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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 803, कुल 869 में से

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पृष्ठ 803

उनतीसवाँ अध्याय ७८७
पहुँचते ही उद्धव का उद्धवपन लुप्त हो गया; देह की अहंता नष्ट होकर वह स्वानंद में तल्लीन हो गया। वहाँ
देवता ने जो प्रश्न किया उसका उत्तर कौन देगा ? कृष्ण के साथ उद्धवपन का विलय होकर वह पूर्ण वस्तुरूप बन
गया था। उद्धव की वह अवस्था देखकर श्रीकृष्ण के ध्यान में आ गया कि वह निजात्मज्ञान से ब्रह्मरूप हो गया।
श्रीकृष्ण प्रत्यक्ष हृदयस्थ होने के कारण, यह न जान सके ऐसी कौन सी बात है ? शिष्य को सच्चा अनुभव प्राप्त
होने पर, जिस प्रकार बच्चे की तृप्ति का सुख माँ अनुभव करती है, उसी प्रकार सद्गुरु सुख के शिखर पर
पहुँचते हैं। शत्रु सेना पर विजय प्राप्त करते देख राजा को अत्यन्त सन्तोष होता है और वह ध्वजा पताकाओं के
साथ समारोह की धूम मचा देता है। बच्चों से किस प्रकार लाड़ किया जाता है यह प्रसूति की वेदना सहन करने
वाली माँ ही जानती है। उसी प्रकार शिष्य को स्वानुभव प्रदान करना केवल सद्गुरु ही जानते हैं। पुत्र का
खजाना मिलने पर जिस प्रकार पुत्र को संतोष होता है, उसी प्रकार उद्धव के अनुभव से श्रीकृष्ण को भी संतोष
हुआ। कृष्ण तो नित्य से ही सुखस्वरूप था, शिष्य के अनुभव से वह सुख के चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। गुरु की
बात गुरु ही जाने, दूसरे के लिये वह अगम्य है। शिष्य को उपदेश करते समय यदि गुह्य को सुख न हुआ होता
तो इस लोक में उपदेश परम्परा का अस्तित्व ही नहीं रहा होता। गुरु यदि ऊब कर उपदेश करे तो वह शिष्य की
समझ में ही नहीं आयेगा। फिर उसकी आत्मानुभव से कैसे भेंट होगी ? जिस प्रकार बालक को अलंकार पहनाने
से उसे कुछ अनुभव नहीं होता लेकिन उसकी माँ को प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार शिष्य को आत्मानुभव प्राप्त
होने पर वास्तव में सद्गुरु को आनन्द होता है। उसी प्रकार उद्धव को ब्रह्मस्थिति पर पहुँचा देखकर श्रीकृष्ण को
अत्यन्त आनन्द हुआ। उन्हें लगा कि अब मेरे उद्धव का सन्देह दूर हो गया। उसे ब्रह्मस्वरूपानुभव हुआ। उसकी
ब्रह्मनिष्ठ स्थिति देखकर उसे आत्मस्वरूपानुभव प्राप्त हुआ है इसका श्रीकृष्ण को अनुभव हुआ। अब उसे दूसरे
को उपदेश करना सिखाते हैं। तुमने ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लिया है। अब शिष्योपदेश करने का ढंग तथा शिष्य का
अधिकार कैसे पहचानते हैं, वह सुनो।
नैतत्त्वया दाम्भिकाय नास्तिकाय शठाय च।
अशुश्रूषोरभक्ताय दुर्विनीताय दीयताम्॥ ३०॥
धूर्त, नास्तिक, ढोंगी, सेवा न करने वाला तथा भक्तिहीन, उसी प्रकार उद्धत स्वभाव के शिष्य को छोड़
देना चाहिये। जिससे अधिक से अधिक लोग एकत्रित हों ऐसे पर्याप्त मात्रामें मिलने की इच्छा करने वाले, ऐसे
ढोंगियों का भजन, उन्हें यह एकादश स्कंध का ज्ञान स्वप्न में बड़बड़ाते हुए भी नहीं देना चाहिये। मोह ममता
के प्रावल्य के कारण जिसकी आस्तिकता का लय हो गया हो, वेद और शास्त्र के प्रति जो पूरी तरह नास्तिक
हों; देवता का अस्तित्व ही न मानते हों; इस प्रकार नास्तिकता का बिगुल बजाने वाले जो लोग हों, उनके कान
में इस ज्ञान का एक भी शब्द नहीं पड़ना चाहिये क्योंकि नास्तिकता के कारण उनकी श्रद्धा शुष्क हो जाती है।
नास्तिकवाद के आगे ज्ञान की क्या कीमत है ? अनीश्वरवाद का विद्रोह अत्यन्त कठिन होता है। ऐसे
नास्तिकवादी लोगों को तत्काल छोड़ देना चाहिये। अनन्यभाव से शरण न आकर, मीठी-मीठी बातें कर धूर्तता
से ज्ञान प्राप्त करने का जो प्रयत्न करता है, ऐसे धूर्तों का भी त्याग करना चाहिये। धूर्त दूसरों से अपने मतलब
की बात निकाल लेते हैं और अपनी बात या युक्ति दूसरों को नहीं बताते। काया, वाचा मन और धन इस
सम्बन्ध में जो गुरु से छल करता है और उसके गुण-दोष देखता है उस धूर्त का भी पूर्णरूप से त्याग करना
चाहिये। मेरी योग्यता बहुत अधिक है, मैं स्वयं गुरु की सेवा कैसे करूँ? मेरा बड़प्पन कम होगा। इस भय से