार करने वाला

उनतीसवाँ अध्याय ८०७
होगा। जो सूर्य के घर में रहता है, उसके लिये अन्धकार का अस्तित्व ही नहीं होता और जो उसके ही गाँव में
जाकर रहेगा वह भी रात्रि से वंचित रहेगा। जब सूर्य के लिये रात्रि नहीं है तो फिर दिन का उदय कैसे होगा ?
उसी प्रकार स्वरूप के पास बन्धन और मोक्ष अत्यन्त मिथ्या हैं। उसी प्रकार यदि इस कथा का अनुसंधान नहीं हो
पाया, केवल श्रवण ही सम्भव हुआ तो उसे भी संसार बंधन की बाधा नहीं होगी। खैर, उसे भी छोड़ो। जिससे
इस कथा का श्रवण भी नहीं हुआ, लेकिन यदि उसने प्रेम से उसका पठन किया तो भी प्रत्येक श्लोक के साथ
उसके दुःख और दोष का भस्म हो जायेगा। जिससे श्रवण पठन का प्रयास सम्भव न हो, वह यदि इस ग्रन्थ के
निरूपण की बातें गाँठ में बाँध लेता है तो वह भी संसार में देवताओं को वंद्य होगा। अधिक क्या कहें ? जिसे इस
कथा से प्रेम होगा, जिसे इस कथा से भक्ति होगी, उसकी संगत जिन्हें अच्छी लगेगी, उन्हें भी यम और काल
वन्दन करेंगे। इस कथा के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखकर जो इसका सेवन करता है, जो श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण और
मनन करता है, उससे दूर श्रीकृष्ण कभी नहीं जाते। भोली-भाली कथाएँ सुनकर जिसकी इस कथा पर श्रद्धा
होती है, उसके हृदय में श्रीकृष्ण प्रकट होकर वे धीरे-धीरे संसारपाश तोड़ देते हैं। इस प्रकार श्रद्धालुओं के प्रति
श्रीकृष्ण प्रभु दयालु है। इसीलिये श्री शुक्राचार्य उन्हें अत्यन्त श्रद्धा से नमन करते हैं।
भवभयमपहन्तुं ज्ञानविज्ञानसारं निगमकृतदुपजहे भृङ्गवद् वेदसारम्।
अमृतमुदधितश्चापाययद् भृत्यवर्गान् पुरुषमृषभमाद्यं कृष्णसंज्ञं नतोऽस्मि॥ ४९॥
संसारभय से त्रस्त होकर जो श्रीकृष्ण की शरण में आये, उनका संसारभय दूर हो इसलिये श्रीकृष्ण ने
वेदार्थ का मंथन किया और उपनिषद्वार का भी मंथन कर यह ज्ञान-विज्ञान का रूप सार निकाला। बड़े-बड़े
ज्ञाता भी जिसके लिये थक गये वे भी उसका पार नहीं पा सके। तुम कहोगे कि निगमों का मंथन करने के कारण
वेदों को कष्ट हुआ होगा, किन्तु कृष्ण वेदों का आदिकर्ता होने के कारण उसने वेदों को जरा भी दुःख नहीं होने
दिया। जिस प्रकार बछड़ा जब स्वयं ही माँ का दूध पीने लगता है तब उसके पैर नहीं बाँधने पड़ते, उसी प्रकार
जब श्रीकृष्ण ही वेदों का मंथन करने लगे, तब वेदों को भी कोई व्यथा नहीं हुई। श्रीकृष्ण सर्वज्ञ था; वेदार्थ का
सार निकालने में राजहंस था; उसने वेदों को दुःख दिये बिना वेद का सार निकाल लिया। इस प्रकार मथ कर
निकाला हुआ वेदार्थ का सार अथवा ज्ञान-विज्ञान सारामृत कृष्ण ने एकत्र कर कृपापूर्वक भक्तों के कल्याणार्थ
अर्पण किया। जिस प्रकार भ्रमर कमल को दुःख पहुँचाये बिना उसका मकरंद आहिस्ते से निकाल लेता है, उसी
प्रकार श्रीकृष्ण ने वेदों का मंथन कर यह शुद्ध सार निकाला है। इस प्रकार कृपालु और भक्तों के हितैषी श्रीकृष्ण
ने वेदसारामृत निकाल कर निर्भय होकर अपने भक्तों को दिया। इस प्रकार अपने सेवकों को पूर्ण वेदसारामृत
पिलाकर श्रीकृष्ण ने उनका जन्म-मरण और संसार का भय नष्ट कर दिया। माया संसार का मूल कारण है;
लेकिन श्रीकृष्ण माया का भी मूल कारण है। 'सच्चिदानन्दघन' नाम का जो स्वरूप है, वही 'श्रीकृष्ण' हैं। माया
के योग से मनुष्य वेष धारण करने वाला, पुरुषों में पुरुष श्रेष्ठ, पूर्णज्ञान के कारण ज्ञाननिष्ठ ऐसा जो श्रीकृष्ण है
वह समस्त वंद्य पुरुषों में अत्यन्त श्रेष्ठ है। उसे काया, वाचा, मन से सभी प्रकार से अनन्य शरण जाकर श्रीशुक
ने स्वयं ही श्रद्धापूर्वक नमस्कार किया। श्रीशुक ने नमन किया यह देखकर परीक्षित के मन में भी प्रेम उत्पन्न
हुआ और उसने भी कहा कि भक्त कृपालु केवल एक श्रीकृष्ण ही हैं। उद्धव ने परम निर्वाण प्राप्त किया यहाँ
ज्ञानकथा का निरूपण समाप्त हुआ। संसार में भगवद्भजन श्रेष्ठ है क्योंकि श्रीकृष्ण भक्त के अधीन रहता है।
भक्तों के मनोरथ श्रीकृष्ण पूरे करता है और अन्त में उसे अपना पद भी देता है। भक्तों पर उसकी इतनी अगाध

८०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कृपा रहती है। श्रीकृष्ण निजधाम की ओर चले उस समय यदि उद्धव ने ये प्रश्न नहीं किये होते, तो श्रीकृष्ण ने
यह परमामृत का कथन नहीं किया होता। लेकिन उद्धव का संसार पर बहुत उपकार है क्योंकि उसी के कारण
श्रीकृष्ण ने भक्ति-ज्ञान-वैराग्य के सार का कथन किया। उद्धव के धर्म से सारा त्रिभुवन संसार समुद्र पार कर
लेगा। ऐसे गुप्त ज्ञान का श्रीकृष्ण ने भजन के साथ कथन किया। चारों मुक्तियों की उपेक्षा कर उद्धव ने हरिभक्ति
की महिमा बढ़ायी। त्रैलोक्य को पार करने के लिये उद्धव ने इतनी बड़ी कीर्ति स्थापित की। एकादश स्कंध के बहाने
भक्ति और मुक्ति का पौसरा बैठा दिया। जड़ जीवों के उद्धार के लिये उद्धव ने इतनी बड़ी कीर्ति स्थापित की।
गाय के स्तन में दूध भरा होता है लेकिन वह बछड़े के बिना हाथ में नहीं आता उसी प्रकार श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान
उद्धव ने प्रकट किया। कृष्ण और उद्धव का यह संवाद वास्तव में गहन ज्ञान है। उसका व्याख्यान मैं अपूर्ण ज्ञानी
कैसे कर पाऊँगा ? कृष्ण और उद्धव का यह गहन ज्ञान लोगों तक पहुँचाने में सर्वज्ञ जनार्दन ही सहायक हुआ।
श्लोक के पदों के अर्थ की संगति, ज्ञान की परिपाक स्थिति, वैराग्ययुक्त भक्ति और मुक्ति इनकी व्युत्पत्ति मैं नहीं
जानता। मेरा 'मैं'पन भी जनार्दन ही बन गया। अतः इस पदार्थ का स्पष्टीकरण करने वाला वही एक है।
एकनाथ को एकपन की भावना से ऐक्यता सहज ही सम्भव हुई और 'एका-जनार्दन' इस नाम से यह ग्रन्थ
भगवान ने ही तैयार किया। अर्थ करते समय जनार्दन ही मेरी बुद्धि बन गया। उसी प्रकार कवित्वयुक्त पदबंध भी
वही बोला। मेरा नाम, रूप, कर्म, गुण आदि मिथ्या ही है; लेकिन वह भी जनार्दन ही बना। 'एकपन' उसे इतना
अधिक प्रिय है। नाम से तथा भाव से भी 'एक' होने के कारण जनार्दन प्रसन्न हुआ; उसने मेरे नाम की ही तरह
संसार में 'एकपन-ऐक्य' प्रकट किया। 'एका' इस नाम का जनार्दन को इतना अधिक कौतूहल है कि वह एक
में ही अनेक प्रकट करता है और अनेक में एक को अविकारी दिखा देता है। जिसका नाम भी एक है और भाव
भी एक है उसका भगवान से सदा ऐक्य रहता है। इसलिये आगे वह एक और अनेक देखने पर भी उसमें भिन्नता
नहीं रहती। यह एकत्व जब तक प्राप्त नहीं होता, तब तक भगवान को प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती और एकत्व के
बिना अकर्त्तात्मता भी नहीं मालूम होती। जब तक कर्तव्य का अभाव है, तब तक, भगवान कभी नहीं मिलेंगे।
अहंकार के ही पास बन्धन रहता है; उसे छोड़ते ही मुक्ति मिलती है। नामस्वरूप में ऐक्य देखना यही मेरा
अनुष्ठान है। इसीलिये जनार्दन सन्तुष्ट होकर वह मेरा 'मैं'पन बन गया है। कठपुतलियों के खेल में कुछ
पुतलियाँ नाराज होती हैं तो कुछ प्रसन्न दिखायी देती हैं, लेकिन वह सब खेल दिखलाने का कौशल होता है।
कठपुतली को उसका अर्थ मालूम नहीं होता। उसी प्रकार मेरे नाम से कविता लिखकर जनार्दन वक्ता बन गया
है। इसीलिये इस ग्रन्थ की कथा साधु-संतों को पसन्द है। ग्रन्थ लिखते समय यदि देह की अहंता विद्यमान हो तो
एक भी ओवी नहीं लिखी जाएगी। यहाँ जनार्दन ही कर्ता बन जाने के कारण इस ग्रन्थ का अर्थ ठीक-ठीक लग
सका। सज्जनों को चाहिये कि वे आत्मदृष्टि से ही इसकी ओर देखें। केवल संस्कृत वन्दनीय है और प्राकृत निंद्य
है, यह कहना क्या उचित है? यह भी अभिमान की ही बात है और अहंकार परमार्थ में बाधक है। जौहरी
मजदूर लगाकर खान खोदता है और उसमें उसे मूल्यवान रत्न मिलता है; लेकिन यदि वैसा ही रत्न उसे झाडू
लगाते समय कचरे में मिल जाए तो क्या कोई बुद्धिमान व्यक्ति उसे फेंक देगा ? उसी प्रकार संस्कृत पढ़ने के
प्रयास में परमार्थ साध्य नहीं होता और अगर देशी भाषा में वह चीज प्राप्त हो जाय तो ज्ञाता उस पर टूट पड़ेंगे।
चकोर चन्द्रामृत प्राशन करता है और वही कौवे को खाने के लाले पड़ जाते हैं, उसी प्रकार यह देशी भाषा का
ग्रन्थ है। उसका फलीभूत होना ज्ञान और अज्ञान पर निर्भर है। भगवान को भाषा का अभिमान नहीं है, उसके
लिये संस्कृत और प्राकृत दोनों एक समान है। जिस भाषा में ब्रह्मज्ञान पढ़ा जाता है, उससे श्रीकृष्ण सन्तुष्ट रहता

उनतीसवाँ अध्याय ८०१
है। यदि सुवर्ण के फूल हों तो उसमें ताजा और बासी का प्रश्न नहीं उठता। उसी प्रकार संस्कृत और प्राकृत ये
दोनों भाषाएँ ब्रह्म कथन की दृष्टि से समान ही हैं। संस्कृत भाषा में निन्दा करने से क्या वह पवित्र हो जायेगी ?
या प्राकृत भाषा में हरिकथा करने से क्या वह व्यर्थ हो जायेगी ? नहीं, बिलकुल नहीं। भाषा का जितना भी
अभिमान करें, वह वक्ता के लिये बाधक ही होता है। जिस भाषा में ब्रह्म कथन किया जाता है वह भाषा हरि
चरणों में पवित्र ही होती है। श्री जनार्दन का यह कवितारूपी बागीचा है जिसमें ब्रह्मरस बह रहा है। इसका
माधुर्य संतजन जानते हैं। इसीलिये यह ग्रन्थ इस रूप में तैयार हुआ है। उद्धव के बहाने श्रीकृष्ण ने स्वयं ब्रह्मज्ञान
दिया वह संसार बन्धन तोड़कर दीनजनों का उद्धार हो इसलिये वह एकादश स्कंध सरीखा ग्रन्थ जिसमें शुद्ध
परमार्थ भरा हुआ है और बड़े-बड़े कवि अपने स्वयं के लाभ के लिये उस पर टूट पड़ रहे हैं। पके हुए फल पर
जहाँ तोता चोंच मारता है, वहीं चींटी भी जा पहुँचती है। उसी प्रकार महाकवियों का पीछा करते-करते मैं भी
प्राकृत भाषा में अपने हित के लिये पहुँच गया हूँ। सार्वभौम राजा के थाली के पास बड़े-बड़े भी नहीं जा पाते
लेकिन मक्खी सहज ही जा पहुँचती है। उसी प्रकार हमें यह प्राकृत ग्रन्थ मिल गया है। पिता के साथ खाना खाते
समय बालक मीठा पकवान पहले खाता है, उसी प्रकार महाकवियों के अनुभव का परमार्थ प्राकृत के द्वारा मुझे
भी मिला। मुझे सद्गुरुचरण का लाभ हुआ, जिससे यह निरूपण चला। जनार्दन स्वामी अत्यन्त कृपालु हैं।
उन्होंने ही यह ग्रन्थ पूरा किया। आप कहेंगे अब परमार्थ समाप्त हुआ, इसके आगे महान अनर्थ है। लेकिन ऐसी
बात नहीं है। गुह्य-ज्ञान का अनुभव कैसा होता है यह श्रीकृष्ण स्वयं दिखला देंगे। माता, पिता, स्त्री, पुत्र तथा
अन्य लोग, जाति, गोत्र, सुहृद, सज्जन आदि के साथ सारे कुल की मृत्यु हो गयी फिर भी श्रीकृष्ण ने उनके प्रति
ममता नहीं रखी। श्रीकृष्ण की आज्ञा को काल भी स्वीकार करता है, इतनी सत्ता होते हुए भी श्रीकृष्ण ने कुल
का संरक्षण करने की ममता नहीं की। जो देह से अभिमानरहित है, जिसे कुल की ममता बाधक नहीं होती, वह
देह की अहंकारहीनता श्रीकृष्ण अब स्वयं दिखलाने वाले हैं। वह परिपक्व ज्ञान निर्वाण का अत्यन्त मधुर
निरूपण, अगले दो अध्यायों में श्री शुक्राचार्य स्वयं करेंगे। ज्ञान-रहस्य की वह निजकथा जनार्दन की कृपा से
एकाजनार्दन सुना रहा है। श्रोतागण कृपया मुझे अवधान दें क्योंकि जिस कथा की ओर संत अवधान देते हैं, वह
कथा परमार्थ में श्रेष्ठ बन जाती है। इसलिये एकाजनार्दन की प्रार्थना है कि ग्रंथार्थ निर्दोष होने के लिये मुझे
अपना अवधान प्रदान करें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे भगवदुद्धव संवादे एकाकार टीकायां
परमार्थप्राप्तिसुगमोपायकथनोद्धवबद्रीकाश्रमप्रवेशो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥

तीसवाँ अध्याय
हे अनादि सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सर्वादि सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सर्वसिद्धि सद्गुरु ! तुम्हारी
जय हो। हे कृपालु, हे कृपानिधि ! तुम्हारी जय हो। हे वेदवक्ता ! तुम्हारी जय हो, हे वेदार्थ प्रकट करने वाले !
तुम्हारी जय हो। हे वेद प्रतिपालक तुम्हारी जय हो। हे वेदात्मक ! हे वेदज्ञ ! तुम्हारी जय हो। हे विश्व
प्रकाशक ! तुम्हारी जय हो। हे विश्वप्रतिपालक ! तुम्हारी जय हो। हे विश्वनिवासक ! हे अकर्त्तात्मक अव्यय !
तुम्हारी जय हो तुम्हारी स्थिति अक्षर और अव्यय है। तुम्हें नाम, रूप, वर्ण और व्यक्तित्व नहीं है, फिर भी तुम
जाति गोत्र में, लोकव्यवहार के अनुसार विचरण करते हो। संसार में तुम्हारा कोई नहीं है, फिर भी तुम गृहस्थ
धर्म के अनुसार घरबार बसा कर रहते हो। तुम सचमुच नपुंसक, स्त्री-पुरुष स्थिति विरहित हो फिर भी स्त्रियों
तथा बच्चों के साथ रहते हो। तुम अजन्मा होते हुए भी पिता का वन्दन करते हो, उसी प्रकार माता को भी
नमस्कार करते हो। संसार में तुम्हें सब एक समान हैं फिर भी शत्रु-मित्र का चुनाव करते हो। तुम जगन्नाथ होते
हुए जगच्चालक हो, लेकिन एक के सेवक भी बनते हो। तुम पूर्णात्मा परिपूर्ण हो लेकिन रंक बनकर भीख भी
माँगते हो। तुम निष्ठावंत ब्रह्मचारी होकर व्यभिचारी स्त्रियों का उद्धार भी करते हो। तुमने सर्वज्ञ होकर गुरु के
घर मस्तक पर घास और लकड़ी भी ढोयी है। कलिकाल का भी संहार करने वाले तुम हौवे के भय से छिप
कर भी बैठते हो। हे श्रीकृष्ण ! तुम माया के नियंता होते हुए भी अन्त में माया ने ही तुम्हें ओखली से बाँधा।
तुम नित्यतृप्त आत्माराम होते हुए गोपालों का भात खाते थे। तुम्हारा अंत ब्रह्मादि देवतागण भी नहीं जानते।
फिर भी तुम यशोदा के पास रोते हुए खड़े रहते थे। अपने पेट में पूरे त्रैलोक्य का दर्शन कराने वाले तुम गोपियों
की गोद में बैठा करते थे। तुम संसार के चालक श्रीहरि हो, तुम्हें लड़के चलना सिखाते थे। सर्ववंद्य और
सर्वेश्वर हो तुम फिर भी तुम सफेद सुअर (वराह अवतार) बने थे। सारांश, तुम्हारे बारे में वेद भी कोई निर्णय
नहीं कर सकते। वेद पूरी तरह मौन हो गये। बड़े-बड़े ज्ञाता आये लेकिन वे भी तुम्हारा पता-ठिकाना नहीं लगा
सके। योगी जंगल में जाकर बैठे, लेकिन वे भी तुम्हारी महिमा नहीं समझ सके। मुख्यत: जब कृष्ण को जन्म
ही नहीं है तो उसकी मृत्यु कैसे दिखायेंगे ? इससे सम्बन्धित निरूपण सुनने के लिये परीक्षित के मन में उत्कंठा
लगी हुई थी। प्रथमाध्याय में वैराग्य के लिये शापयुक्त मूसल का उल्लेख किया था। वही बात अब ग्रन्थ के
अन्त में परीक्षित पूछ रहा है।
राजोवाच
ततो महाभागवत उद्धवे निर्गते वनम्।
द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः ॥ १ ॥
पाण्डव कुल का रत्न अथवा कौरवकुल का भूषण, जिसने धर्म की रक्षा के लिये कली का निग्रहण किया,
ऐसा राजा परीक्षित, धीर, वीर और उदार कीर्ति के रूप से प्रसिद्ध है, उसने स्वमुख से अत्यन्त श्रद्धापूर्वक श्री
शुक्राचार्य से विनती की। पूछा कि उद्धव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त होने के बाद जब वह बदरिकाश्रम गया तो उसके
बाद द्वारका में श्रीकृष्ण ने क्या किया ? उत्पत्ति, स्थिति और लय जो अपनी इच्छा के अनुसार किया करता है,
उस श्रीकृष्ण ने अपने देह का विसर्जन किस प्रकार किया ?