श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 801, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनतीसवाँ अध्याय ७८५
लक्षण इस प्रकार है। साधक का मन जिधर भी जाता है, वहाँ परिपूर्ण ब्रह्म रहता ही है; वहाँ से मन हटकर कहीं
और जाने के लिये खाली स्थान ही नहीं है ऐसा अनुसंधान मन में करने से मन चैतन्य में समरस हो जाता है।
इसी को 'पुष्कल ज्ञान' कहते हैं, और इसी का नाम है 'पूर्ण उपदेश'। इस प्रकार का सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान जो मेरे
भक्तों को दान करेगा, उसका हे उद्धव ! मैं पूर्णरूप से ब्रह्मऋणी होकर रहता हूँ। उसके उपकार की पूर्ति करने के
लिये मेरी गाँठ में कुछ नहीं है। इसलिये मेरा आत्मरूप उसे देकर मैं रात-दिन उसकी सेवा के लिये खड़ा रहता
हूँ। जो शिष्य को ब्रह्मज्ञान देता है, उसके अधीन मैं परमात्मा रहता हूँ और उस ब्रह्मज्ञान देने वाले के शब्द से ही
मैं शूद्र आदि का उद्धार करता हूँ। परब्रह्म देकर जो भक्तों को निष्कर्म कर देता है; वह मुझे अत्यन्त प्रिय है और
मैं पुरुषोत्तम उसका दास बनकर रहता हूँ। उद्धव ! मेरे भक्तों को जो ब्रह्मज्ञान देता है, उससे अधिक लाडला मेरा
कोई नहीं है यह तुम निश्चित रूप से जान लो। वह आत्मा और मैं शरीर हूँ और वह शरीर भी मैं स्वयं ही बनता
हूँ; उसी प्रकार उसका जो भी कर्माचरण रहता है, वह भी पूरी तरह मैं ही रहता हूँ। जैसे मैं अवतारधारी हूँ, उसी
प्रकार यह भी अवतारधारी है। उसमें और मुझमें तिलमात्र का भी अन्तर नहीं है। जो इस ब्रह्मज्ञान का दान करेगा,
उसे मैं स्वयं इस प्रकार अपना आत्मा अर्पण करता हूँ, फिर भी उसकी पूर्ति नहीं होती। इसलिये मैं शरीर से
विचरण करते हुए भी उसकी अखण्ड सेवा करता हूँ। उसके प्रेम के खातिर ही मैं उसे अपना आत्मा अर्पण कर
सदा उसके घर में रहता हूँ। उस पर जो भी संकट आये, वह सब मैं अपने ऊपर ले लेता हूँ। मेरे चैतन्य साम्राज्य
का वैभव उसके घर में निरन्तर रहता है। इस एकादश स्कन्ध के ब्रह्मज्ञान का उपदेश कर मेरे भक्तों को जो
ज्ञानदान देगा, उसे मैं इस प्रकार अपना आत्मा अर्पण करता हूँ। अस्तु ! यह ब्रह्मज्ञान यदि साध्य न हो सके, तो हे
उद्धव ! इस ग्रन्थ का जो सावधानीपूर्वक सर्वकाल पठन करेगा वह भी परम पावन होगा।
य एतत् समधीयीत पवित्रं परमं शुचि।
स पूयेताहरहर्मां ज्ञानदीपेन दर्शयन् ॥ २७ ॥
तुम्हारा और मेरा यह संवाद शुद्ध ब्रह्मज्ञान है। इसका जो भी कोई श्रद्धालु पुरुष ध्यानपूर्वक, आदरपूर्वक
श्रवण करेगा, जो निरन्तर बढ़ते प्रेम से शुद्ध सात्त्विक श्रद्धा मन में दृढ़ कर, पग-पग पर नित्य नयी बात पढ़ने की
चाह उत्पन्न करेगा, वाणी के कसोरे में श्रद्धा का तेल डालकर तथा जिह्वा की बाती बनाकर जो इस ज्ञानज्योति को
प्रज्वलित करेगा, जो इस एकादश स्कंध की ज्ञानज्योति से एकादश इन्द्रियों की बाती बनाकर और उन्हें प्रज्वलित
कर मेरी आरती उतारेगा, उन्हें मैं कितना पवित्र कह कर पुकारूँ? इस प्रकार का ग्रन्थ पठन मेरा ज्ञान-दीप है।
उस ज्ञानदीप से जो मेरा स्वरूप प्रकाशित करता है, उनकी संगति में जो रहते हैं, उन्हें ब्रह्मादि देवता भी वन्दन
करते हैं। उद्धव ! सचमुच, उनके कारण त्रिभुवन पावन होता है, यह निश्चित रूप से जान लो। अस्तु ! जो इसका
पठन नहीं कर सकता, वह यदि श्रद्धापूर्वक इसका श्रवण करे तो उसे भी संसार बन्धन की बाधा नहीं होगी। उसी
का निरूपण श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
य एतच्छ्रद्धया नित्यमव्यग्रः शृणुयान्नरः।
मयि भक्तिं परां कुर्वन् कर्मभिर्न स बध्यते ॥ २८ ॥
यदि अध्ययन नहीं कर सकता तो कोई हर्ज नहीं, श्रद्धा से, ध्यानपूर्वक जो एकादश स्कंध का श्रवण करेगा
उसे कर्मबन्धन बाधक नहीं होगा। अत्यन्त श्रद्धा से श्रवण करने पर भी, उससे अधिक मनन करना चाहिये। मनन
के बिना किया गया श्रवण नपुंसक है। क्योंकि उससे ब्रह्मप्राप्ति पूरी तरह फलदायी नहीं होगी। कथा सुनना भले