श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 821, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनतीसवाँ अध्याय ८०५
पहुँचा और उसे प्रदक्षिणा कर उसके चरणों के पास बैठ गया और मैत्रेय का ज्ञान सुनकर और कृष्ण का निर्वाण
देखकर उद्धव वहाँ से चला गया। हे परीक्षित! वह वृत्तांत सुनो।
ततस्तमन्तर्हृदि संनिवेश्य गतो महाभागवतो विशालाम्।
यथोपदिष्टं जगदेकबन्धुना तपः समास्थाय हरेरगाद् गतिम्॥४७॥
जो संसार का विश्रामस्थल है; जो पुरुषों में पुरुषोत्तम है; उस आत्माराम को हृदय में धारण कर उद्धव प्रेम
से चला गया। कृष्ण की पूर्ण स्थिति को निश्चयपूर्वक हृदय में धारण कर उद्धव स्वानंद स्थिति में विशाल तीर्थ
के लिये चल पड़ा। उद्धव स्वानंद की स्थिति में पहुँच गया था इसलिये वह जहाँ जाता था वहाँ के लोग भक्ति,
ज्ञान और वैराग्य से पावन हो जाते थे। जैसी भी विवेकशक्ति और विरक्ति दिखायी देती, उसी के अनुसार
बोधकशक्ति से ज्ञान और भक्ति का उपदेश करते हुए वह त्रिभुवन का उद्धार करता चला गया। जिनकी उद्धव से
भेंट होती, उनका हरिभजन में मिलना होता, संसार का भय वह उनकी दृष्टि में लाता ही नहीं था, इतना वह श्रेष्ठ
उपदेशक था। भगवद्भक्ति जो भी करते हैं उन्हें 'भागवत' कहते हैं; उद्धव मुक्ति प्राप्त करके भी भजन करता
था, इसलिये वह 'महाभागवत' है। उद्धव ने जिस भक्ति को स्वीकार किया था, उसकी तो नित्यमुक्ति दासी थी;
इसलिये उद्धव की स्थिति को महाभागवत स्थिति कहना चाहिये। अत्यन्त निर्मल शान्ति और अत्यन्त प्रांजल
आत्मानुभव, और मोक्ष के बाद भी भजनशीलता, ऐसा उद्धव अत्यन्त श्रेष्ठ भक्त था। ऐसी विशालता होते हुए भी
वह 'विशाल' तीर्थ पहुँचा। अब उस तीर्थ को विशाल क्यों कहते हैं, उसकी भी कथा सुनाता हूँ। जहाँ केवल
श्रद्धा से ही चित्त की शुद्धि होती है, श्रवण मात्र से ही बुद्धि निर्विकल्प होती है और 'नारायण' नाम से मोक्षसिद्धि
होती है; अतः बदरिकाश्रम को विशाल कहते हैं। वहाँ लोककल्याण के लिये नारायण आज भी अनुष्ठान कर रहे
हैं। मोक्षमार्ग पर लगने वाले पर उसकी पूर्ण कृपा होती है। इस प्रकार बदरिकाश्रम को 'विशालत्व' प्राप्त हुआ
है। जहाँ अल्प तप से ही बड़ा फल प्राप्त होता है, अल्प ध्यान से परिपूर्ण ज्ञान होता है, अल्प विरक्ति से ही मोक्ष
प्राप्त होता है; ऐसा बदरिकाश्रम विशाल रूप से फलप्रद होता रहता है। जो अन्तर्यामी गोविन्द, जो संसार का
सुहृद और बन्धु है, उसी प्रकार जो प्रसिद्ध आत्माराम है, जिससे उद्धव को आत्मज्ञान हुआ उस श्रीकृष्ण ने जैसा
उपदेश किया था, उसी के अनुसार उद्धव वहाँ रहा। इससे लोगों को परमार्थ निष्ठा पर विश्वास हुआ। उद्धव की
स्थिति, उसकी ज्ञानभक्ति, उसकी विरक्ति लोगों के लिये उपदेशस्वरूप हो गयी। गुरु ही जहाँ विषयासक्त होता है
वहाँ शिष्य को विरक्ति कैसे आयेगी? गुरु की प्रवृत्ति ही जहाँ अधर्म की हो वहाँ शिष्य को निवृत्ति कभी नहीं
होगी। इसलिये उद्धव जैसा आचरण कर रहा था, उसी प्रकार सभी लोग आचरण करने लगे। इस प्रकार उद्धव
बदरिकाश्रम में विरक्त होकर रहा। कृष्ण उसे जिस प्रकार पढ़ा कर गया था, उसी के अनुसार वह व्यवहार करने
लगा। उसके धर्म से सारे लोग परमार्थी और विरक्त बन गये। परब्रह्म की सच्ची प्राप्ति कराकर श्रीकृष्ण निजधाम
चले गये थे। वही ब्रह्मस्थिति उद्धव में रात-दिन विद्यमान थी। आसन लगाकर बैठने या जाने पर भी उसका
ब्रह्मत्व टूटता नहीं था। विरक्ति और भोगासक्ति ये दोनों ही शरीर पर दिखायी देती हैं, किन्तु उद्धव की ब्रह्मस्वरूप
स्थिति इन दोनों से परे थी। वह विरक्ति में होते हुए भी विरक्त नहीं था और भोग में रहते हुए भी भोगासक्त नहीं
था; इन दोनों से परे वह सदा ब्रह्मस्वरूप ही था। उसी में प्रारब्ध क्षय से देह की मृत्यु होने पर भी उद्धव ब्रह्म में
पूर्ण ब्रह्म ही होकर रहा था। जन्म और मरण वह जानता ही नहीं था। श्रीकृष्ण ने उद्धव के देह की देहबुद्धि पूरी
तरह नष्ट करके उसे निःसन्देह ब्रह्मस्वरूप का अनुभव दृढ़ कर दिया था। हे परीक्षित! ऐसे उद्धव को देह के