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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 806, कुल 869 में से

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पृष्ठ 806

७९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस वचन को तुम सत्य मान लो। अब धन की इच्छा से जो चतुर्वर्णों को उपदेश करते हैं, उन्हें धनलोभी समझना
चाहिये। उन्हें गुरुपद नहीं देना चाहिये। जहाँ गुरु को ही लोभ रहता है वहाँ शिष्य की विरक्ति डूब जाती है।
ऐसे ही विरक्तों से उपदेश लेने से परमार्थ की हानि होती है। लोकरहित होकर तथा पूर्ण कृपा से यदि सद्गुरु शूद्र
लोगों को उपदेश करें और इस प्रकार दीनों का उद्धार करें तो इस उपदेश से कभी दोष नहीं लगेगा। जिसके योग
से वैरागी की छटपटाकर मृत्यु होती है, जिसके कारण ज्ञाता को दोष लगता है, वह स्त्रीसंग हमें नहीं करना
चाहिये। स्त्री का अकस्मात दर्शन होने से भी अधःपतन होता है। फिर उनकी संगत होने से ज्ञाता का कैसे भला
होगा ? सभी प्रकार से प्रमाद में अर्थात् दोष में पड़ने के कारण इसे 'प्रमदा' कहते हैं। उसका नित्य संग हो जाय
तो परमार्थी लोग कैसे तरेंगे ? जिसका मुख देखते ही मदन तत्काल कटाक्ष बाण छोड़ता है, वहाँ किस बात का
उपदेश किया जाय ? परमार्थ की निश्चित हानि समझ लें। इसलिये हे उद्धव ! तुमसे यही कहता हूँ कि स्त्रियों से
बात भी न करो, स्त्रियों का अवलोकन न करो, उनका शब्द भी कानों पर न आने दो। नहीं-नहीं; स्त्रियों से बात
न करो, उनसे एकांत न करो, उनकी संगत न करो क्योंकि यह लोगों में सभी दृष्टियों से निन्दनीय है। स्त्रियों का
अनुवाद न करो, उनसे संवाद न करो, उन्हें उपदेश न करो, क्योंकि उससे व्यर्थ के लोकापवाद की आशंका है।
कोई सात्त्विक स्वभाव की स्त्री यदि सहज ही परमार्थ की बातें करने लगती है तो इष्ट मित्रों को उसमें कुछ अन्य
का सन्देह होता है। इसलिये स्त्री का सर्वोपरि त्याग ही करना चाहिये। स्त्रियों के संग से ब्रह्मज्ञान तो कभी बढ़ेगा
नहीं। (आशंका) उपदेश के लिये यदि स्त्रियों को वर्ज्य माना जाय तो पहले के बड़े लोगों ने उन्हें कैसे उपदेश
दिया होगा ? तो सुनो। याज्ञवल्क्य अत्यन्त श्रेष्ठ था। उसने उपनिषद में मैत्रेयी को अनेक प्रकार की युक्ति से
ज्ञानोपदेश किया। महामुनि नारद ने प्रह्लाद की माता को इन्द्र से छुड़ाकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया है। कपिल
मुनि ने अवतार लेकर सिद्धासन पर बैठकर देवहूती को ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया है। योगियों का मुकुटमणि
कैलासाधिपति शंकर ने भवानी को आत्मबोध से ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया है। औरों की क्या बात करें। हे
कृष्ण ! तुमने ही तो यज्ञ-पत्नियों को उपदेश किया था, ऐसा भी तुम कहोगे उद्धव अस्तु ! सद्भक्ति देखकर करुणा
दृष्टि से स्त्रियों को उपदेश करना चाहिये। ऐसा यदि तुम कहोगे, तो उद्धव ! उसमें भी अधिकार देखना चाहिए।
इस सम्बन्ध में, उद्धव ! निश्चित बात बताता हूँ, सुनो। वाचाल स्वभाव की स्त्री अयोग्य है। उसे उपदेश करना
व्यर्थ है और उससे गुरुत्व को आघात पहुँचता है। जिस स्त्री को अधिक बोलने की आदत रहती है जिसके मुख
में ब्रह्मज्ञान गूँजता है, जिसके अंतःकरण में विषय का कोलाहल मचता रहता है, पर पुरुष से परमार्थ की बातें
करना जिसे प्रिय लगता है; जो स्त्री ब्रह्मज्ञान की बात करने में ढीठ रहती है तथा मुख से बड़बड़ करती रहती है,
उसे उपदेश कभी नहीं करना चाहिये, उससे अपवाद की उँगली उठेगी। (श्रीएकनाथ कहते हैं) "श्री जनार्दन
स्वामी से मैंने भी विनती की, कि स्त्रियाँ और शूद्र उपदेश के लिये आते हैं, उन्हें क्या कहा जाय ? गुरु के बिना
कोई मार्ग नहीं है, इसलिये वे उपदेश के लिये आते हैं, उन्हें क्या उपदेश किया जाय, यह समझ में नहीं आता।"
यह सुनकर श्रीजनार्दन को संतोष हुआ और उन्होंने कहा, उन्हें भगवन्नाम का उपदेश करें, उससे उनकी
चित्तशुद्धि होगी। चित्तशुद्धि होने के बाद उनमें जब ज्ञान की उत्कंठा जगे और वे.अनन्य भाव से शरण में आये तो
उन्हें ब्रह्मज्ञान बताना चाहिये। अस्तु। श्रीकृष्ण बताते हैं। स्त्री अथवा पुरुष जिन्हें दृष्टि से सम लगें, ऐसे अनुभव
से जो परिपूर्ण हों, उनको ही स्त्रियों का उपदेश करना चाहिये। वह भी उनका अधिकार देखे बिना नहीं करना
चाहिये। उस उपदेश की भी वास्तविकता सुनो। मैंने जिन स्त्रियों की निन्दा की, उसमें जो सात्विकता से
भाग्यवान हो और विषय वासना त्याग कर परमार्थ की ओर उद्यत होगी; प्रपंच के अलावा जिसे विषय का नाम