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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 825, कुल 869 में से

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पृष्ठ 825

उनतीसवाँ अध्याय ८०१
है। यदि सुवर्ण के फूल हों तो उसमें ताजा और बासी का प्रश्न नहीं उठता। उसी प्रकार संस्कृत और प्राकृत ये
दोनों भाषाएँ ब्रह्म कथन की दृष्टि से समान ही हैं। संस्कृत भाषा में निन्दा करने से क्या वह पवित्र हो जायेगी ?
या प्राकृत भाषा में हरिकथा करने से क्या वह व्यर्थ हो जायेगी ? नहीं, बिलकुल नहीं। भाषा का जितना भी
अभिमान करें, वह वक्ता के लिये बाधक ही होता है। जिस भाषा में ब्रह्म कथन किया जाता है वह भाषा हरि
चरणों में पवित्र ही होती है। श्री जनार्दन का यह कवितारूपी बागीचा है जिसमें ब्रह्मरस बह रहा है। इसका
माधुर्य संतजन जानते हैं। इसीलिये यह ग्रन्थ इस रूप में तैयार हुआ है। उद्धव के बहाने श्रीकृष्ण ने स्वयं ब्रह्मज्ञान
दिया वह संसार बन्धन तोड़कर दीनजनों का उद्धार हो इसलिये वह एकादश स्कंध सरीखा ग्रन्थ जिसमें शुद्ध
परमार्थ भरा हुआ है और बड़े-बड़े कवि अपने स्वयं के लाभ के लिये उस पर टूट पड़ रहे हैं। पके हुए फल पर
जहाँ तोता चोंच मारता है, वहीं चींटी भी जा पहुँचती है। उसी प्रकार महाकवियों का पीछा करते-करते मैं भी
प्राकृत भाषा में अपने हित के लिये पहुँच गया हूँ। सार्वभौम राजा के थाली के पास बड़े-बड़े भी नहीं जा पाते
लेकिन मक्खी सहज ही जा पहुँचती है। उसी प्रकार हमें यह प्राकृत ग्रन्थ मिल गया है। पिता के साथ खाना खाते
समय बालक मीठा पकवान पहले खाता है, उसी प्रकार महाकवियों के अनुभव का परमार्थ प्राकृत के द्वारा मुझे
भी मिला। मुझे सद्गुरुचरण का लाभ हुआ, जिससे यह निरूपण चला। जनार्दन स्वामी अत्यन्त कृपालु हैं।
उन्होंने ही यह ग्रन्थ पूरा किया। आप कहेंगे अब परमार्थ समाप्त हुआ, इसके आगे महान अनर्थ है। लेकिन ऐसी
बात नहीं है। गुह्य-ज्ञान का अनुभव कैसा होता है यह श्रीकृष्ण स्वयं दिखला देंगे। माता, पिता, स्त्री, पुत्र तथा
अन्य लोग, जाति, गोत्र, सुहृद, सज्जन आदि के साथ सारे कुल की मृत्यु हो गयी फिर भी श्रीकृष्ण ने उनके प्रति
ममता नहीं रखी। श्रीकृष्ण की आज्ञा को काल भी स्वीकार करता है, इतनी सत्ता होते हुए भी श्रीकृष्ण ने कुल
का संरक्षण करने की ममता नहीं की। जो देह से अभिमानरहित है, जिसे कुल की ममता बाधक नहीं होती, वह
देह की अहंकारहीनता श्रीकृष्ण अब स्वयं दिखलाने वाले हैं। वह परिपक्व ज्ञान निर्वाण का अत्यन्त मधुर
निरूपण, अगले दो अध्यायों में श्री शुक्राचार्य स्वयं करेंगे। ज्ञान-रहस्य की वह निजकथा जनार्दन की कृपा से
एकाजनार्दन सुना रहा है। श्रोतागण कृपया मुझे अवधान दें क्योंकि जिस कथा की ओर संत अवधान देते हैं, वह
कथा परमार्थ में श्रेष्ठ बन जाती है। इसलिये एकाजनार्दन की प्रार्थना है कि ग्रंथार्थ निर्दोष होने के लिये मुझे
अपना अवधान प्रदान करें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे भगवदुद्धव संवादे एकाकार टीकायां
परमार्थप्राप्तिसुगमोपायकथनोद्धवबद्रीकाश्रमप्रवेशो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥