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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

द्वितीय अध्याय ५५
मिलता है वह सब अग्नि ही बन जाता है, उसी प्रकार अभेदरूप हुआ भक्त जो कुछ भी देखता है वह सब
स्वाभाविक रूप से आत्मस्वरूप ही हो जाता है। अपना धन दूसरे को देते समय उसके मन में शंका नहीं आती।
दूजेपन की वार्ता भी उसे सुनाई नहीं देती और कोई विकल्प की बात करता है तो वह उसके गले नहीं उतरती।
बायें हाथ की वस्तु दाहिने हाथ में दी जाये तो देनेवाला कौन और लेने वाला कौन ? उसी प्रकार समस्त प्राणिमात्र
के प्रति उसकी एकात्मता ही हो जाती है। भक्तों को स्वयं अपने शरीर में भगवान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं
दिखाई देता इसलिए उनके मन में शान्ति बनी रहती है। अपनी उस समदृष्टिरूप शान्ति में भगवद्भक्त क्रीड़ा
करते रहते हैं इसीलिए उन्हें सचमुच ही उत्तमत्त्व की प्राप्ति होती है। हे राजा ! अब हरिभक्तों की 'निरपेक्षता'
बताता हूँ, सुनो। उत्तम भक्तों की कथा सुनाते समय हरि के मन को अत्यन्त उल्लास हो रहा था। (उसने कहा)
जो निरपेक्ष है वही 'मुख्य भक्त' है। निरपेक्ष ही वास्तव में 'विरक्त' और निरपेक्ष ही 'नित्यमुक्त' है। क्योंकि
भगवान सचमुच ही निरपेक्ष है।
त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठस्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्।
न चलति भगवत्पदारविन्दाल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्रयः ॥ ५३ ॥
अपना सच्चा स्वार्थ साधने की अवस्था में सप्रेम भक्ति करते समय भक्त अपनी सारी वृत्ति हरि के चरणों
पर केन्द्रित करता है। उस समय त्रैलोक्य की सारी सम्पत्ति हाथ जोड़कर यदि उसका वरण करने आये तो भी वह
अपनी चित्तवृत्ति एक क्षण के लिए भी हरिचरणों से दूर करने के लिये तैयार नहीं रहता। परमार्थ के प्रति वह
इतना अधिक आसक्त रहता है। यदि क्षणभर के लिए भी वह अपनी चित्तवृत्ति वहाँ से हटा ले तो त्रैलोक्य की
सम्पत्ति उसके हाथ लगे। तो फिर इतना स्वार्थ त्याग करने में हरिभक्त का क्या लाभ है ? तो उसका कारण यह है
कि हरिचरणों में लीन होने में जो साक्षात्कार होता है, उस क्षणार्ध में लाभ के सामने भक्तों को त्रैलोक्य का वैभव
अथवा सम्पत्ति तुच्छ मालूम होती है। सारे संसार को उत्पन्न करने वाला ब्रह्मदेव पितामह जिसके आँगन में
त्रैलोक्य की सम्पत्ति ऐसी ही पड़ी रहती है, उस सम्पत्ति के सामने उसका ब्रह्मपद भी काफी श्रेष्ठ है लेकिन वह
ब्रह्मदेव भी अपने सुखस्वार्थ के लिए-हरिचरणों को खोजता रहता है।
ब्रह्मलोक की सम्पत्ति और वैभव को ठुकराकर ब्रह्मदेव एकान्त में बैठकर दिन-रात हरिचरणों का ध्यान
करते रहते हैं। फिर भी उन्हें एकाएक उसकी प्राप्ति नहीं होती। यह बात ध्यान में रखो कि ब्रह्मदेव को हरिचरण
प्राप्त न होने के कारण ही वह घमण्डी हो गया था और गोकुल के गोपाल तथा बछड़ों को चुराकर ले गया था।
उस समय स्वयं बिना कोई कष्ट किये और अपना कृष्णपना भी न तोड़ते हुए वह पूर्णत्व से गोपाल और उनके
बछड़े स्वयं बन कर रहा। हरि की यह अद्भुत लीला देखकर ब्रह्मदेव बौरा गया और अपने ब्रह्मपद का अभिमान
त्याग कर अनन्यभाव से हरि की शरण में आया। ब्रह्मदेव भी जिसके चरण पकड़ता है वह कैलाशपति शंकर भी
अपने कैलाश का राज्य त्याग कर महाश्मशान में बैठकर हरिचरणों का ध्यान करता रहता है। कमर में कौपीन
बाँधकर, पूरे शरीर में भभूत रचाकर, मस्तक पर जटा धारण कर तथा मस्तक पर हरिचरणों का तीर्थ (गंगा)
रखकर अपने हृदय में निरन्तर हरिचरणों का चिन्तन करता रहता है। इस प्रकार जहाँ ब्रह्मदेव और शंकर इन दोनों
को ही हरिचरणों का पता नहीं रहता वहाँ त्रैलोक्य के वैभव को जो श्रेष्ठ मानता है, वह पापी नितान्त भाग्यहीन
होना चाहिए। हरिचरणों की एक क्षण की प्राप्ति के आगे भक्त लोग त्रैलोक्य के वैभव को न्योछावर कर देते हैं,
इसे ध्यान में रखो। हरिचरणसारामृत की मधुरता का स्वाद यदि क्षणभर के लिए भी मिल जाए तो उस पर

५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निजभक्त त्रैलोक्य वैभव को न्योछावर कर सकता है। सारांश यह कि इस लोक में हरिचरण की तरह कोई भी
सारामृत नहीं है। इसलिए वे तन-मन-धन से उसी चरणों से चिपके रहते हैं। हे राजा ! पलक झपकने तक अथवा
चुटकी बजाने तक के अन्तराल के लिए भी जो भक्त हरिचरणों को नहीं छोड़ते वे ही वैष्णवों में अग्रगण्य तथा
उत्तम भक्त हैं, इसे ध्यान में रखो। जो त्रैलोक्य वैभव का सुख भोगते हैं उन्हें भी अनुताप होता ही रहता है।
उनके ताप की निवृत्ति के लिए हरिचरण प्राप्ति यही एक साधन है। उसके बारे में बताता हूँ, सुनो।
भगवत उरुविक्रमाङ्घ्रिशाखानखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुनः स प्रभवति चन्द्र इवोदितेऽर्कतापः ॥ ५४ ॥
हरिचरणों का प्रताप महान है। उस श्रीहरि ने त्रैलोक्य में पराक्रम किया। वह चरणवृक्ष अपने अद्भुत
पराक्रम से ब्रह्माण्ड को भी भेद कर उस पार चला गया। उस पादवृक्ष की दस शाखाएँ उसके दोनों पैरों की दस
उँगलियाँ हैं। जिस प्रकार शाखाओं के अग्रभाग पर फल सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार उँगलियों के अग्रभाग पर
नखमणि चन्द्रिका शोभा देती है। उस नखरूप चन्द्रिका के चन्द्रकान्तमणि चरणरूप चन्द्रामृत के कारण नित्य झरते
रहते हैं और भक्तरूप चकोर उस अमृत का सेवन कर सदासर्वदा स्वानन्द से तृप्त रहते हैं। जिस प्रकार सूर्य की
प्रखरदीप्ति चन्द्रबिम्ब में कभी प्रवेश नहीं करती, उसी प्रकार उन्हें कामादिक त्रिविध ताप की बाधा इसके बाद
कभी भी नहीं हो सकती। वे हरिचरण रूप चन्द्र के चकोर होते हैं, उनके सामने कभी स्वप्न में भी संसारताप
नहीं आता। इस प्रकार चरणों की अपार महिमा 'हरि' नामक मुनि (नवयोगियों में से द्वितीय बन्धु) अत्यन्त
आनन्द से वर्णन करने लगते हैं। हे राजा जनक ! 'देहे वै स हरेः प्रियः' इस श्लोक के द्वारा भक्तों के लक्षण और
उनकी क्रिया के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से बताया। उसी प्रकार 'न यस्य स्वः पर इति' इस श्लोक में उनकी
धर्मस्थिति का यथातथ्य वर्णन तुम्हें सुनाया। 'यादृश' अर्थात् वे कैसे होते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं इन प्रश्नों का
उत्तर दिया। भगवद्भजन और आत्मानन्द से उनकी तृप्ति होती है और इस प्रकार वे हरिभक्त विविध तापों का
निवारण कर किस प्रकार शान्ति से रहते हैं यह सब बतलाया। अब उनकी बोलने की पद्धति और निरन्तर चलने
वाली उनके नाम की गर्जना कैसी होती है, उसके सम्बन्ध में, अन्त में हरिऋषि संक्षेप में बता रहे हैं। प्यारे भक्तों
का असीम प्रेम यही उनका प्रमुख लक्षण है। श्रीपति भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकते। उसका वर्णन अब
अगले उपसंहारात्मक श्लोक में हरि सुना रहे हैं।
विसृजति हृदयं न यस्य साक्षाद्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाशः ।
प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्मः स भवति भागवतप्रधान उक्तः ॥ ५५ ॥
मुँह से यदि गलती से भी हरि का नाम निकल गया तो वह सभी पापों का विनाश करता है। उस हरिनाम
की भक्तजन निरन्तर गर्जना करते रहते हैं। इस प्रकार जिसकी जिह्वा पर नाम निरन्तर नाचता रहता है, जो
स्वानन्द से हरिनाम का घोष करते रहते हैं वे अत्यन्त धन्य पुरुष हैं। पूर्ण प्रेम से तथा सद्भाव से नित्य नामस्मरण
करने से वृत्तियाँ अपने आप बदल जाती हैं। उसका भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। नाम के साथ हृदय में भी हरि
प्रवेश होने लगता है। उससे अंतःकरण में पूरी तरह हृदय शुद्धि होने लगती है। तब 'वासना' सांसारिक प्रपंच को
छोड़कर जनार्दन से ही चिपकती है और अहंकार 'अहं' भाव को छोड़कर 'सोहं' (परब्रह्म मैं हूँ) इस भावना में
प्रवेश करता है। 'चित्त' चित्त को भूलकर भगवान से चिपक जाता है, 'मन' का मनपन त्याग कर वह
संकल्पविकल्प करना भूल जाता है। 'बुद्धि' निश्चयपूर्वक 'समाधि' रूप होकर ही रहती है। हृदय की इस प्रकार

द्वितीय अध्याय ५७
शुद्धि होने पर हरि सचमुच ही वहाँ से बाहर नहीं निकलता। हरिनाम के प्रेम से हरि जो एक बार हृदय में प्रवेश
करता है वह भक्त प्रेम के कारण बाहर निकलना ही भूल जाता है। भक्त ने जब प्रेमरज्जु से हरिचरणों को हृदय
के साथ कस कर बाँध लिया है तो हरि वहाँ से कैसे निकल सकता है ? किन्तु भगवान अत्यन्त बलशाली होते
हुए शक्तिशाली दैत्यों का भी संहार करता है, उस महाबलिष्ट हरि को हृदय कमल में बन्द कर दिया इस बात
को क्या कोई मिथ्या कह सकता है। लेकिन जो भँवरा सूखी लकड़ी को भी खोदता है, वही भँवरा कोमल कमल
में प्रेमवश फँसा रहता है। उसमें जो केशर है उसे भी वह नष्ट नहीं होने देता। उसी प्रकार भक्त के अखण्ड प्रेम
के कारण हरि हृदय में स्वयं को बन्द कर लेता है। वहाँ उसका सारा सामर्थ्य और पराक्रम व्यर्थ हो जाता है।
भावार्थ के आगे बल सामर्थ्य का कुछ नहीं चलता। बच्चा बाप की धोती पकड़ कर उसे जाने से रोकता है तो
क्या बाप बल में उससे कम हो गया ? नहीं। प्रेम के भुलावे में वह आगे नहीं बढ़ पाता बस इतनी सी बात है।
उसी प्रकार लाडले निजभक्त का प्रेम, नितांत मधुर होता है इसलिए वहाँ से निकलने की बात भूलकर श्रीहरि
उसके हृदय में ही आनन्दपूर्वक रहता है। ऐसा जिसका अंतःकरण रहता है, उसे श्रीहरि कभी स्वयमेव नहीं
छोड़ते, उसी प्रकार वह भी पूर्णप्रेम के कारण हरिचरणों को छोड़ना नहीं चाहता। हरि के प्रति भक्त की जैसी
प्रीति रहती है, वैसी ही प्रीति हरि की भी भक्त के प्रति रहती है। जो हरि के प्रति निरन्तर अनन्य भाव से रहते हैं
उनके प्रति हरि भी निरन्तर अनन्य ही रहते हैं। उसी प्रकार जो भक्त हरि के प्रति अनन्य भक्ति रखते हैं वे भक्तों
में प्रमुख हैं। हे राजा! वैष्णवों में अग्रगण्य वही हैं और भागवतों में भी उत्तम भागवत वे ही हैं, इसे ध्यान में
रखो। इस प्रकार चारों मुक्तियों को गौण बनाकर संसार में जो भगवद्भक्ति का आश्रय करता है। उस उत्तम भक्त
की स्थिति तुम्हें संक्षेप में बतायी। भक्ति का सम्पूर्ण निरूपण करते समय वेद भी मौन हो जाते हैं, सहस्रमुखी
शेष की जिह्वा भी भक्ति की महिमा का वर्णन करते समय थक. जाती है। हे राजा! मैंने तुम्हें अब तक जो कथा
सुनायी वह इस भक्ति का अंशमात्र ही है ऐसा समझो। हस्त्रिऋषि सदृश रसाल वक्ता से उत्तम भक्त की कथा
सुनते समय सब लोग स्तब्ध रह गये थे। राजा की बात क्या की जाय ? उसका सारा शरीर रोमांच से भर आया
था और प्रत्येक रोम के मूल से पसीना चू रहा था। श्रवणसुख से लुब्ध होकर वह आत्मानन्द से डोलने लगा। मन
में अत्यन्त सन्तुष्ट होकर राजा ने कहा, मुनिवर्य! आपने बहुत अच्छा किया। आपका निरूपण सुनकर बड़ा
समाधान हुआ लेकिन केवल उतने से श्रवण की तृप्ति नहीं होती। हरिमुनि का भाषण सुनकर राजा ने मन ही मन
कहा, ये सभी मुनि आत्मानुभव ज्ञान से परिपूर्ण हैं। इतना ही नहीं, बल्कि वे उत्तम वक्ता भी हैं। इसलिए इनसे
विभिन्न प्रश्न पूछकर सभी का भाषण क्यों न श्रवण किया जाए ? ऐसी पूर्णश्रद्धा से वह राजा अनुपम प्रश्न करने
वाला है। राजा को कथा अत्यन्त प्रिय होने के कारण वह बहुत अच्छे प्रश्न पूछेगा। उसे सुनते ही इच्छा तृप्त
होकर श्रोताओं को बड़ा संतोष होगा। उन प्रश्नों का गूढ़ ज्ञान मैं भी सबको सुनाऊँगा। सम्पूर्ण अर्थ के साथ
यथातथ्य रीति से श्रीजनार्दन ही मेरे मुख से बोलने वाले हैं। मुरली में से अनेक प्रकार की ध्वनियाँ निकलती हैं
लेकिन उसका कौशल बजाने वाले में होता है। उसी के अनुसार जनार्दन की कृपा से 'एका' कवि और ग्रन्थकर्ता
के रूप में आगे आ रहा है। श्रीकृष्णार्पणमस्तु!
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशे स्कंधे निमिजायंत
संवादे एकाकार टीकायाम। द्वितीयोध्यायः ॥ २ ॥

तृतीय अध्याय
'हे चित्स्वरूप सद्गुरु राया ! आपको प्रणाम करता हूँ,' कहकर आपके चरण छूता हूँ, मेरे 'मैं' पन के साथ
तुम्हारा 'तू' पन भी नष्ट हो गया। आपके पैरों की कठोरता कितनी अपूर्व है जो लिंगदेह कभीं वज्र से भी नहीं
टूटता उसे आपने सहज स्पर्श से चूर्ण कर दिया। राजा बलि ने आपके चरण छुए ही थे कि आपने उसे तत्काल
पाताल भेज दिया। लवणासुर सरीखे महाबली का भी आपने इसी प्रकार पैर से कुचल कर विनाश कर दिया।
सचमुच ही आपके पैर बहुत कठोर हैं। कालियानाग से उनका स्पर्श होते ही उन्होंने उसका सारा गरल खींच
लिया और उसे विषविहीन कर दिया। आपके पैर ऐसे कठोर हैं कि शकटासुर से उनका स्पर्श होते ही उसके
पाशबन्ध टूट गये और उसका चलना-फिरना बन्द हो गया। बड़े-बड़े बलवान भी आपके पैरों से भयाक्रान्त रहते
हैं। अहिल्या शिला बन कर पड़ी हुई थी, उसका उद्धार आपके पैरों ने ही किया। दानवीर राजा नृग ब्राह्मण के
शाप से गिरगिटाँग बन कर पड़ा हुआ था—उसे तुम्हारे कृष्णावतारी चरणों का दर्शन होते ही, वह मिथ्या संसार
से अर्थात् जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त हो गया। जो दास स्वेच्छा से आपके चरणों का चिन्तन करते हैं उनका
मनुष्यधर्म ही नष्ट हो जाता है। उन पैरों से यमलोक उजाड़ हो गया और उन्हीं पैरों ने प्राणी का 'जीव' पन नष्ट
कर दिया। आपके चरणों का तीर्थ शंकर ने मस्तक पर धारण किया तो वह जगत के प्राण ही लेने लग गया और
उसकी राख बड़े भक्ति भाव से शरीर में पोत कर, अन्त में नग्न होकर श्मशान में घूमने लगा। ऐसी इन चरणों की
महिमा है। वह शिव का शिवपन नहीं रहने देता, फिर जीवों का 'जीव' पन कैसे रहने देगा? इस प्रकार वे
जीव-शिव भाव तथा उसे मानना ये दोनों ही बातें शेष नहीं रहने देते। यही भाव मन में लाकर एका ने
(एकनाथ) एकत्व से आपके चरणों में अपना स्थान बनाया। लेकिन यहाँ भी आपके चरणों ने बड़ा चमत्कार
किया है। वह यह कि वन्दन करते ही उसका 'एक' पन ही व्यर्थ कर दिया। इसलिए अब कौन किसका वर्णन
अथवा स्तुति करेगा? कौन किसको मनाये? कौन किसे कुछ दे या ले ? क्योंकि अब 'मैं' और 'तू' का तो जीवन
ही समाप्त हो गया। तो अब 'भगवान' और भक्त तो अब तुम ही हो गये न ? तो अब 'मैं पन' कौन किसके
सामने प्रकट करे ? ऐसे पद पर मुझे बिठाकर तुम मुझसे यह ग्रन्थ निरूपण करवा रहे हो? इसलिए हे सद्गुरु
राया ! इस ग्रन्थ का कवि, कर्ता वास्तव में तुम ही हो। मेरा नाम और रूप सब कुछ एक ही है और वह भी
जनार्दन ही हो गया है। इस प्रकार श्रीजनार्दन को एका का बड़ा कौतुक है। उसी कौतुक के कारण वह मेरे नाम
से कवि-कर्ता बनकर यथार्थ आत्मबोध से युक्त होकर इस ग्रन्थ की रचना स्वयं कर रहा है। दूसरे अध्याय के
अन्त में बताया था कि किस प्रकार उत्तम भक्तों ने भजनस्थिति से कठिन माया को समाप्त कर भगवत्प्राप्ति कर
ली। इसलिए हरि की माया कठिन क्यों है, यह पूछने की उत्कंठा राजा में लगी रही। इसलिए बड़े आदर के साथ
उसने कहा, हे मुनिश्रेष्ठों ! सुनिए—
राजोवाच
परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।
मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु नः ॥ १॥
राजा पूछेगा, 'कैसी माया ? कैसा तरण' ब्रह्म क्या है ? और कर्म कैसा होता है ? इनका निरूपण इस तीसरे

तृतीय अध्याय ५९
अध्याय में है। उसमें पहला माया का प्रश्न राजा ने स्वयं ही पूछा। उसका स्पष्टीकरण करने के लिए वह माया
का लक्षण बताते हुए बोला कि जिसका ब्रह्मदेव, शंकर आदि वन्दन करते हैं, वे विष्णु सभी देवताओं में श्रेष्ठ है।
मायिकों को भी भुलावे में डालने वाली उस विष्णु की माया कैसी होती है ? ब्रह्मदेव और शंकर भी मन ही मन
यह समझते हैं कि हम माया के बड़े नियंता हैं किन्तु यह माया उन पर भी अपनी मोहिनी का प्रभाव डालती है।
शंकर के विवाह में ब्रह्मदेव को भी मोह उत्पन्न हुआ था और पार्वती को देखकर उनका वीर्य स्खलित हुआ था।
महादेव तो बड़े ज्ञानी थे किन्तु मोहिनी को देखकर उनका भी वीर्य द्रवित हुआ था। ज्ञानियों को भी जो बड़ी
सहजता से छलती है, श्रुति जिसे 'अजया' अर्थात् अजेय कहती है, उस श्रीहरि की कठिन माया के सम्बन्ध में
मुझे विवेचन करके बताएँ। "माया की पीड़ा अत्यन्त दुःखसह है किन्तु वह अनन्य भक्तों को बाधक नहीं होती।
तुम भी भगवान का भजन करते जाओ। व्यर्थ ही माया की बात क्यों करते हो ?" शायद आप ऐसी बात करें।
इसी अर्थ का निरूपण राजा कर रहा है। मुनियों के मुख से गुह्य ज्ञान जानने के लिए ही अनेक राजा अत्यन्त
उत्कंठा से यह सुन्दर प्रश्न पूछ रहे हैं।
नानुसृप्ये जुषन्युष्मद्वचो हरिकथामृतम्।
संसारतापनितप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम्॥ २॥
श्लोक २-राजा कहता है-आपका अमृततुल्य मधुर भाषण सुनते समय मेरा चित्त कभी 'तृप्त' नहीं
होता। शब्दार्थों का रसास्वादन करते समय 'कान' कुछ अधिक ही क्षुधार्थ हो गये हैं। वह भाषण अत्यन्त रसाल
और अद्भुत होने के कारण कानों को उसे सुनने की हवस हो गयी है। 'जिह्वा' कहती है कि यह रस अत्यन्त
मधुर है और 'आँखों' को तो यह अपूर्व स्वरूप देखकर उल्हास हो रहा है। 'नाक' कहती है कि यही सच्ची
सुगन्ध है। इसके ही कारण सुमन में सुगन्ध होती है। 'वाचा' कहती है कि यह शब्द मानों परमानन्द का अनुवाद
कर रहा है। इस निरूपण का प्रवाह विचित्र है। उसे आलिंगन देने के लिए बाहुओं में स्फुरण हो आता है। जीव
सद्भाव से आत्मा के गले मिलता है। सचमुच, आपकी कथाएँ तो दिव्योषधि की तरह हैं, वे भवरोग को नष्ट
करती हैं। जड़-मूढ़ प्राकृत लोग यदि भक्ति भाव से उनका श्रवण करें तो उनकी त्रिविध तापों से निवृत्ति होती
है। राजा को परमार्थ की विशेष चाह है यह जान कर तथा उसका ध्यान कथा की ओर लगा हुआ है यह देखकर,
बोलने में कुशल 'अन्तरिक्ष' नाम का योगी जो हरि से छोटा था, उसने बोलना प्रारम्भ किया।
अन्तरिक्ष उवाच
एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज।
ससर्जाच्चावचान्याद्यः स्वमात्रात्मप्रसिद्धये॥ ३॥
श्लोक ३-अन्तरिक्ष ने कहा, "हे राजा! तुमने हरि की माया के बारे में पूछा है, लेकिन तुम्हारा वह
प्रश्न ही व्यर्थ चला गया क्योंकि माया के सम्बन्ध में बात करना बड़े-बड़े वक्ताओं के सामर्थ्य के बाहर है।
कहते हैं किसी राजा ने एक बाँझ के पुत्र का जन्मकाल तुरन्त मँगवाया। उससे यदि उस पुत्र की राशि, नक्षत्र,
जाति, कुल आदि के बारे में कोई बताने लगे तो वाचा वेद ही हो जाएगी। जैसे कोई गन्धर्व नगर में मृगजल का
पौसरा खोले या कोई हवा की बातियाँ सूत की तरह बना कर उसे जुगनू के तेज से जलाये अथवा कोई अपनी
छाया के मस्तक पर प्रहार करे, आकाश का छिलका उतार दे, सीप से रगड़ कर अँधेरा नष्ट कर दे अथवा अपने
शस्त्र से हौआ का शिरच्छेद कर उसकी स्त्रियों को विधवा कर दे। जब बाँझ की बहू को बच्चा पैदा हुआ, उस

६० श्रीमद् एकनाथी भागवत

समय भीष्म की स्त्री के स्तनों में दूध उतर आया और उस दूध से मस्त होकर उसने दिगम्बर के मकान को
ध्वस्त कर दिया अथवा चक्की में हवा डालकर उसे महीन पीसा जाए, घोड़े के सींग से आकाश चीर दिया जाए,
नपुंसक के नाती-पोते सूर्योदय के बाद अँधेरे में छिपने के लिये आयें अथवा गुंजा के तेज से मारुति के विवाह में
दीपक जलाये जाएँ और इस विवाह समारोह के लिए किसी उजाड़ गाँव में जाकर कोई अपनी छाया बेच दे
अथवा आकाशपुष्प गन्धयुक्त हैं या गन्धहीन हैं आदि बातों का विचार जो विद्वान कर सकते हों, वे हीं चाहें तो
माया का विवेचन बेझिझक करें। कुल मिलाकर, माया के सम्बन्ध में कुछ बोलने से बोलने वाला लज्जित हो
जाता है। यह एक तरह से किसी अजन्मे का श्राद्ध करने की तरह है। मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है, इसीलिए
वह खुद को 'माया' कहती है और इसीलिए शास्त्र उसे 'अविद्या' कहकर पुकारते हैं। 'भ्रम' ही इस माया का
मूल है। भ्रान्ति उसका उज्ज्वल फूल है और विषयरूपी रस में निरन्तर डूबी हुई 'भूल' यही उसका ताजा फल
है। जो अस्तित्व में ही नहीं है, उस रूप से वह अस्तित्व में आयी है, सत्यासत्य से वह गर्भवती हुई है और
असत्य के अनेक पिल्लों को उसने जन्म दिया है। वासने के विषय रूपी डोर से बँधी हुई वेणी धारण कर यह
मटकती रहती है, और 'मैंपन' के यौवन से यह मदनमोहिनी चमकती रहती है। मृगजल के मोतियों की जाली
गूँथकर यह अपने मस्तक पर धारण करती है। आकाश की चम्पाकली धारण कर अत्यन्त सौन्दर्य से यह
लावण्यमयी फड़कती रहती है। वह रज्जुसर्प के मस्तक से मणि निकालकर तथा उसके अलंकार बनवा कर
अपने शरीर पर धारण करती है और सीप पर भासित होने वाली चाँदी की पैंजनिया पहन कर छम-छम की
आवाज करती हुई चलती रहती है। खरगोश के सींग के खड़ाऊ पहनकर वह चलती रहती है। उसका ज्येष्ठ
और सुन्दर पुत्र 'अहंकार' है जिस पर वह अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करती है। अपना वंश बढ़े इसलिए वह
ममतारूपी कन्या कई जगह प्रसूत हुई और देह में मोह उत्पन्न कर उसे घरजमाई बनाकर रख लिया। उस
अहंमोहममता के संयोग से संसार का अपने आप विस्तार हुआ। ममता सबल प्रयोगों से अपने अंग बढ़ाती रहती
है। संकल्प विकल्प के कंगन पहनकर मन ममता के पास गिरवी रखती है। त्रिगुण के आधार बनाकर माया दिन
पर दिन मोटी हो रही है। हे राजा ! ऐसी है यह मूलमाया जो मिथ्या होते हुए भी मोटी दिखाई देती है। वह किस
प्रकार नियन्त्रण में आएगी यह कहना कठिन है। उसे यदि 'सत्' कहा जाए तो वह 'ज्ञान' प्राप्ति के बाद नष्ट हो
जाती है, यदि 'असत' अर्थात् मिथ्या कहा जाए तो दिखाई देती है। यदि यह कहें कि पहले रहती है और बाद में
नष्ट हो जाती है, तो ऐसी भी बात नहीं है। वह ऐसी है जिस प्रकार मृगजल का ज्ञान ! मृगजल दिखाई देता है
किन्तु वह पूर्णतयः मिथ्या रहता है, उसी प्रकार हे नृपनाथ ! संसार के अस्तित्व का जो आभास होता है, वही
माया है। वेदशास्त्रों से माया का पता पूछने पर वे मौन हो जाते हैं। माया का स्वरूप सच्चा है लेकिन ठीक तरह
से देखा जाए तो वैसा नहीं दिखाई देता। मृगजल की महानदी किस पर्वत से निकली यह कहना जिस प्रकार
कठिन है, उसी प्रकार माया का सच्चा लक्षण बतलाना भी वाणी के लिए असम्भव है। प्रतिबिम्ब क्या दर्पण में
रहता है? लेकिन जो उसमें देखता है उसे अपना प्रतिबिम्ब उसमें दिखाई देता है। उसी प्रकार हमारे संकल्प के
अनुरूप मिथ्या माया का आभास होने लगता है। डोरी का सर्प जिन्दा पकड़ा है, उसे देखने चलिए ऐसी बातें जो
करते हैं, वे माया के बड़प्पन की चाहे जितनी बातें करें, लेकिन कोई अपनी छाया हटाना चाहे तो उसके लिए
जैसे यह सम्भव नहीं है, उसी प्रकार हे राजा ! माया से पार पाना दुस्तर है। जैसे अग्नि उत्पन्न करना सूर्य का
संकल्प नहीं रहता उसी प्रकार सूर्यकांत में भी उसका अस्तित्व नहीं दिखाई देता लेकिन नीचे पकड़ी हुई रुई में
अग्नि प्रज्वलित होता है। उसी प्रकार शुद्ध ब्रह्म में संकल्प नहीं होता। उसी प्रकार वह केवल देह में भी नहीं

दिखाई देता। लेकिन वासना की ठाँव में देहाभिमान से संसार का भास होता है। जब तक जागृत देह का
विस्मरण हो रहा है, तब तक दूसरा स्वप्नदेह प्राप्त होता है। जिससे मिथ्या स्वप्नप्रपंच बढ़ता है। स्वप्नावस्था में
स्वप्न कभी मिथ्या नहीं मालूम होता। सुषुप्ती में देह असम्भव है, इसलिए वहाँ संसार का अस्तित्व नहीं है। वहाँ
जन्म-मरण भी मिथ्या है। संसार की अर्थात् जन्म-मरण की सम्भावना देहाभिमान के कारण ही होती है। इस
प्रकार आत्मत्व का विस्मरण होने से 'मैं ही देह हूँ' का अहंकार उत्पन्न होता है और उस अहंकार से दुस्तर संसार
की वृद्धि होती है। जिस प्रकार मृगजल में मछली मिथ्या है, उसी प्रकार ब्रह्म में प्रपंच तो होता ही नहीं है।
इसलिए उसे नष्ट करने के साधन का उपयोग करने का पागलपन तो पागल ही जाने। 'माया' इस दो अक्षर के
शब्द का अर्थ बतलाने गया तो हे राजा! श्लोक का अर्थ तो रहा एक तरफ लेकिन ग्रन्थ का विस्तार व्यर्थ ही बढ़
गया। ज्ञानी लोग भी माया का अर्थ जानने जाते हैं और पागल बन कर रह जाते हैं। नामरूप के भरोसे कल्पना के
वश में माया बढ़ती है। हे राजा! तुम्हें माया के रूप की प्रमुख पहचान बताता हूँ। सच तो यह है कि हमारी
कल्पना की उड़ान ही माया है। हे राजा! हमारे हृदय में जो आशा है वही प्रमुख माया है। जो नित्य सभी दृष्टियों
से निराश रहता है, वही ईश्वर को पूज्य होता है। अब जब तुमने प्रश्न किया ही है तो तुम्हें उस माया के कुछ
उदाहरण बताता हूँ। उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करने वाली वह माया त्रिविध गुणों में भासित होती है। जिस
प्रकार सूर्य का अग्निविषयक कोई संकल्प नहीं होता, फिर भी जब वह अपने किरणों के योग से सूर्यकांता से
अग्नि उत्पन्न करता है, तब वह उसमें स्वयं की तरह दिखाई देता है। उसी प्रकार शुद्ध स्वरूप में कोई भी संकल्प
नहीं होता। न होते हुए भी जो दिखाई देती है, वही हे राजा जनक! 'मूलमाया' है। स्वरूप पूर्ण निर्विकल्प है।
वहाँ 'मैं' कहने वाला कौन है? ऐसे स्थान पर भी जहाँ 'मैंपन' की स्फूर्ति होती है, वही मुख्य रूप से 'मूल
माया' है। उस 'मैंपन' में वह 'मैं मुझे ही इस दृष्टि से देखूँ', 'मैं अपने से ही बातें करूँ', बड़े आदर से मेरी
मुझसे ही भेंट हो ऐसा कहता है। 'मेरी मुझसे ही अत्यन्त प्रीति है', 'मैं स्वयं में ही रममाण होऊँ', 'मैं अपनी ही
युक्तियों से, मेरे ही बोध से, मुझे मेरी प्राप्ति हो', 'मैं ही मुझ को आलिंगन दूँ', 'मैं स्वयं मेरा उपयोग करूँ', 'मैं
ही मुझसे मिलूँ', 'स्वामीसेवक के नाते से सर्वकाल मैं ही मुझ पर नियन्त्रण करूँ' ऐसा हे आजानुबाहो नृपश्रेष्ठ!
भगवान ने विचार किया और उस विचार से ही पंचभूत एवं भौतिकों का निर्माण हुआ। चार वर्ण, चार खान, चार
युग, चार वाणी, चारों पुरुषार्थ और चारों लक्षणों से चारों मुक्ति की रचना भी उसी स्फुरण से हुई। उस स्फुरण ने
ही तीनों गुण उत्पन्न कर त्रैलोक्य की रचना की। उसने ही ज्ञान, ज्ञाता तथा ज्ञेय इस त्रिपुटी के कार्यों की संरचना
कर सारा कर्म भी तीन प्रकार का किया। इस प्रकार एक स्फूर्ति ने ही एकता में अनेकता का रूप उत्पन्न किया।
लेकिन उस अनेकता में जो एकता है, वह पूर्णरूप से अखण्ड है। वह कभी भी नहीं टूटती। कुम्हार जिन मटकों
की रचना करता है, उनमें आकाश स्वयमेव रहता है। उसी प्रकार पंचमहाभूत तथा भौतिक शरीरों में श्रीहरि
अंतर्बाह्य भरे ही रहते हैं। इसीलिए हे राजा! 'एकाकी न रमते' इस श्रुति के अनुसार भगवान में द्वैत की स्फूर्ति
हुई ऐसा उपनिषद में कहा गया है। अथवा हे राजाधिराज यह बात ध्यान में रखो कि ऐक्यरूप से जिन महाभूतों
ने आकार लिया है, वही यहाँ 'माया' है। किन्तु भूतभौतिकादि में जो स्फूर्ति आती है उसे माया अपनी शक्ति से
प्रकाशित नहीं कर सकती। तो माया का प्रकाशक चिन्मूर्ति परमात्मा ही समस्त भूताकृतियों में प्रविष्ट हुआ रहता
है। वही माया का प्रमुख लक्षण प्रकाशित करता है और वही भूतात्मा भूतों में वास्तव में प्रवेश न होते हुए भी
प्रवेश दिखलाता है।

६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्टः पञ्चधातुभिः ।
एकधादशधाऽऽत्मानंविभजञ्जुषतेगुणान् ॥ ४ ॥
इस प्रकार जड़, मूढ़ एवं अचेतन ये पंचमहाभूत तथा प्राणिमात्र की उत्पत्ति हुई और उन्हें अपने-अपने
कर्म करने के लिए, उनमें प्रवेश कर उनके विभाग बाँट दिये गये। पाँच प्रकार के पंचमहाभूत अपने-अपने
कार्यों में तत्पर रहें इसलिए हे राजा! श्रीअनंत ने स्वयं भी पाँच रूपों में उनमें प्रवेश किया। वह प्रवेश कैसे
किया, उसे बताता हूँ, सुनो। श्री अनंत ने 'गन्ध' रूप में पृथ्वी में प्रवेश कर उसमें पूर्ण क्षमाभाव उत्पन्न कर, उसे
सहज रूप से प्राणियों का भार सहन करने में समर्थ किया। हे मिथिलाधिपते! पृथ्वी में भगवान ने प्रवेश किया
इसीलिए वह अपने चारों ओर जल से आवृत्त होते हुए भी उसमें विलीन नहीं हुई। शेषरूप भगवान पृथ्वी को
धारण करता है, इसलिए समुद्र उसे गला नहीं सकता। शेष के ही कारण पृथ्वी सुदृढ़ हुई है और इसीलिए वह
समस्त प्राणिमात्र का भार सहन कर रही है। 'स्वाद' के रूप में श्रीहरि जल में प्रवेश कर वहाँ द्रवरूप में अर्थात्
पतले रूप में रहकर निरन्तर प्राणियों की रक्षा करता है। जगजीवन ही जल में निहित है इसीलिए वह आवरण
जल शोषण हुए बिना वैसा का वैसा रहता है। श्रीहरि की यह कितनी महानता है। सद्रूप श्रीहरि तेज में 'रूप'
होकर रहता है, इसलिए आँखों में विचित्र तेज दिखाई देता है। उसी प्रकार पेट में प्रदीप्त जठराग्नि के रूप में
वही है। तेज-में रूपगुण से श्रीहरि घुसा हुआ है, इसलिए वह आवरण वायु में विलीन नहीं हो जाता। 'स्पर्श'
गुण से भगवान वायु में प्रविष्ट है इसलिए प्राण के योग से जीव सशरीर विचरण करते रहते हैं। स्पर्श रूप से
भगवान वायु में प्रवेश करते हैं इसलिए आकाश वायु को ग्रसित नहीं कर सकता। 'शब्द' गुण से श्रीहरि
आकाश में प्रवेश करते हैं इसीलिए प्राणियों को रहने के लिए पर्याप्त स्थान मिल पाता है। चक्रपाणि आकाश में
शब्दगुण से विद्यमान है, इसलिए वह निजकारण से अर्थात् महत्तत्त्व में विलीन नहीं हो सकता। पंचमहाभूतों में
देखा जाए तो वहाँ नित्य ही परस्पर बैरभाव दिखाई देता है। एक को ग्रसने के लिए दूसरा सदैव तैयार ही रहता
है। पानी पृथ्वी को घोलना चाहता है तो पानी को तेज अर्थात् अग्नि सुखाना चाहता है, तेज को वायु निगलना
चाहता है तो आकाश वायु को निगलना चाहता है। लेकिन श्रीधर उन सबमें प्रवेश कर उनका परस्पर वैरभाव
मिटा कर उन्हें आपस में आनन्द से रहने देता है। इस प्रकार पंचभूतों में आकार आकर उनमें से प्राणियों के
शरीर बने और भगवान माया के योग से जीव रूप में प्रवेश कर उनसे परस्पर व्यवहार कराने लगा। उसी को
ब्रह्माण्ड में 'पुरुष' तथा पिण्ड में अर्थात् देह में 'जीव' कहते हैं। भगवान ही जीव शिवरूप से देह में
प्रतिबिम्बित हुआ, यह माया का अपना स्वभाव है। शिव में जो 'योगमाया' के नाम से प्रसिद्ध है, वही 'जीव' में
'अविद्या' कहलाती है। प्रमुख रूप से माया की भ्रांति यही है। स्वप्न की ही तरह संसार भी उसके ही कारण
विभासित होता है। जिसे ईश्वर का 'दीर्घस्वप्न' कहा जाता है वह यही माया से भासित होने वाला जगद्रूपी
संसार है और नींद में अविद्या के कारण जो दिखाई देता है वह जीव का स्वप्न है। जाग जाने पर जैसे स्वप्न
मिथ्या होता है, उसी प्रकार ज्ञान अर्थात् आत्मसाक्षात्कार होने पर संसार का आभास भी मिथ्या होता है। हे नृप!
यह सब माया का कार्य है, इसे ध्यान में रखो। हे राजराजेश्वर! अब तुम्हें जीव की विषयावस्था सुनाता हूँ। वह
अपना एक प्रकार तथा दस प्रकार के भाग बनाकर किस प्रकार विषयभोक्ता बनता है, यह सुनाता हूँ। वह
जनार्दन एक विभाग रूप अर्थात् अंतःकरण बना तथा फिर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चार विभागों में
पुनः बँट गया। जीव अपने परिपूर्णत्व से तथा निजात्म शक्ति से 'अहं' कहता है लेकिन माया ने चतुराई कर
'देहोऽहं' अर्थात् साढ़े तीन हाथ का देह ही मैं हूँ, यह भावना दृढ़ की। अहंकार जब देहात्मभावना को बढ़ाता है

तृतीय अध्याय ६३
तो जीव अपनी चिद्रूपता अर्थात् चैतन्यरूपता भूल जाता है। वह विस्मरण चिन्ता बढ़ाता है, यही 'चित्त' है।
देहाहंता अत्यन्त चपल है, उसे ही 'मन' कहते हैं। वही अनेक प्रकार के संकल्प विकल्पों का जाल फैलाता है
और भय, शोक और दुःख उत्पन्न करता है। देह-अहंता के चातुर्य को ही 'बुद्धि' कहा गया है। जन्म-मरण
अनिवार्य है, यह निश्चय भी बुद्धि ने ही किया। इस प्रकार देहाभिमान के मस्तक पर 'चित्तचतुष्टय' ये
अवस्थाएँ रहती हैं। वास्तव में संसार का कर्ता देहाभिमान ही है, यह ध्यान में रखो। जब 'सोहं' भी अहंकार
करता है, तभी चित्त में चैतन्य होता है, मन 'उन्मन' होता है, बुद्धि परब्रह्म में निश्चित हो जाती है। जब सम्पूर्ण
अभिमान का ही अन्त हो गया तो फिर कहाँ रह गयी बुद्धि और कहाँ रह गया मन? चित्त का चित्तपन डूब
जाता है और चारों ओर परब्रह्म ही भर जाता है। हे राजा! तुम्हें अन्तःकरणरूप 'एकधा' विभाग की पहचान
अथवा लक्षण बताया। अब 'दशधा' लक्षण बताता हूँ, सुनो। दस प्रकार के इन्द्रिय अचेतन हैं, उन्हें चेतना देने
वाला नारायण है। वह विभिन्न दस रूपों में उनमें प्रवेश कर उनसे विहित क्रिया करवाता है। आँखों में देखने की
शक्ति देकर वह दृश्य को दृश्यरूप में प्रकाशित करता है। ऐसे प्रकाशक धर्म से वह दृश्य का सौन्दर्य दिखलाता
है। कान में 'सुनना' वही बन गया है। शब्द के रूप में वही शब्द व्यक्त करता है और फिर अर्थज्ञ होकर
प्रबोधन भी वही करता है। रस में 'रस की रुचि' वह नारायण ही है। जिह्वा में रुचि जगानेवाला वही है। इस
प्रकार जनार्दन जन में अनेक प्रकार के रसों का सेवन करवाता है। पुष्पों में 'सुगन्ध' के रूप में जो है वही
श्रीहरि है और नाक में गन्ध ज्ञान जाननेवाला भी वही है। इस प्रकार श्रीहरि अपने ही स्वरूप से पुष्पों का
मकरंद जीवों को सेवन करवाता है। 'स्पर्श' के चार गुण—शीत, उष्ण, मृदु, कठिन आदि को प्रकाशित करने
वाला वही नारायण है। त्वचा में 'स्पर्श' जानने वाला भी वही बनता है और इस प्रकार वह जगजीवन स्पर्श के
सुख का भोग करवाता है। (इस प्रकार ज्ञानेन्द्रियों के पाँच प्रकार बतलाये।) (अब कर्मेन्द्रियों के पाँच प्रकार
बताते हैं) वाणी का वाचक कमलापति है। वही शब्दमालिका व्यक्त करता है और वही अनेक प्रकार की
शब्दार्थव्युत्पत्ति प्राणियों से व्यक्त करवाता है। हाथ में 'लेने-देने' की शक्ति उस अकर्ता की ही है, उसी प्रकार
पैरों से 'चलना' उस गोविन्द के ही कारण सम्भव होता है। कर्मेन्द्रिय का चौथा इन्द्रिय जो उपस्थ है, उससे होने
वाली सुखप्राप्ति उस श्रीपति के कारण ही होती है। उस सुख से वह भगवान ही सुखी होता है। स्त्री-पुरुषों का
समागम सुख भी वह पुरुषोत्तम अपनी पसन्द से प्रकाशित करता है। गुदा में 'मलविसर्जन' का जो क्षरणधर्म है,
वह भी उस अक्षररूप परमात्मा की शक्ति से उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह परिपूर्ण निजात्मा प्राणियों की देह
में दस प्रकार से विभाजित है। इस प्रकार वह विषयों का भोग कर विलास करता है और भोग्य और भोक्ता इन
दोनों प्रकारों से स्वयं ही व्यक्त होकर वे सारे भोग स्वयं भोगता है। जिस प्रकार साल वृक्ष में साल का ही बीज
रहता है, छोटी-मोटी टहनियाँ भी साल की ही होती हैं, कैसा भी विकार पाये बिना वह वृक्ष ही बनता है।
अथवा जिस प्रकार गन्ने का टुकड़ा गन्ने का ही बीज रहता है और उसे जमीन में बोने के बाद बाहर भी वह गन्ने
के ही रूप में बढ़ता है, वह भले ही विभिन्न प्रकार का दिखाई देता हो लेकिन उसमें ऊपर से लेकर नीचे तक
एक ही प्रकार का रस रहता है। उसी प्रकार विषय और इन्द्रिय इन दोनों को ही परमात्मा एक ही समान
प्रकाशित करता है और फिर विषय के प्रति रुचि भी जीवस्वरूप से स्वयं ही लेता है।
गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः ।
मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥५॥
इन्द्रियों को और विषयों को अंतर्यामी स्वाभाविक रूप से प्रकाशित करता है। किन्तु जीव उन विषयों का

६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सेवन कर अहंभाव के कारण आसक्त होता है। वह कहता है, ' 'अहा ! यह विषय-प्रेम कितना मधुर है। यह मेरे
शरीर की हवस को तृप्त करता है।' ' ऐसा कहते समय अधिक विषयभोग करने के लिए इन्द्रियों की इच्छा
प्रक्षुब्ध होती है। देहाभिमान के कारण इन्द्रियों की विषय के प्रति आसक्ति बढ़ती ही रहती है और मूल
आत्मस्फूर्ति का अस्त होकर मोह और ममता का पलड़ा ऊपर चढ़ता जाता है। तब वह देह को ही 'मैं' कहता है
और जो देह के सम्बन्धी हैं, उन्हें अपना कहता है। विषय लोलुपता के कारण उसे क्षण भर के लिए भी फुरसत
नहीं मिलती। प्राकृतिक रूप से जो कर्म होता रहता है, उसे मैं कर रहा हूँ, ऐसा ही वह कहता है जिससे व्यर्थ के
देहाहंकार का आतंक फैल जाता है। देह का अहंकार प्रबल होते ही, मोह और ममता अनिवार हो जाती है और
इस प्रकार जन्म-मरण का रास्ता तेजी से शुरू हो जाता है।
कर्माणि कर्मभिःकुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत्।
तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ्रमतीह सुखेतरम्॥६॥
मन में विषयेच्छा रखकर जब कर्मेन्द्रिय कर्म करते हैं तो धर्म और अधर्म की उत्पत्ति होती है और वे ही
जीव के लिए अत्यन्त बाधक होते हैं। इच्छित फल का भोग मिलते ही, उस जैसा भोग लेना आवश्यक हो जाता
है। उस देह से फिर देह की ही खान खुलती है, अर्थात् अनेक जन्म लेने पड़ते हैं और मृत्यु भी भोगनी पड़ती
है। फल की आशा से किया हुआ कर्म भयंकर होता है। उससे उन्हें भी मृत्यु प्राप्त होती है, जो अमर हैं और
जो जन्मरहित हैं उन्हें भी बार-बार जन्म लेने को बाध्य करता है। इस प्रकार स्वर्ग और संसार के बीच संचार
अर्थात् जन्म-मरण के फेरे शुरू हो जाते हैं और अपने कर्म के कारण विविध प्रकार की योनियाँ भोगनी होती हैं।
कोल्हू के बैल को कोल्हू से जोतने पर वह बार-बार कोल्हू के चारों ओर फेरा लगाता रहता है उसी प्रकार ज्ञान
की आँखें बन्द कर अपने कर्मों का फल भोगते हुए जन्म-मरण के असंख्य कष्ट भोगने पड़ते हैं। उदय और
अस्त के अनुसार जिस प्रकार सूर्य को घूमना ही पड़ता है, उसी प्रकार जन्म और मृत्यु के भोग जीव भोगता
रहता है। बड़े परिश्रम से वह जन्म लेता है, तभी मृत्यु भी उसका पीछा करती हुई आती है। जिस प्रकार एक ही
डंठल पर जुड़वाँ फल आते हैं, उसी प्रकार जन्म-मरण के करोड़ों भोग जीव स्वयं अनुभव करता है।
इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रवहाः पुमान्।
आभूतसम्प्लवात् सर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः॥७॥
जो पूर्णरूप से स्वतंत्र था वह कर्मों के अधीन हो गया और इस प्रकार कर्मगति का पात्र होकर निरन्तर
सुख और दुःख भोगने लगा। विषय का सुख मानकर उसने जानबूझ कर विष ही ग्रहण किया और अगणित
दुःखों का पात्र बना। करोड़ों जन्म लेकर दुःख भोगते रहने पर भी दुःख कम नहीं होता। वह दुःखों के भँवर में
फँस जाता है, शोक और मोह के गर्त में पड़ जाता है और घोर यातनाओं में डूब कर सर्वदा कालाग्नि में उबलता
रहता है। इस प्रकार प्रत्येक जन्म में दुःख और शोक सहन करते-करते आगे एकाएक महाप्रलय भड़क उठता है।
फिर वहाँ से लौटना सम्भव नहीं होता और आगे बढ़ने का भी मौका नहीं रहता। इस प्रकार वह जब अपने कर्म
से बँध जाता है, तब प्रलय का प्रहार उसके मस्तक पर होता है। अब तक तुम्हें उत्पत्ति और स्थिति के बारे में
सम्पूर्ण रूप से बतलाया। अब प्रलय का लक्षण बताता हूँ, ध्यान से सुनो।
धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम्।
अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्तायापकर्षति॥ ८॥

तृतीय अध्याय ६५
सूर्योदय होने के बाद दिन जिस प्रकार समाप्त होते ही रात आनी ही है, उसी प्रकार उत्पत्ति और स्थिति
समाप्त होते ही प्रलय का आना निश्चित ही है। ऐसा प्रलयकाल आता देख अनादि काल क्षुब्ध होता है और वह
महाभूतों के साथ पृथ्वी का विनाश करने के लिए भयंकर ताण्डव करने लगता है। जब फसल पक जाती है तो
गरमी में अपने आप सूखने लगती है उसी प्रकार अब तक सृष्टि में स्थूल आकार में जितना कुछ व्यक्त हो रहा
था, उन सबकी वह अव्यक्त अर्थात् अदृश्य करने लगता है। घास आदि का बीज पृथ्वी पर पड़ा रहता है, वह
वर्षाकाल में अपने आप अंकुरित हो जाता है और शरद ऋतु में अनेक रूपों से फल बनकर पुष्ट होता है। ग्रीष्म
ऋतु के अन्त में उसकी जड़ें और फल अदृश्य हो कर उसके बीज पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं। उसी प्रकार इस
संसार की अवस्था है। जिस प्रकार वसन्त ऋतु के आगमन से पहले पेड़ों के पत्ते गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार
ब्रह्मदेव आदि का प्रभाव भी काल अपनी शक्ति से नष्ट कर देता है। जिस प्रकार किसान सूखे खेत को बटोरने
लगता है, उसी प्रकार काल भी शीघ्रता से व्यक्त को अव्यक्त करने लगता है। हे राजा! वही अव्यक्त करने की
रीति तुम्हें बताऊँगा। प्रलयकाल आने से पूर्व ही काल की प्रक्षोभक शक्ति प्रकट होती है।
शतवर्षा ह्यनावृष्टिर्भविष्यत्युल्बणा भुवि।
तत्कालोपचितोष्णार्को लोकांस्त्रीन् प्रतपिष्यति ॥ ९॥
जब कालशक्ति क्षुब्ध हो जाती है तो सौ वर्ष तक वर्षा नहीं होती। इससे महासंकट उत्पन्न होकर सृष्टि का
संहार होता है। पृथ्वी की पीठ पर कुछ भी शेष नहीं रहता। प्राणि मर जाते हैं, जंगल जलकर राख हो जाते हैं।
आँख में लगाने भर के लिए भी एक बूँद पानी नहीं रहता। इस प्रकार काल सभी लोगों का संहार कर डालता है।
तभी द्वादश सूर्यों का मेला आकाशमण्डल में एकत्र होकर उसके प्रखर किरणों से सारा त्रिभुवन संतप्त हो उठता
है। धूप की लहरें उठती हैं और उनके कारण पर्वत मालाएँ झुलस जाती हैं। हे राजा! उस भयानक अग्नि से
भूमण्डल देखते-देखते भस्म हो जाता है।
पातालतलमाराभ्य सङ्कर्षणमुखानलः।
दहन्नूर्ध्वशिखोविष्वग् वर्धते वायुनेरितः ॥ १०॥
उष्णता से पृथ्वी का तल तपता है और उससे शेष नाग का फन झुलसने लगता है। तब शेष अपने
सहस्रमुखों से विष की अग्निज्वालाएँ उगलने लगता है। अग्नि की वे ज्वालाएँ पाताल के नीचे से ऊपर आकर
त्रिभुवन को भी जलाने लगती हैं। तबिवार ज्वाला भड़क उठती है। शेषनाग क्रोध से फुफकारने लगता है।
उससे प्रचण्ड वायु उत्पन्न होती है और वही उस अग्नि की सहायक बनकर जब दसों दिशाओं को जलाने लगती
है तब ज्वालाएँ और भी अधिक भड़कती हैं।
सावर्तको मेघगणो वर्षति स्म शतं समाः।
धाराभिर्हस्तिहस्ताभिर्लीयते सलिले विराट् ॥ ११ ॥
स्वर्ग से लेकर पाताल तक अग्नि की ज्वालाएँ भड़क उठती हैं, तभी प्रलय करने वाली मेघपंक्ति भी उस
दुर्धर प्रसंग में क्षुब्ध हो जाती हैं। उस समय पानी की बड़ी-बड़ी बूँदें नहीं गिरतीं बल्कि जोर से बिजली
कड़कती है और अत्यन्त प्रचण्ड एवं निरन्तर मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है। हे राजा! ये पर्जन्य धाराएँ अन्य
धाराओं की तरह साधारण नहीं होतीं। उनका परिमाण तुम्हें बताता हूँ। हे वीरश्रेष्ठ! वह प्रसंग सचमुच ही अत्यन्त
कठिन है। उन प्रलय मेघों की धाराएँ उन्मत्त हाथी की सूँड की तरह होती हैं और ऐसा वह पर्जन्य क्षणभर के

६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
लिए भी रुके बिना सौ वर्ष तक निरन्तर बरसता रहता है। बिजली अपने तेज से सम्पूर्ण आकाश को जला डालती
है। उसके गर्जन से काल की भी घिग्घी बँध जाती है। इस प्रकार प्रलयकाल में मेघ उन्मत्त हो जाते हैं। इससे
अपार जल का संचय होता है। वह इतना अधिक हो जाता है कि जहाँ से मेघ बरसते हैं, उसे भी मिलाकर
समस्त त्रैलोक्य जलमय हो जाता है। ऐसे उस मेघ को 'सावर्तक मेघ' कहते हैं। उसकी वृष्टि अद्भुत रहती है।
उस समय तीर्थ, क्षेत्र, पवित्रोदक, नदियाँ और समुद्र सब एक हो जाते हैं। चन्द्र, सूर्य आदि के साथ तीनों लोक
उस जल में डूब जाते हैं। अरे! ऐसे उस ऐक्यसमुद्र में परमेश्वर का विराट् देह भी विलीन हो जाता है। हे राजा!
उस समय साकार जैसी कोई वस्तु शेष नहीं रहती।
ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप।
अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२॥
श्लोक १२—प्रलयकाल में महाभयंकर पानी ऐसे उल्हास से उछलता है कि वह समस्त दृश्य पदार्थों का
विनाश कर डालता है। उस समय विराट् पुरुष का शरीर भी पिघल जाता है। ईंधन समाप्त होने पर जिस प्रकार
अग्नि अपने पूर्व स्वरूपं में चला जाता है, उसी प्रकार विराट् शरीर का अभिमानी 'वैराज' पुरुष अव्यक्त में
अर्थात् प्रकृति में प्रवेश करता है। जो कोई ब्रह्मलोक में रहने वाले होते हैं, उन्हें महाप्रलय के समय ब्रह्मदेव के
ही साथ मुक्ति मिलती है ऐसा श्रुतिस्मृति का वचन है। जिसे 'वैराजपुरुष' कहते हैं वह 'हिरण्यगर्भ' ही है। उसे
भी प्रलयकाल में अव्यक्त में प्रवेश करना पड़ता है। तो फिर ब्रह्मदेव के साथ वहाँ के लोगों को मुक्ति मिलती है,
ऐसा जो श्रुति में कहा गया है, उस वचन की क्या व्यवस्था की जाए? (अन्तरिक्ष बताते हैं-) राजा जनक ने
जिस माया का स्वरूप पूछा है, उस माया की शक्ति इतनी दुर्धर है कि यदि भगवद्भक्ति न की जाए तो ब्रह्मदेव
को भी वह मुक्ति नहीं मिलने देती। ब्रह्मलोक प्राप्त होने पर भी यदि भगवद्भक्ति न की जाए तो मुक्ति दुर्लभ
है। निश्चय ही भक्ति के पास मुक्ति दासी की तरह रहती है। भगवद्भजन न किया जाए तो ब्रह्मदेव को भी मुक्ति
नहीं मिलती तो परमार्थ में लगे अन्य ज्ञानाभिमानी लोगों की क्या बात की जाए ? जिसे जिस पद का अभिमान
रहता है, उसके लिए वही दृढ़ बन्धन होता है। इसलिए त्रिभुवन में मोक्ष दुर्लभ हो गया है। इसलिए स्वयं शंकर
भी अपने कैलास पद का अभिमान छोड़कर दिन रात महाश्मशान में (काशी क्षेत्र में) रहकर भगवद्भजन में
लीन रहता है। इसलिए हे राजराजेश्वर ! ब्रह्मलोक प्राप्त होने पर जो वहाँ भी भगवद्भक्ति करते हैं, उन्हें ही प्रलय
के अन्त में मुक्ति प्राप्त होती है। ब्रह्मलोक में रहकर जो हरि की भक्ति नहीं करते, वे पुनरावृत्ति के फेर में फँस
जाते हैं। ऐसी माया की शक्ति अत्यन्त दुर्धर है। सारांश यह कि यदि भक्ति न की हो तो मुक्ति किस बात की ?
इसी अर्थ का ब्रह्मदेव का वचन (भागवत में) दो श्लोकों में है। उसका भावार्थ यह है, "ज्ञानाभिमानियों का
पतन होता है और भक्तों को संसार बन्धन की कभी बाधा नहीं होती। श्लोक इस प्रकार है—"
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्त भावादविशुद्धबुद्धयः ।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ १॥
तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद्भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः ।
त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभु ॥ २॥
(भागवत, द० स्कं० पूर्वार्द्ध अ २)
भगवद्भक्ति न करने पर ज्ञानीजनों को भी मुक्ति नहीं मिलती। इसी अर्थ के दृष्टांत के लिए ब्रह्मदेव का

तृतीय अध्याय ६७
भाषण यहाँ दिया हुआ है। जन्म में श्रेष्ठ ब्राह्मणजन्म और वह भी वेदशास्त्र सम्पन्न, ऐसा होने पर भी
भगवद्भजन न करने पर उसका भी निश्चित रूप से पतन होता है। भक्तों की समस्त प्राणियों के प्रति
भगवद्भावना ही होती है, इसलिए वहाँ विघ्नों को स्थान ही नहीं मिलता क्योंकि विघ्न का अर्थ है हानि। लेकिन
वही उनके लिए उपाय बन जाता है क्योंकि भावार्थ के लिए ईश्वर सदा सहायक होता है। भक्ति के बिना मुक्ति
की चाह कर प्रयत्न करने से वह प्रयत्न निष्फल होता है। अस्तु। अब वर्तमान प्रकरण (प्रलय) के सम्बन्ध में
बात करें। बैराजपुरुष भी अव्यक्त में प्रवेश करता है। वैराज का अव्यक्त में प्रवेश होते ही महाभूत विलास
(अथवा विनाश) शुरु होता है और भूतों का ह्रास् होने लगता है। राजा! उनका 'अनुप्रवेश' अर्थात् एक में दूसरे
का विलय किस प्रकार होता है उसे क्रम से सुनाता हूँ।
वायुना हृतगन्धाः भूः सलिलत्वाय कल्पते।
सलिलं तद्धृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते॥ १३॥
प्रलयवायु का प्रक्षोभक क्रोध पृथ्वी का गन्ध हरण कर लेता है। इसलिए पृथ्वी वहीं घुलकर चारों ओर
पानी ही पानी हो जाता है। इसके बाद वायु का भयंकर क्षोभ होकर वह जल का रस नष्ट कर डालता है।
इसलिए प्रलय के महातेज में धीरे-धीरे जल का ह्रास हो जाता है। उस तेज के स्वाभाविक गुण से, वायुबल से
तम अर्थात् अन्धकार फैल जाता है। उस समय आकाश में प्रलय वायु ही भर जाता है। उस प्रलय वायु का स्पर्श
गुण और चपलता को आकाश स्वाहा कर देता है। अर्थात् सम्पूर्ण वायु का आकाश में विलय होता है।
ह्तरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते।
हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते॥ १४॥
कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लोयत।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप।
प्रविशन्ति ह्यहङ्कारं स्वगुणैरहमात्मनि॥ १५॥
आकाश के शब्दगुण को वह प्रलयकाल पूरी तरह निगल लेता है। तब तामस अभिमान क्षुब्ध होकर
समस्त आकाश को पी जाता है। दशेन्द्रियों का समुदाय राजस अहंकार में प्रवेश करता है और चित्त चतुष्ट का
मेला सात्विक अहंकार में प्रवेश करता है। हे राजश्रेष्ठ! इन्द्रियों की अधिष्ठात्री देवताएँ मिलकर सात्विक
अहंकार में प्रवेश करती हैं, यह जान लो। इसके बाद त्रिगुणों के साथ वे तीनों अहंकार महत्तत्व में मिल जाते
हैं और जिस प्रकार कन्या अपने बालबच्चों को लेकर अपने मैके आ जाती है, उसी प्रकार महत्तत्व भी माया से
मिल जाते हैं। मुर्गी जिस प्रकार अपने चूजों को अपने पंखों के नीचे छिपा लेती है और लगता है कि वह
अकेली बैठी है उसी प्रकार कल्पांत के समय माया अकेली बच रहती है। इस प्रकार उत्पत्ति-स्थिति और
प्रलय तक माया के तीन रूप दिखला दिये। ऐसी वह त्रिगुणात्मक माया मिथ्याभूत अर्थात् न होते हुए भी
दिखाई देनेवाली है। बच्चे जिस प्रकार खेल खेलते समय दिन में ही 'रात हो गयी' कहते हैं, उसी प्रकार पूर्ण
स्वरूप में माया की त्रिविध कल्पना करते हैं।
एषा माया भगवतः स्रर्गस्थित्यन्तकारिणी।
त्रिवर्णा वर्णितास्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥ १६॥

६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीन लोकों में उत्तम, मध्यम और अधम, तीन अवस्थाएँ यथा जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति, स्वर्ग-मृत्यु-पाताल
ये तीन लोक, संचित-प्रारब्ध-क्रियमाण ये तीन कर्म, सत्त्व-रज-तम ये तीन गुण ये सब माया के कार्य हैं—
ध्येय-ध्याता-ध्यान; पूज्य-पूजक-पूजन; ज्ञेय-ज्ञाता-ज्ञान यह त्रिपुटी भी माया की ही है। दृश्य-द्रष्टा-दर्शन;
कर्म-कर्ता-क्रियाचरण; भोग्य-भोक्ता-भोजन, यह त्रिपुटी भी माया की ही है, यह समझ लो। शब्द-श्रोता-श्रवण;
घ्रेय-घ्राता-घ्राण; रस-रसना-रसास्वाद, यह त्रिपुटी भी माया की ही है। कर, क्रिया और कर्ता; चरण, चाल और
चलता; वाक-वाचा-वदविता ये तीन अवस्थाएँ भी माया की ही हैं। अहं, सोहं और जड़मूढ़ता; साधक, साधन
•और साध्यता; देवी, देव और परिवार देवता, ये तीन प्रकार भी माया के ही हैं। देह, देही और देहाभिमान; भव,
भवमय और भवबन्धन; मुक्त, मुमुक्षु और अज्ञानी यह घटना भी माया की है। सुख, दुःख और जड़त्व; व्याधि,
समाधि और व्युत्थान; उत्पत्ति, स्थिति और मृत्यु इन सारे लक्षणों से माया का ही विकास होता है। आकाश में
चारों ओर नीले रंग का आभास होता है लेकिन वहाँ नीले रंग का अस्तित्व भी नहीं होता, उसी प्रकार
आत्मस्वरूप में माया का मिथ्या आभास होता है। मृगजल जिस प्रकार प्रत्यक्ष दिखाई देता है, लेकिन वह केवल
चिलचिलाती धूप ही रहती है, उसी प्रकार स्वरूप में माया प्रबल हुई दिखाई देती है, लेकिन मूल में कुछ भी
विभासित नहीं होता। माया मिथ्या है लेकिन कल्पना के कारण वह प्रबल मालूम होती है। उसका विनाश किया
जा सके ऐसा उसका स्वरूप ही नहीं है। पर नामरूप की तड़क-भड़क से उसने ब्रह्मादिकों को पागल बना रखा
है। उसने ही मिथ्या त्रिपुटी के विस्तार से सम्पूर्ण त्रैलोक्य को बन्धन में डाला हुआ दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार
दीपक के साथ छाया दिखाई देती है, लेकिन उसे नष्ट करने जाओ तो वह दिखाई नहीं देती उसी प्रकार
स्वस्वरूप में माया मिथ्या है और उसका विनाश करना देवताओं के लिए भी कठिन हो गया है। जिस प्रकार देह
के साथ छाया मिथ्या रहती है, उसी प्रकार ब्रह्मा में माया मिथ्या है। वह कल्पना के कारण ही विस्तार पाती है
इसलिए वेदशास्त्र उसे 'अजेय' मानते हैं। राजा! जहाँ कल्पना बढ़ती है वहीं माया का मूल है। राजा! जिसे
कल्पना कहते हैं, वही मुख्य माया है, इसे ध्यान में रखो। माया का निरूपण करते समय इससे अच्छा रूपक नहीं
मिलेगा। त्रिविध लक्षणों से युक्त माया तुम्हें विशद रूप से बतायी। राजा! अब तुम्हें और क्या श्रवण करने की
इच्छा है? माया भयंकर है और उसे पार करना कठिन है, यह सुनकर ऋत्विज, ब्राह्मण और सभा के सभी लोग
थर-थर काँपने लगे। राजा को भी आश्चर्य हुआ। माया का स्वरूप विचित्र है, ज्ञानी लोग भी उसका निवारण
करने में समर्थ नहीं हैं। जिसके जाल में ब्रह्मदेवादिक भी फँसे हुए हैं वहाँ दूसरों की क्या बिसात है? माया ने शिव
का भी आकलन कर उसे जीवदशा में ला दिया है। ऐसी इस माया को साधारण जन भी पार कर सकें ऐसा उपाय
इनसे पूछिए। राजा ने इसी आशय से उनसे आग्रहपूर्वक प्रश्न किया।
राजोवाच
यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः।
तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्॥ १७॥
हरि की माया अत्यन्त कठिन है, यह सुनकर राजा को हँसी आ गयी। वह मिथ्या ही सही लेकिन
देहाभिमानी को बाधक होने में समर्थ बनी। माया दुस्तर है यह शास्त्र प्रसिद्ध है लेकिन जो सीधे-सादे, भोले-
भाले हैं और बुद्धि से मन्द हैं, वे किस उपाय से तर सकेंगे इसका कोई निश्चित उपाय बताइए। जो अपने मन
को वश में नहीं कर पाये हैं किन्तु जिनका संसार सागर को पार करने का दृढ़ निश्चय है, ऐसे भोले-भाले लोग

तृतीय अध्याय ६९
होंगे उनके लिए माया को पार करने का कोई सरल उपाय हो तो बताइये। पहले कवि ने संक्षेप में बतलाया है
कि 'तन्माययाऽतोबुध आभजेति' गुरु और ब्रह्म एकरूप हैं ऐसी अभेद भाव से भक्ति करने पर माया को पार
किया जा सकता है। उस भक्ति का स्पष्ट लक्षण मालूम हो और माया को तरने का भी उपाय मालूम हो, यही
इस प्रश्न को पूछने का कारण है। उसी उपाय का सुगम साधन बताने के लिए अन्तरिक्ष का छोटा बेटा 'प्रबुद्ध'
बोलने लगा।
प्रबुद्ध उवाच
कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च।
पश्येत्पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १८ ॥
जो प्रबुद्ध अर्थात् ज्ञानी होता है, वही माया से तरने की बात पूरी तरह से जानता है। हम भी प्रबुद्ध अर्थात्
ज्ञानसम्पन्न होने पर माया के बन्धन से छूट सकते हैं। मन में विषय का छन्द रहना यही मुख्य बन्धन है।
इसलिए जो विषय का अर्थात् विषयासक्ति का त्याग करता है वही प्रबुद्ध अर्थात् ज्ञानी है। यही आशय अब
स्पष्ट करके बताता हूँ, सुनिए। यदि मन विषय में लुब्ध होकर रह गया और पूर्ण वैराग्य नहीं हुआ तो माया को
पार करना सम्भव नहीं होगा। इसलिए वैराग्य की ओर प्रवृत्ति मुड़े इसलिए विषयों की निन्दा करते हैं। विषय
नाशवान हैं, किन्तु मूर्ख उसे ही बड़ा सुख मानते हैं, लेकिन वह सुख ही दुःखदायी होता है। विशेषरूप से
स्त्रीविषयक इच्छा से ही माया पीछा करती है। पास का धन खर्च कर सुख के लिए स्त्री को लाकर उसे घर की
मालकिन बनाकर रखते हैं, लेकिन वही स्त्री करोड़ों दुःखों का भोग कराती है। संसार में स्त्री की अभिलाषा से
ही माया को बल प्राप्त होता है। स्त्री कामना से ही संसार बढ़ता है, स्त्री कामना से महद् दुःख प्राप्त होता है।
सारांश, स्त्री कामना से सारा संसार मोहित हो गया है। बड़े प्रेम से स्त्री को पीढ़ी पर बिठाते ही वह संसार को
करोड़ों गुना बढ़ाती है। स्त्रीकामना ही महामोह की गाँठ बाँध कर दुःख के सागर में ढकेल देती है। जो माता नौ
महीने उसे अपने उदर में पालती है, उसे दूर कर पत्नी को परम निकट का मानते हैं। इस प्रकार माया
स्त्रीकामना से प्रबल होती है। जो अपने मुँह का ग्रास उसे खिलाती है, उसकी गन्दगी साफ करती है उस माता
की अपेक्षा स्त्री माया के कारण जगत में अपनी बन जाती है। मिलने को तो हजारों स्त्रियाँ मिल सकती हैं
लेकिन पूरे त्रिभुवन में माँ खोज कर भी नहीं मिलेगी। यह बात जिन ज्ञानियों को मालूम रहती है, वे भी स्त्री को
सिर पर बिठाते हैं। माँ की सेवा करने से भुक्ति और मुक्ति मिलती है और स्त्री की सेवा करने से नरकप्राप्ति
होती है यह बात भी जो शास्त्रज्ञ जानते हैं, वे भी स्त्री की कामना से माता की उपेक्षा करते हैं। इस प्रकार
स्त्रीकामना के विस्तार से माया सारे त्रिभुवन में फैल रही है। उसने ज्ञान सम्पन्न लोगों को भी भ्रम में डाल रखा
है। सचमुच स्त्रीकामासक्ति ही महामाया है। देखो! विषय को सुख मानकर काम्य कर्म करने से लोग अत्यन्त
दुःखी होते हैं क्योंकि काम्य कर्म दुःखदायक ही है। स्त्री कामना के कारण गृहासक्ति बढ़ती है और गृहासक्ति
के कारण प्राणी स्वयं ही अपने को कष्ट में डाल देता है। हे राजाधिराज! उन कष्टों के कारण अन्त में क्या
स्थिति होती है, वह भी तुम्हें बताता हूँ। निर्मल पानी लेकर दीवार पोंछने लगो तो पानी का निर्मलपन नष्ट होकर
वह गन्दा हो जाता है, हाथ कीचड़ से सन जाते हैं और दीवार का पलस्तर खराब होकर वह खुरदुरा हो जाता
है। उसी प्रकार ब्रह्मदेव आदि देवताओं को भी विषयसुख से सुख नहीं प्राप्त होता। ऐसे विषय को जो आनन्द
मानते हैं, वे महामूर्ख अथवा पशु ही हैं।

७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभैनात्ममृत्युना।
गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥१९॥
रात-रात भर मर कर कष्ट किया लेकिन उससे कौड़ी की भी प्राप्ति नहीं हुई। सारांश, धन प्राप्त करने के
लिए प्राणान्त कष्ट करने पड़ते हैं और ऐसे कष्ट से धन प्राप्त भी किया तो वह महादुःख का ही कारण बनता है।
धन अनर्थ का मूल है। अपने सर्वनाश का भी वही कारण है। धन न रहने पर उसे प्राप्त करने के लिए परिश्रम
करना पड़ता है। मिलने पर उसके सुरक्षा की चिन्ता करनी पड़ती है। प्राणि के लिए रात दिन हृदयरोग ही लग
जाता है। द्रव्य का लोभ अविश्वास से रहने के लिए बाध्य करता है। माँ-बाप से चोरी करना सिखलाता है।
स्त्री-पुत्रों में कलह शुरू कराता है। इष्टमित्रों को दूर करता है। ऐसा यह धन का स्वाभाविक गुण है। धन के
पास आधिव्याधि, धन के पास दुष्ट बुद्धि, धन के पास लोभ और क्रोध होता है, धन के पास असत्य सदैव रहता
है, धन के पास अनेक विकल्प होते हैं, धन पाप का केन्द्र बिन्दु होता है। सारांश, धन पूर्णरूपेण दुःख रूप ही
है। वही धन दानधर्म में खर्च करने से उसका उत्तम फल मिलता है लेकिन लालची व्यक्ति को वह नरक ले
जाता है। इस धन की तरह खराब वस्तु सारे त्रिभुवन में कोई नहीं है। नलिका में रखे चने की लालच में बन्दर
नलिका में हाथ डालकर अपना हाथ फँसा लेता है। उसी प्रकार कनककांता की अभिलाषा ही नरदेह को उस
दशा में पहुँचाती है। देखो, धन सहज ही नहीं मिल जाता और अगर मिल भी जाय तो अनीति से मिलने के
कारण हानिकारक होता है। इसलिए धन में सचमुच ही सुख नहीं है। लोग काफी सम्पत्ति खर्च कर बड़े शौक से
घर बनवाते हैं, लेकिन वह टिकाऊ न होने के कारण जल्दी ही गिर जाता है और धन के साथ-साथ जीवन भी
व्यर्थ चला जाता है। जीवन नष्ट कर, वीर्य खर्च कर पुत्र उत्पन्न करता है, वह पुत्र मर जाता है और दुःसह दुःख
के सागर में डूब जाता है। गृहस्थी में सभी सुहृद जब तक उनका स्वार्थ रहता है तब तक सगे-सम्बन्धी होकर
रहते हैं। लेकिन जब स्वार्थ का विरोध होने लगता है तो शत्रु बनकर चोट करने से नहीं चूकते। बड़ी हवस के
साथ गौ, घोड़े आदि अनेक प्रकार के पशु एकत्र करते हैं, इतने में वे पशु मर जाते हैं। उस दुःख से गृहस्थों को
कष्ट होता है। जब हमारा देह ही अशाश्वत है तो उससे खड़ा किया हुआ प्रपंच कैसे शाश्वत हो सकता है ? सारे
जगत को ही काल ने ग्रस लिया है। इस लोक में सभी विषय के ही जाल में फँसे हुए हैं। मनुष्यदेह कर्मभूमि में
आया हुआ है। यहाँ यज्ञ आदि कर्म करके उन कर्मों ने स्वर्ग को भी जीत लिया ऐसा कहते हैं। लेकिन जब यहाँ
इहलोक नश्वर है तो स्वर्ग भी वैसे ही नश्वर होगा।
एवं लोक परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम्।
सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥२०॥
मन में विषय भोग की इच्छा धारण कर इस जगत में यज्ञ करते हैं और पर्याप्त पुण्य प्राप्त कर उस पुण्य के
योग से स्वर्ग जाते हैं। स्वर्गसुख का अधिपति इन्द्र है लेकिन वह भी कहीं मेरा पतन न हो जाए इस भय से
आक्रान्त रहता है। तपस्वी लोगों पर वह विघ्न ढाता है। कुल मिलाकर स्वर्ग की स्थिति हानिकारक ही है। इस
प्रकार अपने पुण्य से स्वर्ग प्राप्ति होती है इसलिए उस स्वर्गलोक को 'पुण्यजित लोक' कहते हैं। लेकिन
पुण्यक्षय होते ही उनका भी क्षय होता है। इसलिए स्वर्ग के श्रेष्ठ पुण्यवानों को भय लगा रहता है। गाँठ में उत्तम
पुण्य होने पर स्वर्ग के भोग में अच्छा सुख प्राप्त होगा, यह कहना भी निखालस गलत है। हे राजा! उस स्वर्ग के
दुःख बताता हूँ, सुनो। जिनके पुण्य समसमान होते हैं, उन्हें समसमान पदों की प्राप्ति होती है। वे परस्पर स्पर्धा

तृतीय अध्याय ७१
और कलह करने लगते हैं। उसके मन में रात-दिन द्वेष जगाते हैं। जिस प्रकार इस लोक में मण्डलवर्ती राजा
राज्य के लालच से कलह करते हैं उसी प्रकार स्वर्ग में रहने वालों में भी कलह मचा रहता है और उस द्वेष से वे
अत्यन्त दुःखी रहते हैं। कहीं मेरा पतन न हो जाए इस भय से उनका झुकाव कलह और द्वेष की ओर रहता है।
इससे उनका अर्जित किया हुआ पुण्य नष्ट हो जाता है और बेचारे याज्ञिक अधोमुख होकर धराशायी हो जाते हैं।
(अर्थात् पृथ्वी पर जन्म लेते हैं) इस प्रकार जो स्वर्गसुख को आनन्द मानते हैं वे शुद्ध पशु हैं क्योंकि वहाँ द्वेष
और विनाश होता है और कलह तो नित्य चलता रहता है। वे किये हुए विषय का ही नित्य सेवन करते रहते हैं
किन्तु उनके मन की कभी तृप्ति नहीं होती। फिर भी यह मिथ्या है यह बात उनकी समझ में नहीं आती। यह भी
माया की ही मोहिनी शक्ति है। जिस प्रकार वेश्या धन लेने के बाद ग्राहक को दुत्कार कर निकाल देती है, उसी
प्रकार जो विषय से लिपट कर रहता है, उसे अधिक से अधिक दुःख प्राप्त होता है। इसलिए हे राजा ! जो दोनों
लोकों का भोग साधने में लगे रहे वे माया के योग से फँसते चले गये और उनका अधिकांश जीवन व्यर्थ गया
ऐसा समझो। कर्मभूमि में नरदेह खर्च करना यही भाग्य का सम्पूर्ण सार है। देवतागण भी नरदेह की कामना करते
हैं लेकिन वे भी विषय के चक्कर में व्यर्थ हो जाते हैं। इस प्रकार विषयासक्ति ने अपनी माया से कितने लोगों
को ठगा होगा इसका हिसाब कौन जाने ? इसलिए विषय की विरक्ति उत्पन्न करने के लिए गुरुभक्ति करनी
चाहिए। वही कथा
तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥ २१॥
विषय क्षणिक हैं यह जानकर पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति के लिए पूर्ण श्रद्धा धारण कर अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाना चाहिए। हे राजा ! केवल सद्गुरु वचन से ही मैं यह माया तर जाऊँगा ऐसे निश्चय से वह
एकनिष्ठ भक्ति धारण कर अपने इष्ट की प्राप्ति के लिए मुमुक्षु उसके चरणों में लगता है। जिसे 'गुरु' कहते हैं
उनके भी अनेक प्रकार हैं। हे राजा ! वे प्रकार भी तुम्हें बताता हूँ। सुनो! एक वेदाध्ययन कराने वाले गुरु होते हैं,
कोई भाषण देने में निपुण होते हैं, कोई ज्योतिष शास्त्र में निपुण होते हैं, लेकिन बुद्धिमान लोग उन्हें 'गुरु' नहीं
कहते। कोई आगमोक्त मंत्रों की उपासना करते हैं, शिष्य को मंत्र देते हैं और उसका विधिपूर्वक जप करने के
लिए कहते हैं। किन्तु उससे आत्मानुभव की प्राप्ति कब होगी इसे गुरु शिष्य दोनों को ही मालूम नहीं रहता। कोई
वायुधारणा (प्राणायाम आदि) सिखलाते हैं कोई अन्य प्रकार के ध्यान करके बताते हैं। कोई हठयोग की आदत
डालते हैं। कोई मुद्रा लगाना सिखलाते हैं। कोई ब्रह्मसंवाद में पटु हैं तो कोई तत्व निरूपण में कुशल हैं और कोई
वैराग्य सम्बन्धी भाषण इतने उत्तम ढंग से करते हैं कि उससे दोनों भोगों से घृणा हो जाती है। वे शुद्ध ब्रह्म का
निरूपण इस प्रकार करते हैं कि उसे सुनकर मनुष्य में प्रेम के सोते फूट पड़ते हैं। किन्तु अपने अंतःकरण का भ्रम
कैसे जाएगा इसका मर्म उनकी समझ में नहीं आता। घानी में डाला हुआ गन्ना जिस प्रकार नीचे के बर्तन में रस
भरता रहता है और स्वयं घानी में करकराता रहता है उसी प्रकार केवल शब्द ज्ञानी ज्ञान के निरूपण में उत्तम
वक्ता रहता है। वह अपने वक्तृत्व से लोगों का अच्छा मनोरंजन करता है लेकिन स्वयं अलिप्त रहता है उसकी
रोजी रोटी अच्छी तरह से चलती रहती है। उसे लोगों में मनचाही प्रतिष्ठा मिलती है लेकिन ऐसे गुरु से उच्चश्रेणी
की आत्मप्राप्ति की उत्कंठा पूरी नहीं होती। जिस प्रकार केवल 'अमृत' का उच्चार करने भर से उसकी रुचि नहीं
मालूम होती, उसी प्रकार शाब्दिक ज्ञान से उसे अनुभव का लाभ नहीं मिल पाता। जिसने स्वयं ही स्वाद नहीं

७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चखा वह दूसरों को कैसे स्वाद चखाएगा ? इसलिए जो पूर्ण अनुभवी है, वही सद्भाव से शिष्य का उद्धार करता
है। इसी तरह गुरुत्व के अनेक प्रकार हैं। लेकिन जो शिष्य को अपरोक्षानुभव प्राप्त कराता है उसी को
'सद्गुरुस्वामी' कहते हैं। जिसके भाषण से 'असत्' असंतता का तत्वतः निःशेष अस्त हो जाता है तथा 'सत्'
का उदय होता है उसे ही वेदशास्त्रों ने सद्गुरुत्व कहा है। जो मंत्र तंत्र का उपदेश करते हैं वे भी पूज्यत्व की
दृष्टि से श्रेष्ठ ही होते हैं लेकिन जिसमें 'पूज्य' और 'पूजक' का भेद नहीं होता वही वास्तव में 'सद्गुरु स्वामी'
है। किसी में शुद्ध ब्रह्मज्ञान रहता है, ब्रह्मस्वरूप को देखकर उसका मन उसमें रम जाता है, द्वैत की भावना
समाप्त होकर चारों वाचाएँ मौन हो जाती हैं, सारी इन्द्रियाँ तटस्थ हो जाती हैं, प्राण जहाँ पंगु हो जाता है, अत्यन्त
अद्भुत परब्रह्म को देखकर जिसके देहभाव में तटस्थता आ जाती है, ऐसा जो भी कोई आत्मानुभवी रहता है,
उससे शिष्य विनती करता है लेकिन वह उससे न कुछ पूछता है और न कुछ बताता ही है। वह तटस्थ भाव से
मौन ही रहता है। किसी को ब्रह्म का अनुभव होता है, उसका बाध्य-बाधकता का भ्रम भी नष्ट हुआ रहता है,
द्वैतभाव भी समाप्त हुआ रहता है, संसार में जिसके लिए कोई विषमभाव नहीं रहता लेकिन उसका व्यवहार कुछ
विचित्र-सा रहता है। उसमें चिड़चिड़ापन रहता है, वह कुछ अजीब-सा काम करता रहता है, साथ ही वह अपने
स्वभाव में कुछ ऐसी उग्रता का प्रदर्शन करता है कि कोई उसके निकट नहीं जा सकता। वह अपने में ही हँसता
रहता है, परमार्थ को ध्वनि से अभिव्यक्त करता है लेकिन उससे शिष्य को किसी भी बात का बोध नहीं होता।
वह दुश्चिंता में पड़ जाता है। ऐसा जो ब्रह्मज्ञानी होता है, उसकी ब्रह्मस्थिति लोगों की समझ में नहीं आती। ऐसी
अवस्था में उसके पास ज्ञानप्राप्ति के लिए भक्तिभाव से कौन जाएगा ? हे राजा अब तुम्हें सद्गुरु के वास्तविक
लक्षण बताता हूँ। यदि अंतःकरण में श्रद्धाभाव लेकर सुनोगे तो सुखी हो जाओगे। जो काया, वाचा तथा मन से
दीनजनों पर कृपालु रहता है, शिष्य के भवबन्धन तोड़ देता है, जो अहंकार का अस्तित्व नष्ट करता है, उसी
प्रकार जो शब्दज्ञान में पारंगत रहते हुए सर्वदा ब्रह्मानन्द में लीन रहता है, वह अपने शिष्य का उसकी भक्ति के
अनुरूप प्रबोधन करने में समर्थ होता है। शिष्य की भक्ति के अनुसार उसे वैसा अनुभव देता है लेकिन मन में
गुरुता का जरा भी अहंकार नहीं रहने देता। शिष्य से सेवा लेने की कल्पना वह स्वप्न में भी नहीं करता, बल्कि
वह स्वयं ही शिष्य की सेवा करता है और उसे पूज्य मानता है। शिष्य को पुत्र के समान मानना चाहिए ऐसा
स्मृतिवचन है, उसके अनुसार वह शिष्य को गौण न मानकर उसकी ओर ब्रह्मभाव से ही देखता है। शिष्य अपनी
भक्ति के कारण उसकी सेवा करता है, लेकिन वह उसे सेवक नहीं मानता। जिसके लिए सभी भूत भगवद्रूप हैं
वह शिष्य को सेवक के रूप में कैसे देखेगा ? मैं एक महान योगी हूँ, ऐसी शेखी भी वह नहीं बघारता। गुरुता का
अहंकार कभी उभरने नहीं देता। स्वप्न में भी अपने निर्वाह का संकट शिष्य पर नहीं डालता। इतना ही नहीं
बल्कि शिष्य पर संकट आने पर वह तत्काल उसका निस्तारण करता है। मैं एक अकर्ता निजात्मयोगी हूँ यह
कहकर वह विषयों का न भोग ही करता है न उन्हें पूर्ण रूप से त्याग देने का ही आग्रह करता है। प्रारब्ध के
अनुसार जो भी भोग आते हैं उन्हें देह को सौंप कर वह स्वयं परब्रह्म योग में मग्न रहता है। देह पालकी में चढ़े
अथवा विष्ठा में गिरे लेकिन उसके लिए दोनों का ही सुख या दुःख नहीं रहता। देह में रहते हुए भी उसे देह का
अहंकार नहीं होता और घर में रहते हुए भी घर की आसक्ति नहीं रहती, अन्त में लौकिक दृष्टि से लोगों में रह
कर वह लोगों जैसा व्यवहार करता है। स्त्री उसे मेरा पति, पुत्र मेरा पिता और शिष्य उसे मेरा गुरु कहते हैं
लेकिन वह उन सबमें निराले ही ढंग से व्यवहार करता है। इस प्रकार पूरी तरह व्यवहार तथा आचरण कर वह
भक्ति करता है। भूतमात्र में हरि का ही दर्शन करना चाहिए, उसी का भजन करना चाहिए यही उपदेश वह अपने

तृतीय अध्याय ७३
शिष्यों को देता है। ये सद्गुरु के लक्षण हैं लेकिन ज्ञान के अहंकार के कारण वे पण्डितों की समझ में नहीं आते।
जो पूर्ण अनुभवी होते हैं वे ही इस रहस्य को जानते हैं, दूसरों का ज्ञान वहाँ पंगु पड़ जाता है इसके गुरुत्व की
महानता यह है कि उसमें पूर्ण शान्ति का वास रहता है। हे राजा! सद्गुरु का लक्षण यही है और मुख्य भूषण भी
यही है। संसार में शान्ति परदेसी हो गयी थी उसे निवास के लिये कहीं स्थान नहीं मिल रहा था इसलिये वह
सद्गुरु के चरणों में वास करने आयी। जिस प्रकार माँ के घर आने पर लड़की स्वेच्छा से विचरण करती है, उसी
प्रकार शान्ति भी आनन्दपूर्वक वास करने के लिए सद्गुरु के पास आती है। वेदशास्त्र का मर्म जानकर भी जो
विद्वत्ता की शेखी नहीं बघारता, जिसे आत्मानुभव से ही पूर्ण शान्ति प्राप्त हुई रहती है, वही निश्चित रूप से
सद्गुरु है। शायद श्रोतागण यह कहकर रुष्ट हो जाएँ कि व्यर्थ ही अनावश्यक विस्तार कर ग्रन्थ को बड़ा किया।
लेकिन 'निष्णात' शब्द का अर्थ लगाते समय ये सारी बातें ध्यान में आयीं। यह कोई मेरा अपना पांडित्य नहीं है
बल्कि सद्गुरु स्वयं ही पद-पद में अर्थ स्पष्ट कर मुझसे कहला रहे हैं। फिर भी सद्गुरु के लक्षण अगाध होने
के कारण उनका वर्णन करना कठिन है। वेद भी जहाँ पागल होकर मौन हो जाते हैं वहाँ मेरा बोलना कहाँ तक
काम आयेगा ? देखिये, कैसा चमत्कार है। मेरे सखा जनार्दन स्वामी प्रसन्न हुए इसलिए श्रीमद्भागवत देशी भाषा
में, अर्थात् प्राकृत में उत्तम रीति से प्रकट हुआ। एका जनार्दन की शरण में है। जब उसकी पूर्ण कृपा होती है तभी
गुरुभक्त देह में रहते हुए भी देह के बन्धन को स्पर्श नहीं करता। जिनके चरणों की सेवा करने से देह में रहते
हुए भी देह बन्धन की बाधा नहीं होती, उनकी शरण में अनन्य भाव से जाने पर जिस अगाध ज्ञान की प्राप्ति
होगी उसका पता वेदों को भी नहीं है। सद्गुरु भक्ति न करने से परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होगी, इसलिये
शिष्य के कल्याण के लिए ग्रन्थों में सद्गुरुभक्ति करने के लिये कहा गया है। इसलिए अनन्य भाव से सद्गुरु की
शरण में जाना चाहिए ताकि वे अपने यथार्थ आत्मबोध बताकर शिष्य को सद्भावना से सन्तुष्ट कर सकें। राजा!
इस प्रकार सद्गुरु का लक्षण तुम्हें बताया। अब शिष्य का लक्षण बताता हूँ। ध्यान से सुनो।
तत्रभागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः।
अमाययाऽनुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्माऽऽत्मदोहरिः ॥ २२ ॥
कितने ही शिष्य ऊपर से सात्विक दिखाई पड़ते हैं किन्तु अन्दर बड़े विकल्पी होते हैं। किसी को केवल
प्रतिष्ठा की चाह रहती है तो कोई स्वयं को ब्रह्मनिष्ठ समझ कर कर्म ही नहीं करते हैं। किसी को प्राणायाम
अच्छा लगता है, किसी को आसन का अभिमान रहता है, किसी के मन में सन्देह होने के कारण उसे पूर्ण
विश्वास किसी भी बात में नहीं होता। कुछ लोग बड़े आदरपूर्वक गुरु से उपदेश लेते हैं लेकिन मन में फलप्राप्ति
के सम्बन्ध में विकल्प रखते हैं। इस प्रकार शिष्यों के अनेक भेद हैं। लेकिन वास्तव में वे सारे ढोंगी होते हैं यह
ध्यान में रखो। अब सच्चे शिष्य के लक्षण बताता हूँ, ध्यान से सुनो। सच्चे शिष्य निष्कपट बुद्धिवाले, शुद्ध
सत्वगुणी तथा सच्चे परमार्थ साधक होते हैं। उनमें ढोंग नहीं होता। वे गुरुचरणों के सेवक, गुरुवचन पर बिके
हुए तथा सद्गुरु पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले होते हैं। सच्छिष्य सद्गुरु के वचनों के लिए अपने प्राणों
को भी न्योछावर कर देते हैं। गुरु की आज्ञा के बाहर वह तिलमात्र भी नहीं हिल सकता। सद्गुरु को जो केवल
मनुष्य बुद्धि से नहीं देखता, जो गुरु सेवा के लिए सदैव आनन्द से तत्पर रहता है, निजभाव से सेवा के लिये वह
अत्यन्त तत्पर रहता है, आठों पहर शरीर घिसना पड़े तो भी वह काम से जी नहीं चुराता। यह काम उच्च है या
यह काम नीच है ऐसी कल्पना भी उसके मन में नहीं आती। अपना नित्य का धर्मकर्म गौण मानकर वह गुरु की

७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सेवा को उत्तम मानता है। सेवा में किसी प्रकार का कपट न कर वह शुद्ध मन से उसे करता है। सेवा में कष्ट
जितना अधिक होता है, उतना ही उसका मन अधिक उल्हसित होता है। गुरु के लिए सच्छिष्य और असच्छिष्य
एक समान रहते हैं लेकिन जिसके हृदय में जैसा भाव रहता है उसी के अनुसार उसे फल प्राप्त होता है। 'भावेषु
विद्यते देवो' यही उपदेश का सार है। अपने भाव के अनुसार ही फलभोग भोगना पड़ता है। अपनी बुद्धि के
अहंकार के बल पर मृत्यु से बचने के प्रयास में हिरण्यकशिपु मारा गया। मौका देखकर भगवान ने उसे समाप्त
कर दिया। लेकिन उधर प्रह्लाद को देखिये। देवाधिदेव मेरी रक्षा करने वाला है ऐसा उसका दृढ़ भाव था और
उसी भाव के कारण राजा ने उसे मारने के जितने भी प्रयत्न किये वे सब व्यर्थ गये। परमार्थ में ज्ञान का अभिमान
शुद्ध डाका है इसलिये जो सद्भाव से परिपूर्ण रहता है वही जन्म-मरण के बन्धन तोड़ डालता है। शिष्य की
परीक्षा करने वाला मैं ज्ञानी हूँ ऐसा अहंकार सद्गुरु को कभी नहीं होता बल्कि उसके प्रति जिसके मन में जैसी
भक्ति होती है वैसा वह फल पाता है। राजा! इसे रहने दो लेकिन देखो अच्छे शिष्य का सद्भाव कितना विचित्र
होता है। गुरु और ब्रह्म को वह ऐक्य भाव से मानता है। वह मानता है कि सद्गुरु मेरी इन्द्रियों का परिचालक,
मेरे हृदय में रहने वाली 'आत्मा' है तथा बाह्य सेवा करते समय सद्गुरु वास्तव में साक्षात 'ब्रह्ममूर्ति' है।
सद्गुरुचरणों में वह अपना तन-मन-धन अर्पण कर अपना प्राण भी उसे अर्पण कर देता है, अर्थात् सब कुछ
आत्मार्पण करता है। इससे सद्गुरु भी उस पर सन्तुष्ट होकर उससे मोहित हो जाते हैं और स्वयं स्वामी होते हुए
भी सेवक के अधीन हो जाते हैं। बलि ने सर्वस्व अर्पण कर दिया इसलिये भगवान उसके द्वार पर द्वारपाल
बनकर रह गये। भजन भक्ति का यह आनन्द है कि उसमें जो स्वामी रहता है वही सेवक के पास पहरा देता है।
जो उत्तम भक्त होते हैं वे भगवान की ऐसी अगाध प्रीति के पात्र बनते हैं, लेकिन यह लाभ भोले-भाले लोगों को
कैसे प्राप्त होगा? इसीलिए हर प्रकार से सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए ताकि वह प्रसन्न होकर शिष्य को
का उपदेश कर सके। जिस भजन से भगवान का भजन कर 'उत्तम भक्त' बने, उन सारे भागवतधर्मों
को सद्गुरु से निश्चयपूर्वक तथा भक्तिपूर्वक सीखना चाहिए। भागवत धर्म का प्रमुख लक्षण है सत्संगती। सद्गुरु
भी असत्संगति का त्याग करने के लिए यही उपदेश देते हैं।
सर्वतौ मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु।
दयां मैत्रीं प्रश्रय च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥ २३॥
मन में यदि सबसे निःसंग होने की इच्छा हो तो निश्चित रूप से सत्संग करना चाहिए और असत्संग
छोड़ देना चाहिए। देह संगति ही मुख्य असत्संग है। इसलिए उसे समूल वर्जित करना चाहिए। हे राजेश्वर!
सत्संगति ही सामर्थ्यवान है यह बात ध्यान में रखो। जहाँ दया, मैत्री और विनय इन तीन लक्षणों का पूर्णत्व के
साथ वास दिखायी दे उस पुरुष की संगति को 'सत्संग' कहना चाहिए। 'स्वहित' सिद्ध करने के लिये
'सत्संग' अत्यन्त आवश्यक है। बड़प्पन छोड़ कर साधु की शरण में लीन होना चाहिये। देहाभिमान त्याग कर
उन्हें साक्षात् दण्डवत करना चाहिए। संसार में साधु से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। संतों का पूजन करने से स्वयं
देवताओं को भी सन्तोष होता है। पूरी श्रद्धा से संतों की चरण रज को सर पर धारण करना चाहिये। संतों के
सामने अपनी बुद्धि की शेखी नहीं बघारनी चाहिये। संतों का समुदाय देखकर वे भगवत्स्वरूप हैं ऐसा भाव
एकनिष्ठा से धारण करना चाहिये। ऐसी भगवद्भावना से विनम्र होने को ही 'प्रश्रय' अथवा विनय कहते हैं।
विनम्रतापूर्वक संत चरणों की सेवा करते रहने से भूतदया की वृद्धि होती है। यही 'दया' का प्रमुख लक्षण है।