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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 823, कुल 869 में से

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पृष्ठ 823

उनतीसवाँ अध्याय ८०७
होगा। जो सूर्य के घर में रहता है, उसके लिये अन्धकार का अस्तित्व ही नहीं होता और जो उसके ही गाँव में
जाकर रहेगा वह भी रात्रि से वंचित रहेगा। जब सूर्य के लिये रात्रि नहीं है तो फिर दिन का उदय कैसे होगा ?
उसी प्रकार स्वरूप के पास बन्धन और मोक्ष अत्यन्त मिथ्या हैं। उसी प्रकार यदि इस कथा का अनुसंधान नहीं हो
पाया, केवल श्रवण ही सम्भव हुआ तो उसे भी संसार बंधन की बाधा नहीं होगी। खैर, उसे भी छोड़ो। जिससे
इस कथा का श्रवण भी नहीं हुआ, लेकिन यदि उसने प्रेम से उसका पठन किया तो भी प्रत्येक श्लोक के साथ
उसके दुःख और दोष का भस्म हो जायेगा। जिससे श्रवण पठन का प्रयास सम्भव न हो, वह यदि इस ग्रन्थ के
निरूपण की बातें गाँठ में बाँध लेता है तो वह भी संसार में देवताओं को वंद्य होगा। अधिक क्या कहें ? जिसे इस
कथा से प्रेम होगा, जिसे इस कथा से भक्ति होगी, उसकी संगत जिन्हें अच्छी लगेगी, उन्हें भी यम और काल
वन्दन करेंगे। इस कथा के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखकर जो इसका सेवन करता है, जो श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण और
मनन करता है, उससे दूर श्रीकृष्ण कभी नहीं जाते। भोली-भाली कथाएँ सुनकर जिसकी इस कथा पर श्रद्धा
होती है, उसके हृदय में श्रीकृष्ण प्रकट होकर वे धीरे-धीरे संसारपाश तोड़ देते हैं। इस प्रकार श्रद्धालुओं के प्रति
श्रीकृष्ण प्रभु दयालु है। इसीलिये श्री शुक्राचार्य उन्हें अत्यन्त श्रद्धा से नमन करते हैं।
भवभयमपहन्तुं ज्ञानविज्ञानसारं निगमकृतदुपजहे भृङ्गवद् वेदसारम्।
अमृतमुदधितश्चापाययद् भृत्यवर्गान् पुरुषमृषभमाद्यं कृष्णसंज्ञं नतोऽस्मि॥ ४९॥
संसारभय से त्रस्त होकर जो श्रीकृष्ण की शरण में आये, उनका संसारभय दूर हो इसलिये श्रीकृष्ण ने
वेदार्थ का मंथन किया और उपनिषद्वार का भी मंथन कर यह ज्ञान-विज्ञान का रूप सार निकाला। बड़े-बड़े
ज्ञाता भी जिसके लिये थक गये वे भी उसका पार नहीं पा सके। तुम कहोगे कि निगमों का मंथन करने के कारण
वेदों को कष्ट हुआ होगा, किन्तु कृष्ण वेदों का आदिकर्ता होने के कारण उसने वेदों को जरा भी दुःख नहीं होने
दिया। जिस प्रकार बछड़ा जब स्वयं ही माँ का दूध पीने लगता है तब उसके पैर नहीं बाँधने पड़ते, उसी प्रकार
जब श्रीकृष्ण ही वेदों का मंथन करने लगे, तब वेदों को भी कोई व्यथा नहीं हुई। श्रीकृष्ण सर्वज्ञ था; वेदार्थ का
सार निकालने में राजहंस था; उसने वेदों को दुःख दिये बिना वेद का सार निकाल लिया। इस प्रकार मथ कर
निकाला हुआ वेदार्थ का सार अथवा ज्ञान-विज्ञान सारामृत कृष्ण ने एकत्र कर कृपापूर्वक भक्तों के कल्याणार्थ
अर्पण किया। जिस प्रकार भ्रमर कमल को दुःख पहुँचाये बिना उसका मकरंद आहिस्ते से निकाल लेता है, उसी
प्रकार श्रीकृष्ण ने वेदों का मंथन कर यह शुद्ध सार निकाला है। इस प्रकार कृपालु और भक्तों के हितैषी श्रीकृष्ण
ने वेदसारामृत निकाल कर निर्भय होकर अपने भक्तों को दिया। इस प्रकार अपने सेवकों को पूर्ण वेदसारामृत
पिलाकर श्रीकृष्ण ने उनका जन्म-मरण और संसार का भय नष्ट कर दिया। माया संसार का मूल कारण है;
लेकिन श्रीकृष्ण माया का भी मूल कारण है। 'सच्चिदानन्दघन' नाम का जो स्वरूप है, वही 'श्रीकृष्ण' हैं। माया
के योग से मनुष्य वेष धारण करने वाला, पुरुषों में पुरुष श्रेष्ठ, पूर्णज्ञान के कारण ज्ञाननिष्ठ ऐसा जो श्रीकृष्ण है
वह समस्त वंद्य पुरुषों में अत्यन्त श्रेष्ठ है। उसे काया, वाचा, मन से सभी प्रकार से अनन्य शरण जाकर श्रीशुक
ने स्वयं ही श्रद्धापूर्वक नमस्कार किया। श्रीशुक ने नमन किया यह देखकर परीक्षित के मन में भी प्रेम उत्पन्न
हुआ और उसने भी कहा कि भक्त कृपालु केवल एक श्रीकृष्ण ही हैं। उद्धव ने परम निर्वाण प्राप्त किया यहाँ
ज्ञानकथा का निरूपण समाप्त हुआ। संसार में भगवद्भजन श्रेष्ठ है क्योंकि श्रीकृष्ण भक्त के अधीन रहता है।
भक्तों के मनोरथ श्रीकृष्ण पूरे करता है और अन्त में उसे अपना पद भी देता है। भक्तों पर उसकी इतनी अगाध