श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 802, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें७८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही समाप्त हो जाय किन्तु मनन समाप्त नहीं होना चाहिये। लालची आदमी को जिस प्रकार मन में धन की याद
रहती है, उसी प्रकार कथा का मन में स्मरण रहना चाहिये। मनन करने से भजन और पराभक्ति उत्पन्न होती है।
ऐसा करने से आर्त, जिज्ञासु तथा अर्थार्थी इनकी स्थिति छोड़कर मेरी चौथी भक्ति बढ़ती है। इसी को ज्ञाता
‘पराभक्ति’ कहते हैं। पराभक्ति से मेरा भजन करने से तत्काल आत्मदर्शन होता है। इससे मेरे भक्तों को कर्मबन्धन
की बाधा नहीं होती। यह अत्यन्त गुप्त बात है; इस एकादश स्कंध का श्रवण कर ‘मैं तरूँगा’ ऐसा विश्वास
जिसने अंतःकरण में दृढ़ कर लिया और इस प्रकार जो श्रवण के प्रति लुब्ध हो गया, वह यदि मेरी भक्ति को घर
से बाहर निकालने का भी प्रयास करे तो भी वह उसके घर में घुस आयेगी। वह भक्ति घर में घुस कर निष्काम
भक्तों के सारे कर्मों का नाश करती है। इसी का नाम है ‘पराभक्ति’। यह श्रोताओं का विश्राम मन्दिर है। एकादश
स्कंध का श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से इतना लाभ होता है। श्रवण के योग से मेरा भजन उत्पन्न होता है और भजन
से भक्तजन मुक्त होते हैं। खैर यह तो औरों की बात हुई लेकिन तुम्हें जो ज्ञानकथा मैंने सुनायी, वह तुम्हारा
निश्चय दृढ़ होने के लिये सुनायी, उसका तत्त्वबोध तुम्हें हो ही गया होगा।
अप्युद्धव त्वया ब्रह्म सखे समवधारितम्।
अपि ते विगतो मोहः शौकश्चासौमनोभवः ॥ २९ ॥
हे उद्धव ! तुम्हारा प्रेम देखकर मैंने तुम्हें अत्युत्तम गुप्त ज्ञान अर्थात् शुद्ध जो परब्रह्म है उसे सम्पूर्ण बताकर,
उसे सुगम बनाकर उसका निरूपण किया। यह ज्ञान का शुद्ध सार तथा वेदों का विश्राम स्थल है। अविद्या का
पराभव इसी से होता है तथा जीव शिव का समाधान भी यही है। यह गुप्त ज्ञान मन, बुद्धि तथा वाणी को
अगम्य होते हुए भी तुम्हारी पूर्ण श्रद्धा देखकर तुम्हें बताया। एक घनिष्ठ मित्र जिस प्रकार अपनी सम्पत्ति अपने
मित्र को अर्पण करता है, उसी प्रकार यह ब्रह्मस्थिति मैंने तुम्हारे हाथ में दी है। मैंने जो परम रहस्य तुम्हें बतलाया
वह परब्रह्म तुम्हारी समझ में आ गया न ? यदि समझ में नहीं आया हो तो अधिक सुगम करके बताऊँगा।
अंतःकरण में चैतन्य जमकर बैठ गया हो और जहाँ ब्रह्मस्थिति प्राप्त हो गयी हो, वहाँ मोह ममता की बस्ती
बिलकुल नहीं होनी चाहिये। ब्रह्मज्ञान का आकलन होने का लक्षण यही है कि उसके बाद संकल्प विकल्प के
विचार मन में नहीं आते। ब्रह्म को पूरी तरह जान लेने के बाद ‘मैं’ और ‘तू’ का भाव नहीं उत्पन्न होता, ध्येय,
ध्याता, ध्यान नहीं रह जाता और कर्मठता भी शेष नहीं बचती। जिसने ब्रह्मज्ञान जान लिया, उसे कर्मबन्धन की
बाधा नहीं होती क्योंकि कर्म का जो आचरण है, वह मूलतः मायिक ही है। जिस प्रकार पुरुष के योग से छाया
हिलती है लेकिन पुरुष उसका लोभ नहीं करता, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानी भी देह को चलाता है किन्तु वह
देहाभिमानी नहीं होता। सूर्य के सामने जिस प्रकार अन्धकार क्षणभर की भी प्रतीक्षा नहीं करता, उसी प्रकार
ब्रह्मज्ञानी को भी कर्म का आदर जरा भी नहीं रहता। इसका कारण यही है कि कर्म का कर्मबन्धन यह केवल
मन का संकल्प है। किन्तु जहाँ मन का मनपन ही टूट जाता है, वहाँ कर्माचरण भी बीजरहित हो जाता है।
ब्रह्मवस्तु नित्य निर्विकल्प है। वहाँ संकल्प विकल्प नहीं है। यही परब्रह्म का सच्चा स्वरूप है और उसी का
स्वानुभव होता रहता है। इस प्रकार स्वयं ही ब्रह्मरूप होने के बाद, ‘मैं एक उद्धव हूँ’ इस प्रकार का उद्धव का
ठौर ही नहीं रह जाता। फिर वहाँ शोक और मोह किस बात का? उद्धवपन की बस्ती में शोकमोह की उत्पत्ति
होती थी; किन्तु ब्रह्म की प्राप्ति होने के बाद वह उद्धवपन याद ही नहीं आता। देव का यह भाषण सुनकर उद्धव
का उद्धवपन उड़ गया। वह स्वानंद में लीन हो गया और उसका वाचालपन बन्द हो गया। अपने आत्मस्वरूप पर