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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 814, कुल 869 में से

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पृष्ठ 814

सामर्थ्य से मैं कर्म करके भी अकर्ता और भोग करके भी अभोक्ता बना रहता हूँ। यह योग जिसकी समझ में
नहीं आता उसे यह संसार दुःखस्वरूप हो जाता है; लेकिन मेरे पास यह योग अखण्ड होने के कारण मैं संसार
में रहते हुए भी सुखस्वरूप ही हूँ। यह योग शंकर जानता है और मैं जानता हूँ। वह योग दुर्गम होने के कारण
दूसरों की समझ में नहीं आता। यह गुप्त बात श्रीकृष्ण ने बतायी और वह उद्धव के मन में बैठ गयी। आत्मज्ञान
से दोनों में एकरूपता हो गयी और उसे भजन की महत्ता मालूम हो गयी। मुक्ति का आधार भक्ति है, यह बात
उद्धव की समझ में अच्छी तरह आ गयी। इससे उसे जो आनन्द हुआ वह उसके हृदय में नहीं समा रहा था।
वह स्वानंद से भर गया। बालक के हठ के कारण जिस प्रकार माँ उसे अपने आभूषण पहनाती है, उसी प्रकार
श्रीकृष्ण ने उद्धव को अपनी अवतार स्थिति अर्पण की। न मन ने सुना, न बुद्धि ने देखा और भगवान ने आकाश
से भी चुरा कर भगवान ने अपना स्वरूप उद्धव को अर्पण किया। जो ब्रह्मवेत्ता को भी नहीं दिखायी देता,
जिसका आकलन वेदों को भी नहीं होता, वह स्थिति श्रीकृष्ण ने कृपा के बल से उद्धव को दी। देखो! पहले
जब श्रीकृष्ण ने पूछा था, उस समय 'मेरा उद्धार हो गया' ऐसा उद्धव ने कहा था और अब उसने भजनभाव
माँगा। इसका गूढ़ अर्थ भगवान ही जानें। मुक्ति से ऊपर की भक्ति माँगने के कारण, श्रीकृष्ण की अवतारशक्ति
अर्थात् माया नियंत्रण की पूर्णस्थिति उद्धव के हाथ में सहज ही आ गयी। माया का मिथ्यत्व पूरी तरह जान कर
ही उसकी प्रेरणा और आवरण यह जो 'मायानियंत्रण' का लक्षण है वही श्रीकृष्ण ने स्वयं दिया। शतरंज के
खेल में जिस प्रकार किसी तरह का पूर्वकर्म न होने पर भी राजा, प्रधान, हाथी, घोड़े, प्यादा ये सब मारामारी पर
उतर आते हैं, जबकि सबमें लकड़ी एक ही होती है। दोनों ओर की सेनाओं में लकड़ी एक ही होती है, फिर
कौन किसका शत्रु है ? लेकिन सचमुच बैर न होते हुए भी युद्ध में निर्जीव में ही मारामारी होती है। हाथी, घोड़ा,
प्रधान मरा ऐसा कहा जाता है, लेकिन क्या इसमें किसी का प्राण जाता है ? अथवा जो प्यादा है, वह प्रधान बन
जाता है, तो क्या उसे अकूत सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है ? सचमुच, प्राण न होते हुए भी मारने की बात करते हैं
और चिल्लाते है। एक की जय और दूसरे की पराजय होती है। लेकिन उन गोटियों को इसका कोई ज्ञान नहीं
होता। गोटियाँ मर जाती हैं तो उनमें से कौन धर्मात्मा वैकुण्ठ जाता है और कौन नरक भोगता है ? उसी प्रकार
बन्धन और मोक्ष की बातें समूल मिथ्या हैं। सारांश, शतरंज की ही तरह जिसका संसार में ध्यान रहता है वही
अवतारों का अवतार है और वही सचमुच भगवान है। वेदोक्ति भी मिथ्या ही है, बन्धन और मुक्ति भी मिथ्या ही
हैं, यह जानते हुए भी वह वेद विहित धर्म के अनुसार चलता है, यही मुक्ति से भी श्रेष्ठ भक्ति है। संसार से
मुक्त होकर अनेक नित्यमुक्त हुए हैं; उनके लिये यह भक्ति असाध्य है। उन्हें इस अगम्य स्थिति की कल्पना भी
नहीं होगी। उद्धव ! जिसके पास मेरी ऐसी स्थिति होगी, वही मोक्ष से श्रेष्ठ वाली भक्ति करेगा। औरों के लिये
वह सोच से परे है। इस प्रकार उद्धव को अगाध गति प्राप्त हुई। उसे लोकोपकार की दृष्टि से ब्रह्मशाप से बचाने
के लिये श्रीकृष्ण ने स्वयं उपाय ढूँढ़ा। नारद के पास ब्रह्मज्ञान था, फिर भी उसे ब्रह्मशाप का बन्धन था, उस
शाप के कारण वह भ्रमण करता रहता था। एक स्थान पर वह कहीं रहता ही नहीं था। ब्रह्मज्ञान होने पर भी
ब्रह्मशाप का भयानक भय नहीं चूकता। यह जानकर ही श्रीकृष्ण ने ब्रह्मज्ञान का उपदेश देकर उद्धव को दूर
हटाया। उद्धव का जन्म यादव वंश में हुआ था और यादव ब्रह्मशाप से मरने वाले थे। उससे उद्धव को बचाने के
लिये उन्होंने उसे बदरिकाश्रम में भेजा। उद्धव को जो ज्ञान प्राप्त हुआ था, उससे बदरिकाश्रम पवित्र था, ऐसी
बात नहीं थी किन्तु ब्रह्मशाप के भय से ही उसे श्रीकृष्ण ने दूर भगाया। उद्धव सरीखा मूल्यवान रत्न, जिसे पूर्ण
स्थिति मालूम थी, उसे बचाने के लिये श्रीकृष्ण ने स्वयं ही बदरिकाश्रम भेजा।