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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 819, कुल 869 में से

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पृष्ठ 819

उनतीसवाँ अध्याय ८०३
किया हुआ, गले में एक लड़ी का पदक और कंठ में कौस्तुभमणि। पैरों में पैंजनी की रुनझुन, बाहों में बाजुबंद
और कटि पर शोभा देने वाला पीत रंग का पीताम्बर, पैरों तक लटकी हुई वनमाला ऐसा अत्यन्त सुन्दर
घनश्याम देखकर मन तृप्त हो जाता था। श्रीकृष्ण का ऐसा दर्शन पुनः प्राप्त नहीं होगा इसलिये उद्धव प्रेमविह्वल
हो उठा। उद्धव पूर्णब्रह्म हो चुका था। उसे सगुण की इतनी चाह कैसे हो गयी? क्योंकि कृष्णप्रभा से प्रकाशित
होने वाली चिद्धन आत्मवस्तु श्रीकृष्ण ही था। घी जमा हुआ हो या पतला हो, लेकिन वह घी के गुण से वंचित
नहीं होता; उसी प्रकार सगुणानर्गुणत्त्व के साँचे में ढली हुई परब्रह्म की मूर्ति साक्षात् श्रीकृष्ण ही थे। सगुण रूप
त्याज्य है और निर्गुण रूप पूज्य है यह विचार भी आज की स्थिति का है। जो तृण-पाषाण को भी ब्रह्मरूप
मानता है, वह सगुण रूप का कभी भी तिरस्कार नहीं करेगा। इस प्रकार उद्धव को सगुण के लिये सगुण और
निर्गुण ये दोनों ही रूप समान थे किन्तु गुरु की दृष्टि से श्रीकृष्ण पर उसका अत्यन्त प्रेम था। इसलिये उसे
छोड़कर जाने में उद्धव अत्यन्त विह्वल हो उठा। किन्तु आज्ञा का उल्लंघन करना नहीं चाहता था, इसलिये
बदरिकाश्रम जाने के लिये उद्यत हुआ तो श्रीकृष्ण को छोड़कर जाने में अत्यन्त कष्ट हुआ। जाने से पहले वह
श्रीकृष्ण के चरणों पर लोट गया। पैरों को आलिंगन में बाँधकर उसे हृदय से कसकर बाँध लिया लेकिन वहाँ
से निकल कर जाने का साहस नहीं हुआ। यदि मैं यहाँ से चला गया तो पुनः श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं होंगे। इस
विचार से उसकी अवस्था अत्यन्त कठिन हो गयी और उसके पैर ठिठक कर वहीं रह गये। कृष्ण के चरणामृत
से ही मैं तृप्त हो गया हूँ। मुझे अब महातीर्थों की आवश्यकता नहीं है। ऐसा होते हुए भी मेरा प्रारब्ध मुझे
श्रीकृष्ण का वियोग करा रहा है। इतना कहकर वह थर-थर काँपने लगा; उसका गला रुंध गया, आँखों में
आँसू भर आये और वह बार-बार सुबकने लगा। वह रोमांचित होकर पसीने से तर हो गया। वह जाने के लिये
बिलकुल तैयार हो गया; श्रीकृष्ण के चरणों पर गिरता, फिर वहाँ से चला जाता और पुनः आकर चरणों पर
लोट जाता। उद्धव का वह श्रद्धा भाव देखकर श्रीकृष्ण परमानंद से सन्तुष्ट हो गये। वे मन ही मन बोले, मेरे
प्रति इसका अत्यन्त स्नेह है; और गुरुत्व भावना से तो वह अनन्य हो गया है। श्रीकृष्ण को उस पर दया आयी
और उसने अपने चरणों की पादुकाएँ उद्धव को सौंप दीं। उसने उन्हें अपने मस्तक से लगाया। उसे मस्तक से
लगाते ही उद्धव भूल गया कि मैं कृष्ण से दूर जा रहा हूँ। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने उसे उपदेश दिया। वे पादुकाएँ
मस्तक पर रखते ही उसकी व्याकुलता अपने आप शान्त हो गयी और वह श्रीकृष्ण को नमस्कार कर उनसे
आज्ञा लेकर जाने के लिये निकला। त्रिवार प्रदक्षिणा कर उसने श्रीकृष्ण का मुखावलोकन किया; उसके चरणों
को नमस्कार किया और उसकी आज्ञा से चला गया। अब तृतीय स्कंध की कथा सुनें—उद्धव को विदुर का
दर्शन हुआ, दोनों ने एक-दूसरे को आलिंगन देकर कुशल क्षेम पूछा। तब कृष्ण के निधन की वार्ता सुनाते
समय उद्धव की चर्या पर दुःख की हलकी सी छटा भी नहीं दिखायी दी। इससे विदुर ने भाँप लिया कि इसे
ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ है। मरता गुरु हो और रोता हुआ चेला हो तो समझ लो कि ज्ञान व्यर्थ गया। इस पार
कृपामूर्ति श्रीकृष्ण प्रसन्न हुआ, इसलिये इसकी मोह ममता वाली वृत्ति समाप्त हो गयी, इसलिये यह परमानंद में
निमग्न होकर आत्मस्वरूप में झूम रहा है। शब्दों को स्पर्श किये बिना ही वह बोल रहा है, पृथ्वी का स्पर्श
किये बिना ही यह सहज रूप से चल रहा है, नामरूप में रहकर भी नामरूप को स्पर्श नहीं करता; जिह्वा के
बिना ही रसास्वादन करता है; नेत्रों के बिना ही देखता रहता है; इन्द्रियों के बिना ही निर्मल सुख का
निजात्मतृप्ति से भोग कर रहा है। निर्विकल्प आत्मज्ञान; तिसपर भक्ति, ज्ञान, वैराग्य! उद्धव की ऐसी स्थिति
देखकर विदुर के मन को अत्यन्त संतोष हुआ। फिर उसने उद्धव से विनती की कि हे भगवन्! श्रीकृष्ण तुझ

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