श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 826, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसवाँ अध्याय
हे अनादि सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सर्वादि सद्गुरु ! तुम्हारी जय हो। हे सर्वसिद्धि सद्गुरु ! तुम्हारी
जय हो। हे कृपालु, हे कृपानिधि ! तुम्हारी जय हो। हे वेदवक्ता ! तुम्हारी जय हो, हे वेदार्थ प्रकट करने वाले !
तुम्हारी जय हो। हे वेद प्रतिपालक तुम्हारी जय हो। हे वेदात्मक ! हे वेदज्ञ ! तुम्हारी जय हो। हे विश्व
प्रकाशक ! तुम्हारी जय हो। हे विश्वप्रतिपालक ! तुम्हारी जय हो। हे विश्वनिवासक ! हे अकर्त्तात्मक अव्यय !
तुम्हारी जय हो तुम्हारी स्थिति अक्षर और अव्यय है। तुम्हें नाम, रूप, वर्ण और व्यक्तित्व नहीं है, फिर भी तुम
जाति गोत्र में, लोकव्यवहार के अनुसार विचरण करते हो। संसार में तुम्हारा कोई नहीं है, फिर भी तुम गृहस्थ
धर्म के अनुसार घरबार बसा कर रहते हो। तुम सचमुच नपुंसक, स्त्री-पुरुष स्थिति विरहित हो फिर भी स्त्रियों
तथा बच्चों के साथ रहते हो। तुम अजन्मा होते हुए भी पिता का वन्दन करते हो, उसी प्रकार माता को भी
नमस्कार करते हो। संसार में तुम्हें सब एक समान हैं फिर भी शत्रु-मित्र का चुनाव करते हो। तुम जगन्नाथ होते
हुए जगच्चालक हो, लेकिन एक के सेवक भी बनते हो। तुम पूर्णात्मा परिपूर्ण हो लेकिन रंक बनकर भीख भी
माँगते हो। तुम निष्ठावंत ब्रह्मचारी होकर व्यभिचारी स्त्रियों का उद्धार भी करते हो। तुमने सर्वज्ञ होकर गुरु के
घर मस्तक पर घास और लकड़ी भी ढोयी है। कलिकाल का भी संहार करने वाले तुम हौवे के भय से छिप
कर भी बैठते हो। हे श्रीकृष्ण ! तुम माया के नियंता होते हुए भी अन्त में माया ने ही तुम्हें ओखली से बाँधा।
तुम नित्यतृप्त आत्माराम होते हुए गोपालों का भात खाते थे। तुम्हारा अंत ब्रह्मादि देवतागण भी नहीं जानते।
फिर भी तुम यशोदा के पास रोते हुए खड़े रहते थे। अपने पेट में पूरे त्रैलोक्य का दर्शन कराने वाले तुम गोपियों
की गोद में बैठा करते थे। तुम संसार के चालक श्रीहरि हो, तुम्हें लड़के चलना सिखाते थे। सर्ववंद्य और
सर्वेश्वर हो तुम फिर भी तुम सफेद सुअर (वराह अवतार) बने थे। सारांश, तुम्हारे बारे में वेद भी कोई निर्णय
नहीं कर सकते। वेद पूरी तरह मौन हो गये। बड़े-बड़े ज्ञाता आये लेकिन वे भी तुम्हारा पता-ठिकाना नहीं लगा
सके। योगी जंगल में जाकर बैठे, लेकिन वे भी तुम्हारी महिमा नहीं समझ सके। मुख्यत: जब कृष्ण को जन्म
ही नहीं है तो उसकी मृत्यु कैसे दिखायेंगे ? इससे सम्बन्धित निरूपण सुनने के लिये परीक्षित के मन में उत्कंठा
लगी हुई थी। प्रथमाध्याय में वैराग्य के लिये शापयुक्त मूसल का उल्लेख किया था। वही बात अब ग्रन्थ के
अन्त में परीक्षित पूछ रहा है।
राजोवाच
ततो महाभागवत उद्धवे निर्गते वनम्।
द्वारवत्यां किमकरोद् भगवान् भूतभावनः ॥ १ ॥
पाण्डव कुल का रत्न अथवा कौरवकुल का भूषण, जिसने धर्म की रक्षा के लिये कली का निग्रहण किया,
ऐसा राजा परीक्षित, धीर, वीर और उदार कीर्ति के रूप से प्रसिद्ध है, उसने स्वमुख से अत्यन्त श्रद्धापूर्वक श्री
शुक्राचार्य से विनती की। पूछा कि उद्धव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त होने के बाद जब वह बदरिकाश्रम गया तो उसके
बाद द्वारका में श्रीकृष्ण ने क्या किया ? उत्पत्ति, स्थिति और लय जो अपनी इच्छा के अनुसार किया करता है,
उस श्रीकृष्ण ने अपने देह का विसर्जन किस प्रकार किया ?