श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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सेवन कर अहंभाव के कारण आसक्त होता है। वह कहता है, ' 'अहा ! यह विषय-प्रेम कितना मधुर है। यह मेरे
शरीर की हवस को तृप्त करता है।' ' ऐसा कहते समय अधिक विषयभोग करने के लिए इन्द्रियों की इच्छा
प्रक्षुब्ध होती है। देहाभिमान के कारण इन्द्रियों की विषय के प्रति आसक्ति बढ़ती ही रहती है और मूल
आत्मस्फूर्ति का अस्त होकर मोह और ममता का पलड़ा ऊपर चढ़ता जाता है। तब वह देह को ही 'मैं' कहता है
और जो देह के सम्बन्धी हैं, उन्हें अपना कहता है। विषय लोलुपता के कारण उसे क्षण भर के लिए भी फुरसत
नहीं मिलती। प्राकृतिक रूप से जो कर्म होता रहता है, उसे मैं कर रहा हूँ, ऐसा ही वह कहता है जिससे व्यर्थ के
देहाहंकार का आतंक फैल जाता है। देह का अहंकार प्रबल होते ही, मोह और ममता अनिवार हो जाती है और
इस प्रकार जन्म-मरण का रास्ता तेजी से शुरू हो जाता है।
कर्माणि कर्मभिःकुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत्।
तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ्रमतीह सुखेतरम्॥६॥
मन में विषयेच्छा रखकर जब कर्मेन्द्रिय कर्म करते हैं तो धर्म और अधर्म की उत्पत्ति होती है और वे ही
जीव के लिए अत्यन्त बाधक होते हैं। इच्छित फल का भोग मिलते ही, उस जैसा भोग लेना आवश्यक हो जाता
है। उस देह से फिर देह की ही खान खुलती है, अर्थात् अनेक जन्म लेने पड़ते हैं और मृत्यु भी भोगनी पड़ती
है। फल की आशा से किया हुआ कर्म भयंकर होता है। उससे उन्हें भी मृत्यु प्राप्त होती है, जो अमर हैं और
जो जन्मरहित हैं उन्हें भी बार-बार जन्म लेने को बाध्य करता है। इस प्रकार स्वर्ग और संसार के बीच संचार
अर्थात् जन्म-मरण के फेरे शुरू हो जाते हैं और अपने कर्म के कारण विविध प्रकार की योनियाँ भोगनी होती हैं।
कोल्हू के बैल को कोल्हू से जोतने पर वह बार-बार कोल्हू के चारों ओर फेरा लगाता रहता है उसी प्रकार ज्ञान
की आँखें बन्द कर अपने कर्मों का फल भोगते हुए जन्म-मरण के असंख्य कष्ट भोगने पड़ते हैं। उदय और
अस्त के अनुसार जिस प्रकार सूर्य को घूमना ही पड़ता है, उसी प्रकार जन्म और मृत्यु के भोग जीव भोगता
रहता है। बड़े परिश्रम से वह जन्म लेता है, तभी मृत्यु भी उसका पीछा करती हुई आती है। जिस प्रकार एक ही
डंठल पर जुड़वाँ फल आते हैं, उसी प्रकार जन्म-मरण के करोड़ों भोग जीव स्वयं अनुभव करता है।
इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रवहाः पुमान्।
आभूतसम्प्लवात् सर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः॥७॥
जो पूर्णरूप से स्वतंत्र था वह कर्मों के अधीन हो गया और इस प्रकार कर्मगति का पात्र होकर निरन्तर
सुख और दुःख भोगने लगा। विषय का सुख मानकर उसने जानबूझ कर विष ही ग्रहण किया और अगणित
दुःखों का पात्र बना। करोड़ों जन्म लेकर दुःख भोगते रहने पर भी दुःख कम नहीं होता। वह दुःखों के भँवर में
फँस जाता है, शोक और मोह के गर्त में पड़ जाता है और घोर यातनाओं में डूब कर सर्वदा कालाग्नि में उबलता
रहता है। इस प्रकार प्रत्येक जन्म में दुःख और शोक सहन करते-करते आगे एकाएक महाप्रलय भड़क उठता है।
फिर वहाँ से लौटना सम्भव नहीं होता और आगे बढ़ने का भी मौका नहीं रहता। इस प्रकार वह जब अपने कर्म
से बँध जाता है, तब प्रलय का प्रहार उसके मस्तक पर होता है। अब तक तुम्हें उत्पत्ति और स्थिति के बारे में
सम्पूर्ण रूप से बतलाया। अब प्रलय का लक्षण बताता हूँ, ध्यान से सुनो।
धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम्।
अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्तायापकर्षति॥ ८॥