श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 811, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनतीसवाँ अध्याय ७९५
प्रत्यर्पितो मे भवतानुकम्पिना भृत्याय विज्ञानमयः प्रदीपः।
हित्वा कृतज्ञस्तव पादमूलं कोऽन्यत् समीयाच्छरणं त्वदीयम्॥ ३८ ॥
केवल तुम्हारा सान्निध्य ही अज्ञान का निघातक है, और यह बात सात्त्विक भक्तों को भली-भाँति मालूम
है। औरों की बात तो है ही लेकिन स्वयं मैंने भी अनुभव लिया है। अविद्या को समाप्त करने के लिये
सत्संगति ही समर्थ है। सत्संग में भी तुम्हारी संगत अत्यन्त पवित्र है। दीनों का उद्धार करने के लिये तुमने ही
यह आत्मज्ञान प्रकट किया है। मेरा बहाना बनाकर दीन जनों का उद्धार हो अज्ञान का विनाश हो, इसलिये
तुमने ज्ञानदीप पूरी तरह प्रज्वलित किया। उपदेश के लिये श्रद्धा उत्पन्न होना आवश्यक है। वही कसोरे में भरा
हुआ तेल है। विवेक वैराग्य धारण करना यह उसमें की बाती है। वहाँ ज्ञानधन चित्रभापूर्ण महाद्वीप प्रज्वलित
किया हुआ है। नैराश्य ही वैराग्यधारण है। उसमें ही ज्ञानदीप पूर्णरूप से प्रज्वलित होता है और आशा ही उस
दीप को बुझाना है। दीप बुझाने के बाद वहाँ चारों ओर अँधेरा छा जाता है। उस दीप को कर्णद्वार में रखा तो
उसका अंतर्बाह्य प्रकाश फैल गया। अज्ञान-अन्धकार नष्ट होकर वह दीपक स्वयं से प्रदीप्त हो गया। उस
अंतर्बाह्य सप्रकाश से तुम्हारा स्वरूप स्पष्ट दिखायी देने लगा। इस प्रकार हृषीकेश ने स्वयं ही अपना स्वरूप
मुझे अनायास अर्पण किया। तुमने अंतर्यामित्व से अपना स्वरूप मुझे पहले ही दिया था, किन्तु अपना भजन
प्रकट हो इसलिये तुमने उसे समेट लिया। तुम्हारे सच्चे भजन का लक्षण यह है कि सभी भूतों के प्रति
भगवद्भजन करें। इस प्रकार तुम सचमुच प्रसन्न होकर पहले अर्पण किया हुआ ज्ञान ही पुनः अर्पण करते हो।
आत्मभजन की वृद्धि कर मेरा ही ज्ञान मुझे अर्पण करते हो। इसे ही ज्ञानी लोग 'प्रत्यर्पण' कहते हैं। अपनी
भक्ति बढ़ाकर मेरा ही ज्ञान मुझे प्रदान किया जिससे माया और विकल्पवृत्ति मुझे स्पर्श भी नहीं करती। जो
स्वरूप स्थिति तुमने दी उसे कल्पांत में भी छिपाया नहीं जा सकता। इस प्रकार हे श्रीकृष्ण! तुमने सचमुच
बड़ी कृपा की। इस प्रकार तुम अत्यन्त कृपालु हो और अपने दासों के प्रति सदय हो। तुम्हें छोड़कर अनाड़ी
लोग दूसरों का भजन करने दौड़ते हैं। स्वामी श्रीकृष्ण को छोड़कर जो दूसरे के भजन में लगता है, उसे
हरिभजन पर विश्वास नहीं है, वह शुद्ध पशु ही नहीं, अपितु पशुओं में भी निरा गधा है। तुमने लोगों पर जो
उपकार किया है, अव्यंग इन्द्रिय देकर ज्ञान का अधिकार दिया है, यह उपकार जो मनुष्य भूल जायगा वह
सचमुच ही कृतघ्न है। जो कोई तुम्हारा उपकार जानता है, वह काया, वाचा, मन और धन देकर किसी अन्य
को नहीं भजता, इस बात का मुझे विश्वास हो गया। मेरे बहाने तुमने जो आत्मज्ञान प्रकट किया, उसके श्रवण
से, मनन से और कीर्तन से पूरे संसार का उद्धार होगा। इस प्रकार तुम पूर्ण कृपालु हो, इसीलिये मेरा
संसारबंधन तोड़ दिया, इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं कर रहा है।
वृक्णश्च मे सुदृढः स्नेहपाशो दाशार्हवृष्ण्यन्धकसात्वतेषु।
प्रसारितः सृष्टिविवृद्धये त्वया स्वमायया ह्यात्मसुबोधहेतिना ॥ ३९ ॥
तुमने माया से लोग उत्पन्न किये हैं, सृष्टि को बढ़ाने के लिये स्त्री, पुत्र, सुहृद, सज्जन इनके प्रति स्नेह पूरी
तरह बढ़ा दिया है। मैंने यादवकुल में जन्म लिया। उसमें वृष्णि, अंधक, सात्वत आदि सारे भाई, आत्मीयता के
कारण मुझे प्रिय लगते थे। लेकिन मेरे बचपन में मैं खेलते समय जब मुझे तुम्हारा ध्यान लगा हुआ था, उसी
समय, इन भाईयों तथा स्त्रीपुत्रों के स्नेहपाश का बन्धन तुमने ही तोड़ डाला है। जिस प्रकार मदारी खेल
दिखलाने के पहले अपनी मोहिनी विद्या का असर फैलाता है, उस प्रभाव को दूर करने की सामर्थ्य केवल उस