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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 799, कुल 869 में से

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पृष्ठ 799

उनतीसवाँ अध्याय ७८३
गला जमीन पर फेंक देते हैं; लेकिन यदि साधक उसे दृढ़ निश्चय से ब्रह्मार्पण मान ले तो वह भी मेरी भक्ति में
जमा होता है। इतना ही नहीं बल्कि कडुए कद्दू की खीर जिसे श्वान और सुअर भी नहीं खायेंगे, वह भी यदि
आनन्द से कृष्णार्पण करें तो वह कर्म भी ब्रह्मार्पण होता है। जो खोयी हुई वस्तु न मिल रही हो, वह भी
कृष्णार्पण करने से अनायास मुझे मदर्पण होती है। सारांश यही है कि प्रत्येक कर्म कृष्णार्पण करें। उसे
मनःपूर्वक अर्पण करने का ही नाम है 'सद्बुद्धि'।
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्।
यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्॥२२॥
मन में तो विषय की आसक्ति है और ऊपरी मन से ब्रह्मार्पण करें, ऐसे लोग अनेक दृष्टि से फँस जाते
हैं। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं। कुछ लोग अत्यन्त बुद्धिमान रहते हैं, वे अपनी बुद्धि हाथ में लेकर अन्त में
विषय का स्वार्थ सिद्ध करने में लग जाते हैं। वह अपनी देहममता के कारण अवश्य ही फँस जाते हैं। किसी
की बुद्धि अत्यन्त उत्तम रहती है, वेदशास्त्र में वे अत्यन्त पारंगत रहते हैं; किन्तु गर्व अभिमान के कारण ज्ञान
के गर्व में फँस जाते हैं। कुछ बुद्धिमान योगाभ्यास में पारंगत रहते हैं। वे अभ्यास से प्राणायाम साध्य कर
योगरूप किले में घुस जाते हैं और वहाँ की सिद्धि के वैभव की बलि चढ़ते हैं। कुछ लोग कर्म को श्रेष्ठ
मानते हैं और कर्म का हो-हल्ला मचाते हैं। विधि निषेध से ही उनका मार्ग अवरुद्ध हो जाने के कारण लोग
कर्म में ही डूब जाते हैं। इस प्रकार नाना प्रकार के प्रयास कर कितने लोग फँस गये हैं उनकी कोई गिनती
नहीं है। लेकिन मेरी भक्ति वैसी नहीं है। वह केवल भाग्यवान को ही प्राप्त होती है जिसका सर्वभूमि
भगवद्भजन रहता है, उसकी बुद्धि की बुद्धि मैं स्वयं बन जाता हूँ। वह बुद्धि कौन सी होती है? तो कर्म
को ब्रह्मार्पण करना यही 'महाबुद्धि' है। समस्त प्राणियों के प्रति मेरा भजन और सभी कर्म मदर्पण यही बुद्धि
की 'महाबुद्धि' है। इसी के योग से वे स्वयं पूर्णब्रह्म होते हैं। चतुर लोगों की चातुरी इसे ही कहनी चाहिये।
क्योंकि वे मिथ्या देह के योग से भजन कर स्वयं सत्य सनातन ब्रह्म बन जाते हैं। पहले तो माया ही मिथ्या
है और उस माया से कल्पित देह भी मिथ्या! लेकिन देखो। उसी देह का कर्म मुझे अर्पण करने से वे स्वयं
ही ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। मिथ्या देह के भजन से स्वयं सत्यस्वरूप परब्रह्म होना यह भूसा देकर अनाज की
ढेर लेने की तरह है। अथवा फूटी कौड़ी देकर चिन्तामणि गठियाने की तरह है। उसी प्रकार मिथ्या देह का
कर्माचरण जिसके योग से जीव को दृढ़तर बन्धन प्राप्त होता, उसे ही अर्पण कर वे स्वयं परिपूर्ण ब्रह्म बन
जाते हैं। अनित्य देह के कारण ही नित्य वस्तु प्राप्त होती है। यही बुद्धिमानों की श्रेष्ठ बुद्धि है। इसी को
'ज्ञान का संतोष' कहते हैं। इस प्रकार परमशुद्ध परमार्थ श्रीकृष्ण ने अपने मुख से सुनाया। उस ग्रन्थ की अब
परिसमाप्ति करने के लिये उपसंहार के रूप में निरूपण सुनाते हैं।
एष तेऽभिहितः कृत्स्नो ब्रह्मवादस्य संग्रहः।
समासव्यासविधिना देवानामपि दुर्गमः ॥२३॥
अनेक मत-मतान्तरों को छोड़कर, कहीं संक्षेप में तो कहीं विस्तार में मैंने अत्यन्त शुद्ध ब्रह्मज्ञान तुम्हें
बताया। मैंने तुम्हें इसे अत्यन्त सुगम बनाकर बताया, अन्यथा यह ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। जो
आगम निगम शास्त्र का अध्ययन करते हैं उनके लिये तो यह और भी असाध्य है। वस्तु का साक्षात्कार न कर
अनेक प्रकार के शास्त्रार्थों का खोखले शब्दों से साक्षात्कार करते रहते हैं। ब्रह्म का वाद करते समय वेद भी