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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 807, कुल 869 में से

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पृष्ठ 807

उनतीसवाँ अध्याय ७९१
भी अच्छा नहीं लगता; परमार्थ की ओर उन्मुख होकर, वैराग्य के कारण जिसमें सद्भक्ति उत्पन्न हुई हो, भोजन के
समय अतिथि, पति और पुत्र जिसे एकसमान दिखायी देते हों, जिसके मन में धन का लोभ न हो, उसी को
परमार्थ का अधिकार है। जन्म-मरण से मुक्ति मिले यही जिसके मन की तिलमिलाहट हो और क्या मेरे संसार
का पाश तोड़ने वाला कोई धर्मदाता मिलेगा इस प्रकार जिसके मन में सद्गुरु प्राप्ति की लगन लगी हुई हो,
परमार्थ के लिये भक्तिभाव से जो अपनी काया, वाचा, मन, धन और जीवन को न्योछावर कर देती है, उद्धव!
इस प्रकार जो स्त्री निष्ठा से परमार्थ के प्रति उद्यत होती है, उसे उपदेश देने में कभी भी दोष नहीं लगेगा।
क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री अथवा शूद्र इनकी दृढ़ श्रद्धा देखकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से शिष्यों के दोष का निर्मूलन
होता है। ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से यदि गुरु को ही दोष लगता हो तो शिष्य का उद्धार कौन करेगा ? यह बात
ही असंबद्ध है। उपदेश करते समय पात्र की शुद्धता परखने के लिये ही मैंने इन दोषों का उल्लेख किया था। इन्हें
जाँच कर उपदेश करने से दोष नहीं रहता। यह ज्ञान प्राप्त करने के बाद, संसार में जानने के लिये कुछ भी नहीं
रह जाता; संसार समाप्त हो जाता है और दोष की बात ही नहीं रह जाती।
नैतद् विज्ञाय जिज्ञासोर्ज्ञातव्यमवशिष्यते।
पीत्वा पीयूषममृतं पातव्यं नावशिष्यते ॥ ३२ ॥
इस ग्रन्थ का ज्ञान जान लेने के बाद मुमुक्षु अथवा साधकों को जानने लायक कुछ शेष नहीं रहता। जिस
प्रकार अमृतपान करने के बाद और कुछ प्राशन करने की आवश्यकता नहीं रह जाती, उसी प्रकार यह ज्ञान प्राप्त
करने के बाद ज्ञातव्य और ज्ञातापन समूल नष्ट हो जाता है। (आशंका) धर्मार्थ काम मोक्ष के कितने साधन हैं,
उनका पता नहीं है। ऐसा होते हुए आपने केवल एक ही कैसे बताया ? (उत्तर) उद्धव ! जो अनेक साधन बताये
हैं, उन्हें अभक्त लोग सहन करते हैं। किन्तु मेरे भक्तों के लिये एक मैं ही साधन हूँ।
ज्ञाने कर्मणि योगे च वार्तायां दण्डधारणे।
यावानर्थो नृणां तात तावांस्तेऽहं चतुर्विधः ॥ ३३ ॥
मोक्ष के लिये 'ज्ञान' यह साधन है; धर्म के लिये 'स्वधर्माचरण' साधन है; संन्यासी के लिये दण्डधारण
साधन है; और उपजीविका के लिये 'व्यापार' साधन है। इहलोक और पारलौकिक सुख के लिये 'योगयाग'
करते हैं। चारों पुरुषार्थों के लिये अभक्तों को ही ये साधन बताये गये हैं। इन साधनों के संकट सहने पर भी उन्हें
उसमें सहजता से सिद्धि नहीं प्राप्त होती। अनेक विकलता के दोष उभर आते हैं, फिर देवता भी विघ्न उपस्थित
कर उनका छल करते हैं। वैसा मेरे भक्तों के साथ नहीं होता। मेरा अनन्य भजन करने पर चारों पुरुषार्थ उसकी
ही शरण में आते हैं और देवतागण भी उसके पैर छूते हैं। उद्धव ! जो अनन्यभाव से मेरी शरण में आते हैं उनका
धर्म और अर्थ मैं ही हो जाता हूँ, उनका काम भी मैं ही होता हूँ और उनका सम्पूर्ण मोक्ष भी मैं ही होता हूँ।
उद्धव ! अभक्तों को पुण्य भोगों के क्षय से पुनरावृत्ति प्राप्त होती है और भक्तों को भोग भोगते हुए भी नित्यमुक्ति
रहती है। मेरी भक्ति की इतनी योग्यता है, यह जान लो। देव का यह भाषण सुनकर कर उद्धव का प्रेम उफन
उठा; उस प्रेम पर श्रीकृष्ण भी लुब्ध हुए और हर्षपूर्वक बोलने लगे। हे उद्धव ! साक्षात भगवान जो मैं हूँ, वही
तुम्हारे चारों पुरुषार्थ हैं। इस प्रकार आनन्द से बोलकर उन्होंने प्रेम से उसे आलिंगन दिया। इस प्रकार हर्ष से
आलिंगन देते ही कृष्ण अपना कृष्णपन भूल गये और उद्धव स्वानंद में निमग्न होकर अपना उद्धवपन भूल गया।
आलिंगन का चमत्कार ऐसा हुआ कि दोनों का दूजापन समाप्त हो गया और वे परिपूर्ण चैतन्यस्वरूप और