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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 815, कुल 869 में से

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पृष्ठ 815

उनतीसवाँ अध्याय ७९९
श्रीभगवानुवाच
गच्छोद्धव मयाऽऽदिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम्।
तव मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनैः शुचिः॥४१॥
न बुद्धि भेदं जनयेत् अज्ञानांलोक संग्रहम्।
जोषयेत सर्व कर्माणि विद्वान्युक्त समाचरन्॥
श्रीकृष्ण गम्भीर वाणी में बोले, उद्धव! तुम्हें अब ब्रह्मज्ञान हो गया और तुम्हारा स्नेहपाश बन्धन भी टूट
गया, अब तुम मेरी आज्ञा से बदरिकाश्रम जाओ। उस बदरिकाश्रम की महिमा लोकसंग्रह तथा जड़-मूढ़ जनों के
उद्धार के लिये श्रीकृष्ण अपने मुख से बताते हैं। वह बदरिकाश्रम मेरा स्थान है। वहाँ मैं नित्य अनुष्ठान करता
हूँ। उस स्थान का दूर से दर्शन करने पर भी कलिकल्मष का नाश होता है। उस पर्वत के स्पर्शमात्र से मनुष्य
पवित्र हो जाता है, उस बद्री के नामस्मरण से भी बड़े-बड़े दोषों का विलय हो जाता है। वहाँ भी मेरे चरणों का
तीर्थ 'अलकनंदा' नामक नदी के नाम से प्रवाहित हो रहा है। उसके स्पर्शमात्र से लोग पवित्र हो जाते हैं। वहाँ
श्रद्धापूर्वक स्नान करने से संसार बंधन नहीं रहता और जो उसका आचमन करता है उसका पितरों के साथ उद्धार
हो जाता है। ऐसा मेरा बदरिकाश्रम है। वह अत्यन्त पवित्र है। उद्धव! अब शायद तुम यह कहोगे कि आपने यह
स्थान कब बनाया ? तो उसका भी वर्णन सुनो। मैंने रजोगुण वाले लोग उत्पन्न किये। वे सुखविलास में निमग्न हो
गये। वे भोगासक्ति में डूब गये। तब मैंने दो रूपों में अवतार लिया। रवि और चन्द्र जिस प्रकार अन्धकार का पूर्ण
विनाश करते हैं, उसी प्रकार मैं भी नर-नारायण बना और बदरिकाश्रम में नित्य उदित होने लगा। वहाँ मैंने भक्ति,
वैराग्य तथा ज्ञान का स्वयं आचरण कर प्रकाशन किया। ऐसा वह बदरिकाश्रम मेरा स्थान है तथा वहाँ मैं अभी
भी भक्ति, ज्ञान, वैराग्य का अनुष्ठान करता रहता हूँ। नरनारायण के रूप में जिस पर्वत पर मैंने अवतार लिया,
वहाँ तोड़े हुए बैर के समान मेरी भक्ति फलती-फूलती रहती है। इसीलिये मैंने उसका नाम बदरिकाश्रम रखा है।
यहाँ संसार का सारा भ्रम समाप्त हो जाता है, इतना वह पवित्र है। इसलिये तुम अब बदरिकाश्रम जाओ। लेकिन
उद्धव! तुम्हारे मन में यह विचार आयेगा कि अब तीर्थ जाने की क्या आवश्यकता है ? तुमने मोक्ष से भी श्रेष्ठ
भक्ति दी, जिससे मैं अत्यन्त कृतकृत्य हो गया हूँ, अब तीर्थ जाने की मुझे जरा भी इच्छा नहीं है। लेकिन मेरी
आज्ञा है कि तुम वहाँ अवश्य जाओ। इतना सुनते ही उद्धव ने मौन धारण कर श्रीकृष्ण की आज्ञा का वंदन
किया। सद्भाव से वन्दन कर बदरिकाश्रम का दर्शन करने से वह नर का नारायण हो जाता है, इतनी उस स्थान
की महिमा है। उद्धव! तुझमें पूर्ण ज्ञान है, इसके साथ ही तुम मेरा भजन करते हो; इससे तुम्हारे चरण-स्पर्श से
वह बदरिकाश्रम भी पवित्र हो जायेगा। श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव को रुलाई आ गयी; उसने दौड़कर
श्रीकृष्ण चरणों का वन्दन किया और वहाँ जाने का आश्वासन दिया। ब्रह्मशाप से होने वाले नाश से बचाने के
लिये श्रीकृष्ण ने उसे पूर्ण उपदेश कर बदरिकाश्रम जाने को बाध्य किया। उद्धव ज्ञानियों में रत्न था, ब्रह्मशाप से
बचने के लिये उद्धव को बदरिकाश्रम भेजा। अन्यथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के बाद कृष्ण किसी को तीर्थाटन करने
के लिये नहीं कहेंगे। उद्धव का भवबन्धन बचपन में ही समाप्त हो गया था। श्रीकृष्ण ने जानबूझ कर उसे
बदरिकाश्रम भेजा और कहा कि इससे बहुत बड़ा लोकोपकार होगा। तुम्हारे धर्म से समस्त अज्ञानियों का उद्धार
होगा। अब तुम पूछो कि उस तीर्थ में जाने के बाद वहाँ किस तरह रहा जाय ? तो उस सम्बन्ध में लोककल्याण
के लिये तुम्हें निर्णय बताता हूँ। उद्धव! तुम्हारा आचरण ही जनता को उपदेश मालूम होगा। इसलिये वैराग्य,