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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 817, कुल 869 में से

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पृष्ठ 817

उनतीसवाँ अध्याय ८०१
जिसके ब्रह्मज्ञान की फसल नहीं फलती, उसका वह ज्ञान पूरा नहीं है। जिस प्रकार पके हुए फलों के वृक्ष के पास
पक्षी अपने आप एकत्र होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मस्थिति अपने पूर्णत्व पर पहुँचती है उस समय शिष्यों का वहाँ
जमघट होने लगता है। शब्दों से ब्रह्मज्ञान का उपदेश करते हैं लेकिन यदि वह मन को रुचता नहीं है तो वह
ब्रह्मज्ञान निर्वीर्य है। उद्धव ! जानते हो, ऐसा क्यों होता है ? ब्रह्मज्ञान का अनुभव होते ही उससे देह में ज्ञातव्य का
बोध होता है और उससे ज्ञानाभिमान उत्पन्न होता है। इससे ज्ञान का सामर्थ्य कम हो जाता है। ज्ञाता जितना
निरहंकारी होगा, उतना ही ज्ञान का सामर्थ्य बढ़ता है। उसकी कृपा होते ही सच्छिष्य को तत्काल बोध होता है।
उद्धव ! तुम्हें मेरा ज्ञान प्राप्त हुआ है, उसका शिष्यों को उपदेश करो ताकि वे तुम्हारा सम्मान करें। फिर भी तुम
ज्ञानाभिमान न करो। शिष्य जो सम्मान दे रहे हैं, उसे न लेने से अपरिपक्वता दिखायी देती है और लेने से
ज्ञानाभिमान बढ़ता है। यह भी ज्ञाता का विघ्न ही है। इसलिये शिष्य जो सम्मान दे रहे हैं उसे बिना झिझक के
लेना चाहिये लेकिन ज्ञानाभिमान नहीं करना चाहिये। यही ज्ञाता का मुख्य लक्षण है। तुम्हें मेरा पूर्ण ज्ञान प्राप्त
हुआ है अतः एकान्त हो या लौकिक में हो, तुम निरभिमान स्थिति में ही रहो। सदा स्वानंदस्फूर्ति रहने दो। इस
निरभिमान स्थिति का उपदेश शिष्यों को भी करो क्योंकि निरभिमान होने जैसी स्थिति से उत्कृष्ट स्थिति त्रिभुवन
में और कोई नहीं है। इस उपदेश का लक्षण है, वाणी में मेरे नाम का कीर्तन, शरीर से मेरा नित्य भजन और मन
को सदा मेरे स्वरूप में निमग्न रखना। ज्ञानी कहने से अभिमान नहीं होना चाहिये और मूर्ख कहने से क्रुद्ध नहीं
होना चाहिये। स्वयं उद्वेगरहित अवस्था में रहना चाहिये। यही ज्ञाता की उत्तम स्थिति है। इस प्रकार नित्य
अभिमानरहित रहकर, भक्तियुक्त वैराग्य तथा ज्ञान का स्वयं आचरण कर सच्छिष्यों को वैसा ही उपदेश करते
रहना चाहिये। जो शिष्य तुम्हारी शरण में आयें उन्हें नीच न समझो। शिष्य को भी पूज्य समझना गुरुत्व की पूर्णता
का लक्षण है। जिस प्रकार सद्गुरु को समस्त प्राणिमात्र में निरन्तर ब्रह्म के ही दर्शन होते हैं, यदि उनमें शिष्य
भिन्न-भिन्न दिखायी देने लगें तो क्या उनकी ब्रह्मस्थिति भाग गयी ? इसलिये शिष्य अपने से क्षुद्र है ऐसा कभी
नहीं समझना चाहिये। शिष्य भी पूर्ण ब्रह्मरूप है ऐसा मानना चाहिये, यही गुरु का प्रमुख लक्षण है। जिस प्रकार
माँ को अपने नन्हे बालक से दुलार रहता है, उसी प्रकार गुरु को शिष्य के सच्चे हित का ख्याल रहना चाहिये।
इसी को शुद्ध 'सद्गुरुत्व' कहते हैं। शिष्य के लक्षण के बारे में पहले ही बताया जा चुका है। वैसा अधिकारी
शिष्य जहाँ भी दिखायी पड़े, उसे सचमुच उपदेश करो। तुम्हें अब तक जो कुछ पढ़ाया, वह सब शिष्योपदेश के
ही लिये था, ऐसा समझ लो। वास्तव में तुम तो मूलतयः गुणातीत हो इसलिये यह तुम पर लागू नहीं होता।
अतिव्रज्य गीतस्तिस्रो मामेष्यसि ततः परम्॥ ४४॥
इस प्रकार ज्ञान का उपदेश करोगे तो तुम्हारी गुणातीतता तो भंग नहीं होगी; बल्कि तुम जिसे उपदेश करोगे
वह भी त्रिगुणावस्था पर विजय प्राप्त करेगा। पहले बताये हुए उपदेश के अनुसार जो शिष्य सदा व्यवहार करेंगे,
वे भी गुरुकृपा से त्रिगुण की जो तीन वृत्तियाँ हैं उन्हें पार कर जायेंगे। तीन गुणों के तीन प्रकार हैं। दृश्य, द्रष्टा
और दर्शन; जागृति, सुषुप्ति और स्वप्न; ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान। कार्य, कारण और कर्त्ता; भोज्य, भोजन और भोक्ता;
शत्रु, मित्र और उदासीन; ये तीन गुणों की तीन अवस्थाएँ हैं जो बाधक हैं। किन्तु इस उपदेश से सच्छिष्य मेरा
भजन कर त्रिगुणों के त्रिगुण का नाश कर स्वयं मेरा स्वरूप बन जायेंगे। मेरे स्वरूप में न गुण हैं न गुणवृत्ति ही
है। इसलिये भक्त सद्भाव से गुणातीत स्थिति तक पहुँच कर सहज स्वानंद प्राप्त करते हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव को
ऐसी आज्ञा की। इसके बाद की उसकी अवस्था की महिमा का वर्णन परीक्षित को स्वयं शुक्राचार्य किस प्रकार
करते हैं, देखें।