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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 869 में से

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पृष्ठ 79

तृतीय अध्याय ६३
तो जीव अपनी चिद्रूपता अर्थात् चैतन्यरूपता भूल जाता है। वह विस्मरण चिन्ता बढ़ाता है, यही 'चित्त' है।
देहाहंता अत्यन्त चपल है, उसे ही 'मन' कहते हैं। वही अनेक प्रकार के संकल्प विकल्पों का जाल फैलाता है
और भय, शोक और दुःख उत्पन्न करता है। देह-अहंता के चातुर्य को ही 'बुद्धि' कहा गया है। जन्म-मरण
अनिवार्य है, यह निश्चय भी बुद्धि ने ही किया। इस प्रकार देहाभिमान के मस्तक पर 'चित्तचतुष्टय' ये
अवस्थाएँ रहती हैं। वास्तव में संसार का कर्ता देहाभिमान ही है, यह ध्यान में रखो। जब 'सोहं' भी अहंकार
करता है, तभी चित्त में चैतन्य होता है, मन 'उन्मन' होता है, बुद्धि परब्रह्म में निश्चित हो जाती है। जब सम्पूर्ण
अभिमान का ही अन्त हो गया तो फिर कहाँ रह गयी बुद्धि और कहाँ रह गया मन? चित्त का चित्तपन डूब
जाता है और चारों ओर परब्रह्म ही भर जाता है। हे राजा! तुम्हें अन्तःकरणरूप 'एकधा' विभाग की पहचान
अथवा लक्षण बताया। अब 'दशधा' लक्षण बताता हूँ, सुनो। दस प्रकार के इन्द्रिय अचेतन हैं, उन्हें चेतना देने
वाला नारायण है। वह विभिन्न दस रूपों में उनमें प्रवेश कर उनसे विहित क्रिया करवाता है। आँखों में देखने की
शक्ति देकर वह दृश्य को दृश्यरूप में प्रकाशित करता है। ऐसे प्रकाशक धर्म से वह दृश्य का सौन्दर्य दिखलाता
है। कान में 'सुनना' वही बन गया है। शब्द के रूप में वही शब्द व्यक्त करता है और फिर अर्थज्ञ होकर
प्रबोधन भी वही करता है। रस में 'रस की रुचि' वह नारायण ही है। जिह्वा में रुचि जगानेवाला वही है। इस
प्रकार जनार्दन जन में अनेक प्रकार के रसों का सेवन करवाता है। पुष्पों में 'सुगन्ध' के रूप में जो है वही
श्रीहरि है और नाक में गन्ध ज्ञान जाननेवाला भी वही है। इस प्रकार श्रीहरि अपने ही स्वरूप से पुष्पों का
मकरंद जीवों को सेवन करवाता है। 'स्पर्श' के चार गुण—शीत, उष्ण, मृदु, कठिन आदि को प्रकाशित करने
वाला वही नारायण है। त्वचा में 'स्पर्श' जानने वाला भी वही बनता है और इस प्रकार वह जगजीवन स्पर्श के
सुख का भोग करवाता है। (इस प्रकार ज्ञानेन्द्रियों के पाँच प्रकार बतलाये।) (अब कर्मेन्द्रियों के पाँच प्रकार
बताते हैं) वाणी का वाचक कमलापति है। वही शब्दमालिका व्यक्त करता है और वही अनेक प्रकार की
शब्दार्थव्युत्पत्ति प्राणियों से व्यक्त करवाता है। हाथ में 'लेने-देने' की शक्ति उस अकर्ता की ही है, उसी प्रकार
पैरों से 'चलना' उस गोविन्द के ही कारण सम्भव होता है। कर्मेन्द्रिय का चौथा इन्द्रिय जो उपस्थ है, उससे होने
वाली सुखप्राप्ति उस श्रीपति के कारण ही होती है। उस सुख से वह भगवान ही सुखी होता है। स्त्री-पुरुषों का
समागम सुख भी वह पुरुषोत्तम अपनी पसन्द से प्रकाशित करता है। गुदा में 'मलविसर्जन' का जो क्षरणधर्म है,
वह भी उस अक्षररूप परमात्मा की शक्ति से उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह परिपूर्ण निजात्मा प्राणियों की देह
में दस प्रकार से विभाजित है। इस प्रकार वह विषयों का भोग कर विलास करता है और भोग्य और भोक्ता इन
दोनों प्रकारों से स्वयं ही व्यक्त होकर वे सारे भोग स्वयं भोगता है। जिस प्रकार साल वृक्ष में साल का ही बीज
रहता है, छोटी-मोटी टहनियाँ भी साल की ही होती हैं, कैसा भी विकार पाये बिना वह वृक्ष ही बनता है।
अथवा जिस प्रकार गन्ने का टुकड़ा गन्ने का ही बीज रहता है और उसे जमीन में बोने के बाद बाहर भी वह गन्ने
के ही रूप में बढ़ता है, वह भले ही विभिन्न प्रकार का दिखाई देता हो लेकिन उसमें ऊपर से लेकर नीचे तक
एक ही प्रकार का रस रहता है। उसी प्रकार विषय और इन्द्रिय इन दोनों को ही परमात्मा एक ही समान
प्रकाशित करता है और फिर विषय के प्रति रुचि भी जीवस्वरूप से स्वयं ही लेता है।
गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः ।
मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥५॥
इन्द्रियों को और विषयों को अंतर्यामी स्वाभाविक रूप से प्रकाशित करता है। किन्तु जीव उन विषयों का