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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 812, कुल 869 में से

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पृष्ठ 812

७९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मदारी में ही होता है, उसी प्रकार तुम्हारी यह माया तुम्हारे ही वश में रहती है, उसके स्नेहपाश भयंकर हैं, उसने
लोगों को बद्ध करके रखा है। तुमने मेरे वे पाश पहले ही तोड़ दिये हैं। जब मेरी बाल्यावस्था थी, तभी तुमने मुझ
पर कृपा की थी। संसार बन्धन काटने वाला शस्त्र तुमने धार तेज कर मेरे हाथ में दिया है। अब इस शस्त्र के बल
पर मैं संसार का बन्धन भी तोड़ सकूँ, इतनी तुमने दयालु होकर मुझ पर कृपा की है। संसार जो दुःखरूप था वह
मेरे लिये सुखरूप हो गया। इस प्रकार तुमने कृपा का वरदहस्त रखकर मेरा सचमुच उद्धार किया। इससे मैं
कृतकृत्य हो गया हूँ, लेकिन अब मैं तुमसे कुछ माँगने वाला हूँ, उसे देने की श्रीकृष्ण कृपा करें। इतना कह कर
वह श्रीकृष्ण के चरणों में गिर गया।
नमोऽस्तु ते महायोगिन् प्रपन्नमनुशाधि माम्।
यथात्वच्चरणाम्भोजे रतिः स्यादनपायिनी ॥४०॥
जो घटना सम्भव नहीं होता, उसे सम्भव कर देते हो, अलौकिक चमत्कार दिखाते हो, चैतन्य और जड़
देह का विवाह कराकर माया से उनका उत्तम संसार बसा देते हो। जो योगियों के लिये भी कठिन है, जिसने
ब्रह्मदेव और शंकर को भी छला, वह माया तुम्हारी दासी है। तुम परात्पर महायोगी हो। तुम्हारी उस कृपा के
कारण ही मैं आज कृतकृत्य हुआ। संसार भय आदि दुःखों का भान ही न रहकर मैं सर्वदा स्वानंद में ही निमग्न
रहता हूँ। दृश्य, द्रष्टा, दर्शन यह त्रिपुटी भी नहीं है और त्रिगुण में नहीं हैं; आत्मबोध से पूर्णानंद प्राप्त होने के
कारण 'मैं' 'तू'पन के भाव का विलय हो गया। आत्मज्ञान के कारण स्वानंद पूर्ण हो गया यह कहना भी मायिक
है क्योंकि, परादि चारों वाणियाँ मूक हो गयीं, इसीलिये वेदवाद मौन हो गये। कार्य, कारण और कर्त्तव्यता मेरे
लिये नहीं रह गये। फिर भी हे श्रीकृष्णनाथ! मैं अब तुमसे कुछ तो माँगूँगा। माँ जिस प्रकार बालक का हठ
आत्मीयता से सुनती है, उसी प्रकार मेरी माँग भी तुम सुन लो। यह मेरी अन्तिम माँग है। भगवान इसे ध्यान
देकर सुनें, यह कह कर उसने श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन कर विचित्र-सी माँग प्रस्तुत की। मुझे भ्रम था कि
जीवन्मुक्ति बड़ी मधुर पीड़ा होगी, लेकिन उसमें मुझे तुम्हारी भक्ति नहीं दिखायी देती। इसलिये वह शुष्क मुक्ति
मुझे नहीं चाहिये। इसलिये मैं पुनः तुम्हारी शरण में आया हूँ। सद्गुरु के वचन से शिष्य को तत्काल मुक्ति
मिलती है, लेकिन जिसमें सद्गुरु की भक्ति नहीं है, उस मुक्ति को आग लगे। मुझे वह नहीं चाहिये। इसलिये मैं
पुनः तुम्हारी शरण में आया हूँ; मुझे तुम अपना गुरु भजन दो। पहले अनेकों ने भक्ति की, उन्हें मैंने मुक्ति ही दी,
लेकिन उनमें से किसी ने मुक्ति के बाद भक्ति नहीं माँगी ऐसा यदि कहोगे तो पहले जिन्होंने तुम्हारी भक्ति की
थी उन्हें तुमने मुक्ति देकर फँसाया लेकिन तुम्हारी यह चातुरी मेरे साथ नहीं चलेगी। क्योंकि जिनकी वृत्ति
अहंकारशून्य होकर जो सहज ही आत्मारामस्वरूप हो गये, वे भी तुम्हारी निष्काम भक्ति करते हैं। तुम्हारे स्वरूप
का यही धर्म है। अतः तुम्हारी गुरुभक्ति के बजाय मुक्ति माँगना यह केवल भ्रम है। तुम्हारी वह मुक्ति मुझे नहीं
चाहिये। मुझे गुरुभक्ति ही दो। जब स्वयं ही मुक्ति प्राप्त हो गयी, उसे अब भक्ति नहीं दी जा सकती, ऐसा यदि
तुम कहोगे तो ऐसी बातें मुझे न समझाओ। तुम्हारा सामर्थ्य मैं अच्छी तरह जानता हूँ। जो कभी हो नहीं सकता,
उसे तुम सम्भव कर देते हो; जो हिल नहीं सकता उसे हिला देते हो; जो किसी से नहीं हो सकता वह तुम कर
देते हो, तुम्हारे सामर्थ्य का अन्त नहीं है। हे श्रीराम! सेतु बाँधने के लिये तुमने डूबते हुए पत्थरों को तैरा दिया
और उसके ऊपर से वानर सेना को ले गये। जंगल में रहने वाले और पेड़ के पत्ते खाने वाले वे वानर उनकी
दासी चारों मुक्त हो गये और बड़े-बड़े देवता भी उन्हें नमन करने लगे। जो व्यभिचारिणी तथा गोबर में खेलने