श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्ति, ज्ञान और स्वधर्माचरण का त्याग न करो। उद्धव! मुझे ही देखो न। इस त्रिभुवन में मेरा कोई कार्य नहीं है।
लेकिन लोगों को मार्ग दिखाने के लिये मैं स्वधर्माचरण के अनुसार व्यवहार करता हूँ। इस पर तुम कहोगे कि पूरे
त्रैलोक्य की जिम्मेदारी तुम्हारी है इसलिये लोगों को व्यवहार सिखाने के लिये आप स्वधर्म पर चलते हैं। लेकिन
मैं अब निजधाम जा रहा हूँ इसलिये मेरी परिपूर्ण स्थिति तुम्हें अर्पण कर दी, इसलिये अब लोकसंग्रह के लिये
तुम पूरी तरह विरक्त होकर रहो। अभेद भक्ति, वैराग्य, ज्ञान का स्वयं आचरण कर, अन्य लोगों से वैसा ही
आचरण कराने का ही नाम है, लोकसंग्रह। उद्धव! मेरे ज्ञान की प्राप्ति होने के कारण तुम त्रिभुवन में भी वन्दनीय
हो गये हो। इसलिये तुम जैसा आचरण करोगे, उसी के अनुसार लोग व्यवहार करेंगे। अब तुम्हारे ही बहाने
लोकसंग्रह के लिये साढ़े-तीन श्लोकों का निरूपण करता हूँ। उसी के अनुसार तुम व्यवहार करो। तुम
बदरिकाश्रम जाओगे तो वहाँ अनेक तीर्थ दिखायी देंगे लेकिन उनमें अलकनंदा ही प्रमुख है। वह गंगा ही है;
उसके दर्शन मात्र से सभी दोषों का परिहार होता है।
ईक्ष्यालकनन्दाया विधूताशेषकल्मषः।
वसानो वल्कलान्यङ्ग वन्यभुक्सुखनिःस्पृहः ॥ ४२ ॥
उस अलकनंदा का स्नान कर शास्त्रोक्त पद्धति से तीर्थविधान करें और फिर वहाँ रहें। अब, कैसे रहा जाय
उसके सम्बन्ध में सुनो। वस्त्रों का त्याग कर वल्कल पहनें। वन के फलों का भक्षण कर उद्वेगरहित वृत्ति से रहें।
लोगों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने के लिये पूरी तरह निःस्पृहता का व्यवहार करें और निजसुख से वहाँ रहते
हुए शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों के प्रति सहिष्णुता दिखायें।
तितिक्षुर्द्वन्द्वमात्राणां सुशीलः संयतेन्द्रियः।
शान्तः समाहितधिया ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ४३ ॥
तुम ज्ञानविज्ञान सम्पन्न हो, अतः तुम्हें द्वंद्वों की बाधा होना सम्भव नहीं है। लेकिन लोकहित की दृष्टि से
शीतोष्णादि द्वंद्वों की सहनशीलता अवश्य दिखायें। तुम्हें विषय की आसक्ति नहीं है। फिर भी इन्द्रिय और विषय
का नियंत्रण करें। अपनी सुशीलता प्रकट कर आत्मशान्ति का प्रदर्शन करें। आत्मबुद्धि का समाधान कैसा होता है
उसे सहज ढंग से प्रकट करें और मुझसे जो ज्ञान तुमने प्राप्त किया है, उसका अनुभव लोगों को दिखायें।
मत्तोऽनुशिक्षितं यत्ते विविक्तमनुभावयन्।
मय्यावेशितवाक्चित्तो मद्धर्मनिरतो भव॥
यदि तुम इस प्रकार रहोगे तो अनेक लोग तुम्हारी शरण में आयेंगे क्योंकि मेरा ज्ञान तुम्हें प्राप्त होने की बात
सबको ज्ञात है। हम ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर केवल अपना उद्धार कर लें और दीनजनों का उद्धार न करें तो उसमें ज्ञाता
की कमी दिखायी देती है। कुछ लोग ब्रह्मज्ञान का सम्पादन कर, शिष्य को भी उसका उपदेश करते हैं, किन्तु वह
उन्हें ठीक तरह बोध नहीं करा पाते; उनकी वह निष्ठा हीन और निर्वीर्य है। ठीक से बोध न होने के कारण शिष्य
छटपटाता रहता है और गुरु अपने गुरुत्व के कारण बड़बड़ाता रहता है। घर में ही इतनी बड़ी त्रुटि। उपदेश का
यह प्रकार अबद्ध है। दूसरे के अंतःकरण में बोध का प्रकाश फैलाना सरल कार्य नहीं है। उद्धव! सचमुच इसी का
नाम है ब्रह्मज्ञान की पूर्ण प्राप्ति। स्वयं तरकर दूसरे को तारना यही ज्ञान की महानता है। मैंने वह तुम्हें सौंपी है।
इसलिये मेरे कहने के अनुसार ठीक तरह से व्यवहार कर लोगों का उद्धार करते रहो। शिष्यरूपी उत्तम खेत में