श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ६५
सूर्योदय होने के बाद दिन जिस प्रकार समाप्त होते ही रात आनी ही है, उसी प्रकार उत्पत्ति और स्थिति
समाप्त होते ही प्रलय का आना निश्चित ही है। ऐसा प्रलयकाल आता देख अनादि काल क्षुब्ध होता है और वह
महाभूतों के साथ पृथ्वी का विनाश करने के लिए भयंकर ताण्डव करने लगता है। जब फसल पक जाती है तो
गरमी में अपने आप सूखने लगती है उसी प्रकार अब तक सृष्टि में स्थूल आकार में जितना कुछ व्यक्त हो रहा
था, उन सबकी वह अव्यक्त अर्थात् अदृश्य करने लगता है। घास आदि का बीज पृथ्वी पर पड़ा रहता है, वह
वर्षाकाल में अपने आप अंकुरित हो जाता है और शरद ऋतु में अनेक रूपों से फल बनकर पुष्ट होता है। ग्रीष्म
ऋतु के अन्त में उसकी जड़ें और फल अदृश्य हो कर उसके बीज पृथ्वी में विलीन हो जाते हैं। उसी प्रकार इस
संसार की अवस्था है। जिस प्रकार वसन्त ऋतु के आगमन से पहले पेड़ों के पत्ते गिर पड़ते हैं, उसी प्रकार
ब्रह्मदेव आदि का प्रभाव भी काल अपनी शक्ति से नष्ट कर देता है। जिस प्रकार किसान सूखे खेत को बटोरने
लगता है, उसी प्रकार काल भी शीघ्रता से व्यक्त को अव्यक्त करने लगता है। हे राजा! वही अव्यक्त करने की
रीति तुम्हें बताऊँगा। प्रलयकाल आने से पूर्व ही काल की प्रक्षोभक शक्ति प्रकट होती है।
शतवर्षा ह्यनावृष्टिर्भविष्यत्युल्बणा भुवि।
तत्कालोपचितोष्णार्को लोकांस्त्रीन् प्रतपिष्यति ॥ ९॥
जब कालशक्ति क्षुब्ध हो जाती है तो सौ वर्ष तक वर्षा नहीं होती। इससे महासंकट उत्पन्न होकर सृष्टि का
संहार होता है। पृथ्वी की पीठ पर कुछ भी शेष नहीं रहता। प्राणि मर जाते हैं, जंगल जलकर राख हो जाते हैं।
आँख में लगाने भर के लिए भी एक बूँद पानी नहीं रहता। इस प्रकार काल सभी लोगों का संहार कर डालता है।
तभी द्वादश सूर्यों का मेला आकाशमण्डल में एकत्र होकर उसके प्रखर किरणों से सारा त्रिभुवन संतप्त हो उठता
है। धूप की लहरें उठती हैं और उनके कारण पर्वत मालाएँ झुलस जाती हैं। हे राजा! उस भयानक अग्नि से
भूमण्डल देखते-देखते भस्म हो जाता है।
पातालतलमाराभ्य सङ्कर्षणमुखानलः।
दहन्नूर्ध्वशिखोविष्वग् वर्धते वायुनेरितः ॥ १०॥
उष्णता से पृथ्वी का तल तपता है और उससे शेष नाग का फन झुलसने लगता है। तब शेष अपने
सहस्रमुखों से विष की अग्निज्वालाएँ उगलने लगता है। अग्नि की वे ज्वालाएँ पाताल के नीचे से ऊपर आकर
त्रिभुवन को भी जलाने लगती हैं। तबिवार ज्वाला भड़क उठती है। शेषनाग क्रोध से फुफकारने लगता है।
उससे प्रचण्ड वायु उत्पन्न होती है और वही उस अग्नि की सहायक बनकर जब दसों दिशाओं को जलाने लगती
है तब ज्वालाएँ और भी अधिक भड़कती हैं।
सावर्तको मेघगणो वर्षति स्म शतं समाः।
धाराभिर्हस्तिहस्ताभिर्लीयते सलिले विराट् ॥ ११ ॥
स्वर्ग से लेकर पाताल तक अग्नि की ज्वालाएँ भड़क उठती हैं, तभी प्रलय करने वाली मेघपंक्ति भी उस
दुर्धर प्रसंग में क्षुब्ध हो जाती हैं। उस समय पानी की बड़ी-बड़ी बूँदें नहीं गिरतीं बल्कि जोर से बिजली
कड़कती है और अत्यन्त प्रचण्ड एवं निरन्तर मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है। हे राजा! ये पर्जन्य धाराएँ अन्य
धाराओं की तरह साधारण नहीं होतीं। उनका परिमाण तुम्हें बताता हूँ। हे वीरश्रेष्ठ! वह प्रसंग सचमुच ही अत्यन्त
कठिन है। उन प्रलय मेघों की धाराएँ उन्मत्त हाथी की सूँड की तरह होती हैं और ऐसा वह पर्जन्य क्षणभर के