श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
उनतीसवाँ अध्याय ७८३
गला जमीन पर फेंक देते हैं; लेकिन यदि साधक उसे दृढ़ निश्चय से ब्रह्मार्पण मान ले तो वह भी मेरी भक्ति में
जमा होता है। इतना ही नहीं बल्कि कडुए कद्दू की खीर जिसे श्वान और सुअर भी नहीं खायेंगे, वह भी यदि
आनन्द से कृष्णार्पण करें तो वह कर्म भी ब्रह्मार्पण होता है। जो खोयी हुई वस्तु न मिल रही हो, वह भी
कृष्णार्पण करने से अनायास मुझे मदर्पण होती है। सारांश यही है कि प्रत्येक कर्म कृष्णार्पण करें। उसे
मनःपूर्वक अर्पण करने का ही नाम है 'सद्बुद्धि'।
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्।
यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्॥२२॥
मन में तो विषय की आसक्ति है और ऊपरी मन से ब्रह्मार्पण करें, ऐसे लोग अनेक दृष्टि से फँस जाते
हैं। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं। कुछ लोग अत्यन्त बुद्धिमान रहते हैं, वे अपनी बुद्धि हाथ में लेकर अन्त में
विषय का स्वार्थ सिद्ध करने में लग जाते हैं। वह अपनी देहममता के कारण अवश्य ही फँस जाते हैं। किसी
की बुद्धि अत्यन्त उत्तम रहती है, वेदशास्त्र में वे अत्यन्त पारंगत रहते हैं; किन्तु गर्व अभिमान के कारण ज्ञान
के गर्व में फँस जाते हैं। कुछ बुद्धिमान योगाभ्यास में पारंगत रहते हैं। वे अभ्यास से प्राणायाम साध्य कर
योगरूप किले में घुस जाते हैं और वहाँ की सिद्धि के वैभव की बलि चढ़ते हैं। कुछ लोग कर्म को श्रेष्ठ
मानते हैं और कर्म का हो-हल्ला मचाते हैं। विधि निषेध से ही उनका मार्ग अवरुद्ध हो जाने के कारण लोग
कर्म में ही डूब जाते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार के प्रयास कर कितने लोग फँस गये हैं उनकी कोई गिनती
नहीं है। लेकिन मेरी भक्ति वैसी नहीं है। वह केवल भाग्यवान को ही प्राप्त होती है जिसका सर्वभूमि
भगवद्भजन रहता है, उसकी बुद्धि की बुद्धि मैं स्वयं बन जाता हूँ। वह बुद्धि कौन सी होती है? तो कर्म
को ब्रह्मार्पण करना यही 'महाबुद्धि' है। समस्त प्राणियों के प्रति मेरा भजन और सभी कर्म मदर्पण यही बुद्धि
की 'महाबुद्धि' है। इसी के योग से वे स्वयं पूर्णब्रह्म होते हैं। चतुर लोगों की चातुरी इसे ही कहनी चाहिये।
क्योंकि वे मिथ्या देह के योग से भजन कर स्वयं सत्य सनातन ब्रह्म बन जाते हैं। पहले तो माया ही मिथ्या
है और उस माया से कल्पित देह भी मिथ्या! लेकिन देखो। उसी देह का कर्म मुझे अर्पण करने से वे स्वयं
ही ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। मिथ्या देह के भजन से स्वयं सत्यस्वरूप परब्रह्म होना यह भूसा देकर अनाज की
ढेर लेने की तरह है। अथवा फूटी कौड़ी देकर चिन्तामणि गठियाने की तरह है। उसी प्रकार मिथ्या देह का
कर्माचरण जिसके योग से जीव को दृढ़तर बन्धन प्राप्त होता, उसे ही अर्पण कर वे स्वयं परिपूर्ण ब्रह्म बन
जाते हैं। अनित्य देह के कारण ही नित्य वस्तु प्राप्त होती है। यही बुद्धिमानों की श्रेष्ठ बुद्धि है। इसी को
'ज्ञान का संतोष' कहते हैं। इस प्रकार परमशुद्ध परमार्थ श्रीकृष्ण ने अपने मुख से सुनाया। उस ग्रन्थ की अब
परिसमाप्ति करने के लिये उपसंहार के रूप में निरूपण सुनाते हैं।
एष तेऽभिहितः कृत्स्नो ब्रह्मवादस्य संग्रहः।
समासव्यासविधिना देवानामपि दुर्गमः ॥२३॥
अनेक मत-मतान्तरों को छोड़कर, कहीं संक्षेप में तो कहीं विस्तार में मैंने अत्यन्त शुद्ध ब्रह्मज्ञान तुम्हें
बताया। मैंने तुम्हें इसे अत्यन्त सुगम बनाकर बताया, अन्यथा यह ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो
आगम निगम शास्त्र का अध्ययन करते हैं उनके लिये तो यह और भी असाध्य है। वस्तु का साक्षात्कार न कर
अनेक प्रकार के शास्त्रार्थों का खोखले शब्दों से साक्षात्कार करते रहते हैं। ब्रह्म का वाद करते समय वेद भी
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'नेति' शब्द से निःशब्द हो गये हैं। उसी आत्मज्ञान का सार तथा परमार्थ का गुप्त भण्डार और मुझ परमात्मा का
अंतःकरण खोल कर तुम्हें बताया है।
अभीक्ष्णशस्ते गदितं ज्ञानं विस्पष्टयुक्तिमत्।
एतद् विज्ञाय मुच्येत पुरुषो नष्टसंशयः ॥ २४॥
जो वेदशास्त्रों के लिये कठिन है, जिसे शब्दों में वर्णन करना कठिन है, वह ज्ञान मैंने तुम्हें चुनकर बताया
है और वह ज्ञान तुम्हारे मन पर अंकित हो, इसलिये उसे अनेक प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियों से बार-बार बतलाया
है। तुम्हें अधिक प्रयास न करना पड़े और तुम्हें अधिक कष्ट न हो, इस दृष्टि से सारे संशय निर्मूल करते हुए
तुम्हें स्पष्ट ज्ञान दिया है। इस ज्ञान को जानने से सारे संशय जल जाते हैं और साधक ब्रह्मसम्पन्न होकर निरन्तर
स्वानंद में तृप्त रहते हैं। उद्धव ! मैंने यह जो गुप्तज्ञान बताया, उस एकादश स्कंध के निरूपण का श्रवण, पठन
और मनन जो करेगा वह धन्य है।
सुविविक्तं तव प्रश्नं मयैतदपि धारयेत्।
सनातनं ब्रह्मगुह्यं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ २५ ॥
ज्ञाता तर जाएँ तो इसमें कैसा आश्चर्य है ? लेकिन जो भोले-भाले और अज्ञानी हैं, उनका भी उद्धार करने
के लिये तुमने प्रश्न पूछा है। उस प्रश्न के अनुसार मैंने स्वयं सन्तुष्ट होकर तुम्हें गुप्त ज्ञान अर्थात् परम कारण जो
परब्रह्म है, उसके सम्बन्ध में बताया। जिस प्रकार बछड़े की हुँकार से गाय के स्तन में दूध उतरता चलता है, उसी
प्रकार तुम्हारे प्रश्न के आदर से मैं भी स्वानंद से भर गया। कछुए के पिल्लों को उनकी माँ बिन माँगे ही अपने
नेत्रों के द्वारा अमृतपान कराती है। उसी प्रकार तुम्हें देखते ही मेरे हृदय में जो ब्रह्मज्ञान था वह पूरी तरह उफन
कर बाहर आ गया, वही यह निरूपण है। उसी निरूपण के बहाने मैंने तुम्हें स्वानंद रस से युक्त परमामृत का पान
कराया। समुद्र मेघ को पानी पिलाता है और उस जल से मेघ संसार को तृप्त करता है; उसी प्रकार उद्धव को
प्राप्त ब्रह्मपद से मूढ़ जीवों का भी उद्धार होने वाला है। बछड़े के प्रेम के कारण गाय के स्तन में दूध उतरता है,
वह दूध पूरे परिवार का पोषण करता है, उसी प्रकार उद्धव के आग्रहपूर्वक किये गये प्रश्न से संसार का अनायास
ही उद्धार होने वाला है। वह प्रश्नोत्तरी कथाभाग अर्थात् मेरा और तुम्हारा ब्रह्मसंवाद-एकादश स्कंध के निरूपण
का अर्थबोध जो ध्यान में रखेगा अथवा इस निरूपण का अर्थ जो श्रवण करेगा, वे श्रोता और वक्ता दोनों ही स्वयं
ही सनातन ब्रह्म हो जायेंगे। संसार में ब्रह्म परिपूर्ण भरा रहने पर भी वह मन को, बुद्धि को और इन्द्रियों को नहीं
दिखायी देता। जहाँ वेद भी मौन हो जाते हैं, वहाँ यह ब्रह्मज्ञान उपयोगी होगा। (उन श्रोता वक्ताओं के लिए)
एक बार यह ज्ञान प्राप्त होने पर वह टस से मस नहीं होता। एकादश स्कंध का अर्थ मन में धारण करने से
परमपद की अटल प्राप्ति होगी। इस एकादश स्कंध से श्रोताओं और वक्ताओं को इतना बड़ा पद प्राप्त होता है,
तब मेरे भक्तों को जो प्रेमपूर्वक इस ज्ञान का उपदेश करेंगे, उन्हें किस फल की प्राप्ति होती है वह तथा ज्ञानोपदेश
की शुद्ध स्थिति उद्धव को श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रेम से स्वमुख से बता रहे हैं।
य एतन्मम भक्तेषु सम्प्रदद्यात् सुपुष्कलम्।
तस्याहं ब्रह्मदायस्य ददान्यात्मानमात्मना ॥ २६ ॥
काया, वाचा, मन, घरबार, पत्नी, बच्चे, धन और प्राण आदि जो मुझे निष्काम बुद्धि से अर्पण करते हैं, वे
ही मेरे अनन्य भक्त हैं। ऐसे भक्तों को इस ज्ञान का अवश्य उपदेश करें। उस उपदेश का भी परिपक्व तथा पूर्ण
उनतीसवाँ अध्याय ७८५
लक्षण इस प्रकार है। साधक का मन जिधर भी जाता है, वहाँ परिपूर्ण ब्रह्म रहता ही है; वहाँ से मन हटकर कहीं
और जाने के लिये खाली स्थान ही नहीं है ऐसा अनुसंधान मन में करने से मन चैतन्य में समरस हो जाता है।
इसी को 'पुष्कल ज्ञान' कहते हैं, और इसी का नाम है 'पूर्ण उपदेश'। इस प्रकार का सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान जो मेरे
भक्तों को दान करेगा, उसका हे उद्धव ! मैं पूर्णरूप से ब्रह्मऋणी होकर रहता हूँ। उसके उपकार की पूर्ति करने के
लिये मेरी गाँठ में कुछ नहीं है। इसलिये मेरा आत्मरूप उसे देकर मैं रात-दिन उसकी सेवा के लिये खड़ा रहता
हूँ। जो शिष्य को ब्रह्मज्ञान देता है, उसके अधीन मैं परमात्मा रहता हूँ और उस ब्रह्मज्ञान देने वाले के शब्द से ही
मैं शूद्र आदि का उद्धार करता हूँ। परब्रह्म देकर जो भक्तों को निष्कर्म कर देता है; वह मुझे अत्यन्त प्रिय है और
मैं पुरुषोत्तम उसका दास बनकर रहता हूँ। उद्धव ! मेरे भक्तों को जो ब्रह्मज्ञान देता है, उससे अधिक लाडला मेरा
कोई नहीं है यह तुम निश्चित रूप से जान लो। वह आत्मा और मैं शरीर हूँ और वह शरीर भी मैं स्वयं ही बनता
हूँ; उसी प्रकार उसका जो भी कर्माचरण रहता है, वह भी पूरी तरह मैं ही रहता हूँ। जैसे मैं अवतारधारी हूँ, उसी
प्रकार यह भी अवतारधारी है। उसमें और मुझमें तिलमात्र का भी अन्तर नहीं है। जो इस ब्रह्मज्ञान का दान करेगा,
उसे मैं स्वयं इस प्रकार अपना आत्मा अर्पण करता हूँ, फिर भी उसकी पूर्ति नहीं होती। इसलिये मैं शरीर से
विचरण करते हुए भी उसकी अखण्ड सेवा करता हूँ। उसके प्रेम के खातिर ही मैं उसे अपना आत्मा अर्पण कर
सदा उसके घर में रहता हूँ। उस पर जो भी संकट आये, वह सब मैं अपने ऊपर ले लेता हूँ। मेरे चैतन्य साम्राज्य
का वैभव उसके घर में निरन्तर रहता है। इस एकादश स्कन्ध के ब्रह्मज्ञान का उपदेश कर मेरे भक्तों को जो
ज्ञानदान देगा, उसे मैं इस प्रकार अपना आत्मा अर्पण करता हूँ। अस्तु ! यह ब्रह्मज्ञान यदि साध्य न हो सके, तो हे
उद्धव ! इस ग्रन्थ का जो सावधानीपूर्वक सर्वकाल पठन करेगा वह भी परम पावन होगा।
य एतत् समधीयीत पवित्रं परमं शुचि।
स पूयेताहरहर्मां ज्ञानदीपेन दर्शयन् ॥ २७ ॥
तुम्हारा और मेरा यह संवाद शुद्ध ब्रह्मज्ञान है। इसका जो भी कोई श्रद्धालु पुरुष ध्यानपूर्वक, आदरपूर्वक
श्रवण करेगा, जो निरन्तर बढ़ते प्रेम से शुद्ध सात्त्विक श्रद्धा मन में दृढ़ कर, पग-पग पर नित्य नयी बात पढ़ने की
चाह उत्पन्न करेगा, वाणी के कसोरे में श्रद्धा का तेल डालकर तथा जिह्वा की बाती बनाकर जो इस ज्ञानज्योति को
प्रज्वलित करेगा, जो इस एकादश स्कंध की ज्ञानज्योति से एकादश इन्द्रियों की बाती बनाकर और उन्हें प्रज्वलित
कर मेरी आरती उतारेगा, उन्हें मैं कितना पवित्र कह कर पुकारूँ? इस प्रकार का ग्रन्थ पठन मेरा ज्ञान-दीप है।
उस ज्ञानदीप से जो मेरा स्वरूप प्रकाशित करता है, उनकी संगति में जो रहते हैं, उन्हें ब्रह्मादि देवता भी वन्दन
करते हैं। उद्धव ! सचमुच, उनके कारण त्रिभुवन पावन होता है, यह निश्चित रूप से जान लो। अस्तु ! जो इसका
पठन नहीं कर सकता, वह यदि श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण करे तो उसे भी संसार बन्धन की बाधा नहीं होगी। उसी
का निरूपण श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
य एतच्छ्रद्धया नित्यमव्यग्रः शृणुयान्नरः।
मयि भक्तिं परां कुर्वन् कर्मभिर्न स बध्यते ॥ २८ ॥
यदि अध्ययन नहीं कर सकता तो कोई हर्ज नहीं, श्रद्धा से, ध्यानपूर्वक जो एकादश स्कंध का श्रवण करेगा
उसे कर्मबन्धन बाधक नहीं होगा। अत्यन्त श्रद्धा से श्रवण करने पर भी, उससे अधिक मनन करना चाहिये। मनन
के बिना किया गया श्रवण नपुंसक है। क्योंकि उससे ब्रह्मप्राप्ति पूरी तरह फलदायी नहीं होगी। कथा सुनना भले
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ही समाप्त हो जाय किन्तु मनन समाप्त नहीं होना चाहिये। लालची आदमी को जिस प्रकार मन में धन की याद
रहती है, उसी प्रकार कथा का मन में स्मरण रहना चाहिये। मनन करने से भजन और पराभक्ति उत्पन्न होती है।
ऐसा करने से आर्त, जिज्ञासु तथा अर्थार्थी इनकी स्थिति छोड़कर मेरी चौथी भक्ति बढ़ती है। इसी को ज्ञाता
‘पराभक्ति’ कहते हैं। पराभक्ति से मेरा भजन करने से तत्काल आत्मदर्शन होता है। इससे मेरे भक्तों को कर्मबन्धन
की बाधा नहीं होती। यह अत्यन्त गुप्त बात है; इस एकादश स्कंध का श्रवण कर ‘मैं तरूँगा’ ऐसा विश्वास
जिसने अंतःकरण में दृढ़ कर लिया और इस प्रकार जो श्रवण के प्रति लुब्ध हो गया, वह यदि मेरी भक्ति को घर
से बाहर निकालने का भी प्रयास करे तो भी वह उसके घर में घुस आयेगी। वह भक्ति घर में घुस कर निष्काम
भक्तों के सारे कर्मों का नाश करती है। इसी का नाम है ‘पराभक्ति’। यह श्रोताओं का विश्राम मन्दिर है। एकादश
स्कंध का श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से इतना लाभ होता है। श्रवण के योग से मेरा भजन उत्पन्न होता है और भजन
से भक्तजन मुक्त होते हैं। खैर यह तो औरों की बात हुई लेकिन तुम्हें जो ज्ञानकथा मैंने सुनायी, वह तुम्हारा
निश्चय दृढ़ होने के लिये सुनायी, उसका तत्त्वबोध तुम्हें हो ही गया होगा।
अप्युद्धव त्वया ब्रह्म सखे समवधारितम्।
अपि ते विगतो मोहः शौकश्चासौमनोभवः ॥ २९ ॥
हे उद्धव ! तुम्हारा प्रेम देखकर मैंने तुम्हें अत्युत्तम गुप्त ज्ञान अर्थात् शुद्ध जो परब्रह्म है उसे सम्पूर्ण बताकर,
उसे सुगम बनाकर उसका निरूपण किया। यह ज्ञान का शुद्ध सार तथा वेदों का विश्राम स्थल है। अविद्या का
पराभव इसी से होता है तथा जीव शिव का समाधान भी यही है। यह गुप्त ज्ञान मन, बुद्धि तथा वाणी को
अगम्य होते हुए भी तुम्हारी पूर्ण श्रद्धा देखकर तुम्हें बताया। एक घनिष्ठ मित्र जिस प्रकार अपनी सम्पत्ति अपने
मित्र को अर्पण करता है, उसी प्रकार यह ब्रह्मस्थिति मैंने तुम्हारे हाथ में दी है। मैंने जो परम रहस्य तुम्हें बतलाया
वह परब्रह्म तुम्हारी समझ में आ गया न ? यदि समझ में नहीं आया हो तो अधिक सुगम करके बताऊँगा।
अंतःकरण में चैतन्य जमकर बैठ गया हो और जहाँ ब्रह्मस्थिति प्राप्त हो गयी हो, वहाँ मोह ममता की बस्ती
बिलकुल नहीं होनी चाहिये। ब्रह्मज्ञान का आकलन होने का लक्षण यही है कि उसके बाद संकल्प विकल्प के
विचार मन में नहीं आते। ब्रह्म को पूरी तरह जान लेने के बाद ‘मैं’ और ‘तू’ का भाव नहीं उत्पन्न होता, ध्येय,
ध्याता, ध्यान नहीं रह जाता और कर्मठता भी शेष नहीं बचती। जिसने ब्रह्मज्ञान जान लिया, उसे कर्मबन्धन की
बाधा नहीं होती क्योंकि कर्म का जो आचरण है, वह मूलतः मायिक ही है। जिस प्रकार पुरुष के योग से छाया
हिलती है लेकिन पुरुष उसका लोभ नहीं करता, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी भी देह को चलाता है किन्तु वह
देहाभिमानी नहीं होता। सूर्य के सामने जिस प्रकार अन्धकार क्षणभर की भी प्रतीक्षा नहीं करता, उसी प्रकार
ब्रह्मज्ञानी को भी कर्म का आदर जरा भी नहीं रहता। इसका कारण यही है कि कर्म का कर्मबन्धन यह केवल
मन का संकल्प है। किन्तु जहाँ मन का मनपन ही टूट जाता है, वहाँ कर्माचरण भी बीजरहित हो जाता है।
ब्रह्मवस्तु नित्य निर्विकल्प है। वहाँ संकल्प विकल्प नहीं है। यही परब्रह्म का सच्चा स्वरूप है और उसी का
स्वानुभव होता रहता है। इस प्रकार स्वयं ही ब्रह्मरूप होने के बाद, ‘मैं एक उद्धव हूँ’ इस प्रकार का उद्धव का
ठौर ही नहीं रह जाता। फिर वहाँ शोक और मोह किस बात का? उद्धवपन की बस्ती में शोकमोह की उत्पत्ति
होती थी; किन्तु ब्रह्म की प्राप्ति होने के बाद वह उद्धवपन याद ही नहीं आता। देव का यह भाषण सुनकर उद्धव
का उद्धवपन उड़ गया। वह स्वानंद में लीन हो गया और उसका वाचालपन बन्द हो गया। अपने आत्मस्वरूप पर
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पहुँचते ही उद्धव का उद्धवपन लुप्त हो गया; देह की अहंता नष्ट होकर वह स्वानंद में तल्लीन हो गया। वहाँ
देवता ने जो प्रश्न किया उसका उत्तर कौन देगा ? कृष्ण के साथ उद्धवपन का विलय होकर वह पूर्ण वस्तुरूप बन
गया था। उद्धव की वह अवस्था देखकर श्रीकृष्ण के ध्यान में आ गया कि वह निजात्मज्ञान से ब्रह्मरूप हो गया।
श्रीकृष्ण प्रत्यक्ष हृदयस्थ होने के कारण, यह न जान सके ऐसी कौन सी बात है ? शिष्य को सच्चा अनुभव प्राप्त
होने पर, जिस प्रकार बच्चे की तृप्ति का सुख माँ अनुभव करती है, उसी प्रकार सद्गुरु सुख के शिखर पर
पहुँचते हैं। शत्रु सेना पर विजय प्राप्त करते देख राजा को अत्यन्त सन्तोष होता है और वह ध्वजा पताकाओं के
साथ समारोह की धूम मचा देता है। बच्चों से किस प्रकार लाड़ किया जाता है यह प्रसूति की वेदना सहन करने
वाली माँ ही जानती है। उसी प्रकार शिष्य को स्वानुभव प्रदान करना केवल सद्गुरु ही जानते हैं। पुत्र का
खजाना मिलने पर जिस प्रकार पुत्र को संतोष होता है, उसी प्रकार उद्धव के अनुभव से श्रीकृष्ण को भी संतोष
हुआ। कृष्ण तो नित्य से ही सुखस्वरूप था, शिष्य के अनुभव से वह सुख के चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। गुरु की
बात गुरु ही जाने, दूसरे के लिये वह अगम्य है। शिष्य को उपदेश करते समय यदि गुह्य को सुख न हुआ होता
तो इस लोक में उपदेश परम्परा का अस्तित्व ही नहीं रहा होता। गुरु यदि ऊब कर उपदेश करे तो वह शिष्य की
समझ में ही नहीं आयेगा। फिर उसकी आत्मानुभव से कैसे भेंट होगी ? जिस प्रकार बालक को अलंकार पहनाने
से उसे कुछ अनुभव नहीं होता लेकिन उसकी माँ को प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार शिष्य को आत्मानुभव प्राप्त
होने पर वास्तव में सद्गुरु को आनन्द होता है। उसी प्रकार उद्धव को ब्रह्मस्थिति पर पहुँचा देखकर श्रीकृष्ण को
अत्यन्त आनन्द हुआ। उन्हें लगा कि अब मेरे उद्धव का सन्देह दूर हो गया। उसे ब्रह्मस्वरूपानुभव हुआ। उसकी
ब्रह्मनिष्ठ स्थिति देखकर उसे आत्मस्वरूपानुभव प्राप्त हुआ है इसका श्रीकृष्ण को अनुभव हुआ। अब उसे दूसरे
को उपदेश करना सिखाते हैं। तुमने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया है। अब शिष्योपदेश करने का ढंग तथा शिष्य का
अधिकार कैसे पहचानते हैं, वह सुनो।
नैतत्त्वया दाम्भिकाय नास्तिकाय शठाय च।
अशुश्रूषोरभक्ताय दुर्विनीताय दीयताम्॥ ३०॥
धूर्त, नास्तिक, ढोंगी, सेवा न करने वाला तथा भक्तिहीन, उसी प्रकार उद्धत स्वभाव के शिष्य को छोड़
देना चाहिये। जिससे अधिक से अधिक लोग एकत्रित हों ऐसे पर्याप्त मात्रामें मिलने की इच्छा करने वाले, ऐसे
ढोंगियों का भजन, उन्हें यह एकादश स्कंध का ज्ञान स्वप्न में बड़बड़ाते हुए भी नहीं देना चाहिये। मोह ममता
के प्रावल्य के कारण जिसकी आस्तिकता का लय हो गया हो, वेद और शास्त्र के प्रति जो पूरी तरह नास्तिक
हों; देवता का अस्तित्व ही न मानते हों; इस प्रकार नास्तिकता का बिगुल बजाने वाले जो लोग हों, उनके कान
में इस ज्ञान का एक भी शब्द नहीं पड़ना चाहिये क्योंकि नास्तिकता के कारण उनकी श्रद्धा शुष्क हो जाती है।
नास्तिकवाद के आगे ज्ञान की क्या कीमत है ? अनीश्वरवाद का विद्रोह अत्यन्त कठिन होता है। ऐसे
नास्तिकवादी लोगों को तत्काल छोड़ देना चाहिये। अनन्यभाव से शरण न आकर, मीठी-मीठी बातें कर धूर्तता
से ज्ञान प्राप्त करने का जो प्रयत्न करता है, ऐसे धूर्तों का भी त्याग करना चाहिये। धूर्त दूसरों से अपने मतलब
की बात निकाल लेते हैं और अपनी बात या युक्ति दूसरों को नहीं बताते। काया, वाचा मन और धन इस
सम्बन्ध में जो गुरु से छल करता है और उसके गुण-दोष देखता है उस धूर्त का भी पूर्णरूप से त्याग करना
चाहिये। मेरी योग्यता बहुत अधिक है, मैं स्वयं गुरु की सेवा कैसे करूँ? मेरा बड़प्पन कम होगा। इस भय से
७८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जो गुरु की सेवा नहीं करता, उस शिष्य का भी त्याग करना चाहिये। स्वयं ऊँचे आसन पर बैठकर जो सेवकों
के हाथों गुरु की सेवा कराता है, उस शिष्य को पाखंडी समझकर उसका त्याग करना चाहिये। उसे इस ग्रन्थ
का उपदेश नहीं करना चाहिये। सद्गुरु के सामने जो बड़ी शान से अपने शब्द पांडित्य की शेखी बघारता है,
जो अहंकार के कारण ठीक से सेवा नहीं करता, ऐसे शिष्य का भी त्याग करना चाहिये। मैं बहुत बड़ा दानी हूँ
यह कहकर जो छोटे काम को हाथ नहीं लगाता है, ऐसे अभिमानी का भी त्याग करना चाहिये। जो
लोकलज्जा के भय से गुरु की सेवा नहीं करता, जिसे लौकिक का बहुत अभिमान रहता है, ऐसे शिष्य का भी
त्याग करना चाहिये। मैं अमीर हूँ यह कहकर जो गुरु के घर का छोटा काम नहीं करता, उस घमण्डी और
अभिमानी शिष्य को भी छोड़ देना चाहिये। जो नम्रतापूर्वक गुरु की सेवा नहीं करता; अखण्ड ध्यान करना ही
हमारी गुरुभक्ति है; इस युक्ति से जो सेवा से बचने का बहाना करता है, उसका भी त्याग करें। मैं सेवा के
छोटे-मोटे काम नहीं करूँगा; धन जितना भी चाहें दे दूँगा, ऐसा कहने वाला तथा धन का अभिमान करने वाले
को शिष्य नहीं बनाना चाहिये। धन की आशा कर गुरु यदि शिष्य को उपदेश देता हो तो समझ लो कि
ब्रह्मसान उजाड़ हो गया या धन देकर ब्रह्मज्ञान चाहने वाले को भी शिष्य कभी नहीं बनाना चाहिये। समय के
अनुसार गुरु की जो सेवा करना उचित है, उसे जो नहीं करता, उसे 'अशुश्रूषु' कहते हैं, उसका भी सचमुच
त्याग करना चाहिये। सद्गुरु की भक्ति करने से सचमुच मेरा उद्धार होगा ऐसा जिसका निश्चय हो ऐसा शिष्य
नहीं करना चाहिये। सद्गुरु ही परब्रह्ममूर्ति है, ऐसी भावना जिसके अंतःकरण में न हो और जिसके मूल में ही
विकल्प हो, उसे भी शिष्य नहीं बनाना चाहिये। गुरु से ब्रह्म भिन्न है ऐसा जिसका ज्ञान हो उसे निश्चय से
अभक्त मानना चाहिये। उसे भी शिष्य नहीं करना चाहिये। सद्गुरु भी एक मनुष्य ही है, यह जानकर जो
उसकी आज्ञा का उल्लंघन करेगा, वह संभ्रम में पड़कर रास्ता भटक गया ऐसा समझना चाहिये। ऐसे शिष्य
को छोड़ देना चाहिये। जो शिष्य अपनी पवित्रता सद्गुरु से अधिक मानता है, वह अभक्तों में अग्रगण्य है।
उसका भी तत्वतः त्याग करना चाहिये। उद्धव! गुरु में ब्रह्म स्थिति है ऐसी जिसकी पूर्ण श्रद्धा नहीं होती, उसी
का नाम है 'अभक्ति' यह जान लो। अथवा इस ग्रन्थ का ब्रह्मज्ञान जिसे नहीं भाता, उसे भूलकर भी कभी
शिष्य नहीं बनाना चाहिये। उसी प्रकार इस ग्रन्थ का ब्रह्मज्ञान बतलाने वाला मैं साक्षात परब्रह्म मूर्ति, उसके
प्रति जिसे भक्ति न हो, उस शिष्य का भी निश्चयपूर्वक त्याग करना चाहिये। उसी प्रकार, इस ग्रन्थ का ज्ञान
तो अच्छा लगता है, गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा भी रहती है, किन्तु उसका व्यवहार उद्धत रहता है, तो ऐसे शिष्य
का भी त्याग करें। मेरी साक्षात मूर्ति जो संत सज्जन हैं और मेरे प्राणप्रिय भक्तों का जो उपहास करता है उसे
'दुर्विनीत' अर्थात् उद्धत कहते हैं। मेरे भक्तों में यदि कोई अत्यन्त दरिद्र भी हो तो उसके चरणों का वन्दन
करना चाहिये। यह जिसे अच्छा नहीं लगता, उसे 'दुर्विनीत' कहते हैं। साधु संतों से भेंट करने जाता है और
पाखण्डपूर्ण नम्रता से उनके चरणों का वन्दन करता है लेकिन उनके गुणदोष खोजता रहता है, उसमें
'दुर्विनीतता' रहती है। दुष्ट बुद्धि से विनय दिखलाने को 'दुर्विनीतता' कहते हैं। वह जिस शिष्य में दिखायी दे
उसका भी सचमुच त्याग करना चाहिये। यह निरूपण सुनकर तुम कहोगे कि तब तो मैं शिष्य ही नहीं बनता।
लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिये क्योंकि जो सच्छिष्य को ब्रह्मदान का उपदेश करता है, वह मेरा आत्मा है,
ऐसा मैं समझता हूँ। अब उपदेश करने के लिये पूर्ण उपयुक्त सच्छिष्य का लक्षण बताता हूँ। उद्धव! उसे ध्यान
देकर सुनो।
उनतीसवाँ अध्याय ७८९
एतैर्दोषैर्विहीनाय ब्रह्मण्याय प्रियाय च।
साधवे शुचये ब्रूयाद् भक्तिः स्याच्छूद्रयोषिताम्॥ ३१॥
उपदेश देने के लिये पूर्ण अधिकार यह है कि उसमें प्रखर वैराग्य हो। वह भी पिशाच वैराग्य नहीं, बल्कि
विवेकसम्पन्न तथा शास्त्र शुद्ध वैराग्य चाहिये। अन्यथा चार दिन वैराग्य धारण करेगा और तत्काल विषयों की
ओर मुड़ जायेगा। ऐसे को उपदेश करना, दूध पिलाने की तरह है क्योंकि वैराग्य चला जाने के बाद केवल ज्ञान
का अभिमान शेष रहता है। उस अभिमान से यह क्या करता है? तो श्रेष्ठ लोगों के गुणदोष देखता है।
कनिष्ठोंकी अवहेलना कर उनकी निन्दा करना तथा श्रेष्ठ लोगों के गुणदोष देखना। वैराग्य क्षीण होने पर इस
प्रकार का ज्ञानाभिमान जागृत होता है। उद्धव ! इस संसार में केवल दो ही अवस्थाएँ हैं। पहली विरक्ति तथा
दूसरी विषयासक्ति तीसरी कोई अवस्था होती ही नहीं। जहाँ विवेक से विषय क्षीण होते हैं वहाँ परिपूर्ण वैराग्य
बढ़ता है और जहाँ विवेक के साथ वैराग्य क्षीण होता है, वहाँ ज्ञानाभिमान से विषयाचरण होने लगता है।
इसलिये ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने तक पूर्णरूप से वैराग्य कायम रखता है तथा वैराग्य युक्त होकर अनन्य भाव से गुरु
की शरण में जाता है वही उपदेश के लिये अधिकारी रत्न है, ऐसा समझना चाहिये। पिछले श्लोक में दोषों का
निरूपण वैराग्य के लिये समझना चाहिये। इन दोषों से जो रहित होता है, वही सच्छिष्य है। जो ब्राह्मणों की
ब्रह्मभाव से भक्ति करता है, जो भूतों को अनन्य भगवद् भाव से भजता है, उसकी भक्ति और विरति दासी बन
जाती हैं। उसे ही सचमुच अधिकारी समझना चाहिये। गुरु का अत्यन्त प्रिय भी हो लेकिन यदि अभक्त हो तो
भजन करने तक उसे भी ब्रह्मज्ञान नहीं प्राप्त होगा। गुरु को प्रिय तथा भजनशील और दोषरहित हो तो ऐसे शिष्य
की विरक्ति को अटल बनाकर उसे पूर्ण ईमानदारी से इस गुप्त ज्ञान का उपदेश करना चाहिये। स्वपत्नी तथा
स्वधन का जिसे अत्यन्त लोभ हो तो उसे न स्वर्ग मिलेगा, न मुक्ति ही। असीम जन्म-मरण अवश्य भोगना
पड़ेगा। परस्त्री और पराया धन को जिसका मन कभी स्पर्श नहीं करता, ऐसे पवित्र व्यक्ति को इस ज्ञान का
उपदेश करना चाहिये। जो वैराग्य के साँचे में ढला हुआ है, विवेक से जो परिपूर्ण है, जीवभाव से जो सद्गुरु की
सेवा के लिये समर्पित है और अनन्यभाव से उनके चरणों पर गिरा हुआ है; उसी प्रकार अपनी महानता भूलकर
जो गुरु सेवा के लिये रंक होने को तत्पर है, ऐसी सेवा के प्रति जिसका पूर्ण सद्भाव रहता है, इन्द्र जैसे बड़े-बड़े
देवतागण को भी जो सद्गुरु का दास मानता है और सद्गुरु की अपेक्षा हरिहर को भी श्रेष्ठ नहीं मानता; जिसमें
न गर्व है न मद, जिसमें कामक्रोध नहीं है, जिसे विकल्प भेद पसन्द नहीं है, उसी शिष्य को पूर्णरूप से परमार्थी
समझना चाहिये। काया, वाचा, मन, धन छोड़ तथा बड़प्पन की अकड़ छोड़कर जो अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाता है, उसे ही साधुत्व की दृष्टि से सच्छिष्य समझना चाहिये। लोकलज्जा को छोड़कर जो ब्रह्मज्ञान
का याचक बनता है और सद्गुरु के उपदेश के लिये चातक बनकर रहता है, उसे अवश्य उपदेश करना चाहिये।
जो तीन वर्णों से अलग हैं, वेदों ने जिन्हें अपने से दूर करके रखा है, जिन्हें मंत्रों का अधिकार नहीं है, जो श्रवण
के भी अधिकारी नहीं हैं, जिनका आश्रमधर्म नहीं है, वैदिक कर्म नहीं है, जप अथवा होम नहीं है, जो अधमवर्ण
के कारण नीच हैं, ऐसे शूद्रादि लोग, उनमें भी इस ग्रन्थ का ज्ञान पढ़कर जन्म-मरण निवारण करने के लिये तीव्र
वैराग्य उत्पन्न होता है। ऐसे लोगों को मन से विषयों से घृणा होती है और वे काया, वाचा तथा मन से सद्गुरु को
अनन्य भाव से शरण जाते हैं। गुरु से किस तरह प्रश्न किया जाय, यह भी उनकी समझ में नहीं आता। जन्म-
मरण से मुक्ति पाने के लिये वे भक्ति से साष्टांग दण्डवत करते हैं। परमार्थ के प्रति उन्हें शुद्ध और परिपूर्ण श्रद्धा
रहती है। ऐसे लोग भले ही शूद्र क्यों न हों लेकिन उन्हें ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से कभी दोष नहीं लगता। मेरे
७९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस वचन को तुम सत्य मान लो। अब धन की इच्छा से जो चतुर्वर्णों को उपदेश करते हैं, उन्हें धनलोभी समझना
चाहिये। उन्हें गुरुपद नहीं देना चाहिये। जहाँ गुरु को ही लोभ रहता है वहाँ शिष्य की विरक्ति डूब जाती है।
ऐसे ही विरक्तों से उपदेश लेने से परमार्थ की हानि होती है। लोकरहित होकर तथा पूर्ण कृपा से यदि सद्गुरु शूद्र
लोगों को उपदेश करें और इस प्रकार दीनों का उद्धार करें तो इस उपदेश से कभी दोष नहीं लगेगा। जिसके योग
से वैरागी की छटपटाकर मृत्यु होती है, जिसके कारण ज्ञाता को दोष लगता है, वह स्त्रीसंग हमें नहीं करना
चाहिये। स्त्री का अकस्मात दर्शन होने से भी अधःपतन होता है। फिर उनकी संगत होने से ज्ञाता का कैसे भला
होगा ? सभी प्रकार से प्रमाद में अर्थात् दोष में पड़ने के कारण इसे 'प्रमदा' कहते हैं। उसका नित्य संग हो जाय
तो परमार्थी लोग कैसे तरेंगे ? जिसका मुख देखते ही मदन तत्काल कटाक्ष बाण छोड़ता है, वहाँ किस बात का
उपदेश किया जाय ? परमार्थ की निश्चित हानि समझ लें। इसलिये हे उद्धव ! तुमसे यही कहता हूँ कि स्त्रियों से
बात भी न करो, स्त्रियों का अवलोकन न करो, उनका शब्द भी कानों पर न आने दो। नहीं-नहीं; स्त्रियों से बात
न करो, उनसे एकांत न करो, उनकी संगत न करो क्योंकि यह लोगों में सभी दृष्टियों से निन्दनीय है। स्त्रियों का
अनुवाद न करो, उनसे संवाद न करो, उन्हें उपदेश न करो, क्योंकि उससे व्यर्थ के लोकापवाद की आशंका है।
कोई सात्त्विक स्वभाव की स्त्री यदि सहज ही परमार्थ की बातें करने लगती है तो इष्ट मित्रों को उसमें कुछ अन्य
का सन्देह होता है। इसलिये स्त्री का सर्वोपरि त्याग ही करना चाहिये। स्त्रियों के संग से ब्रह्मज्ञान तो कभी बढ़ेगा
नहीं। (आशंका) उपदेश के लिये यदि स्त्रियों को वर्ज्य माना जाय तो पहले के बड़े लोगों ने उन्हें कैसे उपदेश
दिया होगा ? तो सुनो। याज्ञवल्क्य अत्यन्त श्रेष्ठ था। उसने उपनिषद में मैत्रेयी को अनेक प्रकार की युक्ति से
ज्ञानोपदेश किया। महामुनि नारद ने प्रह्लाद की माता को इन्द्र से छुड़ाकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया है। कपिल
मुनि ने अवतार लेकर सिद्धासन पर बैठकर देवहूती को ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया है। योगियों का मुकुटमणि
कैलासाधिपति शंकर ने भवानी को आत्मबोध से ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया है। औरों की क्या बात करें। हे
कृष्ण ! तुमने ही तो यज्ञ-पत्नियों को उपदेश किया था, ऐसा भी तुम कहोगे उद्धव अस्तु ! सद्भक्ति देखकर करुणा
दृष्टि से स्त्रियों को उपदेश करना चाहिये। ऐसा यदि तुम कहोगे, तो उद्धव ! उसमें भी अधिकार देखना चाहिए।
इस सम्बन्ध में, उद्धव ! निश्चित बात बताता हूँ, सुनो। वाचाल स्वभाव की स्त्री अयोग्य है। उसे उपदेश करना
व्यर्थ है और उससे गुरुत्व को आघात पहुँचता है। जिस स्त्री को अधिक बोलने की आदत रहती है जिसके मुख
में ब्रह्मज्ञान गूँजता है, जिसके अंतःकरण में विषय का कोलाहल मचता रहता है, पर पुरुष से परमार्थ की बातें
करना जिसे प्रिय लगता है; जो स्त्री ब्रह्मज्ञान की बात करने में ढीठ रहती है तथा मुख से बड़बड़ करती रहती है,
उसे उपदेश कभी नहीं करना चाहिये, उससे अपवाद की उँगली उठेगी। (श्रीएकनाथ कहते हैं) "श्री जनार्दन
स्वामी से मैंने भी विनती की, कि स्त्रियाँ और शूद्र उपदेश के लिये आते हैं, उन्हें क्या कहा जाय ? गुरु के बिना
कोई मार्ग नहीं है, इसलिये वे उपदेश के लिये आते हैं, उन्हें क्या उपदेश किया जाय, यह समझ में नहीं आता।"
यह सुनकर श्रीजनार्दन को संतोष हुआ और उन्होंने कहा, उन्हें भगवन्नाम का उपदेश करें, उससे उनकी
चित्तशुद्धि होगी। चित्तशुद्धि होने के बाद उनमें जब ज्ञान की उत्कंठा जगे और वे.अनन्य भाव से शरण में आये तो
उन्हें ब्रह्मज्ञान बताना चाहिये। अस्तु। श्रीकृष्ण बताते हैं। स्त्री अथवा पुरुष जिन्हें दृष्टि से सम लगें, ऐसे अनुभव
से जो परिपूर्ण हों, उनको ही स्त्रियों का उपदेश करना चाहिये। वह भी उनका अधिकार देखे बिना नहीं करना
चाहिये। उस उपदेश की भी वास्तविकता सुनो। मैंने जिन स्त्रियों की निन्दा की, उसमें जो सात्विकता से
भाग्यवान हो और विषय वासना त्याग कर परमार्थ की ओर उद्यत होगी; प्रपंच के अलावा जिसे विषय का नाम
उनतीसवाँ अध्याय ७९१
भी अच्छा नहीं लगता; परमार्थ की ओर उन्मुख होकर, वैराग्य के कारण जिसमें सद्भक्ति उत्पन्न हुई हो, भोजन के
समय अतिथि, पति और पुत्र जिसे एकसमान दिखायी देते हों, जिसके मन में धन का लोभ न हो, उसी को
परमार्थ का अधिकार है। जन्म-मरण से मुक्ति मिले यही जिसके मन की तिलमिलाहट हो और क्या मेरे संसार
का पाश तोड़ने वाला कोई धर्मदाता मिलेगा इस प्रकार जिसके मन में सद्गुरु प्राप्ति की लगन लगी हुई हो,
परमार्थ के लिये भक्तिभाव से जो अपनी काया, वाचा, मन, धन और जीवन को न्योछावर कर देती है, उद्धव!
इस प्रकार जो स्त्री निष्ठा से परमार्थ के प्रति उद्यत होती है, उसे उपदेश देने में कभी भी दोष नहीं लगेगा।
क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री अथवा शूद्र इनकी दृढ़ श्रद्धा देखकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से शिष्यों के दोष का निर्मूलन
होता है। ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने से यदि गुरु को ही दोष लगता हो तो शिष्य का उद्धार कौन करेगा ? यह बात
ही असंबद्ध है। उपदेश करते समय पात्र की शुद्धता परखने के लिये ही मैंने इन दोषों का उल्लेख किया था। इन्हें
जाँच कर उपदेश करने से दोष नहीं रहता। यह ज्ञान प्राप्त करने के बाद, संसार में जानने के लिये कुछ भी नहीं
रह जाता; संसार समाप्त हो जाता है और दोष की बात ही नहीं रह जाती।
नैतद् विज्ञाय जिज्ञासोर्ज्ञातव्यमवशिष्यते।
पीत्वा पीयूषममृतं पातव्यं नावशिष्यते ॥ ३२ ॥
इस ग्रन्थ का ज्ञान जान लेने के बाद मुमुक्षु अथवा साधकों को जानने लायक कुछ शेष नहीं रहता। जिस
प्रकार अमृतपान करने के बाद और कुछ प्राशन करने की आवश्यकता नहीं रह जाती, उसी प्रकार यह ज्ञान प्राप्त
करने के बाद ज्ञातव्य और ज्ञातापन समूल नष्ट हो जाता है। (आशंका) धर्मार्थ काम मोक्ष के कितने साधन हैं,
उनका पता नहीं है। ऐसा होते हुए आपने केवल एक ही कैसे बताया ? (उत्तर) उद्धव ! जो अनेक साधन बताये
हैं, उन्हें अभक्त लोग सहन करते हैं। किन्तु मेरे भक्तों के लिये एक मैं ही साधन हूँ।
ज्ञाने कर्मणि योगे च वार्तायां दण्डधारणे।
यावानर्थो नृणां तात तावांस्तेऽहं चतुर्विधः ॥ ३३ ॥
मोक्ष के लिये 'ज्ञान' यह साधन है; धर्म के लिये 'स्वधर्माचरण' साधन है; संन्यासी के लिये दण्डधारण
साधन है; और उपजीविका के लिये 'व्यापार' साधन है। इहलोक और पारलौकिक सुख के लिये 'योगयाग'
करते हैं। चारों पुरुषार्थों के लिये अभक्तों को ही ये साधन बताये गये हैं। इन साधनों के संकट सहने पर भी उन्हें
उसमें सहजता से सिद्धि नहीं प्राप्त होती। अनेक विकलता के दोष उभर आते हैं, फिर देवता भी विघ्न उपस्थित
कर उनका छल करते हैं। वैसा मेरे भक्तों के साथ नहीं होता। मेरा अनन्य भजन करने पर चारों पुरुषार्थ उसकी
ही शरण में आते हैं और देवतागण भी उसके पैर छूते हैं। उद्धव ! जो अनन्यभाव से मेरी शरण में आते हैं उनका
धर्म और अर्थ मैं ही हो जाता हूँ, उनका काम भी मैं ही होता हूँ और उनका सम्पूर्ण मोक्ष भी मैं ही होता हूँ।
उद्धव ! अभक्तों को पुण्य भोगों के क्षय से पुनरावृत्ति प्राप्त होती है और भक्तों को भोग भोगते हुए भी नित्यमुक्ति
रहती है। मेरी भक्ति की इतनी योग्यता है, यह जान लो। देव का यह भाषण सुनकर कर उद्धव का प्रेम उफन
उठा; उस प्रेम पर श्रीकृष्ण भी लुब्ध हुए और हर्षपूर्वक बोलने लगे। हे उद्धव ! साक्षात भगवान जो मैं हूँ, वही
तुम्हारे चारों पुरुषार्थ हैं। इस प्रकार आनन्द से बोलकर उन्होंने प्रेम से उसे आलिंगन दिया। इस प्रकार हर्ष से
आलिंगन देते ही कृष्ण अपना कृष्णपन भूल गये और उद्धव स्वानंद में निमग्न होकर अपना उद्धवपन भूल गया।
आलिंगन का चमत्कार ऐसा हुआ कि दोनों का दूजापन समाप्त हो गया और वे परिपूर्ण चैतन्यस्वरूप और
७९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वानंदघन बन गये। फिर हेतु दब गया, वेद मौन हो गये; और एक में एक मिलकर देव और भक्त एक हो गये।
तब धर्माधर्म का अस्त हो गया। क्रिया के साथ कर्म नष्ट हो गया और भ्रम और विभ्रम का नाम भी शेष नहीं
रहा। भेद अभेद को ले गया। बोध अपने साथ आत्मबोध को ले गया और आनन्द का आनन्द लजा गया। उद्धव
ऐसे स्वरूप में पहुँच गया। 'मैं परब्रह्म स्वरूप हो गया' यह भी मुख्य रूप से भ्रम ही रहता है। श्रीकृष्ण के
आलिंगन का यह विशेष गुण है कि उससे उद्धव निरुपम ब्रह्मस्वरूप हो गया। तदुपरान्त सर्वज्ञ श्रीकृष्ण ने उद्धव
का आलिंगन छुड़ा कर उसे ऐक्यज्ञान से ही उसके भक्त होने का ज्ञान कराया। तब उद्धव को बड़ा आश्चर्य
हुआ। क्षणभर के लिये वह तटस्थ खड़ा रहा। फिर बोला, यह आत्मस्वरूप स्वतः सिद्ध अपने पास होते हुए,
लोगों को मालूम नहीं होता, फिर वह साधकों के हाथ कैसे लगेगा? उद्धव के मन की बात जानकर उसका
निश्चित उपाय श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे।
तदाऽमृतत्वं प्रतिपद्यमानो मयाऽऽत्मभूयाय च कल्पते वै ॥ ३४॥
धर्म, अर्थ, काम-मोक्षप्राप्ति के जो साधन बताये गये हैं, उन सबको छोड़कर जो अनन्य भाव से, विश्वास
से और भक्ति से मेरी शरण में आते हैं, उन्हें हे उद्धव! तुमने अभी-अभी अनुभव की हुई स्वरूप स्थिति अर्थात्
आत्मप्रतीति प्राप्त होती है, यह निश्चित रूप से जान लो। धर्मार्थ कामवासना होते हुए भी मेरी भक्ति में लगने से
मैं उनकी वह वासना भी पूर्ण कर उन्हें सायुज्य पद तक पहुँचाता हूँ। भक्तों को यदि स्वधर्म कर्म में रुचि हो और
यदि वह उन कर्मों को मेरे भजन मार्ग में लगाता है, तो उस स्वधर्म में अकर्मता किस प्रकार होती है इसका मैं
अपने भक्तों को उपदेश करता हूँ। अथवा, यदि कोई भक्त सुखोपभोग की इच्छा करता है तो उस सुख का
उपभोग करते समय किस प्रकार निष्काम रहना चाहिये, इस ज्ञान का मर्म भी मैं आत्माराम उन्हें बताता हूँ। कोई
भक्त दरिद्र होने के कारण यदि विपुल धन माँगता है तो मैं उन्हें अपना षडगुणैश्वर्य ही अर्पण करता हूँ। भक्त
यदि सर्वभूतों में मेरी भक्ति रखता है और अनन्य प्रीति से मेरा भजन करता है तो चारों मुक्ति उसकी शरण में
आती हैं, क्योंकि मेरे भक्तों को मुक्ति स्वतः सिद्ध होती है। वैद्य यदि सचमुच ही धन्वंतरी, अर्थात् प्रवीण हो तो
वह रोगी की वासना पूर्ण कर, उसकी मनचाही चीज उसे खाने को देकर भी, अपनी रासायनिक कुशलता से उसे
बचा लेता है। उसी प्रकार भक्त की धर्म-अर्थ-काम ये वासनायें पूर्ण करके भी मैं उसे सायुज्य पद तक पहुँचाता
हूँ। उद्धव! नाना प्रकार के साधनों का अभिमान छोड़ जो मेरी शरण में आता है, उसे भी पूर्ण स्वरूप की प्राप्ति
होती है, यह निश्चित रूप से जान लो। भक्त मन में सकाम हो और वह यदि अनन्य भाव से मेरी भक्ति करे, तो
उसकी वह इच्छा पूर्ण कर मैं उसे मुक्ति प्रदान करता हूँ। भक्तों की अधोगति कभी नहीं होती। जिस प्रकार
बालक किसी हठ के कारण माँ के पैर पकड़ लेता है तो वह चाहे जितना पैसा खर्च करके भी उसे वह चीज ला
देती है। उसी प्रकार मेरी अनन्यभक्ति करते समय, भक्त मन में जो भी इच्छा करता है उसे पूर्ण कर मैं उसे मुक्ति
दिलाता हूँ किन्तु उसकी अधोगति नहीं होने देता। बच्चे का दुःख देखकर जिस प्रकार माँ छटपटाती है, उसी
प्रकार मेरे भक्त का दुःख मुझसे नहीं सहा जाता। उसकी भोगेच्छा पूर्ण कर उसे मुक्ति दिलाने की शक्ति क्या
मुझमें नहीं है? मैं श्रीपति भक्तों का रखवाला होने के कारण कभी उनकी अधोगति नहीं होने देता। मेरा नाम
अकस्मात भी यदि अंतकाल में मुख में आ जाय, तो जब रंक को भी सायुज्य प्राप्ति होती है तो मेरी अनन्यभक्ति
करने पर भक्तों की दुर्गति कैसे होगी? मेरा भक्त कृपादृष्टि से जिसकी ओर देखे, उसे भी मेरी भक्ति प्राप्त होती
उनतीसवाँ अध्याय ७९३
है। फिर मेरे भक्तों की अधोगति कैसे होगी? मैंने स्वयं गर्भवास भोग कर अंबरीष को मुक्त किया और
हिरण्यकश्यपु का विदारण कर प्रह्लाद का संरक्षण किया। मैंने हाथ में चक्र लेकर परीक्षित का गर्भ में संरक्षण
किया। मैं भक्तों की कल्पांत में भी अधोगति नहीं होने दूँगा। मेरे भक्त के नाम पर मैं तृण का भी उद्धार करता हूँ।
फिर जो जीवभाव से मेरा भजन करते हैं, उन भक्तों की अवनति कैसे होगी? काया, वाचा, मन तथा धन न
छिपाकर जो अनन्यभाव से मेरी शरण में आते हैं, उनके कुशलक्षेम का भार मैं श्रीकृष्ण स्वयं सहन करता हूँ।
ऐसी अनन्यभक्ति की महिमा का वर्णन करते समय श्रीकृष्ण को भी उल्हास प्राप्त हुआ जिससे उद्धव को भी प्रेम
का ज्वार आया, उसके सारे शरीर से पसीना चुहचुहाने लगा और उसके शरीर पर रोमांच उभर आये। भक्ति की
यह महिमा सुनकर तथा उद्धव का वह पूर्ण प्रेम देखकर शुक्राचार्य को भी आनन्द हुआ और वे आत्मानंद में
झूमने लगे। अत्यन्त हर्षपूर्वक उन्होंने परीक्षित से कहा, भक्त त्रिभुवन में धन्य हैं। उन्हें सर्वतोपरी मुक्ति होने की
बात श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने मुख से कही है। भक्ति की महिमा जिस प्रकार अगाध है, उसी प्रकार उद्धव का प्रेम
भी अगाध ही था। उद्धव के उस प्रेम का लक्षण श्रीशुक्राचार्य स्वयं ही बताते हैं।
श्रीशुकउवाच
स एवमादर्शितयोगमार्गस्तदोत्तमश्लोकवचो निशम्य।
बद्धाञ्जलिः प्रोत्युपरुद्धकण्ठो न किंचिदूचेऽश्रुपरिप्लुताक्षः॥ ३५॥
विष्टभ्य चित्तं प्रणयावधूर्णं धैर्येण राजन् बहुमन्य मानः।
कृताञ्जलिः प्राह यदुप्रवीरं शीर्ष्णा स्पृशंस्तच्चरणारविन्दम्॥ ३६॥
जो ज्ञाताओं का ज्ञाननिधि है, जो आत्मज्ञान का सागर है, जो आनन्द की क्षीराब्धि है, वह श्रीशुक आत्मानंद
से सन्तुष्ट होकर बोलने लगा। हे श्रवण सौभाग्य चक्रवर्ति परीक्षित राजा! बताता हूँ, सुनो। देव, दानव, मानव
जिसका वर्णन करते हैं और महासिद्ध भी जिसकी स्तुति करते हैं; जिसका वेद निरन्तर गायन करते हैं, योगी वृन्द
भी जिसकी कीर्ति की प्रशंसा करते हैं, उस श्रीकृष्ण ने परम प्रीति से भक्ति की निर्मल स्तुति की सचमुच अनन्य
भक्ति की अपेक्षा अन्य कोई सुख नहीं है। देवताओं को भी भक्ति ही सबसे श्रेष्ठ लगती है। भक्तियोग का समूल,
सप्रेम और शुद्ध योगमार्ग श्रीकृष्ण ने उद्धव को श्रीमुख से सम्पूर्ण बताया और उद्धव ने उसे ध्यानपूर्वक सुना।
भक्ति का वह निरूपण सुनकर उद्धव का मन द्रवित हो उठा, आँखें अश्रुओं से भींग गयी और स्वानंद की बाढ़
आ गयी। शरीर रोमांचित हो उठा, चित्त को हर्ष हुआ, गला भर आया और शरीर पर स्वेदबिन्दु चमकने लगे।
प्राण अपनी जगह स्थिर रह गया, शरीर थोड़ा काँपने लगा, आँखें अर्धोन्मीलित होने लगीं। औत्सुक के अत्यन्त
प्रेम से आत्मानंद में चित्तवृत्ति स्थिर हो जाने के कारण उद्धव का देह विलीन होने लगा लेकिन प्रारब्ध ने ही
उसकी रक्षा की। जिस प्रकार पानी में डूबती हुई नौका को डोर ही सँभाले रखती है, उसी प्रकार विलीन होने को
उद्यत उद्धव को प्रारब्ध ने ही रोक कर रखा। फिर उसने अत्यन्त धैर्यपूर्वक प्रेम के आवेग को रोका और उसे
कृतकृत्य होने का विश्वास हुआ। श्रीकृष्ण ने मेरा उद्धार किया यह बहुत बड़ा उपकार किया, अब किस तरह
उसकी पूर्ति की जाय? वह मन ही मन इस प्रकार का विचार करने लगा। गुरु को यदि चिन्तामणि दिया जाय तो
वह गुरु की चिन्ता ही बढ़ाता है। गुरु ने तो अचिंत्य वस्तु दी है, उसकी पूर्ति कभी नहीं होगी। गुरु को यदि
कल्पतरु दें तो वह कल्पना ही बढ़ाता है। गुरु ने तो निर्विकल्पता प्रदान की है अतः उसकी पूर्ति उससे भी नहीं
होगी। गुरु को पारस दें तो वह धातु को स्पर्श कर उसे सुवर्ण बनाता है; किन्तु गुरु के चरणस्पर्श से ब्रह्मस्वरूप
७९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्राप्त होता है, अतः पारस देने से भी उसकी पूर्ति नहीं हो पायेगी। गुरु को यदि कामधेनु लाकर दें तो वह धन
देकर कामना बढ़ाती है और गुरु तो निष्काम बुद्धि से निर्गुणदान देते हैं अतः उसकी पूर्ति के लिये कामधेनु भी
उपयुक्त नहीं है। त्रिभुवन की सारी उत्तम सम्पत्ति यदि गुरु को दें तो वह मायिक है। जिन्होंने अमायिक वस्तु दी
है उसकी पूर्ति किससे होगी? देह से यदि गुरु के उपकार की पूर्ति की जाय तो देह तो नश्वर है। नश्वर से
अनश्वर की पूर्ति तो नहीं हो पायेगी। जिसने बड़ी चाह से दाहिने हाथ का शंख दिया उसे फूटी कौड़ी देकर उस
उपकार की पूर्ति कर सन्तुष्ट हो उसी प्रकार यह देहभाव वाली बात है। यदि गुरु को प्राण देकर उनके उपकार
की पूर्ति करें तो वह तो मिथ्या है। जिसने सत्य ब्रह्म हमें दिया है उसे मिथ्या देते समय लज्जा नहीं आती ?
जिसने अमूल्य रत्न दिया है, उसे वंध्यापुत्र दें; उसी प्रकार जीवभाव मिथ्या होने के कारण उससे उपकार की पूर्ति
नहीं होगी। इस प्रकार काया, वाचा, मन, धन और प्राण अर्पण करने से भी गुरु के उपकार की पूर्ति नहीं होगी,
यह उद्धव ने अच्छी तरह जान लिया। जिसमें अणुमात्र का भी दुःख नहीं है ऐसा आत्मसुख जिसने दिया, उस
गुरु के उपकार की पूर्ति करने में शिष्य के पास कोई रास्ता नहीं है। इसलिये उद्धव ने साष्टांग दण्डवत किया
और श्रीकृष्ण के चरणों को पूरी तरह मस्तक पर धारण किया। देखो! पहले श्रीकृष्ण ने ही 'तुम्हारा शोक और
मोह समाप्त हो गया न' ऐसा प्रश्न उद्धव से किया था। इसलिये उद्धव को आश्चर्य हुआ था और उसे उत्तर देने
का होश ही नहीं रहा। इसलिये अब उसके चरणों का वन्दन कर, हाथ जोड़कर, उत्तर देने के लिये वह श्रीकृष्ण
के मुख की ओर देखने लगा। चन्द्रमा के किरण सेवन करने पर जिस प्रकार चकोर तृप्त हो कर ढकार देता है,
उसी प्रकार उद्धव भी श्रीकृष्ण सुख पर निर्भर होकर क्या उत्तर देगा, देखिये।
उद्धव उवाच
विद्रावितो मोहमहान्धकारो य आश्रितो मे तव संनिधानात्।
विभावसोः किं नु समीपगस्य शीतं तमो भीः प्रभवन्त्यजाद्य ॥ ३७॥
जो समस्त देवताओं में श्रेष्ठ, जो यादवों में अग्रगण्य, जो अविद्या रात्रि का सूर्य, जो ब्रह्मवेत्ताओं का
शिरोमणि है ऐसे श्रीकृष्ण को स्वानंद की स्फूर्ति से अपनी स्थिति का वर्णन करते समय उद्धव मुख्य रूप से
श्रीहरि की स्तुति करने लगा। उसने कहा, विचार करने से लगता है कि ब्रह्मदेव यह सबका आदिकर्त्ता है; लेकिन
वह भी वास्तव में 'अज' इस नाम से नारायण की नाभि से उत्पन्न हुआ। तो तुम कमलनाभि नारायण ही
मायासंबलित ब्रह्म हो। उस माया के आद्य कारण तुम हो; इसलिये आद्य स्वरूप तुम पर ही शोभित होता है।
अविद्या की महारात्रि में, मोहरूपी अन्धकार में भी फँसा हुआ था। उसमें से बाहर आने के लिये किसी दूसरे का
सामर्थ्य काम न आता। इसलिये तुम्हारे वचनरूपी सूर्य से शोकमोहरूपी अन्धकार को नष्ट कर अत्यन्त चमत्कार
से मुझे बाहर निकाला। तुम्हारे निकट अविद्या का ठौर ही नहीं है। श्रीकृष्ण! तुम्हारे रहते मोह ममता का क्या
प्रभाव होगा? घनघोर अँधेरी रात्रि में जो शीत से ठिठुर रहा हो उसे यदि आग मिल जाय तो जाड़ा और अन्धकार
दोनों तत्काल भाग जाते हैं। उस अग्नि को यदि सदा साथ में ही रखा जाय तो शीत और अँधेरे के भय की कभी
पीड़ा नहीं होगी। तुम्हारे सान्निध्य का यह फल है। इस प्रकार मोह ममता से माया 'लोगों को संसारपाश में बाँध
लेती है; लेकिन तुम्हारे पास आते ही वह अपने आप अदृश्य हो जाती है। जन्म-मरण के दुःख पहले भी अनेक
बार भोगे हैं; लेकिन जिसे तुम्हारा सान्निध्य प्राप्त होता है, उसे वह भय समूल मिथ्या लगता है। तुम्हारे सान्निध्य
से माया का समूल निर्दलन होता है। इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं कर रहा है।
उनतीसवाँ अध्याय ७९५
प्रत्यर्पितो मे भवतानुकम्पिना भृत्याय विज्ञानमयः प्रदीपः।
हित्वा कृतज्ञस्तव पादमूलं कोऽन्यत् समीयाच्छरणं त्वदीयम्॥ ३८ ॥
केवल तुम्हारा सान्निध्य ही अज्ञान का निघातक है, और यह बात सात्त्विक भक्तों को भली-भाँति मालूम
है। औरों की बात तो है ही लेकिन स्वयं मैंने भी अनुभव लिया है। अविद्या को समाप्त करने के लिये
सत्संगति ही समर्थ है। सत्संग में भी तुम्हारी संगत अत्यन्त पवित्र है। दीनों का उद्धार करने के लिये तुमने ही
यह आत्मज्ञान प्रकट किया है। मेरा बहाना बनाकर दीन जनों का उद्धार हो अज्ञान का विनाश हो, इसलिये
तुमने ज्ञानदीप पूरी तरह प्रज्वलित किया। उपदेश के लिये श्रद्धा उत्पन्न होना आवश्यक है। वही कसोरे में भरा
हुआ तेल है। विवेक वैराग्य धारण करना यह उसमें की बाती है। वहाँ ज्ञानधन चित्रभापूर्ण महाद्वीप प्रज्वलित
किया हुआ है। नैराश्य ही वैराग्यधारण है। उसमें ही ज्ञानदीप पूर्णरूप से प्रज्वलित होता है और आशा ही उस
दीप को बुझाना है। दीप बुझाने के बाद वहाँ चारों ओर अँधेरा छा जाता है। उस दीप को कर्णद्वार में रखा तो
उसका अंतर्बाह्य प्रकाश फैल गया। अज्ञान-अन्धकार नष्ट होकर वह दीपक स्वयं से प्रदीप्त हो गया। उस
अंतर्बाह्य सप्रकाश से तुम्हारा स्वरूप स्पष्ट दिखायी देने लगा। इस प्रकार हृषीकेश ने स्वयं ही अपना स्वरूप
मुझे अनायास अर्पण किया। तुमने अंतर्यामित्व से अपना स्वरूप मुझे पहले ही दिया था, किन्तु अपना भजन
प्रकट हो इसलिये तुमने उसे समेट लिया। तुम्हारे सच्चे भजन का लक्षण यह है कि सभी भूतों के प्रति
भगवद्भजन करें। इस प्रकार तुम सचमुच प्रसन्न होकर पहले अर्पण किया हुआ ज्ञान ही पुनः अर्पण करते हो।
आत्मभजन की वृद्धि कर मेरा ही ज्ञान मुझे अर्पण करते हो। इसे ही ज्ञानी लोग 'प्रत्यर्पण' कहते हैं। अपनी
भक्ति बढ़ाकर मेरा ही ज्ञान मुझे प्रदान किया जिससे माया और विकल्पवृत्ति मुझे स्पर्श भी नहीं करती। जो
स्वरूप स्थिति तुमने दी उसे कल्पांत में भी छिपाया नहीं जा सकता। इस प्रकार हे श्रीकृष्ण! तुमने सचमुच
बड़ी कृपा की। इस प्रकार तुम अत्यन्त कृपालु हो और अपने दासों के प्रति सदय हो। तुम्हें छोड़कर अनाड़ी
लोग दूसरों का भजन करने दौड़ते हैं। स्वामी श्रीकृष्ण को छोड़कर जो दूसरे के भजन में लगता है, उसे
हरिभजन पर विश्वास नहीं है, वह शुद्ध पशु ही नहीं, अपितु पशुओं में भी निरा गधा है। तुमने लोगों पर जो
उपकार किया है, अव्यंग इन्द्रिय देकर ज्ञान का अधिकार दिया है, यह उपकार जो मनुष्य भूल जायगा वह
सचमुच ही कृतघ्न है। जो कोई तुम्हारा उपकार जानता है, वह काया, वाचा, मन और धन देकर किसी अन्य
को नहीं भजता, इस बात का मुझे विश्वास हो गया। मेरे बहाने तुमने जो आत्मज्ञान प्रकट किया, उसके श्रवण
से, मनन से और कीर्तन से पूरे संसार का उद्धार होगा। इस प्रकार तुम पूर्ण कृपालु हो, इसीलिये मेरा
संसारबंधन तोड़ दिया, इसी अर्थ का निरूपण उद्धव स्वयं कर रहा है।
वृक्णश्च मे सुदृढः स्नेहपाशो दाशार्हवृष्ण्यन्धकसात्वतेषु।
प्रसारितः सृष्टिविवृद्धये त्वया स्वमायया ह्यात्मसुबोधहेतिना ॥ ३९ ॥
तुमने माया से लोग उत्पन्न किये हैं, सृष्टि को बढ़ाने के लिये स्त्री, पुत्र, सुहृद, सज्जन इनके प्रति स्नेह पूरी
तरह बढ़ा दिया है। मैंने यादवकुल में जन्म लिया। उसमें वृष्णि, अंधक, सात्वत आदि सारे भाई, आत्मीयता के
कारण मुझे प्रिय लगते थे। लेकिन मेरे बचपन में मैं खेलते समय जब मुझे तुम्हारा ध्यान लगा हुआ था, उसी
समय, इन भाईयों तथा स्त्रीपुत्रों के स्नेहपाश का बन्धन तुमने ही तोड़ डाला है। जिस प्रकार मदारी खेल
दिखलाने के पहले अपनी मोहिनी विद्या का असर फैलाता है, उस प्रभाव को दूर करने की सामर्थ्य केवल उस
७९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मदारी में ही होता है, उसी प्रकार तुम्हारी यह माया तुम्हारे ही वश में रहती है, उसके स्नेहपाश भयंकर हैं, उसने
लोगों को बद्ध करके रखा है। तुमने मेरे वे पाश पहले ही तोड़ दिये हैं। जब मेरी बाल्यावस्था थी, तभी तुमने मुझ
पर कृपा की थी। संसार बन्धन काटने वाला शस्त्र तुमने धार तेज कर मेरे हाथ में दिया है। अब इस शस्त्र के बल
पर मैं संसार का बन्धन भी तोड़ सकूँ, इतनी तुमने दयालु होकर मुझ पर कृपा की है। संसार जो दुःखरूप था वह
मेरे लिये सुखरूप हो गया। इस प्रकार तुमने कृपा का वरदहस्त रखकर मेरा सचमुच उद्धार किया। इससे मैं
कृतकृत्य हो गया हूँ, लेकिन अब मैं तुमसे कुछ माँगने वाला हूँ, उसे देने की श्रीकृष्ण कृपा करें। इतना कह कर
वह श्रीकृष्ण के चरणों में गिर गया।
नमोऽस्तु ते महायोगिन् प्रपन्नमनुशाधि माम्।
यथात्वच्चरणाम्भोजे रतिः स्यादनपायिनी ॥४०॥
जो घटना सम्भव नहीं होता, उसे सम्भव कर देते हो, अलौकिक चमत्कार दिखाते हो, चैतन्य और जड़
देह का विवाह कराकर माया से उनका उत्तम संसार बसा देते हो। जो योगियों के लिये भी कठिन है, जिसने
ब्रह्मदेव और शंकर को भी छला, वह माया तुम्हारी दासी है। तुम परात्पर महायोगी हो। तुम्हारी उस कृपा के
कारण ही मैं आज कृतकृत्य हुआ। संसार भय आदि दुःखों का भान ही न रहकर मैं सर्वदा स्वानंद में ही निमग्न
रहता हूँ। दृश्य, द्रष्टा, दर्शन यह त्रिपुटी भी नहीं है और त्रिगुण में नहीं हैं; आत्मबोध से पूर्णानंद प्राप्त होने के
कारण 'मैं' 'तू'पन के भाव का विलय हो गया। आत्मज्ञान के कारण स्वानंद पूर्ण हो गया यह कहना भी मायिक
है क्योंकि, परादि चारों वाणियाँ मूक हो गयीं, इसीलिये वेदवाद मौन हो गये। कार्य, कारण और कर्त्तव्यता मेरे
लिये नहीं रह गये। फिर भी हे श्रीकृष्णनाथ! मैं अब तुमसे कुछ तो माँगूँगा। माँ जिस प्रकार बालक का हठ
आत्मीयता से सुनती है, उसी प्रकार मेरी माँग भी तुम सुन लो। यह मेरी अन्तिम माँग है। भगवान इसे ध्यान
देकर सुनें, यह कह कर उसने श्रीकृष्ण के चरणों का वन्दन कर विचित्र-सी माँग प्रस्तुत की। मुझे भ्रम था कि
जीवन्मुक्ति बड़ी मधुर पीड़ा होगी, लेकिन उसमें मुझे तुम्हारी भक्ति नहीं दिखायी देती। इसलिये वह शुष्क मुक्ति
मुझे नहीं चाहिये। इसलिये मैं पुनः तुम्हारी शरण में आया हूँ। सद्गुरु के वचन से शिष्य को तत्काल मुक्ति
मिलती है, लेकिन जिसमें सद्गुरु की भक्ति नहीं है, उस मुक्ति को आग लगे। मुझे वह नहीं चाहिये। इसलिये मैं
पुनः तुम्हारी शरण में आया हूँ; मुझे तुम अपना गुरु भजन दो। पहले अनेकों ने भक्ति की, उन्हें मैंने मुक्ति ही दी,
लेकिन उनमें से किसी ने मुक्ति के बाद भक्ति नहीं माँगी ऐसा यदि कहोगे तो पहले जिन्होंने तुम्हारी भक्ति की
थी उन्हें तुमने मुक्ति देकर फँसाया लेकिन तुम्हारी यह चातुरी मेरे साथ नहीं चलेगी। क्योंकि जिनकी वृत्ति
अहंकारशून्य होकर जो सहज ही आत्मारामस्वरूप हो गये, वे भी तुम्हारी निष्काम भक्ति करते हैं। तुम्हारे स्वरूप
का यही धर्म है। अतः तुम्हारी गुरुभक्ति के बजाय मुक्ति माँगना यह केवल भ्रम है। तुम्हारी वह मुक्ति मुझे नहीं
चाहिये। मुझे गुरुभक्ति ही दो। जब स्वयं ही मुक्ति प्राप्त हो गयी, उसे अब भक्ति नहीं दी जा सकती, ऐसा यदि
तुम कहोगे तो ऐसी बातें मुझे न समझाओ। तुम्हारा सामर्थ्य मैं अच्छी तरह जानता हूँ। जो कभी हो नहीं सकता,
उसे तुम सम्भव कर देते हो; जो हिल नहीं सकता उसे हिला देते हो; जो किसी से नहीं हो सकता वह तुम कर
देते हो, तुम्हारे सामर्थ्य का अन्त नहीं है। हे श्रीराम! सेतु बाँधने के लिये तुमने डूबते हुए पत्थरों को तैरा दिया
और उसके ऊपर से वानर सेना को ले गये। जंगल में रहने वाले और पेड़ के पत्ते खाने वाले वे वानर उनकी
दासी चारों मुक्त हो गये और बड़े-बड़े देवता भी उन्हें नमन करने लगे। जो व्यभिचारिणी तथा गोबर में खेलने
उनतीसवाँ अध्याय ७९७
वाली ग्वालिनें थीं उनके पैरों पर मोक्ष आ लगा और उनकी चरण रज को ब्रह्मदेव ने भी दण्डवत किया। तुम
परमात्मा परमेश्वर हो, यह बात उन ग्वालिनों को तथा वानरों को नहीं मालूम थी। फिर भी तुम्हारी भक्ति ही
उन्हें सचमुच परब्रह्मस्वरूप के कारण मालूम हुई। इस प्रकार तुम्हारा भजन अगाध है, उसकी महिमा भी समझ
से बाहर है; तुम्हारा देवत्व यदि भक्ति के ही अधीन है, तो फिर मोक्ष में अधिक क्या है? भक्ति से ही मुक्ति का
जन्म हुआ, भक्ति के कारण ही वह बढ़ी; वही मुक्ति यदि भक्ति के विनाश का कारण बनती है तो ऐसी
मातृघातक मुक्ति को मैं स्पर्श भी नहीं करूँगा। जिससे मुक्ति पर आया हुआ दोष दूर होकर वह अत्यन्त पवित्र
होगी, ऐसी एक गुप्त बात मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रीकृष्ण ! उसे कृपया ध्यानपूर्वक सुनें। वह गुप्त बात यही है कि
मोक्ष प्राप्त होते हुए भी आप मुझे अपना गुरुभजन भी दें, उससे मुक्ति भी पावन होगी। इतना कहकर उसने
श्रीकृष्ण को साष्टांग दण्डवत किया। उद्धव ने श्रीकृष्ण के चरण अपने मस्तक पर रखे, वह उसे छोड़ ही नहीं
रहा था। इससे श्रीकृष्ण आश्चर्यचकित हो गया और उसे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उद्धव ने कहा, मैं मुक्त हो गया
यह जानकर भी मैं तुम्हारा भजन नहीं छोड़ूँगा। मुझ पर ऐसी ही कृपा करो। पूर्ण मुक्तता प्राप्त होने के बाद मुझे
सद्गुरु भजन का लाभ नहीं मिलेगा, लेकिन मुझे इस विघ्न की बाधा न हो ऐसी भक्ति मुझे बतायें। तुम कहोगे
कि कोटि-कोटि जन्म लेने पर भी जब मुक्ति नहीं मिल पाती, उस मुक्ति को ही तुम विघ्न कहते हो ? तुम पक्के
मूर्ख हो। लेकिन जिसके कारण तुम्हारा भजन छूट रहा हो, उसे मैं बहुत बड़ा विघ्न समझता हूँ। हे श्रीकृष्ण !
तुम्हारी भक्ति के बिना मिली हुई मुक्ति मुझे स्वादहीन लगती है। हे श्रीकृष्ण ! ऐसी कृपा करो कि मेरी
नित्यमुक्तता भी न टूटे और अहेतुक भक्तिमार्ग भी चलता रहे। इसमें जरा भी संकोच न करो। तुम कहोगे, मैंने
तुम्हें नित्य मुक्ति दी; लेकिन मुक्ति तो मेरे पास तैयार ही थी। वह तुमने मुझे दी यह कहना व्यर्थ है। दातृत्व का
यह व्यर्थ का ही अहंकार है। अब मैं आपसे भक्ति माँग रहा हूँ, उसे आप दें तभी आप सच्चे दाता हैं, इसी को
मैं आपकी उदारता कहूँगा। लेकिन प्रसन्न होकर मुझे भक्ति दिलाने में आपको उत्साह नहीं दिखायी देता। कृष्ण !
आप मेरे प्रति अत्यन्त कंजूस हो गये हैं। सद्गुरु भक्ति को नष्ट करने वाली जीवन्मुक्ति हमें बिलकुल नहीं
चाहिये। उसे मुक्ति कहना यह भी भ्रांति है। हे श्रीकृष्ण ! जब बद्धता ही नहीं है, तो फिर मुक्ति कहाँ से आयी ?
अतः ऐसी मिथ्या मुक्ति को मैं स्पर्श भी नहीं करूँगा। मेरी गुरुभक्ति ही मुझे दे दो। पहले तुमने जिन्हें मुक्ति
दिलायी थी, उन्हें भी तुमने ऐसा ही ठगा था। मुझे इस प्रकार की झूठी आशा मत दिलाओ। मोक्ष से ऊपर जो
भक्ति है वही मुझे दीजिये। यह कह कर उसने साष्टांग दण्डवत किया और उसके दोनों चरण पकड़ लिये। तब
श्रीकृष्ण के प्रेम को भी ज्वार आ गया और वह उद्धव पर अत्यन्त प्रसन्न हो उठा। मोक्ष से भी श्रेष्ठ जो
गुरुभक्ति, वही उद्धव ने अनेक युक्तियों से माँगी और उस समय उसने जो भाषण किया उससे श्रीकृष्ण अत्यन्त
सन्तुष्ट हुआ। प्रेमसुख में वह झूमने लगा। उसी सुखमय स्थिति में उसने भक्ति और मुक्ति दोनों ही उद्धव को
अर्पण की। संसार में उद्धव ही पुण्य शुद्ध है; संसार में उद्धव ही सबसे धन्य है क्योंकि श्रीकृष्ण ने उसे मोक्ष से
भी श्रेष्ठ गुरुभजन अर्पित किया। गुरु और ब्रह्म दोनों एक ही हैं, यह भी पूरी तरह सद्गुरु ही सिखाते हैं।
इसलिये मोक्ष से भी श्रेष्ठ जो गुरुभजन है, उसका सच्छिष्य को दोष नहीं लगता। पहले श्रीकृष्ण ने सन्तुष्ट
होकर अपने भक्तों को उन्होंने माँगी हुई मुक्ति दी थी। लेकिन उन्हें इस भक्ति का आकलन ही नहीं हुआ।
लेकिन उद्धव ने उन सब पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की। मुक्ति के मस्तक पर भक्ति को बिठाया और दुर्गम स्थिति
माँगी जो श्रीकृष्ण ने उसे दी। उद्धव ! मुक्ति से भी श्रेष्ठ जो भक्ति है, वही मेरे अवतारों की अवतारशक्ति है।
उसी के योग से मैं श्रीपति उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कर अन्त में अलिप्त ही रहता हूँ और सचमुच इसी के
सामर्थ्य से मैं कर्म करके भी अकर्ता और भोग करके भी अभोक्ता बना रहता हूँ। यह योग जिसकी समझ में
नहीं आता उसे यह संसार दुःखस्वरूप हो जाता है; लेकिन मेरे पास यह योग अखण्ड होने के कारण मैं संसार
में रहते हुए भी सुखस्वरूप ही हूँ। यह योग शंकर जानता है और मैं जानता हूँ। वह योग दुर्गम होने के कारण
दूसरों की समझ में नहीं आता। यह गुप्त बात श्रीकृष्ण ने बतायी और वह उद्धव के मन में बैठ गयी। आत्मज्ञान
से दोनों में एकरूपता हो गयी और उसे भजन की महत्ता मालूम हो गयी। मुक्ति का आधार भक्ति है, यह बात
उद्धव की समझ में अच्छी तरह आ गयी। इससे उसे जो आनन्द हुआ वह उसके हृदय में नहीं समा रहा था।
वह स्वानंद से भर गया। बालक के हठ के कारण जिस प्रकार माँ उसे अपने आभूषण पहनाती है, उसी प्रकार
श्रीकृष्ण ने उद्धव को अपनी अवतार स्थिति अर्पण की। न मन ने सुना, न बुद्धि ने देखा और भगवान ने आकाश
से भी चुरा कर भगवान ने अपना स्वरूप उद्धव को अर्पण किया। जो ब्रह्मवेत्ता को भी नहीं दिखायी देता,
जिसका आकलन वेदों को भी नहीं होता, वह स्थिति श्रीकृष्ण ने कृपा के बल से उद्धव को दी। देखो! पहले
जब श्रीकृष्ण ने पूछा था, उस समय 'मेरा उद्धार हो गया' ऐसा उद्धव ने कहा था और अब उसने भजनभाव
माँगा। इसका गूढ़ अर्थ भगवान ही जानें। मुक्ति से ऊपर की भक्ति माँगने के कारण, श्रीकृष्ण की अवतारशक्ति
अर्थात् माया नियंत्रण की पूर्णस्थिति उद्धव के हाथ में सहज ही आ गयी। माया का मिथ्यत्व पूरी तरह जान कर
ही उसकी प्रेरणा और आवरण यह जो 'मायानियंत्रण' का लक्षण है वही श्रीकृष्ण ने स्वयं दिया। शतरंज के
खेल में जिस प्रकार किसी तरह का पूर्वकर्म न होने पर भी राजा, प्रधान, हाथी, घोड़े, प्यादा ये सब मारामारी पर
उतर आते हैं, जबकि सबमें लकड़ी एक ही होती है। दोनों ओर की सेनाओं में लकड़ी एक ही होती है, फिर
कौन किसका शत्रु है ? लेकिन सचमुच बैर न होते हुए भी युद्ध में निर्जीव में ही मारामारी होती है। हाथी, घोड़ा,
प्रधान मरा ऐसा कहा जाता है, लेकिन क्या इसमें किसी का प्राण जाता है ? अथवा जो प्यादा है, वह प्रधान बन
जाता है, तो क्या उसे अकूत सम्पत्ति प्राप्त हो जाती है ? सचमुच, प्राण न होते हुए भी मारने की बात करते हैं
और चिल्लाते है। एक की जय और दूसरे की पराजय होती है। लेकिन उन गोटियों को इसका कोई ज्ञान नहीं
होता। गोटियाँ मर जाती हैं तो उनमें से कौन धर्मात्मा वैकुण्ठ जाता है और कौन नरक भोगता है ? उसी प्रकार
बन्धन और मोक्ष की बातें समूल मिथ्या हैं। सारांश, शतरंज की ही तरह जिसका संसार में ध्यान रहता है वही
अवतारों का अवतार है और वही सचमुच भगवान है। वेदोक्ति भी मिथ्या ही है, बन्धन और मुक्ति भी मिथ्या ही
हैं, यह जानते हुए भी वह वेद विहित धर्म के अनुसार चलता है, यही मुक्ति से भी श्रेष्ठ भक्ति है। संसार से
मुक्त होकर अनेक नित्यमुक्त हुए हैं; उनके लिये यह भक्ति असाध्य है। उन्हें इस अगम्य स्थिति की कल्पना भी
नहीं होगी। उद्धव ! जिसके पास मेरी ऐसी स्थिति होगी, वही मोक्ष से श्रेष्ठ वाली भक्ति करेगा। औरों के लिये
वह सोच से परे है। इस प्रकार उद्धव को अगाध गति प्राप्त हुई। उसे लोकोपकार की दृष्टि से ब्रह्मशाप से बचाने
के लिये श्रीकृष्ण ने स्वयं उपाय ढूँढ़ा। नारद के पास ब्रह्मज्ञान था, फिर भी उसे ब्रह्मशाप का बन्धन था, उस
शाप के कारण वह भ्रमण करता रहता था। एक स्थान पर वह कहीं रहता ही नहीं था। ब्रह्मज्ञान होने पर भी
ब्रह्मशाप का भयानक भय नहीं चूकता। यह जानकर ही श्रीकृष्ण ने ब्रह्मज्ञान का उपदेश देकर उद्धव को दूर
हटाया। उद्धव का जन्म यादव वंश में हुआ था और यादव ब्रह्मशाप से मरने वाले थे। उससे उद्धव को बचाने के
लिये उन्होंने उसे बदरिकाश्रम में भेजा। उद्धव को जो ज्ञान प्राप्त हुआ था, उससे बदरिकाश्रम पवित्र था, ऐसी
बात नहीं थी किन्तु ब्रह्मशाप के भय से ही उसे श्रीकृष्ण ने दूर भगाया। उद्धव सरीखा मूल्यवान रत्न, जिसे पूर्ण
स्थिति मालूम थी, उसे बचाने के लिये श्रीकृष्ण ने स्वयं ही बदरिकाश्रम भेजा।
उनतीसवाँ अध्याय ७९९
श्रीभगवानुवाच
गच्छोद्धव मयाऽऽदिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम्।
तव मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनैः शुचिः॥४१॥
न बुद्धि भेदं जनयेत् अज्ञानांलोक संग्रहम्।
जोषयेत सर्व कर्माणि विद्वान्युक्त समाचरन्॥
श्रीकृष्ण गम्भीर वाणी में बोले, उद्धव! तुम्हें अब ब्रह्मज्ञान हो गया और तुम्हारा स्नेहपाश बन्धन भी टूट
गया, अब तुम मेरी आज्ञा से बदरिकाश्रम जाओ। उस बदरिकाश्रम की महिमा लोकसंग्रह तथा जड़-मूढ़ जनों के
उद्धार के लिये श्रीकृष्ण अपने मुख से बताते हैं। वह बदरिकाश्रम मेरा स्थान है। वहाँ मैं नित्य अनुष्ठान करता
हूँ। उस स्थान का दूर से दर्शन करने पर भी कलिकल्मष का नाश होता है। उस पर्वत के स्पर्शमात्र से मनुष्य
पवित्र हो जाता है, उस बद्री के नामस्मरण से भी बड़े-बड़े दोषों का विलय हो जाता है। वहाँ भी मेरे चरणों का
तीर्थ 'अलकनंदा' नामक नदी के नाम से प्रवाहित हो रहा है। उसके स्पर्शमात्र से लोग पवित्र हो जाते हैं। वहाँ
श्रद्धापूर्वक स्नान करने से संसार बंधन नहीं रहता और जो उसका आचमन करता है उसका पितरों के साथ उद्धार
हो जाता है। ऐसा मेरा बदरिकाश्रम है। वह अत्यन्त पवित्र है। उद्धव! अब शायद तुम यह कहोगे कि आपने यह
स्थान कब बनाया ? तो उसका भी वर्णन सुनो। मैंने रजोगुण वाले लोग उत्पन्न किये। वे सुखविलास में निमग्न हो
गये। वे भोगासक्ति में डूब गये। तब मैंने दो रूपों में अवतार लिया। रवि और चन्द्र जिस प्रकार अन्धकार का पूर्ण
विनाश करते हैं, उसी प्रकार मैं भी नर-नारायण बना और बदरिकाश्रम में नित्य उदित होने लगा। वहाँ मैंने भक्ति,
वैराग्य तथा ज्ञान का स्वयं आचरण कर प्रकाशन किया। ऐसा वह बदरिकाश्रम मेरा स्थान है तथा वहाँ मैं अभी
भी भक्ति, ज्ञान, वैराग्य का अनुष्ठान करता रहता हूँ। नरनारायण के रूप में जिस पर्वत पर मैंने अवतार लिया,
वहाँ तोड़े हुए बैर के समान मेरी भक्ति फलती-फूलती रहती है। इसीलिये मैंने उसका नाम बदरिकाश्रम रखा है।
यहाँ संसार का सारा भ्रम समाप्त हो जाता है, इतना वह पवित्र है। इसलिये तुम अब बदरिकाश्रम जाओ। लेकिन
उद्धव! तुम्हारे मन में यह विचार आयेगा कि अब तीर्थ जाने की क्या आवश्यकता है ? तुमने मोक्ष से भी श्रेष्ठ
भक्ति दी, जिससे मैं अत्यन्त कृतकृत्य हो गया हूँ, अब तीर्थ जाने की मुझे जरा भी इच्छा नहीं है। लेकिन मेरी
आज्ञा है कि तुम वहाँ अवश्य जाओ। इतना सुनते ही उद्धव ने मौन धारण कर श्रीकृष्ण की आज्ञा का वंदन
किया। सद्भाव से वन्दन कर बदरिकाश्रम का दर्शन करने से वह नर का नारायण हो जाता है, इतनी उस स्थान
की महिमा है। उद्धव! तुझमें पूर्ण ज्ञान है, इसके साथ ही तुम मेरा भजन करते हो; इससे तुम्हारे चरण-स्पर्श से
वह बदरिकाश्रम भी पवित्र हो जायेगा। श्रीकृष्ण का यह भाषण सुनकर उद्धव को रुलाई आ गयी; उसने दौड़कर
श्रीकृष्ण चरणों का वन्दन किया और वहाँ जाने का आश्वासन दिया। ब्रह्मशाप से होने वाले नाश से बचाने के
लिये श्रीकृष्ण ने उसे पूर्ण उपदेश कर बदरिकाश्रम जाने को बाध्य किया। उद्धव ज्ञानियों में रत्न था, ब्रह्मशाप से
बचने के लिये उद्धव को बदरिकाश्रम भेजा। अन्यथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के बाद कृष्ण किसी को तीर्थाटन करने
के लिये नहीं कहेंगे। उद्धव का भवबन्धन बचपन में ही समाप्त हो गया था। श्रीकृष्ण ने जानबूझ कर उसे
बदरिकाश्रम भेजा और कहा कि इससे बहुत बड़ा लोकोपकार होगा। तुम्हारे धर्म से समस्त अज्ञानियों का उद्धार
होगा। अब तुम पूछो कि उस तीर्थ में जाने के बाद वहाँ किस तरह रहा जाय ? तो उस सम्बन्ध में लोककल्याण
के लिये तुम्हें निर्णय बताता हूँ। उद्धव! तुम्हारा आचरण ही जनता को उपदेश मालूम होगा। इसलिये वैराग्य,
८०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
भक्ति, ज्ञान और स्वधर्माचरण का त्याग न करो। उद्धव! मुझे ही देखो न। इस त्रिभुवन में मेरा कोई कार्य नहीं है।
लेकिन लोगों को मार्ग दिखाने के लिये मैं स्वधर्माचरण के अनुसार व्यवहार करता हूँ। इस पर तुम कहोगे कि पूरे
त्रैलोक्य की जिम्मेदारी तुम्हारी है इसलिये लोगों को व्यवहार सिखाने के लिये आप स्वधर्म पर चलते हैं। लेकिन
मैं अब निजधाम जा रहा हूँ इसलिये मेरी परिपूर्ण स्थिति तुम्हें अर्पण कर दी, इसलिये अब लोकसंग्रह के लिये
तुम पूरी तरह विरक्त होकर रहो। अभेद भक्ति, वैराग्य, ज्ञान का स्वयं आचरण कर, अन्य लोगों से वैसा ही
आचरण कराने का ही नाम है, लोकसंग्रह। उद्धव! मेरे ज्ञान की प्राप्ति होने के कारण तुम त्रिभुवन में भी वन्दनीय
हो गये हो। इसलिये तुम जैसा आचरण करोगे, उसी के अनुसार लोग व्यवहार करेंगे। अब तुम्हारे ही बहाने
लोकसंग्रह के लिये साढ़े-तीन श्लोकों का निरूपण करता हूँ। उसी के अनुसार तुम व्यवहार करो। तुम
बदरिकाश्रम जाओगे तो वहाँ अनेक तीर्थ दिखायी देंगे लेकिन उनमें अलकनंदा ही प्रमुख है। वह गंगा ही है;
उसके दर्शन मात्र से सभी दोषों का परिहार होता है।
ईक्ष्यालकनन्दाया विधूताशेषकल्मषः।
वसानो वल्कलान्यङ्ग वन्यभुक्सुखनिःस्पृहः ॥ ४२ ॥
उस अलकनंदा का स्नान कर शास्त्रोक्त पद्धति से तीर्थविधान करें और फिर वहाँ रहें। अब, कैसे रहा जाय
उसके सम्बन्ध में सुनो। वस्त्रों का त्याग कर वल्कल पहनें। वन के फलों का भक्षण कर उद्वेगरहित वृत्ति से रहें।
लोगों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने के लिये पूरी तरह निःस्पृहता का व्यवहार करें और निजसुख से वहाँ रहते
हुए शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों के प्रति सहिष्णुता दिखायें।
तितिक्षुर्द्वन्द्वमात्राणां सुशीलः संयतेन्द्रियः।
शान्तः समाहितधिया ज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥ ४३ ॥
तुम ज्ञानविज्ञान सम्पन्न हो, अतः तुम्हें द्वंद्वों की बाधा होना सम्भव नहीं है। लेकिन लोकहित की दृष्टि से
शीतोष्णादि द्वंद्वों की सहनशीलता अवश्य दिखायें। तुम्हें विषय की आसक्ति नहीं है। फिर भी इन्द्रिय और विषय
का नियंत्रण करें। अपनी सुशीलता प्रकट कर आत्मशान्ति का प्रदर्शन करें। आत्मबुद्धि का समाधान कैसा होता है
उसे सहज ढंग से प्रकट करें और मुझसे जो ज्ञान तुमने प्राप्त किया है, उसका अनुभव लोगों को दिखायें।
मत्तोऽनुशिक्षितं यत्ते विविक्तमनुभावयन्।
मय्यावेशितवाक्चित्तो मद्धर्मनिरतो भव॥
यदि तुम इस प्रकार रहोगे तो अनेक लोग तुम्हारी शरण में आयेंगे क्योंकि मेरा ज्ञान तुम्हें प्राप्त होने की बात
सबको ज्ञात है। हम ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर केवल अपना उद्धार कर लें और दीनजनों का उद्धार न करें तो उसमें ज्ञाता
की कमी दिखायी देती है। कुछ लोग ब्रह्मज्ञान का सम्पादन कर, शिष्य को भी उसका उपदेश करते हैं, किन्तु वह
उन्हें ठीक तरह बोध नहीं करा पाते; उनकी वह निष्ठा हीन और निर्वीर्य है। ठीक से बोध न होने के कारण शिष्य
छटपटाता रहता है और गुरु अपने गुरुत्व के कारण बड़बड़ाता रहता है। घर में ही इतनी बड़ी त्रुटि। उपदेश का
यह प्रकार अबद्ध है। दूसरे के अंतःकरण में बोध का प्रकाश फैलाना सरल कार्य नहीं है। उद्धव! सचमुच इसी का
नाम है ब्रह्मज्ञान की पूर्ण प्राप्ति। स्वयं तरकर दूसरे को तारना यही ज्ञान की महानता है। मैंने वह तुम्हें सौंपी है।
इसलिये मेरे कहने के अनुसार ठीक तरह से व्यवहार कर लोगों का उद्धार करते रहो। शिष्यरूपी उत्तम खेत में
उनतीसवाँ अध्याय ८०१
जिसके ब्रह्मज्ञान की फसल नहीं फलती, उसका वह ज्ञान पूरा नहीं है। जिस प्रकार पके हुए फलों के वृक्ष के पास
पक्षी अपने आप एकत्र होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मस्थिति अपने पूर्णत्व पर पहुँचती है उस समय शिष्यों का वहाँ
जमघट होने लगता है। शब्दों से ब्रह्मज्ञान का उपदेश करते हैं लेकिन यदि वह मन को रुचता नहीं है तो वह
ब्रह्मज्ञान निर्वीर्य है। उद्धव ! जानते हो, ऐसा क्यों होता है ? ब्रह्मज्ञान का अनुभव होते ही उससे देह में ज्ञातव्य का
बोध होता है और उससे ज्ञानाभिमान उत्पन्न होता है। इससे ज्ञान का सामर्थ्य कम हो जाता है। ज्ञाता जितना
निरहंकारी होगा, उतना ही ज्ञान का सामर्थ्य बढ़ता है। उसकी कृपा होते ही सच्छिष्य को तत्काल बोध होता है।
उद्धव ! तुम्हें मेरा ज्ञान प्राप्त हुआ है, उसका शिष्यों को उपदेश करो ताकि वे तुम्हारा सम्मान करें। फिर भी तुम
ज्ञानाभिमान न करो। शिष्य जो सम्मान दे रहे हैं, उसे न लेने से अपरिपक्वता दिखायी देती है और लेने से
ज्ञानाभिमान बढ़ता है। यह भी ज्ञाता का विघ्न ही है। इसलिये शिष्य जो सम्मान दे रहे हैं उसे बिना झिझक के
लेना चाहिये लेकिन ज्ञानाभिमान नहीं करना चाहिये। यही ज्ञाता का मुख्य लक्षण है। तुम्हें मेरा पूर्ण ज्ञान प्राप्त
हुआ है अतः एकान्त हो या लौकिक में हो, तुम निरभिमान स्थिति में ही रहो। सदा स्वानंदस्फूर्ति रहने दो। इस
निरभिमान स्थिति का उपदेश शिष्यों को भी करो क्योंकि निरभिमान होने जैसी स्थिति से उत्कृष्ट स्थिति त्रिभुवन
में और कोई नहीं है। इस उपदेश का लक्षण है, वाणी में मेरे नाम का कीर्तन, शरीर से मेरा नित्य भजन और मन
को सदा मेरे स्वरूप में निमग्न रखना। ज्ञानी कहने से अभिमान नहीं होना चाहिये और मूर्ख कहने से क्रुद्ध नहीं
होना चाहिये। स्वयं उद्वेगरहित अवस्था में रहना चाहिये। यही ज्ञाता की उत्तम स्थिति है। इस प्रकार नित्य
अभिमानरहित रहकर, भक्तियुक्त वैराग्य तथा ज्ञान का स्वयं आचरण कर सच्छिष्यों को वैसा ही उपदेश करते
रहना चाहिये। जो शिष्य तुम्हारी शरण में आयें उन्हें नीच न समझो। शिष्य को भी पूज्य समझना गुरुत्व की पूर्णता
का लक्षण है। जिस प्रकार सद्गुरु को समस्त प्राणिमात्र में निरन्तर ब्रह्म के ही दर्शन होते हैं, यदि उनमें शिष्य
भिन्न-भिन्न दिखायी देने लगें तो क्या उनकी ब्रह्मस्थिति भाग गयी ? इसलिये शिष्य अपने से क्षुद्र है ऐसा कभी
नहीं समझना चाहिये। शिष्य भी पूर्ण ब्रह्मरूप है ऐसा मानना चाहिये, यही गुरु का प्रमुख लक्षण है। जिस प्रकार
माँ को अपने नन्हे बालक से दुलार रहता है, उसी प्रकार गुरु को शिष्य के सच्चे हित का ख्याल रहना चाहिये।
इसी को शुद्ध 'सद्गुरुत्व' कहते हैं। शिष्य के लक्षण के बारे में पहले ही बताया जा चुका है। वैसा अधिकारी
शिष्य जहाँ भी दिखायी पड़े, उसे सचमुच उपदेश करो। तुम्हें अब तक जो कुछ पढ़ाया, वह सब शिष्योपदेश के
ही लिये था, ऐसा समझ लो। वास्तव में तुम तो मूलतयः गुणातीत हो इसलिये यह तुम पर लागू नहीं होता।
अतिव्रज्य गीतस्तिस्रो मामेष्यसि ततः परम्॥ ४४॥
इस प्रकार ज्ञान का उपदेश करोगे तो तुम्हारी गुणातीतता तो भंग नहीं होगी; बल्कि तुम जिसे उपदेश करोगे
वह भी त्रिगुणावस्था पर विजय प्राप्त करेगा। पहले बताये हुए उपदेश के अनुसार जो शिष्य सदा व्यवहार करेंगे,
वे भी गुरुकृपा से त्रिगुण की जो तीन वृत्तियाँ हैं उन्हें पार कर जायेंगे। तीन गुणों के तीन प्रकार हैं। दृश्य, द्रष्टा
और दर्शन; जागृति, सुषुप्ति और स्वप्न; ज्ञेय, ज्ञाता और ज्ञान। कार्य, कारण और कर्त्ता; भोज्य, भोजन और भोक्ता;
शत्रु, मित्र और उदासीन; ये तीन गुणों की तीन अवस्थाएँ हैं जो बाधक हैं। किन्तु इस उपदेश से सच्छिष्य मेरा
भजन कर त्रिगुणों के त्रिगुण का नाश कर स्वयं मेरा स्वरूप बन जायेंगे। मेरे स्वरूप में न गुण हैं न गुणवृत्ति ही
है। इसलिये भक्त सद्भाव से गुणातीत स्थिति तक पहुँच कर सहज स्वानंद प्राप्त करते हैं। श्रीकृष्ण ने उद्धव को
ऐसी आज्ञा की। इसके बाद की उसकी अवस्था की महिमा का वर्णन परीक्षित को स्वयं शुक्राचार्य किस प्रकार
करते हैं, देखें।
८०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्रीशुक उवाच
स एवमुक्तो हरिमेधसोद्धवः प्रदक्षिणं तं परिसृत्य पादयोः।
शिरो निधायाशुकलाभिरार्द्रधीर्न्यषिञ्चदद्वन्द्वपरोऽप्यपक्रमे ॥ ४५ ॥
जो निजमुक्ति के कारण नित्य निष्काम है; जिसने परब्रह्म का अनुभव लिया है; उस श्रीशुक्राचार्य को उद्धव
का प्रेम वर्णन करने में अत्यन्त उल्हास प्राप्त हुआ। उसने कहा, हे परीक्षित्! श्रीकृष्ण ने इस प्रकार उद्धव को
आज्ञा की; उसका प्रेम अद्भुत था, उसका वर्णन में कर रहा हूँ, सुनो। उद्धव भले ही गुणातीत हो गया हो लेकिन
उसे गुरुचरण से विलक्षण प्रेम था। उसका सद्गुरु श्रीकृष्णनाथ तो साक्षात परब्रह्म ही था। वह हरि के चरण
छोड़ना नहीं चाहता था, हरि के प्रति उसकी पूर्ण श्रद्धा थी, इसलिये उस ज्ञानसम्पन्न उद्धव को 'हरिमेधा' कहा
गया है। जो अपनी इच्छा से हरि का ध्यान करता है, उसके ध्यान के साथ उसका मन भी हरि हरण करता है; जो
हरि के समाधान का विचार करता है, उसकी बुद्धि का हरि हरण करता है। जो हरि का चिन्तन करता है, उसके
चित्त का हरि हरण करता है; जो हरि का स्मरण करता है उसका सारा संसार ही हरि हरण करता है। उस हरि के
प्रति मुक्तिपद पर पहुँचे उद्धव की सप्रेम श्रद्धा थी इसलिये उसे 'हरिमेधा' कहते थे। जो गुणातीत पद पर पहुँच
गये उन्हें भी जिसकी भक्ति प्रिय थी, उस श्रीकृष्ण ने उद्धव का जाना निश्चित किया। किन्तु बदरिकाश्रम दूर का
पल्ला था। एक बार वहाँ जाने के बाद उससे पुनः भेंट नहीं होगी इस विचार से उसका मन व्याकुल हो उठा।
यद्यपि वह सुख-दुःख से मुक्त हो चुका था, फिर भी प्रयाणकाल में उसने व्याकुल मन से श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा
की। चरणों पर मस्तक रखते समय उसकी आँखों से प्रेमाश्रु की धारा फूट पड़ी। उस धारा से श्रीकृष्ण के चरण
धुल गये।
सुदुस्त्यजस्नेहवियोगकातरो न शक्नुवंस्तं परिहातुमातुरः ।
कृच्छ्रं ययौ मूर्धनि भर्तृपादुके विभ्रन्नमस्कृत्य ययौ पुनः पुनः ॥ ४६ ॥
अन्य लोगों का स्नेह बाधक रहता है, किन्तु वेदांत विचार उनसे साधकों को छुड़ाता है; लेकिन श्रीकृष्ण
का स्नेह वैसा नहीं है। वह सुखदायक और प्रिय रहता है। उद्धव के लिये स्वाभाविक तौर पर गुरु और परब्रह्म
दोनों एक ही थे और लोगों को दोनों में 'ऐक्य' भावना करनी होती है; लेकिन उद्धव के लिये वह स्वतःसिद्ध
था। इस प्रकार का यह स्नेह उद्धव के लिये अत्यन्त सुखदायी था। इसलिये श्रीकृष्ण को छोड़ते समय गुरुप्रेम
के कारण वह भी व्याकुल हो उठा। स्नेह, द्वेष अथवा विषय कामना से जो भी कोई श्रीकृष्ण पर लुब्ध हुआ,
उन्हें परमानन्द ही प्राप्त हुआ। ऐसे श्रीकृष्ण को कौन छोड़ना चाहेगा? अविधि से श्रीकृष्ण से रत हुए लोग भी
जब ब्रह्मादि देवताओं के लिये वंदनीय हो गये तो फिर उद्धव तो गुरुप्रेम पर न्योछावर ही था, वह श्रीकृष्ण को
कैसे छोड़ेगा ? जिसे गुरुभक्ति परब्रह्मतुल्य लगती है, उसके लिये जीवन्मुक्ति तृणप्राय है; मिली हुई मुक्ति का भी
वे त्याग कर देते हैं और अनन्यभाव से गुरुभक्ति की शरण में चले जाते हैं। सद्गुरु की आज्ञा का उल्लंघन न
किया जाय इसलिये बदरिकाश्रम जाना चाहिये यह बात सच है; किन्तु श्रीकृष्ण का प्रेम अत्यन्त मधुर है वह
उसे जाने से रोक रहा था। इस प्रकार उद्धव दोतर्फा संकट में पड़ गया। श्रीकृष्ण के प्रेम से उसका पेट फटने
लगा; उसे बदरिकाश्रम का मार्ग ही नहीं दीख रहा था। श्रीकृष्ण को यदि छोड़ दें तो वह निजधाम चला
जाएगा, मुझे पुनः दिखायी नहीं देगा; इसलिये उसका गला रुंध गया। जल से भरे नूतन मेघ की तरह श्यामवर्ण,
कमलनयन आनन्दमूर्ति श्रीकृष्ण पूर्णत्व से परिपूर्ण ब्रह्म है। मुकुट, कुण्डल, कमरबंद, पीले रंग का टीका धारण