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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 818, कुल 869 में से

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पृष्ठ 818

८०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीशुक उवाच
स एवमुक्तो हरिमेधसोद्धवः प्रदक्षिणं तं परिसृत्य पादयोः।
शिरो निधायाशुकलाभिरार्द्रधीर्न्यषिञ्चदद्वन्द्वपरोऽप्यपक्रमे ॥ ४५ ॥
जो निजमुक्ति के कारण नित्य निष्काम है; जिसने परब्रह्म का अनुभव लिया है; उस श्रीशुक्राचार्य को उद्धव
का प्रेम वर्णन करने में अत्यन्त उल्हास प्राप्त हुआ। उसने कहा, हे परीक्षित्! श्रीकृष्ण ने इस प्रकार उद्धव को
आज्ञा की; उसका प्रेम अद्भुत था, उसका वर्णन में कर रहा हूँ, सुनो। उद्धव भले ही गुणातीत हो गया हो लेकिन
उसे गुरुचरण से विलक्षण प्रेम था। उसका सद्गुरु श्रीकृष्णनाथ तो साक्षात परब्रह्म ही था। वह हरि के चरण
छोड़ना नहीं चाहता था, हरि के प्रति उसकी पूर्ण श्रद्धा थी, इसलिये उस ज्ञानसम्पन्न उद्धव को 'हरिमेधा' कहा
गया है। जो अपनी इच्छा से हरि का ध्यान करता है, उसके ध्यान के साथ उसका मन भी हरि हरण करता है; जो
हरि के समाधान का विचार करता है, उसकी बुद्धि का हरि हरण करता है। जो हरि का चिन्तन करता है, उसके
चित्त का हरि हरण करता है; जो हरि का स्मरण करता है उसका सारा संसार ही हरि हरण करता है। उस हरि के
प्रति मुक्तिपद पर पहुँचे उद्धव की सप्रेम श्रद्धा थी इसलिये उसे 'हरिमेधा' कहते थे। जो गुणातीत पद पर पहुँच
गये उन्हें भी जिसकी भक्ति प्रिय थी, उस श्रीकृष्ण ने उद्धव का जाना निश्चित किया। किन्तु बदरिकाश्रम दूर का
पल्ला था। एक बार वहाँ जाने के बाद उससे पुनः भेंट नहीं होगी इस विचार से उसका मन व्याकुल हो उठा।
यद्यपि वह सुख-दुःख से मुक्त हो चुका था, फिर भी प्रयाणकाल में उसने व्याकुल मन से श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा
की। चरणों पर मस्तक रखते समय उसकी आँखों से प्रेमाश्रु की धारा फूट पड़ी। उस धारा से श्रीकृष्ण के चरण
धुल गये।
सुदुस्त्यजस्नेहवियोगकातरो न शक्नुवंस्तं परिहातुमातुरः ।
कृच्छ्रं ययौ मूर्धनि भर्तृपादुके विभ्रन्नमस्कृत्य ययौ पुनः पुनः ॥ ४६ ॥
अन्य लोगों का स्नेह बाधक रहता है, किन्तु वेदांत विचार उनसे साधकों को छुड़ाता है; लेकिन श्रीकृष्ण
का स्नेह वैसा नहीं है। वह सुखदायक और प्रिय रहता है। उद्धव के लिये स्वाभाविक तौर पर गुरु और परब्रह्म
दोनों एक ही थे और लोगों को दोनों में 'ऐक्य' भावना करनी होती है; लेकिन उद्धव के लिये वह स्वतःसिद्ध
था। इस प्रकार का यह स्नेह उद्धव के लिये अत्यन्त सुखदायी था। इसलिये श्रीकृष्ण को छोड़ते समय गुरुप्रेम
के कारण वह भी व्याकुल हो उठा। स्नेह, द्वेष अथवा विषय कामना से जो भी कोई श्रीकृष्ण पर लुब्ध हुआ,
उन्हें परमानन्द ही प्राप्त हुआ। ऐसे श्रीकृष्ण को कौन छोड़ना चाहेगा? अविधि से श्रीकृष्ण से रत हुए लोग भी
जब ब्रह्मादि देवताओं के लिये वंदनीय हो गये तो फिर उद्धव तो गुरुप्रेम पर न्योछावर ही था, वह श्रीकृष्ण को
कैसे छोड़ेगा ? जिसे गुरुभक्ति परब्रह्मतुल्य लगती है, उसके लिये जीवन्मुक्ति तृणप्राय है; मिली हुई मुक्ति का भी
वे त्याग कर देते हैं और अनन्यभाव से गुरुभक्ति की शरण में चले जाते हैं। सद्गुरु की आज्ञा का उल्लंघन न
किया जाय इसलिये बदरिकाश्रम जाना चाहिये यह बात सच है; किन्तु श्रीकृष्ण का प्रेम अत्यन्त मधुर है वह
उसे जाने से रोक रहा था। इस प्रकार उद्धव दोतर्फा संकट में पड़ गया। श्रीकृष्ण के प्रेम से उसका पेट फटने
लगा; उसे बदरिकाश्रम का मार्ग ही नहीं दीख रहा था। श्रीकृष्ण को यदि छोड़ दें तो वह निजधाम चला
जाएगा, मुझे पुनः दिखायी नहीं देगा; इसलिये उसका गला रुंध गया। जल से भरे नूतन मेघ की तरह श्यामवर्ण,
कमलनयन आनन्दमूर्ति श्रीकृष्ण पूर्णत्व से परिपूर्ण ब्रह्म है। मुकुट, कुण्डल, कमरबंद, पीले रंग का टीका धारण