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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 810, कुल 869 में से

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पृष्ठ 810

७९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्राप्त होता है, अतः पारस देने से भी उसकी पूर्ति नहीं हो पायेगी। गुरु को यदि कामधेनु लाकर दें तो वह धन
देकर कामना बढ़ाती है और गुरु तो निष्काम बुद्धि से निर्गुणदान देते हैं अतः उसकी पूर्ति के लिये कामधेनु भी
उपयुक्त नहीं है। त्रिभुवन की सारी उत्तम सम्पत्ति यदि गुरु को दें तो वह मायिक है। जिन्होंने अमायिक वस्तु दी
है उसकी पूर्ति किससे होगी? देह से यदि गुरु के उपकार की पूर्ति की जाय तो देह तो नश्वर है। नश्वर से
अनश्वर की पूर्ति तो नहीं हो पायेगी। जिसने बड़ी चाह से दाहिने हाथ का शंख दिया उसे फूटी कौड़ी देकर उस
उपकार की पूर्ति कर सन्तुष्ट हो उसी प्रकार यह देहभाव वाली बात है। यदि गुरु को प्राण देकर उनके उपकार
की पूर्ति करें तो वह तो मिथ्या है। जिसने सत्य ब्रह्म हमें दिया है उसे मिथ्या देते समय लज्जा नहीं आती ?
जिसने अमूल्य रत्न दिया है, उसे वंध्यापुत्र दें; उसी प्रकार जीवभाव मिथ्या होने के कारण उससे उपकार की पूर्ति
नहीं होगी। इस प्रकार काया, वाचा, मन, धन और प्राण अर्पण करने से भी गुरु के उपकार की पूर्ति नहीं होगी,
यह उद्धव ने अच्छी तरह जान लिया। जिसमें अणुमात्र का भी दुःख नहीं है ऐसा आत्मसुख जिसने दिया, उस
गुरु के उपकार की पूर्ति करने में शिष्य के पास कोई रास्ता नहीं है। इसलिये उद्धव ने साष्टांग दण्डवत किया
और श्रीकृष्ण के चरणों को पूरी तरह मस्तक पर धारण किया। देखो! पहले श्रीकृष्ण ने ही 'तुम्हारा शोक और
मोह समाप्त हो गया न' ऐसा प्रश्न उद्धव से किया था। इसलिये उद्धव को आश्चर्य हुआ था और उसे उत्तर देने
का होश ही नहीं रहा। इसलिये अब उसके चरणों का वन्दन कर, हाथ जोड़कर, उत्तर देने के लिये वह श्रीकृष्ण
के मुख की ओर देखने लगा। चन्द्रमा के किरण सेवन करने पर जिस प्रकार चकोर तृप्त हो कर ढकार देता है,
उसी प्रकार उद्धव भी श्रीकृष्ण सुख पर निर्भर होकर क्या उत्तर देगा, देखिये।
उद्धव उवाच
विद्रावितो मोहमहान्धकारो य आश्रितो मे तव संनिधानात्।
विभावसोः किं नु समीपगस्य शीतं तमो भीः प्रभवन्त्यजाद्य ॥ ३७॥
जो समस्त देवताओं में श्रेष्ठ, जो यादवों में अग्रगण्य, जो अविद्या रात्रि का सूर्य, जो ब्रह्मवेत्ताओं का
शिरोमणि है ऐसे श्रीकृष्ण को स्वानंद की स्फूर्ति से अपनी स्थिति का वर्णन करते समय उद्धव मुख्य रूप से
श्रीहरि की स्तुति करने लगा। उसने कहा, विचार करने से लगता है कि ब्रह्मदेव यह सबका आदिकर्त्ता है; लेकिन
वह भी वास्तव में 'अज' इस नाम से नारायण की नाभि से उत्पन्न हुआ। तो तुम कमलनाभि नारायण ही
मायासंबलित ब्रह्म हो। उस माया के आद्य कारण तुम हो; इसलिये आद्य स्वरूप तुम पर ही शोभित होता है।
अविद्या की महारात्रि में, मोहरूपी अन्धकार में भी फँसा हुआ था। उसमें से बाहर आने के लिये किसी दूसरे का
सामर्थ्य काम न आता। इसलिये तुम्हारे वचनरूपी सूर्य से शोकमोहरूपी अन्धकार को नष्ट कर अत्यन्त चमत्कार
से मुझे बाहर निकाला। तुम्हारे निकट अविद्या का ठौर ही नहीं है। श्रीकृष्ण! तुम्हारे रहते मोह ममता का क्या
प्रभाव होगा? घनघोर अँधेरी रात्रि में जो शीत से ठिठुर रहा हो उसे यदि आग मिल जाय तो जाड़ा और अन्धकार
दोनों तत्काल भाग जाते हैं। उस अग्नि को यदि सदा साथ में ही रखा जाय तो शीत और अँधेरे के भय की कभी
पीड़ा नहीं होगी। तुम्हारे सान्निध्य का यह फल है। इस प्रकार मोह ममता से माया 'लोगों को संसारपाश में बाँध
लेती है; लेकिन तुम्हारे पास आते ही वह अपने आप अदृश्य हो जाती है। जन्म-मरण के दुःख पहले भी अनेक
बार भोगे हैं; लेकिन जिसे तुम्हारा सान्निध्य प्राप्त होता है, उसे वह भय समूल मिथ्या लगता है। तुम्हारे सान्निध्य
से माया का समूल निर्दलन होता है। इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं कर रहा है।