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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 809, कुल 869 में से

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पृष्ठ 809

उनतीसवाँ अध्याय ७९३
है। फिर मेरे भक्तों की अधोगति कैसे होगी? मैंने स्वयं गर्भवास भोग कर अंबरीष को मुक्त किया और
हिरण्यकश्यपु का विदारण कर प्रह्लाद का संरक्षण किया। मैंने हाथ में चक्र लेकर परीक्षित का गर्भ में संरक्षण
किया। मैं भक्तों की कल्पांत में भी अधोगति नहीं होने दूँगा। मेरे भक्त के नाम पर मैं तृण का भी उद्धार करता हूँ।
फिर जो जीवभाव से मेरा भजन करते हैं, उन भक्तों की अवनति कैसे होगी? काया, वाचा, मन तथा धन न
छिपाकर जो अनन्यभाव से मेरी शरण में आते हैं, उनके कुशलक्षेम का भार मैं श्रीकृष्ण स्वयं सहन करता हूँ।
ऐसी अनन्यभक्ति की महिमा का वर्णन करते समय श्रीकृष्ण को भी उल्हास प्राप्त हुआ जिससे उद्धव को भी प्रेम
का ज्वार आया, उसके सारे शरीर से पसीना चुहचुहाने लगा और उसके शरीर पर रोमांच उभर आये। भक्ति की
यह महिमा सुनकर तथा उद्धव का वह पूर्ण प्रेम देखकर शुक्राचार्य को भी आनन्द हुआ और वे आत्मानंद में
झूमने लगे। अत्यन्त हर्षपूर्वक उन्होंने परीक्षित से कहा, भक्त त्रिभुवन में धन्य हैं। उन्हें सर्वतोपरी मुक्ति होने की
बात श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने मुख से कही है। भक्ति की महिमा जिस प्रकार अगाध है, उसी प्रकार उद्धव का प्रेम
भी अगाध ही था। उद्धव के उस प्रेम का लक्षण श्रीशुक्राचार्य स्वयं ही बताते हैं।
श्रीशुकउवाच
स एवमादर्शितयोगमार्गस्तदोत्तमश्लोकवचो निशम्य।
बद्धाञ्जलिः प्रोत्युपरुद्धकण्ठो न किंचिदूचेऽश्रुपरिप्लुताक्षः॥ ३५॥
विष्टभ्य चित्तं प्रणयावधूर्णं धैर्येण राजन् बहुमन्य मानः।
कृताञ्जलिः प्राह यदुप्रवीरं शीर्ष्णा स्पृशंस्तच्चरणारविन्दम्॥ ३६॥
जो ज्ञाताओं का ज्ञाननिधि है, जो आत्मज्ञान का सागर है, जो आनन्द की क्षीराब्धि है, वह श्रीशुक आत्मानंद
से सन्तुष्ट होकर बोलने लगा। हे श्रवण सौभाग्य चक्रवर्ति परीक्षित राजा! बताता हूँ, सुनो। देव, दानव, मानव
जिसका वर्णन करते हैं और महासिद्ध भी जिसकी स्तुति करते हैं; जिसका वेद निरन्तर गायन करते हैं, योगी वृन्द
भी जिसकी कीर्ति की प्रशंसा करते हैं, उस श्रीकृष्ण ने परम प्रीति से भक्ति की निर्मल स्तुति की सचमुच अनन्य
भक्ति की अपेक्षा अन्य कोई सुख नहीं है। देवताओं को भी भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ लगती है। भक्तियोग का समूल,
सप्रेम और शुद्ध योगमार्ग श्रीकृष्ण ने उद्धव को श्रीमुख से सम्पूर्ण बताया और उद्धव ने उसे ध्यानपूर्वक सुना।
भक्ति का वह निरूपण सुनकर उद्धव का मन द्रवित हो उठा, आँखें अश्रुओं से भींग गयी और स्वानंद की बाढ़
आ गयी। शरीर रोमांचित हो उठा, चित्त को हर्ष हुआ, गला भर आया और शरीर पर स्वेदबिन्दु चमकने लगे।
प्राण अपनी जगह स्थिर रह गया, शरीर थोड़ा काँपने लगा, आँखें अर्धोन्मीलित होने लगीं। औत्सुक के अत्यन्त
प्रेम से आत्मानंद में चित्तवृत्ति स्थिर हो जाने के कारण उद्धव का देह विलीन होने लगा लेकिन प्रारब्ध ने ही
उसकी रक्षा की। जिस प्रकार पानी में डूबती हुई नौका को डोर ही सँभाले रखती है, उसी प्रकार विलीन होने को
उद्यत उद्धव को प्रारब्ध ने ही रोक कर रखा। फिर उसने अत्यन्त धैर्यपूर्वक प्रेम के आवेग को रोका और उसे
कृतकृत्य होने का विश्वास हुआ। श्रीकृष्ण ने मेरा उद्धार किया यह बहुत बड़ा उपकार किया, अब किस तरह
उसकी पूर्ति की जाय? वह मन ही मन इस प्रकार का विचार करने लगा। गुरु को यदि चिन्तामणि दिया जाय तो
वह गुरु की चिन्ता ही बढ़ाता है। गुरु ने तो अचिंत्य वस्तु दी है, उसकी पूर्ति कभी नहीं होगी। गुरु को यदि
कल्पतरु दें तो वह कल्पना ही बढ़ाता है। गुरु ने तो निर्विकल्पता प्रदान की है अतः उसकी पूर्ति उससे भी नहीं
होगी। गुरु को पारस दें तो वह धातु को स्पर्श कर उसे सुवर्ण बनाता है; किन्तु गुरु के चरणस्पर्श से ब्रह्मस्वरूप