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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 824, कुल 869 में से

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पृष्ठ 824

८०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कृपा रहती है। श्रीकृष्ण निजधाम की ओर चले उस समय यदि उद्धव ने ये प्रश्न नहीं किये होते, तो श्रीकृष्ण ने
यह परमामृत का कथन नहीं किया होता। लेकिन उद्धव का संसार पर बहुत उपकार है क्योंकि उसी के कारण
श्रीकृष्ण ने भक्ति-ज्ञान-वैराग्य के सार का कथन किया। उद्धव के धर्म से सारा त्रिभुवन संसार समुद्र पार कर
लेगा। ऐसे गुप्त ज्ञान का श्रीकृष्ण ने भजन के साथ कथन किया। चारों मुक्तियों की उपेक्षा कर उद्धव ने हरिभक्ति
की महिमा बढ़ायी। त्रैलोक्य को पार करने के लिये उद्धव ने इतनी बड़ी कीर्ति स्थापित की। एकादश स्कंध के बहाने
भक्ति और मुक्ति का पौसरा बैठा दिया। जड़ जीवों के उद्धार के लिये उद्धव ने इतनी बड़ी कीर्ति स्थापित की।
गाय के स्तन में दूध भरा होता है लेकिन वह बछड़े के बिना हाथ में नहीं आता उसी प्रकार श्रीकृष्ण का पूर्ण ज्ञान
उद्धव ने प्रकट किया। कृष्ण और उद्धव का यह संवाद वास्तव में गहन ज्ञान है। उसका व्याख्यान मैं अपूर्ण ज्ञानी
कैसे कर पाऊँगा ? कृष्ण और उद्धव का यह गहन ज्ञान लोगों तक पहुँचाने में सर्वज्ञ जनार्दन ही सहायक हुआ।
श्लोक के पदों के अर्थ की संगति, ज्ञान की परिपाक स्थिति, वैराग्ययुक्त भक्ति और मुक्ति इनकी व्युत्पत्ति मैं नहीं
जानता। मेरा 'मैं'पन भी जनार्दन ही बन गया। अतः इस पदार्थ का स्पष्टीकरण करने वाला वही एक है।
एकनाथ को एकपन की भावना से ऐक्यता सहज ही सम्भव हुई और 'एका-जनार्दन' इस नाम से यह ग्रन्थ
भगवान ने ही तैयार किया। अर्थ करते समय जनार्दन ही मेरी बुद्धि बन गया। उसी प्रकार कवित्वयुक्त पदबंध भी
वही बोला। मेरा नाम, रूप, कर्म, गुण आदि मिथ्या ही है; लेकिन वह भी जनार्दन ही बना। 'एकपन' उसे इतना
अधिक प्रिय है। नाम से तथा भाव से भी 'एक' होने के कारण जनार्दन प्रसन्न हुआ; उसने मेरे नाम की ही तरह
संसार में 'एकपन-ऐक्य' प्रकट किया। 'एका' इस नाम का जनार्दन को इतना अधिक कौतूहल है कि वह एक
में ही अनेक प्रकट करता है और अनेक में एक को अविकारी दिखा देता है। जिसका नाम भी एक है और भाव
भी एक है उसका भगवान से सदा ऐक्य रहता है। इसलिये आगे वह एक और अनेक देखने पर भी उसमें भिन्नता
नहीं रहती। यह एकत्व जब तक प्राप्त नहीं होता, तब तक भगवान को प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती और एकत्व के
बिना अकर्त्तात्मता भी नहीं मालूम होती। जब तक कर्तव्य का अभाव है, तब तक, भगवान कभी नहीं मिलेंगे।
अहंकार के ही पास बन्धन रहता है; उसे छोड़ते ही मुक्ति मिलती है। नामस्वरूप में ऐक्य देखना यही मेरा
अनुष्ठान है। इसीलिये जनार्दन सन्तुष्ट होकर वह मेरा 'मैं'पन बन गया है। कठपुतलियों के खेल में कुछ
पुतलियाँ नाराज होती हैं तो कुछ प्रसन्न दिखायी देती हैं, लेकिन वह सब खेल दिखलाने का कौशल होता है।
कठपुतली को उसका अर्थ मालूम नहीं होता। उसी प्रकार मेरे नाम से कविता लिखकर जनार्दन वक्ता बन गया
है। इसीलिये इस ग्रन्थ की कथा साधु-संतों को पसन्द है। ग्रन्थ लिखते समय यदि देह की अहंता विद्यमान हो तो
एक भी ओवी नहीं लिखी जाएगी। यहाँ जनार्दन ही कर्ता बन जाने के कारण इस ग्रन्थ का अर्थ ठीक-ठीक लग
सका। सज्जनों को चाहिये कि वे आत्मदृष्टि से ही इसकी ओर देखें। केवल संस्कृत वन्दनीय है और प्राकृत निंद्य
है, यह कहना क्या उचित है? यह भी अभिमान की ही बात है और अहंकार परमार्थ में बाधक है। जौहरी
मजदूर लगाकर खान खोदता है और उसमें उसे मूल्यवान रत्न मिलता है; लेकिन यदि वैसा ही रत्न उसे झाडू
लगाते समय कचरे में मिल जाए तो क्या कोई बुद्धिमान व्यक्ति उसे फेंक देगा ? उसी प्रकार संस्कृत पढ़ने के
प्रयास में परमार्थ साध्य नहीं होता और अगर देशी भाषा में वह चीज प्राप्त हो जाय तो ज्ञाता उस पर टूट पड़ेंगे।
चकोर चन्द्रामृत प्राशन करता है और वही कौवे को खाने के लाले पड़ जाते हैं, उसी प्रकार यह देशी भाषा का
ग्रन्थ है। उसका फलीभूत होना ज्ञान और अज्ञान पर निर्भर है। भगवान को भाषा का अभिमान नहीं है, उसके
लिये संस्कृत और प्राकृत दोनों एक समान है। जिस भाषा में ब्रह्मज्ञान पढ़ा जाता है, उससे श्रीकृष्ण सन्तुष्ट रहता