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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 822, कुल 869 में से

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पृष्ठ 822

८०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अन्त में विदेह कैवल्य की प्राप्ति हुई यह कहना वक्ता का भ्रम है। सोने का कंगन बनाओ या उसे तोड़ो लेकिन
यह सब सोने को नहीं मालूम होता, उसी प्रकार जन्म और मरण केवल देह के ही लिये है। उद्धव परिपूर्ण
परब्रह्म था। देह में रहते हुए भी वह नित्यमुक्त विदेही ही था। उसे देह के अन्त में विदेह मोक्षप्राप्ति हुई, यह
कहना भी केवल लौकिकता है। देह जाये या रहे, उस सम्बन्ध में ज्ञाताओं को कोई दुःख नहीं होता। उनकी
ब्रह्मभावना अखण्ड और अनस्यूत रहती है। देह को दैव चलाता है और मरण भी दैव ही लाता है। ज्ञाता ब्रह्म में
ही पूर्णब्रह्म होकर रहने के कारण, जन्म और मरण उसे मालूम नहीं होता। देह रहे या जाये, मैं परब्रह्म ही हूँ।
जिस प्रकार डोर में साँप का मिथ्यापन डोर के ही कारण मिथ्या होता है। जहाँ का मृगजल घट गया वहाँ की
भूमि सूख गयी, ऐसा यदि कहें तो क्या जहाँ जल भरा रहता है वहाँ की भूमि गीली रहती है ? उसी प्रकार देह
की वर्तमान स्थिति समूल मिथ्या है ऐसा प्रतीत होता है तो उस देह का अन्त होने पर विदेह कैवल्य की प्राप्ति
हो, ऐसा नहीं होता। इस प्रकार बदरिकाश्रम में अनेक दिन रहने के बाद उसी निजदेह के अन्त में वह भगवद्गति
को प्राप्त हो गया। यह कहना भी केवल लौकिक दृष्टि से ही है। वह प्रारम्भ से अन्त तक परब्रह्मस्वरूप ही था,
वह अपने स्वाभाविक स्वरूप से मिल गया। उद्धव की भगवद्भक्ति और अंतकाल की उसकी स्थिति का विचार
कर शुक्राचार्य को अत्यन्त आनन्द हुआ और वे कृष्ण कृपा का वर्णन करने लगे।
य एतदानन्दसमुद्रसम्भृतं ज्ञानामृतं भागवताय भाषितम्।
कृष्णेन योगेश्वरसेविताङ्घ्रिणा सच्छ्रद्धयाऽऽसेव्य जगद् विमुच्यते ॥ ४८ ॥
जो योगेश्वर योगमार्ग से (अथवा ज्ञानमार्ग से) जीवन्मुक्ति तक पहुँचते हैं, वे भी कृष्ण चरणों की सेवा
करते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण की मूर्ति पूज्य है। उनके चरणों पर सनकादिक सरीखे संत तल्लीन रहते हैं, ब्रह्मदेव जैसे
देवता भी उनके आगे रंक की तरह प्रतीक्षारत रहते हैं। उस श्रीकृष्ण ने स्वानंद की स्थिति में अपनी भक्ति प्रकट
की। उद्धव पर उसकी अत्यन्त कृपा थी इसीलिये उसने अपने मुख से उसे सुनायी। भगवद्भक्ति यही एक
महासागर है; उसमें धैर्य मंदराचल है; और गुरु-शिष्य यही मंथन करने को तत्पर होने वाले सुर और असुर हैं।
श्रद्धा और विश्वास ये मथनी को खम्भे से बाँधने वाली दो डोरियाँ हैं और बोध नामक मजबूत रस्सी से उन्होंने
मंथन करना शुरू किया। उसी मंथन में पहले 'अहं ज्ञाता' अर्थात मैं ज्ञानी नामक अहंकाररूपी हलाहल की
उत्पत्ति हुई। उसे विवेकरूपी शंकर ने कंठ में धारण कर, पुनः 'मैं' का अहंकार नहीं होगा इसलिये निगल
लिया। इस प्रकार अभिमानरहित होकर मंथन कर भक्तिसाररूपी अमृत निकाला ओर.उसे श्रीकृष्ण ने कृपा कर
उद्धव को अर्पण किया। धर्म, अर्थ, काम और मुक्ति इन चार पुरुषार्थों से भी श्रेष्ठ भक्तिसारामृत उद्धव के हाथ में
दिया। निजबोध का पात्र निजानुभव से स्वच्छ धोकर उसमें यह सारामृत भरकर उद्धव को उसका प्राशन कराया।
उससे उद्धव तृप्त हुआ, त्रिविध तापों से मुक्त हुआ परमसुख से सुखी हुआ और ब्रह्मस्वरूप में परब्रह्म से ही
मिला। इस प्रकार उद्धव भक्तिसारामृत प्राशन कर परम सन्तुष्ट हुआ। श्रीकृष्ण निजभक्तों पर इस प्रकार कृपा
करता था। कृष्ण और उद्धव का यह पूरा संवाद अर्थात भक्तिसारामृत रूपी गुह्यज्ञान, इसका जो श्रवण, मनन और
अनवरत चिन्तन से सेवन करेगा, उसके भय से संसारबंधन दूर भाग जायेगा। स्वप्न में भी उसे जन्म-मरण का
दर्शन नहीं होगा। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उसकी संगति में रहकर जो इस कथा की भक्ति में रंग
जायेंगे उन्हें भी, हे परीक्षित् ! संसार बंधन की कल्पांत में भी बाधा नहीं होती। जिसकी इस कथा पर पूर्ण श्रद्धा
होगी, जिसे इस कथा की लगन होगी, जो इस कथा का अनुष्ठान करेगा वह सारे संसार का उद्धार करने वाला