श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्टः पञ्चधातुभिः ।
एकधादशधाऽऽत्मानंविभजञ्जुषतेगुणान् ॥ ४ ॥
इस प्रकार जड़, मूढ़ एवं अचेतन ये पंचमहाभूत तथा प्राणिमात्र की उत्पत्ति हुई और उन्हें अपने-अपने
कर्म करने के लिए, उनमें प्रवेश कर उनके विभाग बाँट दिये गये। पाँच प्रकार के पंचमहाभूत अपने-अपने
कार्यों में तत्पर रहें इसलिए हे राजा! श्रीअनंत ने स्वयं भी पाँच रूपों में उनमें प्रवेश किया। वह प्रवेश कैसे
किया, उसे बताता हूँ, सुनो। श्री अनंत ने 'गन्ध' रूप में पृथ्वी में प्रवेश कर उसमें पूर्ण क्षमाभाव उत्पन्न कर, उसे
सहज रूप से प्राणियों का भार सहन करने में समर्थ किया। हे मिथिलाधिपते! पृथ्वी में भगवान ने प्रवेश किया
इसीलिए वह अपने चारों ओर जल से आवृत्त होते हुए भी उसमें विलीन नहीं हुई। शेषरूप भगवान पृथ्वी को
धारण करता है, इसलिए समुद्र उसे गला नहीं सकता। शेष के ही कारण पृथ्वी सुदृढ़ हुई है और इसीलिए वह
समस्त प्राणिमात्र का भार सहन कर रही है। 'स्वाद' के रूप में श्रीहरि जल में प्रवेश कर वहाँ द्रवरूप में अर्थात्
पतले रूप में रहकर निरन्तर प्राणियों की रक्षा करता है। जगजीवन ही जल में निहित है इसीलिए वह आवरण
जल शोषण हुए बिना वैसा का वैसा रहता है। श्रीहरि की यह कितनी महानता है। सद्रूप श्रीहरि तेज में 'रूप'
होकर रहता है, इसलिए आँखों में विचित्र तेज दिखाई देता है। उसी प्रकार पेट में प्रदीप्त जठराग्नि के रूप में
वही है। तेज-में रूपगुण से श्रीहरि घुसा हुआ है, इसलिए वह आवरण वायु में विलीन नहीं हो जाता। 'स्पर्श'
गुण से भगवान वायु में प्रविष्ट है इसलिए प्राण के योग से जीव सशरीर विचरण करते रहते हैं। स्पर्श रूप से
भगवान वायु में प्रवेश करते हैं इसलिए आकाश वायु को ग्रसित नहीं कर सकता। 'शब्द' गुण से श्रीहरि
आकाश में प्रवेश करते हैं इसीलिए प्राणियों को रहने के लिए पर्याप्त स्थान मिल पाता है। चक्रपाणि आकाश में
शब्दगुण से विद्यमान है, इसलिए वह निजकारण से अर्थात् महत्तत्त्व में विलीन नहीं हो सकता। पंचमहाभूतों में
देखा जाए तो वहाँ नित्य ही परस्पर बैरभाव दिखाई देता है। एक को ग्रसने के लिए दूसरा सदैव तैयार ही रहता
है। पानी पृथ्वी को घोलना चाहता है तो पानी को तेज अर्थात् अग्नि सुखाना चाहता है, तेज को वायु निगलना
चाहता है तो आकाश वायु को निगलना चाहता है। लेकिन श्रीधर उन सबमें प्रवेश कर उनका परस्पर वैरभाव
मिटा कर उन्हें आपस में आनन्द से रहने देता है। इस प्रकार पंचभूतों में आकार आकर उनमें से प्राणियों के
शरीर बने और भगवान माया के योग से जीव रूप में प्रवेश कर उनसे परस्पर व्यवहार कराने लगा। उसी को
ब्रह्माण्ड में 'पुरुष' तथा पिण्ड में अर्थात् देह में 'जीव' कहते हैं। भगवान ही जीव शिवरूप से देह में
प्रतिबिम्बित हुआ, यह माया का अपना स्वभाव है। शिव में जो 'योगमाया' के नाम से प्रसिद्ध है, वही 'जीव' में
'अविद्या' कहलाती है। प्रमुख रूप से माया की भ्रांति यही है। स्वप्न की ही तरह संसार भी उसके ही कारण
विभासित होता है। जिसे ईश्वर का 'दीर्घस्वप्न' कहा जाता है वह यही माया से भासित होने वाला जगद्रूपी
संसार है और नींद में अविद्या के कारण जो दिखाई देता है वह जीव का स्वप्न है। जाग जाने पर जैसे स्वप्न
मिथ्या होता है, उसी प्रकार ज्ञान अर्थात् आत्मसाक्षात्कार होने पर संसार का आभास भी मिथ्या होता है। हे नृप!
यह सब माया का कार्य है, इसे ध्यान में रखो। हे राजराजेश्वर! अब तुम्हें जीव की विषयावस्था सुनाता हूँ। वह
अपना एक प्रकार तथा दस प्रकार के भाग बनाकर किस प्रकार विषयभोक्ता बनता है, यह सुनाता हूँ। वह
जनार्दन एक विभाग रूप अर्थात् अंतःकरण बना तथा फिर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चार विभागों में
पुनः बँट गया। जीव अपने परिपूर्णत्व से तथा निजात्म शक्ति से 'अहं' कहता है लेकिन माया ने चतुराई कर
'देहोऽहं' अर्थात् साढ़े तीन हाथ का देह ही मैं हूँ, यह भावना दृढ़ की। अहंकार जब देहात्मभावना को बढ़ाता है