श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जो गुरु की सेवा नहीं करता, उस शिष्य का भी त्याग करना चाहिये। स्वयं ऊँचे आसन पर बैठकर जो सेवकों
के हाथों गुरु की सेवा कराता है, उस शिष्य को पाखंडी समझकर उसका त्याग करना चाहिये। उसे इस ग्रन्थ
का उपदेश नहीं करना चाहिये। सद्गुरु के सामने जो बड़ी शान से अपने शब्द पांडित्य की शेखी बघारता है,
जो अहंकार के कारण ठीक से सेवा नहीं करता, ऐसे शिष्य का भी त्याग करना चाहिये। मैं बहुत बड़ा दानी हूँ
यह कहकर जो छोटे काम को हाथ नहीं लगाता है, ऐसे अभिमानी का भी त्याग करना चाहिये। जो
लोकलज्जा के भय से गुरु की सेवा नहीं करता, जिसे लौकिक का बहुत अभिमान रहता है, ऐसे शिष्य का भी
त्याग करना चाहिये। मैं अमीर हूँ यह कहकर जो गुरु के घर का छोटा काम नहीं करता, उस घमण्डी और
अभिमानी शिष्य को भी छोड़ देना चाहिये। जो नम्रतापूर्वक गुरु की सेवा नहीं करता; अखण्ड ध्यान करना ही
हमारी गुरुभक्ति है; इस युक्ति से जो सेवा से बचने का बहाना करता है, उसका भी त्याग करें। मैं सेवा के
छोटे-मोटे काम नहीं करूँगा; धन जितना भी चाहें दे दूँगा, ऐसा कहने वाला तथा धन का अभिमान करने वाले
को शिष्य नहीं बनाना चाहिये। धन की आशा कर गुरु यदि शिष्य को उपदेश देता हो तो समझ लो कि
ब्रह्मसान उजाड़ हो गया या धन देकर ब्रह्मज्ञान चाहने वाले को भी शिष्य कभी नहीं बनाना चाहिये। समय के
अनुसार गुरु की जो सेवा करना उचित है, उसे जो नहीं करता, उसे 'अशुश्रूषु' कहते हैं, उसका भी सचमुच
त्याग करना चाहिये। सद्गुरु की भक्ति करने से सचमुच मेरा उद्धार होगा ऐसा जिसका निश्चय हो ऐसा शिष्य
नहीं करना चाहिये। सद्गुरु ही परब्रह्ममूर्ति है, ऐसी भावना जिसके अंतःकरण में न हो और जिसके मूल में ही
विकल्प हो, उसे भी शिष्य नहीं बनाना चाहिये। गुरु से ब्रह्म भिन्न है ऐसा जिसका ज्ञान हो उसे निश्चय से
अभक्त मानना चाहिये। उसे भी शिष्य नहीं करना चाहिये। सद्गुरु भी एक मनुष्य ही है, यह जानकर जो
उसकी आज्ञा का उल्लंघन करेगा, वह संभ्रम में पड़कर रास्ता भटक गया ऐसा समझना चाहिये। ऐसे शिष्य
को छोड़ देना चाहिये। जो शिष्य अपनी पवित्रता सद्गुरु से अधिक मानता है, वह अभक्तों में अग्रगण्य है।
उसका भी तत्वतः त्याग करना चाहिये। उद्धव! गुरु में ब्रह्म स्थिति है ऐसी जिसकी पूर्ण श्रद्धा नहीं होती, उसी
का नाम है 'अभक्ति' यह जान लो। अथवा इस ग्रन्थ का ब्रह्मज्ञान जिसे नहीं भाता, उसे भूलकर भी कभी
शिष्य नहीं बनाना चाहिये। उसी प्रकार इस ग्रन्थ का ब्रह्मज्ञान बतलाने वाला मैं साक्षात परब्रह्म मूर्ति, उसके
प्रति जिसे भक्ति न हो, उस शिष्य का भी निश्चयपूर्वक त्याग करना चाहिये। उसी प्रकार, इस ग्रन्थ का ज्ञान
तो अच्छा लगता है, गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा भी रहती है, किन्तु उसका व्यवहार उद्धत रहता है, तो ऐसे शिष्य
का भी त्याग करें। मेरी साक्षात मूर्ति जो संत सज्जन हैं और मेरे प्राणप्रिय भक्तों का जो उपहास करता है उसे
'दुर्विनीत' अर्थात् उद्धत कहते हैं। मेरे भक्तों में यदि कोई अत्यन्त दरिद्र भी हो तो उसके चरणों का वन्दन
करना चाहिये। यह जिसे अच्छा नहीं लगता, उसे 'दुर्विनीत' कहते हैं। साधु संतों से भेंट करने जाता है और
पाखण्डपूर्ण नम्रता से उनके चरणों का वन्दन करता है लेकिन उनके गुणदोष खोजता रहता है, उसमें
'दुर्विनीतता' रहती है। दुष्ट बुद्धि से विनय दिखलाने को 'दुर्विनीतता' कहते हैं। वह जिस शिष्य में दिखायी दे
उसका भी सचमुच त्याग करना चाहिये। यह निरूपण सुनकर तुम कहोगे कि तब तो मैं शिष्य ही नहीं बनता।
लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिये क्योंकि जो सच्छिष्य को ब्रह्मदान का उपदेश करता है, वह मेरा आत्मा है,
ऐसा मैं समझता हूँ। अब उपदेश करने के लिये पूर्ण उपयुक्त सच्छिष्य का लक्षण बताता हूँ। उद्धव! उसे ध्यान
देकर सुनो।