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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 813, कुल 869 में से

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पृष्ठ 813

उनतीसवाँ अध्याय ७९७
वाली ग्वालिनें थीं उनके पैरों पर मोक्ष आ लगा और उनकी चरण रज को ब्रह्मदेव ने भी दण्डवत किया। तुम
परमात्मा परमेश्वर हो, यह बात उन ग्वालिनों को तथा वानरों को नहीं मालूम थी। फिर भी तुम्हारी भक्ति ही
उन्हें सचमुच परब्रह्मस्वरूप के कारण मालूम हुई। इस प्रकार तुम्हारा भजन अगाध है, उसकी महिमा भी समझ
से बाहर है; तुम्हारा देवत्व यदि भक्ति के ही अधीन है, तो फिर मोक्ष में अधिक क्या है? भक्ति से ही मुक्ति का
जन्म हुआ, भक्ति के कारण ही वह बढ़ी; वही मुक्ति यदि भक्ति के विनाश का कारण बनती है तो ऐसी
मातृघातक मुक्ति को मैं स्पर्श भी नहीं करूँगा। जिससे मुक्ति पर आया हुआ दोष दूर होकर वह अत्यन्त पवित्र
होगी, ऐसी एक गुप्त बात मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रीकृष्ण ! उसे कृपया ध्यानपूर्वक सुनें। वह गुप्त बात यही है कि
मोक्ष प्राप्त होते हुए भी आप मुझे अपना गुरुभजन भी दें, उससे मुक्ति भी पावन होगी। इतना कहकर उसने
श्रीकृष्ण को साष्टांग दण्डवत किया। उद्धव ने श्रीकृष्ण के चरण अपने मस्तक पर रखे, वह उसे छोड़ ही नहीं
रहा था। इससे श्रीकृष्ण आश्चर्यचकित हो गया और उसे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उद्धव ने कहा, मैं मुक्त हो गया
यह जानकर भी मैं तुम्हारा भजन नहीं छोड़ूँगा। मुझ पर ऐसी ही कृपा करो। पूर्ण मुक्तता प्राप्त होने के बाद मुझे
सद्गुरु भजन का लाभ नहीं मिलेगा, लेकिन मुझे इस विघ्न की बाधा न हो ऐसी भक्ति मुझे बतायें। तुम कहोगे
कि कोटि-कोटि जन्म लेने पर भी जब मुक्ति नहीं मिल पाती, उस मुक्ति को ही तुम विघ्न कहते हो ? तुम पक्के
मूर्ख हो। लेकिन जिसके कारण तुम्हारा भजन छूट रहा हो, उसे मैं बहुत बड़ा विघ्न समझता हूँ। हे श्रीकृष्ण !
तुम्हारी भक्ति के बिना मिली हुई मुक्ति मुझे स्वादहीन लगती है। हे श्रीकृष्ण ! ऐसी कृपा करो कि मेरी
नित्यमुक्तता भी न टूटे और अहेतुक भक्तिमार्ग भी चलता रहे। इसमें जरा भी संकोच न करो। तुम कहोगे, मैंने
तुम्हें नित्य मुक्ति दी; लेकिन मुक्ति तो मेरे पास तैयार ही थी। वह तुमने मुझे दी यह कहना व्यर्थ है। दातृत्व का
यह व्यर्थ का ही अहंकार है। अब मैं आपसे भक्ति माँग रहा हूँ, उसे आप दें तभी आप सच्चे दाता हैं, इसी को
मैं आपकी उदारता कहूँगा। लेकिन प्रसन्न होकर मुझे भक्ति दिलाने में आपको उत्साह नहीं दिखायी देता। कृष्ण !
आप मेरे प्रति अत्यन्त कंजूस हो गये हैं। सद्गुरु भक्ति को नष्ट करने वाली जीवन्मुक्ति हमें बिलकुल नहीं
चाहिये। उसे मुक्ति कहना यह भी भ्रांति है। हे श्रीकृष्ण ! जब बद्धता ही नहीं है, तो फिर मुक्ति कहाँ से आयी ?
अतः ऐसी मिथ्या मुक्ति को मैं स्पर्श भी नहीं करूँगा। मेरी गुरुभक्ति ही मुझे दे दो। पहले तुमने जिन्हें मुक्ति
दिलायी थी, उन्हें भी तुमने ऐसा ही ठगा था। मुझे इस प्रकार की झूठी आशा मत दिलाओ। मोक्ष से ऊपर जो
भक्ति है वही मुझे दीजिये। यह कह कर उसने साष्टांग दण्डवत किया और उसके दोनों चरण पकड़ लिये। तब
श्रीकृष्ण के प्रेम को भी ज्वार आ गया और वह उद्धव पर अत्यन्त प्रसन्न हो उठा। मोक्ष से भी श्रेष्ठ जो
गुरुभक्ति, वही उद्धव ने अनेक युक्तियों से माँगी और उस समय उसने जो भाषण किया उससे श्रीकृष्ण अत्यन्त
सन्तुष्ट हुआ। प्रेमसुख में वह झूमने लगा। उसी सुखमय स्थिति में उसने भक्ति और मुक्ति दोनों ही उद्धव को
अर्पण की। संसार में उद्धव ही पुण्य शुद्ध है; संसार में उद्धव ही सबसे धन्य है क्योंकि श्रीकृष्ण ने उसे मोक्ष से
भी श्रेष्ठ गुरुभजन अर्पित किया। गुरु और ब्रह्म दोनों एक ही हैं, यह भी पूरी तरह सद्गुरु ही सिखाते हैं।
इसलिये मोक्ष से भी श्रेष्ठ जो गुरुभजन है, उसका सच्छिष्य को दोष नहीं लगता। पहले श्रीकृष्ण ने सन्तुष्ट
होकर अपने भक्तों को उन्होंने माँगी हुई मुक्ति दी थी। लेकिन उन्हें इस भक्ति का आकलन ही नहीं हुआ।
लेकिन उद्धव ने उन सब पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की। मुक्ति के मस्तक पर भक्ति को बिठाया और दुर्गम स्थिति
माँगी जो श्रीकृष्ण ने उसे दी। उद्धव ! मुक्ति से भी श्रेष्ठ जो भक्ति है, वही मेरे अवतारों की अवतारशक्ति है।
उसी के योग से मैं श्रीपति उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कर अन्त में अलिप्त ही रहता हूँ और सचमुच इसी के