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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 808, कुल 869 में से

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पृष्ठ 808

७९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वानंदघन बन गये। फिर हेतु दब गया, वेद मौन हो गये; और एक में एक मिलकर देव और भक्त एक हो गये।
तब धर्माधर्म का अस्त हो गया। क्रिया के साथ कर्म नष्ट हो गया और भ्रम और विभ्रम का नाम भी शेष नहीं
रहा। भेद अभेद को ले गया। बोध अपने साथ आत्मबोध को ले गया और आनन्द का आनन्द लजा गया। उद्धव
ऐसे स्वरूप में पहुँच गया। 'मैं परब्रह्म स्वरूप हो गया' यह भी मुख्य रूप से भ्रम ही रहता है। श्रीकृष्ण के
आलिंगन का यह विशेष गुण है कि उससे उद्धव निरुपम ब्रह्मस्वरूप हो गया। तदुपरान्त सर्वज्ञ श्रीकृष्ण ने उद्धव
का आलिंगन छुड़ा कर उसे ऐक्यज्ञान से ही उसके भक्त होने का ज्ञान कराया। तब उद्धव को बड़ा आश्चर्य
हुआ। क्षणभर के लिये वह तटस्थ खड़ा रहा। फिर बोला, यह आत्मस्वरूप स्वतः सिद्ध अपने पास होते हुए,
लोगों को मालूम नहीं होता, फिर वह साधकों के हाथ कैसे लगेगा? उद्धव के मन की बात जानकर उसका
निश्चित उपाय श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे।
तदाऽमृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयाऽऽत्मभूयाय च कल्पते वै ॥ ३४॥
धर्म, अर्थ, काम-मोक्षप्राप्ति के जो साधन बताये गये हैं, उन सबको छोड़कर जो अनन्य भाव से, विश्वास
से और भक्ति से मेरी शरण में आते हैं, उन्हें हे उद्धव! तुमने अभी-अभी अनुभव की हुई स्वरूप स्थिति अर्थात्
आत्मप्रतीति प्राप्त होती है, यह निश्चित रूप से जान लो। धर्मार्थ कामवासना होते हुए भी मेरी भक्ति में लगने से
मैं उनकी वह वासना भी पूर्ण कर उन्हें सायुज्य पद तक पहुँचाता हूँ। भक्तों को यदि स्वधर्म कर्म में रुचि हो और
यदि वह उन कर्मों को मेरे भजन मार्ग में लगाता है, तो उस स्वधर्म में अकर्मता किस प्रकार होती है इसका मैं
अपने भक्तों को उपदेश करता हूँ। अथवा, यदि कोई भक्त सुखोपभोग की इच्छा करता है तो उस सुख का
उपभोग करते समय किस प्रकार निष्काम रहना चाहिये, इस ज्ञान का मर्म भी मैं आत्माराम उन्हें बताता हूँ। कोई
भक्त दरिद्र होने के कारण यदि विपुल धन माँगता है तो मैं उन्हें अपना षडगुणैश्वर्य ही अर्पण करता हूँ। भक्त
यदि सर्वभूतों में मेरी भक्ति रखता है और अनन्य प्रीति से मेरा भजन करता है तो चारों मुक्ति उसकी शरण में
आती हैं, क्योंकि मेरे भक्तों को मुक्ति स्वतः सिद्ध होती है। वैद्य यदि सचमुच ही धन्वंतरी, अर्थात् प्रवीण हो तो
वह रोगी की वासना पूर्ण कर, उसकी मनचाही चीज उसे खाने को देकर भी, अपनी रासायनिक कुशलता से उसे
बचा लेता है। उसी प्रकार भक्त की धर्म-अर्थ-काम ये वासनायें पूर्ण करके भी मैं उसे सायुज्य पद तक पहुँचाता
हूँ। उद्धव! नाना प्रकार के साधनों का अभिमान छोड़ जो मेरी शरण में आता है, उसे भी पूर्ण स्वरूप की प्राप्ति
होती है, यह निश्चित रूप से जान लो। भक्त मन में सकाम हो और वह यदि अनन्य भाव से मेरी भक्ति करे, तो
उसकी वह इच्छा पूर्ण कर मैं उसे मुक्ति प्रदान करता हूँ। भक्तों की अधोगति कभी नहीं होती। जिस प्रकार
बालक किसी हठ के कारण माँ के पैर पकड़ लेता है तो वह चाहे जितना पैसा खर्च करके भी उसे वह चीज ला
देती है। उसी प्रकार मेरी अनन्यभक्ति करते समय, भक्त मन में जो भी इच्छा करता है उसे पूर्ण कर मैं उसे मुक्ति
दिलाता हूँ किन्तु उसकी अधोगति नहीं होने देता। बच्चे का दुःख देखकर जिस प्रकार माँ छटपटाती है, उसी
प्रकार मेरे भक्त का दुःख मुझसे नहीं सहा जाता। उसकी भोगेच्छा पूर्ण कर उसे मुक्ति दिलाने की शक्ति क्या
मुझमें नहीं है? मैं श्रीपति भक्तों का रखवाला होने के कारण कभी उनकी अधोगति नहीं होने देता। मेरा नाम
अकस्मात भी यदि अंतकाल में मुख में आ जाय, तो जब रंक को भी सायुज्य प्राप्ति होती है तो मेरी अनन्यभक्ति
करने पर भक्तों की दुर्गति कैसे होगी? मेरा भक्त कृपादृष्टि से जिसकी ओर देखे, उसे भी मेरी भक्ति प्राप्त होती