श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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'नेति' शब्द से निःशब्द हो गये हैं। उसी आत्मज्ञान का सार तथा परमार्थ का गुप्त भण्डार और मुझ परमात्मा का
अंतःकरण खोल कर तुम्हें बताया है।
अभीक्ष्णशस्ते गदितं ज्ञानं विस्पष्टयुक्तिमत्।
एतद् विज्ञाय मुच्येत पुरुषो नष्टसंशयः ॥ २४॥
जो वेदशास्त्रों के लिये कठिन है, जिसे शब्दों में वर्णन करना कठिन है, वह ज्ञान मैंने तुम्हें चुनकर बताया
है और वह ज्ञान तुम्हारे मन पर अंकित हो, इसलिये उसे अनेक प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियों से बार-बार बतलाया
है। तुम्हें अधिक प्रयास न करना पड़े और तुम्हें अधिक कष्ट न हो, इस दृष्टि से सारे संशय निर्मूल करते हुए
तुम्हें स्पष्ट ज्ञान दिया है। इस ज्ञान को जानने से सारे संशय जल जाते हैं और साधक ब्रह्मसम्पन्न होकर निरन्तर
स्वानंद में तृप्त रहते हैं। उद्धव ! मैंने यह जो गुप्तज्ञान बताया, उस एकादश स्कंध के निरूपण का श्रवण, पठन
और मनन जो करेगा वह धन्य है।
सुविविक्तं तव प्रश्नं मयैतदपि धारयेत्।
सनातनं ब्रह्मगुह्यं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ २५ ॥
ज्ञाता तर जाएँ तो इसमें कैसा आश्चर्य है ? लेकिन जो भोले-भाले और अज्ञानी हैं, उनका भी उद्धार करने
के लिये तुमने प्रश्न पूछा है। उस प्रश्न के अनुसार मैंने स्वयं सन्तुष्ट होकर तुम्हें गुप्त ज्ञान अर्थात् परम कारण जो
परब्रह्म है, उसके सम्बन्ध में बताया। जिस प्रकार बछड़े की हुँकार से गाय के स्तन में दूध उतरता चलता है, उसी
प्रकार तुम्हारे प्रश्न के आदर से मैं भी स्वानंद से भर गया। कछुए के पिल्लों को उनकी माँ बिन माँगे ही अपने
नेत्रों के द्वारा अमृतपान कराती है। उसी प्रकार तुम्हें देखते ही मेरे हृदय में जो ब्रह्मज्ञान था वह पूरी तरह उफन
कर बाहर आ गया, वही यह निरूपण है। उसी निरूपण के बहाने मैंने तुम्हें स्वानंद रस से युक्त परमामृत का पान
कराया। समुद्र मेघ को पानी पिलाता है और उस जल से मेघ संसार को तृप्त करता है; उसी प्रकार उद्धव को
प्राप्त ब्रह्मपद से मूढ़ जीवों का भी उद्धार होने वाला है। बछड़े के प्रेम के कारण गाय के स्तन में दूध उतरता है,
वह दूध पूरे परिवार का पोषण करता है, उसी प्रकार उद्धव के आग्रहपूर्वक किये गये प्रश्न से संसार का अनायास
ही उद्धार होने वाला है। वह प्रश्नोत्तरी कथाभाग अर्थात् मेरा और तुम्हारा ब्रह्मसंवाद-एकादश स्कंध के निरूपण
का अर्थबोध जो ध्यान में रखेगा अथवा इस निरूपण का अर्थ जो श्रवण करेगा, वे श्रोता और वक्ता दोनों ही स्वयं
ही सनातन ब्रह्म हो जायेंगे। संसार में ब्रह्म परिपूर्ण भरा रहने पर भी वह मन को, बुद्धि को और इन्द्रियों को नहीं
दिखायी देता। जहाँ वेद भी मौन हो जाते हैं, वहाँ यह ब्रह्मज्ञान उपयोगी होगा। (उन श्रोता वक्ताओं के लिए)
एक बार यह ज्ञान प्राप्त होने पर वह टस से मस नहीं होता। एकादश स्कंध का अर्थ मन में धारण करने से
परमपद की अटल प्राप्ति होगी। इस एकादश स्कंध से श्रोताओं और वक्ताओं को इतना बड़ा पद प्राप्त होता है,
तब मेरे भक्तों को जो प्रेमपूर्वक इस ज्ञान का उपदेश करेंगे, उन्हें किस फल की प्राप्ति होती है वह तथा ज्ञानोपदेश
की शुद्ध स्थिति उद्धव को श्रीकृष्ण अत्यन्त प्रेम से स्वमुख से बता रहे हैं।
य एतन्मम भक्तेषु सम्प्रदद्यात् सुपुष्कलम्।
तस्याहं ब्रह्मदायस्य ददान्यात्मानमात्मना ॥ २६ ॥
काया, वाचा, मन, घरबार, पत्नी, बच्चे, धन और प्राण आदि जो मुझे निष्काम बुद्धि से अर्पण करते हैं, वे
ही मेरे अनन्य भक्त हैं। ऐसे भक्तों को इस ज्ञान का अवश्य उपदेश करें। उस उपदेश का भी परिपक्व तथा पूर्ण