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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

५८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
पूरी तैयारी है और इसी कारण यह प्रपंच इतना फला फूला है। संकल्परूप महापर्जन्य के जल से तथा
वासनारूपी उदक से यहाँ की टंकियाँ भरी हुई हैं इसलिये किले में रहने वाले लोग यही पानी पीकर संसार के
सुख-दुःख में विहार करते हैं। अब इस किले के नौ द्वारों में से किसमें आधिदैव, आधिभूत और अध्यात्म है वह
भी बताता हूँ। किस द्वार में कौन-सा यंत्र रहता है, उसका चालक कौन रहता है, उसकी रचना कैसी है और
उससे विषयों का प्रहार कैसे होता है, यह भी सुनो।
दृग्रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रे परस्परं सिध्यति यः स्वतः खे।
आत्मा यदेषामपरो य आद्यः स्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धिः ॥ ३१॥
नेत्रेन्द्रिय एक बहुत बड़ी तोप है। वह स्त्रीस्वरूप की मार करती है और उस प्रहार से मर्मस्थान का भेद हो
जाने के कारण कोटि-कोटि सुरनर घायल हो जाते हैं। नेत्र गोल इन्द्रिय शरीर में और इस इन्द्रिय की अधिष्ठात्री
देवता सूर्य है इसलिये वह देखे हुए स्वरूप को अपने में अंकित करती है। वही सच्चा अध्यात्म है। नीला, पीला
आदि जो स्वरूप का आभास दृष्टि को होता है, वह दृष्टि को दृश्य का भान होना ही वास्तविक अधिभूत है।
अधिदैव सूर्य सिद्ध है, दृष्टि के सामने अधिभूत रखा हुआ है और शरीर में नेत्रगोल भी हैं, लेकिन यदि दृष्टि में
अध्यात्म तेज न हो तो अंधत्व ही रहता है। अधिदैव और अधिभूत होते हुए भी जब तक दृष्टि में अध्यात्म तेज
नहीं है, तब तक कुछ भी देखना सम्भव नहीं होता। वहाँ अंधत्व कायम ही रहता है। अथवा अध्यात्म और
अधिभूत दोनों हों और अधिदैव रूपी सूर्य अस्त हो गया हो तो भी आँखों का देखना अंधकार में लुप्त हो जाता
है। उस समय यदि बत्ती जलाकर प्रकाश भी किया जाय तो उसका प्रकाश सूर्य की तरह नहीं होता। चन्द्रोदय भी
सूर्यपकाश की बराबरी नहीं कर सकता। सूर्य रात्रि को समाप्त कर दृष्टि की सहायता करता है इसीलिये सूर्य को
अधिदैव कहते हैं। अध्यात्म और अधिभूत ये दोनों हों और अधिदैव सूर्य ही न हो, तो दृष्टि का कुछ बस नहीं
चलता। अध्यात्म और अधिदैव ये दोनों हों और गुरु की पूर्ण कृपा हो और अधिभूत का दृश्य दर्शन बन्द होता है,
तभी सचमुच ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। यहाँ जो अपने दृश्य का दर्शन होता है, उससे देह ही सब कुछ है, यह
देहबुद्धि दृढ़ हो जाती है। उस दृश्य का ही भान नष्ट करने से, देह के साथ संसार ही शून्य लगने लगता है। इस
प्रकार अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत यह त्रिपुटी किसे कहते हैं यह तुम्हें उसके विभागों के साथ विस्तारपूर्वक
बताया। इसमें त्रिपुटी का अर्थ स्वरूप अर्थात् दृश्य, द्रष्टा और दर्शन, कर्म, कर्त्ता और क्रिया का आचरण ध्येय,
ध्यान और ध्यातृत्त्व से है। इन्हें त्रिपुटी कहने का अर्थ यही है कि ये एक-दूसरे से सापेक्ष हैं। इसलिये अब
उनकी परस्पर अपेक्षाओं के लक्षण भी बताता हूँ। नाना प्रकार के सुखोपभोग होते हैं और उन्हें देखने के लिये
दृष्टि भी सक्षम रहती है। लेकिन वह सूर्य के बिना व्यर्थ ही रहती है। ऐसा यह परस्पर सम्बन्ध है। सूर्य हो किन्तु
आँख न हो तो भी दिखायी नहीं देता या आँख हो और सूर्य न हो तो भी कुछ भी नहीं दिखायी देता या सूर्य और
दृष्टि दोनों हो किन्तु देखने के लिये कुछ न हो तो भी दोनों का सामर्थ्य व्यर्थ हो जाता है। सूर्य स्वरूप को व्यक्त
करता है और अपने किरणों से दृष्टि में प्रवेश कर नाना प्रकार के आभास दिखलाता है। इसलिये यह देखने का
कार्य एक-दूसरे पर निर्भर है। लेकिन इतना होते हुए भी सूर्य अलिप्त होकर आकाश मण्डल में रहता है। उसी
प्रकार इस विश्वस्वरूप को व्यक्त करने वाला चिदात्मा सचमुच अलिप्त ही रहता है। वह इस जगत में भरा हुआ
है तथा जगत के हृदय में रहता है। यह सारा संसार उत्पन्न हो या उसका लय हो जाय लेकिन वह वैसा ही रहता
है। जिस प्रकार आकाश में हजारों घटाकाश निर्माण होने पर भी उन घटों में आकाश प्रत्यक्ष रूप से दिखायी ही

देता है। वे घट ही रहते हैं और समाप्त हो जाते हैं, लेकिन जैसा रहना चाहिये, वैसा ही रहता है। उसी प्रकार
चित्स्वरूप, परमात्मा श्रीपति उत्पत्ति, स्थिति और लय इन अवस्थाओं में अलिप्त ही रहता है। वह परमात्मा आदि
का अनादि है, बुद्धि की अनादि बुद्धि है और वास्तव में सिद्धि की अनादि सिद्धि भी वही परमात्मा है। प्रकाश
का प्रकाशक यही है, सूर्य का आदिसूर्य भी यही है; और त्रिपुटी का द्योतक भी यही परमात्मा है और वह
अलिप्त है। विवेक का भी विवेक यह है, सुख का सुखदायक भी यही है, बुद्धि का बोधक और प्रकाश का
प्रकाशक भी यही परमात्मा है। ज्ञानाभिमान से उसे जानने के लिये गये वेद भी लज्जित हो गये, स्मृति और पुराण
तो पगला गये। शास्त्र पठन से वाद-विवाद करने पर भी वह समझ में नहीं आता। देव, देवी और देवता; भोग्य,
भोग और भोक्ता; इस प्रकार नानाप्रकार की त्रिपुटी की जो त्रिगुणता उत्पन्न होती है, वह यह प्रकृति ही कराती
है। यह परमात्मा आदि, अव्यक्त और अतर्क्य है तथा प्रकृति से भिन्न है। उसे जानने के लिये दूसरों के विचार
उपयोगी नहीं है। इसे इसके ही सामर्थ्य से हृदय में देखना चाहिये, इसके ही योग से इसे परिपूर्णत्त्व से पहचानना
चाहिये, इसका ही हाथ पकड़ कर इसे प्राप्त करना चाहिये और वह भी उसकी ही कृपा से प्राप्त होता है। यह
स्वयं ही स्वप्रकाशित है। इसके ही प्रकाश से इसे देखें और इसके ही योग से इसके स्वरूप में मिल जायें।
अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत आदि का वर्णन नेत्र द्वारा यहाँ बतलाया, उसी प्रकार अन्य इन्द्रियों में भी उनकी
व्याप्ति किस प्रकार होती है, इसका वर्णन देव संक्षेप में करेंगे।
एवं त्वचादि श्रवणादि चक्षुर्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम्।
योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकारः प्रधानमूलान्महतः प्रसूतः ॥ ३१ ॥ (अ)
प्रकृति से महत्तत्त्वादि द्वारा अनेक विकार फैलते हैं, और गुणों का क्षोभ होने के कारण वे विकार पूर्ण
रूप से उफन कर त्रिपुटी के स्वरूप में आडम्बर फैलाते हैं। जिस प्रकार सूर्य के योग से नेत्रादि इन्द्रियों के
व्यापार चलते हैं उसी प्रकार कर्ण, त्वचा, जिह्वा और नाक आदि ज्ञानेन्द्रिय पंचक का कार्य त्रिपुटी के रूप में
घटता रहता है। इसमें जो दूसरे पाँच कर्मेन्द्रिय हैं, वे ज्ञानेन्द्रिय के अधीन होते हैं। हाथ, पैर, गुहा, शिस्न और
पाँचवीं वाणी इन्हें ज्ञानेन्द्रिय प्रेरणा देते हैं, तभी वे कर्मेन्द्रिय क्रिया करने लगते हैं। इस प्रकार ये दो पंचक
मिलाकर दस इन्द्रिय होते हैं, इसे ध्यान में रखो। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन्हें ही चित्तचतुष्टय चमत्कार
कहते हैं। वास्तव में ये एक ही हैं किन्तु उनका प्रकार भिन्न-भिन्न है। जिसका जैसा व्यापार है, वैसा उसका
नाम है। उद्धव ! केवल देह के आकार के कारण ही जो 'मैं' की भावना आती है, वह प्रबल अहंकार है। गहन
संकल्प और विकल्प, यही मन है। पूर्व में किये भोगों का स्मरण ही चित्त का स्वरूप है। कोई दृढ़ निश्चय हो
जाना यही 'बुद्धि' है। गुणक्षोभ का यह लक्षण ही भोग के साधन से भोग्य बन जाता है। लेकिन भोक्ता उससे
अलग होता है। उसका भी लक्षण सुनो। जहाँ त्वचा को विषयों का स्पर्श होता है, वहाँ वायु अधिदैव है।
लेकिन परमात्मा उससे भिन्न होता है। ज्ञानस्वरूप होने के कारण वह अविकारी ही होता है। रसनेन्द्रिय अत्यन्त
श्रेष्ठ है और रस उसका विषय है। उसका अधिदैवत स्वयं वरुण है। लेकिन आनन्द से परिपूर्ण आत्मा उस रस
से अलग ही है। श्रवणेन्द्रिय का विषय शब्द है। वहाँ दिशा अधिदैव है यह प्रसिद्ध ही है। किन्तु शब्द में मूल
आत्मा निःशब्द ही रहता है और वह अविकृत रहता है। नेत्रेन्द्रिय का लक्षण पहले ही बता दिया है। ज्ञानेन्द्रियों
की स्थिति इस प्रकार है। इसी रीति से त्रिपुटी बनती है। इसमें चित्त नाम का जो इन्द्रिय है उसे चिंतन का
विषय प्राप्त है। वहाँ वासुदेव अधिदैव है। लेकिन आत्मा चित्त से अलग है। मन यह एक अत्यन्त चंचल

५८२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इन्द्रिय है और संकल्प उसका शक्तिशाली विषय है और वहाँ निर्मल चन्द्रमा अधिदैव है। लेकिन आत्मा मन से
निराला ही है। 'अहंकार' यह इन्द्रिय अत्यन्त बलवान है। 'मैं' का भाव यही उसका विषय है। रुद्र उसका
अधिदैव है। किन्तु परमात्मा अहंकार से बिलकुल भिन्न है। बुद्धिरूप इन्द्रिय अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न है। 'जानना'
यही उसका विषय है। वहाँ ब्रह्मदेव 'अधिदैव' है लेकिन ज्ञानरूप आत्मा बुद्धि से बिलकुल अलग ही है। अब
तक कारण के साथ चित्तचतुष्टय और उसकी त्रिपुटी के बारे में बताया। अब कर्मेन्द्रियों का भी लक्षण
बताऊँगा, सुनो। वाणी के इन्द्रिय में भाषण यह विषय रहता है। वहाँ अग्नि अधिदैव रहता है। उसमें शक्ति
सरस्वती का निवास रहता है। लेकिन आत्मा महामौन रह कर उससे अलिप्त ही रहता है। हस्तेन्द्रिय का विषय
है, 'ग्रहण'। उसका अधिदैव इन्द्रिय है। वहाँ क्रियाशक्ति रहती है। लेकिन अपने अक्रियत्व से, वहाँ भी आत्मा
अलिप्त ही रहता है। पैर नामक इन्द्रिय का विषय गति है और उसका अधिदैव उपेन्द्र है। उसमें गमनशक्ति का
वास है। लेकिन निश्चलत्व के कारण आत्मा वहाँ भी अलिप्त ही रहता है। गुदेन्द्रिय का विषय मलोत्सर्ग है।
वहाँ अधिदैव निऋति है। उसमें क्षरशक्ति है लेकिन वहाँ भी आत्मा अलिप्त ही रहता है। शिस्नेन्द्रिय का विषय
है, रति। वहाँ प्रजापति अधिदैव है और वहाँ आनन्दशक्ति का निवास रहता है। किन्तु परमानन्द के योग के
कारण आत्मा वहाँ भी अलिप्त ही रहता है। ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय के योग से कर्म का आचरण घटता है।
यही चित्तचतुष्टय का लक्षण है। गुणक्षोभ का भी वही कारण होने के कारण वह सारा मायिक है। गुणक्षोभ का
प्रमुख मूल वही है। वही प्रकृति के विकार से जड़रूप होता है और आत्मा अविकारी और निर्मल होने के
कारण प्रकृति से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति पैत्रिक भूमि के साथ सभी साहित्य बड़े
अभिमान से घर में सम्पादन करता है, फिर भी उससे अलिप्त ही रहता है, उसी प्रकार इन तीन गुणों के क्षोभ
से अभिमान नाना प्रकार के विकारों का जंगल कायम करता है, किन्तु आत्मारूप वसंत निराला ही रहता है।
उसी का निरूपण श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतुर्वैकारिकस्तामस ऐन्द्रियश्च ॥ ३२ ॥
आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यास्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः।
सचमुच 'मैं' और 'मेरा' इस लगन के कारण ही जीव के पीछे संसार लगा हुआ है। उस अहंकार की
निवृत्ति से ही जीव को संसार से छुटकारा मिलेगा। लेकिन यह असह्य अहंकार कहाँ से उत्पन्न हुआ? इसका भी
उत्तर देता हूँ। स्वस्वरूप को भूलकर मन में जिस दृढ़ अहं का स्फुरण होता है, वही अहंकार है। विकार से तीन
गुणों का क्षोभ वही करता है। जागृति का विस्मरण ही स्वप्न सृष्टि का विस्तार है और स्वरूप से विमुख होने
वाला अहंकार ही त्रिगुणात्मक संसार है। विकार के योग से तीन गुण क्षुब्ध होते हैं। विस्मरण मोह का लक्षण
है। उस विकार के तीन गुण विकृत हो गये इसलिये अब उसके भाग सुनो। मूल रूप में जिसे 'वैकारिक' कहा
है वही सात्त्विक अहंकार है। वही चित्तचतुष्टय का द्योतक तथा अधिदैवों का प्रकाशक है। सत्त्व से मन उत्पन्न
होता है और मन से प्रचण्ड विकार उत्पन्न होते हैं। इसीलिये सत्वगुण को भी विकृत गुण ही कहते हैं।
ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय पंचक ये दोनों मिलकर दशेन्द्रिय होते हैं। उन्हें रजोगुण प्रकाशित करता है, इसलिये
उस रजोगुण को 'इन्द्रिय सम्बन्धी' कहते हैं। अब इसमें तामस नाम का जो गुण है वह आकाशादि सूक्ष्म
पंचतत्त्व जो महाभूतों को आच्छादित करते हैं, उन्हें विषयों के साथ उत्पन्न करता है। इस प्रकार महाभूत और
पाँच विषय इनको तमोगुण प्रकाशित करता है इसलिये उसे आदरपूर्वक भूतादि (भूतों से पहले का) कहते हैं।

बाईसवाँ अध्याय ५८३
इस प्रकार तीन गुणों के विकार से और काम्य कर्म के संस्कार से, अहंकार से प्रबल होकर वह अनेक कारणों
से संसार में परिभ्रमण करता है। लेकिन प्रकृति के इस विकार से आत्मा अत्यन्त भिन्न है। मृगजल उत्पन्न कर
जिस प्रकार सूर्य आकाश में अलिप्त रहता है, सर्प का आकार प्रकट कर स्वयं डोर जिस प्रकार सर्प का स्पर्श
भी नहीं करती, उसी प्रकार परमात्मा भी संसार उत्पन्न कर स्वयं निःसंग और निर्विकार ही रहता है। जिस प्रकार
स्फटिक जिस रंग पर रखो उसी रंग का दिखायी देगा लेकिन वह स्वयं उन रंगों से अलग सफेद ही होता है,
उसी प्रकार गुणों के सम्पर्क से जीवात्मा भी बद्ध दिखायी देता है, फिर भी वह नितांत शुद्ध ही है। लेकिन यह
ज्ञान न होने के कारण भिन्न-भिन्न मत के लोग व्यर्थ का विवाद करते रहते हैं। कोई कहता है, आत्मा देहधारी
है, कोई उसे विदेही कहता है और कोई उसे स्पष्ट नकार देता है। कोई कहता है, आत्मा सगुण है, कोई कहता
है वह निर्गुण है तो कोई कहता है कि वह परमात्मा सगुण और निर्गुण दोनों है। कोई द्वैत को प्रतिपादित करता
है, तो कोई अद्वैत का प्रतिपादन करते हैं। कोई कहता है, ये दोनों असंबद्ध हैं और हमारे मत के अनुसार
देहात्मवाद ही सही है। कोई कहता है यह सभी गलत है। यहाँ जो प्रपंच दिखायी देता है, वही सच है ऐसा
कुछ लोग कहते हैं। इन सबका विचार करने पर ये सभी अज्ञानमूलक मालूम होते हैं क्योंकि आत्मा पूरी तरह
ज्ञानस्वरूप और सभी भेदों का निवारण करने वाला है। 'आत्मा परिज्ञानमयः' अर्थात् आत्मा प्राणस्वरूप है यही
मूल श्लोक है, इसलिये अज्ञान का भेद ही नहीं रह जाता। आत्मा शुद्ध, बुद्ध और ज्ञानरूप है, यही सिद्ध होता
है। जिस प्रकार नक्षत्र आदि के साथ रात्रि को समाप्त कर सूर्य प्रकट होता है, उसी प्रकार भेदों के साथ कार्य
का भी लोप कर ज्ञानसूर्य ज्ञानरूपी किरणों से प्रकट होता है। तब माया भी गुणों के साथ नष्ट हो जाती है,
वाद-विवाद भी तमाम भेदों के साथ मिट जाता है, अज्ञान समूल नष्ट हो जाता है और चारों ओर सच्चिदानन्द
भर जाता है। आत्मा सच्चिदानन्द से परिपूर्ण होने के कारण उसके आगे सारा अज्ञान व्यर्थ हो जाता है। अज्ञान
को नष्ट करने का वह सबसे अच्छा साधन है। विवेक अथवा सांख्य दर्शन व्यर्थ है, ऐसा लगता है। उसी विषय
का निरूपण आधे श्लोक में श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३॥
मूलतः अज्ञान मिथ्या होता है, इसलिये विषय का भान भी अज्ञानजन्य ही है। लेकिन यही देखकर लोग
भ्रम में पड़ जाते हैं अतः उन्हें स्वस्वरूप का विस्मरण हो जाता है। मैं साक्षात परमात्मा उनके हृदय में अत्यन्त
निकट होते हुए भी, उनकी बुद्धि मुझसे पराङ्मुख होती है और इसीलिये उनमें विषयासक्ति उत्पन्न होकर घरबार,
पत्नी-बच्चे, देह आदि में ही रुचि होने लगती है। स्वस्वरूप का विस्मरण ही विषय का चिन्तन बढ़ाता है और
उसी देहाभिमान के कारण जीवों को अनिवार्य जन्म-मरण प्राप्त होता है। उस देहाभिमान का नाश करने के लिये
ही मैंने वैराग्य युक्त ज्ञानध्यान का साधन करने का ढंग बताया क्योंकि वही समूल अज्ञान का विनाशक है। जब
तक शरीर में देहाभिमान है, तब तक साधन भी आवश्यक ही है। अज्ञान का पूरी तरह क्षालन होने पर, साधन
व्यर्थ हो जाता है, यह मैं भी मानता हूँ। यह वह अज्ञान है जो शुद्ध स्वरूप में जीव का भाव उत्पन्न करता है।
वही जीव में अनिवार्य जीवन-मरण का चक्र लगा देता है। हे उद्धव! आत्मस्वरूप का विस्मरण हो देह में जो
अहंता उत्पन्न होती है वही दृढ़ अज्ञान है। वही देहाभिमान है। अज्ञान यह नाम गौण ही है। वास्तव में देहाभिमान
ही मुख्य है। भगवान का यह भाषण सुनकर उद्धव चौंक उठा। इसलिये वह उसी अर्थ का प्रश्न भगवान से स्वयं
ही पूछने लगा। वह प्रश्न इस प्रकार था कि देहाभिमान किस तरह जन्म-मरण का भोग लगाता है ?

५८४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव उवाच
त्वत्तः परावृत्तधियः स्वकृतैः कर्मभिः प्रभो।
उच्चावचान् यथा देहान् गृह्णन्ति विसृजन्ति च ॥ ३४ ॥
आकाश सर्वत्र सन्मुख ही होता है, कभी भी विन्मुख नहीं होता। उसी प्रकार आत्मा भी अंतर्बाह्य परिपूर्ण
ही है। फिर उसकी वृत्ति विन्मुख कैसे होगी ? जब आकाश को जाल में बाँधना सम्भव होगा, तभी अकर्त्ता को
कर्त्ता का बन्धन लगेगा। वंध्या का गर्भधारण करना जिस प्रकार मिथ्या है, उसी प्रकार मुक्त के लिये जन्म-मरण
का बन्धन झूठ है। आत्मा के सिवा जब कुछ भी खाली नहीं बचा तो फिर इस देह से उस देह में जाना कैसे
सम्भव है ? यदि पृथ्वी रूठ कर आश्रय देना बन्द कर दे, अथवा आकाश ही कहीं दूर चला जाय, तभी एक देह
का आत्मा दूसरे देह में प्रवेश कर सकेगा। चिऊँटी यदि सात समुद्र निगल सके तभी आत्मा को ऊँच-नीच
योनियों का भोग भोगना पड़ेगा। अर्थात्, यह असंभव है। यह बात अतर्क्य है। उसके संशोधन पर तर्क काम नहीं
करता। योगी भी भ्रम में पड़ गये।
तन्ममाख्याहि गोविन्द दुर्विभाव्यमनात्मभिः ।
न ह्येतत् प्रायशो लोके विद्वांसः सन्ति वञ्चिताः ॥ ३५ ॥
हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारी लीला अगाध है। वह किसी की समझ में नहीं आती। जिनका चित्त माया के भुलावे
में है, उन्हें तुम्हारी स्थिति का पता नहीं है। आत्मा केवल अद्वितीय, अविनाशी है, उसमें तुम उत्पत्ति, स्थिति और
नाश दिखाकर मिथ्या संसार का भास उत्पन्न करते हो। तुम्हारी यह लीला अतर्क्य है। उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं
चलता। इसमें वेद की मति गुंग हो गयी, उपनिषद पगला गये, पुराण मूक होकर बैठ गये। इन सबने सारे प्रयास
कर डाले लेकिन उसमें उनकी गति काम न आयी। तुम्हारे संबंध में ज्ञान तुम्हारी कृपा के बिना नहीं होगा।
इसलिये हरि की कृपा को जो पात्र नहीं है ऐसे जड़-मूढ़ लोगों का संसार का बन्धन नहीं टूटता। तुम्हारी
योगमाया की करनी अतर्क्य है। उसने बछड़ों को चुराते ब्रह्मदेव को भी भुलावे में रखा। मोहनी को देखकर शंकर
भी भुलावे में आ गये। इसीलिये गोविन्द की कीर्ति सारे त्रिभुवन में फैली हुई है। इसलिये आप कृपया मेरे इस
प्रश्न का उत्तर दें कि एक देह से दूसरे देह में जीव कैसे प्रवेश करता है ? और जीव को जन्म-मरण भी कैसे
आता है ? उद्धव का यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण हँस दिये और बोले, अरे! यह सब मायिक है, केवल मनोमय
कल्पना का खेल है।
श्रीभगवानुवाच
मनः कर्ममयं नृणामिन्द्रियैः पञ्चभिर्युतम्।
लोकाल्लोकंप्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते ॥ ३६ ॥
ग्यारह इन्द्रिय और पंचमहाभूत मिलकर सोलह कलाओं का लिंगदेह बनता है और अनेक विषयों की
कल्पना करने वाला मन ही उसमें प्रधान रहता है। इसमें लिंगदेह ही मन है और उस मन के अधीन इन्द्रिय रहते
हैं। मन से ही देह चलता रहता है। उसमें देहाभिमान रहता है, वह भी मन के साथ ही रहता है। मन जिसे
छोड़कर चला जाता है, वहाँ देहाभिमान खड़ा भी नहीं रहता। मन के योग से ही अभिमान देह का बोझ ढोता
रहता है। मन जब विषयासक्त होकर शुभाशुभ कर्माचरण करता है, उस समय जीव कर्माधीन होकर दूसरे देह में

बाईसवाँ अध्याय ५८५
प्रवेश करता रहता है। आत्मा देह से बिलकुल भिन्न और अलिप्त रहता है लेकिन देह के साथ रहने का आभास
कराता है। उसका यह कौशल अद्भुत है। उसका भी लक्षण सुनो। घट जिधर-जिधर जाता है, उधर-उधर उसके
साथ घटाकाश भी जाता दिखायी देता है लेकिन वास्तव में आकाश नहीं हिलता। उसी प्रकार इस आत्मा का
जाना है। घट में अमृत भरा हो या मलमूत्र, फिर भी उन दोनों से आकाश अलिप्त ही रहता है, उसी प्रकार देह में
रहने वाला आत्मा सुख-दुःख से अलग ही रहता है। घट पर पत्थर मारकर उसके टुकड़े-टुकड़े भी कर दें
लेकिन आकाश पर एक खरोंच भी नहीं आती। उसी प्रकार नश्वरों में आत्मा सचमुच अनश्वर रहता है। घट जब
फूट कर नष्ट हो जाता है, उस समय भी आकाश स्वयंसिद्ध आकाश में ही रहता है। नया घर बनने पर आकाश
उसे भी व्याप लेता है। उसी प्रकार यह देह अशाश्वत है और आत्मा अखण्डता से परिपूर्ण है। उसे न दूसरे देह
में प्रवेश करना है और न जन्म-मरण का भोग भोगना है। जीव का एक देह से दूसरे देह में प्रवेश करना यह
क्रिया वासना मन के माध्यम से करती है। वह मन जीव के साथ दूसरे देह में कैसे जाता है, उसे सुनो।
ध्यायन्मनोऽनुविषयान् दृष्टान् वानुश्रुतानथ ।
उद्यत् सीदत् कर्मतन्त्रं स्मृतिस्तदनुशाम्यति ॥ ३७ ॥
मन सदा देखी हुई और सुनी हुई बातों का ध्यान करता रहता है। मन का यह ध्यान बहुत कठिन और
भयंकर होता है। इसलिये उसे और कुछ भी नहीं सूझता। अंतकाल में मन किसी चहेती वस्तु के ध्यान में मग्न
हो जाता है और तब वह तदाकार हो जाता है। वह सर्वभाव से उसमें मिल जाता है। जब पहला भोग समाप्त हो
जाता है तो मन सहज ही पहले देह का अभिमान भूल जाता है और अगले देह का ही एकाग्र होकर ध्यान करता
रहता है। विषयवासना पर लुब्ध हुआ मन, अपने कर्मानुसार प्राण के साथ दूसरे देह में संचार करता है। पहले जो
देह छोड़ दिया है, उसका चित्त को जरा भी स्मरण नहीं होता और मैंने नया देह धारण कर लिया है इसका भी
मन को स्मरण नहीं होता।
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं यत् स्मरेत् पुनः ।
जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तस्मृतिः ॥ ३८ ॥
जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद ।
विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथः ॥ ३९ ॥
मन विषयलोलुपता से जिस स्वरूप का चिन्तन करता है, उसमें ही वह स्वयं पूर्वदेह की स्मृति भूलकर
तद्रूप बन कर रहता है। वह पूर्वदेह को कैसे भूलता है? तो जिस प्रकार आयु बढ़ने पर, प्रौढ़ होने पर हम अपना
बचपन भूल जाते हैं, उसी प्रकार वह भी अपने पूर्वदेह को भूल जाता है। इस प्रकार का सम्पूर्ण विस्मरण, यही
देह का मरण है। उस विस्मरण के साथ ही चेतना प्राणों के साथ चली जाती है। चेतना जब प्राणों के साथ चली
जाती है तब देह को प्रेत की अवस्था प्राप्त होती है। उद्धव! इसी का नाम मृत्यु है। अब जन्म की बात सुनो।
मृत्यु के समय स्नेह से, द्वेष से अथवा भय से जैसा ध्यान रहता है, उसी के तद्रूप वह होता है और उसे वैसा ही
जन्म प्राप्त होता है। भरत को अनुष्ठान करते समय स्नेह से मृग का ध्यान आ गया तो वह स्वयं मृग बन गया
क्योंकि उसके ध्यान के अनुरूप मन का जन्म हुआ। कीटकी भय से भृंग का ध्यान कर रही थी अतः वह तद्रूप
हो गयी। पौण्ड्रक ने द्वेष से श्रीकृष्ण का ध्यान किया अतः उसे तद्रूपता प्राप्त हुई। इससे मन को जिस विषय का
ध्यान लगा रहता है, वैसी ही गति उसे प्राप्त होती है। संसार का विस्तार हमने स्वयं किया रहता है अतः

५८६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अंतकाल में वह सब प्रेम से प्रिय विषय बन जाता है। लेकिन इसमें भी जहाँ विशेष रूप से ध्यान बसता है उसी
स्वरूप का जन्म पुरुष प्राप्त करता है। फिर उस चिंतन के सामर्थ्य के अनुसार जैसे आकार का देह प्राप्त होता है,
वैसे ही देह का अभिमान उत्पन्न होता है और 'यह सारा देह मैं ही हूँ' ऐसा वह समझता है। इसमें मन और
अभिमान इनका स्वरूप देखें तो वह एक ही रहता है लेकिन उनके कार्य भिन्न-भिन्न रहते हैं। चित्त चतुष्टय का
यह स्वरूप ज्ञानी लोग एकात्मता से जानते रहते हैं। उस देह का बुरा या भला ईश्वर की कृपानुसार होता रहता
है। लेकिन वह देह का ही अभिमान लेकर नाचता रहता है। इसी का नाम है, पुरुष का जन्म। लेकिन यह देह
पहले का नहीं है, यह दूसरा देह है इसका भी उसे स्मरण नहीं रहता। इसलिये वह यहाँ भी पहले का ही
देहाभिमान लेकर बैठ जाता है। इसी अर्थ का दृष्टांत श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। जिस प्रकार स्वप्न में अथवा
मनोराज्य में अपने देह का भान नहीं रहता, कोई भिखारी अपने ही घर में सोया रहता है और वह स्वप्न में इन्द्र
बन जाता है, ऐरावत पर बैठ कर उर्वशी जैसी अप्सराओं के साथ रहता है। मेरा पहले का भिखारी का देह गया
और यह देवता का देह प्राप्त हो गया इसका उसे स्वप्न में भी स्मरण नहीं रहता। उसी प्रकार लोगों के जन्म की
स्थिति है। कोई मजदूर मन्दिर में घी की गगरी ले जाते समय मन में मनोराज्य करता रहता है कि मैं घोड़े पर
सवार हूँ, और उसी स्वकल्पित कल्पना तरंगों में ही मन ही मन उल्हसित होता रहता है। इतने में मनोराज्य में
घोड़े ने ऊँची छलांग लगायी यह सोच कर वह स्वयं ही कूद जाता है। उसके पास की घी की गगरी गिर कर
चूर-चूर हो जाती है और लोग जब पूछने लगते हैं, यह क्या हुआ ? वह उस मनोराज्य में ही कहता है, "मेरे
घोड़े ने जोर की छलांग लगायी।" लेकिन घी की गगरी गिर जाने के कारण, उस अपराध के लिये उसे बंदीगृह
में जाना पड़ता है लेकिन मन के ध्यान के कारण उसे उसका भान ही नहीं रहता। यहाँ तक का उसका विस्मरण
ही देह की मृत्यु है और मन का तीव्र ध्यान ही प्राणी का जन्म है। सारांश आत्मा का जन्म या मरण केवल भ्रम
का लक्षण है। उसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
स्वप्नं मनोरथ चेत्थं प्राक्तनं न स्मरत्यसौ।
तत्र पूर्वमिवात्मानमपूर्व चानुपश्यति ॥ ४० ॥
स्वप्न में पुरुष देहभान भूलकर स्वप्न की गृहस्थी का विस्तार अपने अभिमान के साथ बढ़ाता है। जागृत
अवस्था का देह उधर रह गया और यहाँ मुझे स्वप्नदेह प्राप्त हुआ है, इस प्रकार पहले के और अभी के देहों का
उस पुरुष को स्मरण नहीं होता। जागृति और स्वप्न इन दोनों स्थितियों में देहों को देखने वाला उनमें से कोई
भिन्न ही होता है, उसी प्रकार जीव जन्म और मृत्यु इन अवस्थाओं से भिन्न है। अर्थात् जीव को जन्म और मृत्यु
इनमें से कुछ भी नहीं है। सारांश जन्म और मृत्यु केवल देह के लिये ही हैं। आत्मा नित्य मुक्त और शाश्वत है
तथा स्वप्न के मनोरथों के तरंगों की तरह संसार अनेक प्रकार से विस्तृत है। देह को उत्पत्ति, स्थिति और लय
होने का कारण मन ही है। इसलिये संसार मन की कल्पना है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
इन्द्रियायनसृष्ट्येदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि।
बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृत् यथा ॥ ४१ ॥
सारा संसार मन की ही कल्पना है। इन्द्रियों के समस्त व्यवहार मन के कारण ही होते हैं और कर्म की
कसौटी के अनुसार मन ने ही इस त्रिपुटी को बढ़ाया है। अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत ये तीन प्रकार भी मन
ने ही किये हैं। सचमुच, आत्मवस्तु अखण्ड होते हुए भी उसमें तीन प्रकार की कल्पना का आभास होता है।

बाईसवाँ अध्याय ५८७
कुम्हार जब मटकी बनाता है, उस समय आकाश भी उसी के आकार का दिखायी देने लगता है, सच पूछो तो
आकाश पूरी तरह निर्विकार है लेकिन मटकी के कारण वह भी विकृत हुआ दिखायी देता है। उसी प्रकार आत्मा
अविकृत, नित्य और शुद्ध ही है। उसे मन तीन प्रकार की कल्पनाओं और नाना प्रकार की त्रिपुटी से अनेक प्रकार
का भेद उत्पन्न करता है। वह भेद कैसे बढ़ता है, सुनो। कार्य, कर्म और कर्त्ता, ध्येय, ध्यान और ध्याता; ज्ञान और
ज्ञाता; ये तीन त्रिपुटी मन द्वारा ही कल्पित है। 'अहं' का अर्थ मैं 'कोहं' अर्थात् मैं कौन यह आशंका और 'सोहं'
अर्थात् मैं ही हूँ, यह भेद; अथवा 'त्वं' अर्थात् जीव, 'तत्' अर्थात् ब्रह्म और 'अस्ति' अर्थात् तू है, ये पद; अथवा
सत्, चित् और आनन्द ये सारे सम्बन्ध मायिक हैं। असत् अर्थात् मिथ्या जो माया है, उसे दूर करने के लिये
वेदवाणी भी सत् का प्रतिपादन करती है और जड़ का विलय होने के लिये आत्मवस्तु को ही चैतन्यतत्त्व कहते
हैं। दुःख का निर्मूलन करने के लिये परब्रह्म को ही परमानन्द कहते हैं। इसलिये सच्चिदानंद भी मायिक ही सिद्ध
होता है। असत् मिथ्या होने के कारण मायिक है। वैसा तत्त्व यथास्थान कौन रख पायेगा? जहाँ जड़ के लिये ही
स्थान नहीं है वहाँ चैतन्य का तत्त्व किस प्रकार हाथ लगेगा? जहाँ दुःख का बिलकुल सम्बन्ध नहीं है, वहाँ कोई
आनन्द किसे कहेगा? इसलिये परब्रह्म के स्थान पर सच्चिदानन्द का सम्बन्ध लगाना भी मायिक है। जहाँ संसार
का आभास होता है, वह त्रिगुणों की त्रिपुटी का ही खेल है। इसलिये वह सब भी मायिक और मन का किया
हुआ है। आत्मा नित्य, मुक्त, शुद्ध और ज्ञानस्वरूप है। उसमें जो तीन प्रकार का भेद दिखायी देता है वह मन द्वारा
किया हुआ गुण सम्बन्धी भेद है। इसलिये स्पष्ट ही वह मायामय है। कोई पुरुष अग्निहोत्री है तथा सदाचारी है।
लेकिन उसकी स्त्री यदि व्यभिचारी है तो उसका पति दोषी है, ऐसा लोग कहते हैं, उसी प्रकार यह आत्मा के
भेद की बात है अर्थात् आत्मा वास्तव में अलिप्त रहता है और गुणों के दोष उस पर आरोपित रहते हैं। जिस
प्रकार स्वप्न में अकेला व्यक्ति सारा संसार बन जाता है, लेकिन वह सारा चमत्कार वास्तव में निद्रा के कारण
होता है, उसी प्रकार का भेद का मायिक प्रकार ब्रह्मा में भी है। जड़ और अजड़ यह देह के भेद; अथवा अलग
से किया हुआ जीव का भेद; यह स्वप्न की तरह माया का आभास है। आत्मा, नित्य, शुद्ध और अद्वितीय है। इस
प्रकार माया द्वारा किये गये भेद पर जिसकी निष्ठा है, ऐसे लोगों को वैराग्य प्राप्त करने के लिये काल ने जन्म-
मरण का फेरा लगा दिया। उसी का वर्णन श्रीकृष्ण करते हैं।
नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च।
कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ॥ ४२ ॥
उन्होंने कहा, हे उद्धव! सुनो। स्थावर जंगम आदि जो भी देहस्वरूप हैं, उन्हें काल के प्रभाव से नित्य नया
जन्म-मृत्यु का जंजाल लगा हुआ है। काल अपनी सूक्ष्म गति से सारे संसार को ग्रस लेता है। शरीर से चिपके
हुए वे जन्म-मृत्यु जीव को माया के मोह के कारण समझ में नहीं आते। माँ अपने बेटे के अवयव खुले होते हुए
भी उसे नग्न अवस्था में लाड़-प्यार करती है लेकिन वही माँ बेटा बड़ा होने पर उससे शरमाती है। वह
बाल्यावस्था काल ले गया और यह नयी प्रौढ़ावस्था प्राप्त होने पर माँ बेटे से शरमाने लगी। यह सारा परिवर्तन
काल ने ही किया है। यह सूक्ष्म काल इस प्रकार प्राणिमात्र को नित्य नया विनाश और नित्य नया जन्म देता रहता
है। लेकिन भ्रम से भ्रांत हुए प्राणी इस जन्म-मृत्यु का मार्ग नहीं जानते। जीवन की जिस अवस्था का भाग काल
ले जाता है, उसके साथ ही देह भी जाता है। आगे नयी उम्र आते ही काल उसे नया शरीर देता है ऐसा समझना
चाहिये। काल ने किया हुआ उद्भव और विनाश नित्य नया दिखाई देता है। इसलिये देह तीन प्रकारों से युक्त है

५८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यह हम स्वयं देख सकते हैं। काल की गति अतर्क्य है, इससे प्राणियों को जीवन-मरण प्राप्त होता है। उस
अत्यन्त काल गति के सम्बन्ध में ही श्रीकृष्ण दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पतेः।
तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादयः कृताः ॥ ४३ ॥
दीपक की ज्वाला क्षण-प्रतिक्षण नयी उत्पन्न होती रहती है, किन्तु वे नयी उत्पन्न होते समय या पुरानी
नष्ट होते समय आँखों को दिखायी नहीं देतीं। यमुना के जल का प्रवाह लहरों के द्वारा तीव्र गति से बहता
रहता है लेकिन उस प्रवाह का जल प्रत्येक क्षण नया हो रहा है, यह किसी को दिखायी नहीं देता। फल, वृक्ष
का डंठल छोड़े बिना कड़ुआ, कसैला, खट्टा या मीठा भी होता है। काल की अदृश्य सत्ता अतर्क्य है। वही
काल देह के साथ नित्य नया कैसे उत्पन्न होता है? इसका उत्तर यह है कि वह बाल्य, युवा और वार्धक्य ये
देह की अवस्थाएँ बदलता रहता है। इसके सिवा मूढ़, चतुर, निर्बल ऐसी नयी-नयी अवस्थाएँ पूर्व की अवस्था
को नष्ट कर उत्पन्न होती है। उस समय 'जो पहला था वही सचमुच' मैं हूँ यह स्मरण किस कारण से होता
है? ऐसी कल्पना भी तुम्हारे मन में आ सकती है। इसलिये श्रीकृष्ण इस विषय का निरूपण करते समय
अखण्ड स्फूर्ति का रहस्य बता रहे हैं।
सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम्।
सोऽयं पुमानिति मृषा धीर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥
उद्धव! दीपक की ज्वाला भले ही नयी उत्पन्न होती हों और पुरानी नष्ट हो, लेकिन उनमें का अग्नि पहले
की ही तरह एक जैसा होता है, इसीलिये उसे दीया कहते हैं। अथवा जल के प्रवाह में बड़ी-बड़ी लहरें बह कर
आती हैं, फिर भी पानी अखण्ड एक ही रहता है। इसीलिये सब लोग उसे पानी कहते हैं। उसी प्रकार उद्धव!
देह में भी उम्र के अनुसार निरनिराली अवस्थाएँ आती हैं और जाती हैं, फिर भी आत्मा अखण्ड सर्वव्यापी ही
रहता है। इसी कारण से 'वही मैं' वाली स्फूर्ति का स्फुरण होता है। तुम कहोगे कि मैं के 'अहं के कारण यह
अहंकार उत्पन्न हुआ है', तो उसका उत्तर यह है कि वह भी अज्ञान के कारण जड़-मूढ़ ही है। उसका दृढ़
प्रकाशक आत्मा ही है। इसलिये वही हमेशा परब्रह्म स्वरूप से स्फुरण प्राप्त करता है। किन्तु यह जो जन्म-मरण
है, वह देह के ही लिये होता है। आत्मा अपने सर्वव्यापित्त्व के कारण परिपूर्ण ही है। देह ही आत्मा है और वही
मैं हूँ, ऐसा जो कहते हैं, वह भी मिथ्या है। विषयों की कार्यसिद्धि होना अथवा देह में 'मैं' का अहं होना यह भी
सचमुच मिथ्या ही है। उसी कारण मनुष्य संसार बन्धन में उलझ जाता है। कर्मभूमि में अनायास ही नरदेह की
प्राप्ति होने पर, जो लोग विषयसुख में लिप्त होकर रह जाते हैं, उनका यह कार्य अमृत के बदले माँड पीने, रत्नों
के बदले अनाज के छिलके खरीदने, पर्वत त्याग कर कीट पाने, और ईंट के बदले हाथी बेचने जैसा है। आँखें
फोड़ कर कोई उसमें काजल लगा ले, अथवा नाक काट कर होली खेलने जैसा है। इस प्रकार वे नरदेह की
विडम्बना करते हैं और जीवन का सत्यानाश कर लेते हैं। लाखों की सम्पत्ति खर्च करने पर भी जीवन का एक
क्षण भी वापस नहीं मिलेगा ऐसा जीवन जो लोग विषयों के लिए खर्च कर देते हैं वे कर्मदरिद्री और नितांत मूढ़
हैं। देह स्वयं ही काल्पनिक है। इसलिये उसका अभिमान भी काल्पनिक है। वही यह देहबुद्धि की 'अहंता',
संसार को दृढ़ बन्धन लगा देता है। यदि उस 'मैं पन'को ही छोड़ दें तो फिर कैसा जन्म और कैसा मृत्यु? जब
संसार ही नहीं रहेगा तो फिर संसार बन्धन कैसा? देखो! बगुले का भय मिथ्या रहता है लेकिन जैसे बालक उसे

बाईसवाँ अध्याय ५८९
सच मान लेता है, उसी प्रकार देह भी मिथ्या और काल्पनिक है। लेकिन अज्ञानी लोग उसी को सच मानते हैं।
जो देह और बुद्धि दोनों को ही मिथ्या मानता है, उसे भविष्य में जन्मसिद्धि की क्या चिन्ता है? क्योंकि
मिथ्यारूपी पदार्थों की वृद्धि होती ही नहीं है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण बताते हैं।
मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।
म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्निर्दारुसंयुतः ॥ ४५ ॥
देहात्मवाद से देहाभिमान उत्पन्न होता है, जिससे लोगों में गूढ़ वासनाबीज उत्पन्न होता है और अपनी
वासनाओं के संकल्प से ही मनुष्य स्वयं मिथ्या जन्म-मरण को ही सत्य मानने लगता है। उस देहाभिमान के
कारण ही क्रिया चरण करने वाला कर्मकर्ता मैं हूँ यह मान कर निष्कर्म को कर्मबन्धन है और अमर को जन्म-
मरण है, यह मान लेता है। गड्ढे में एकत्र पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, इसलिये वहीं सूर्य का
जन्म हुआ और पानी जब सूख जाता है तो सूर्य का जीवन समाप्त हो गया, ऐसा बालक कहता है। उसी प्रकार
अजन्मा को जन्म-कर्म है ऐसा मानना केवल माया का भ्रम है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण सरल दृष्टांत देते हैं।
वास्तव में अग्नि अजन्मा होने के कारण अव्यक्त है, लेकिन वह लकड़ी में ही उत्पन्न हुआ ऐसा कहा जाता है।
वह उस लकड़ी के आकार का ही दिखायी देता है। इसलिये लकड़ी समाप्त होने पर अग्नि नष्ट हो गया ऐसा
कहते हैं। उस लकड़ी की ही तरह यहाँ जन्म और विनाश ये दोनों देह के ही लिये हैं। दृष्टांत के अग्नि की ही
तरह आत्मा नित्य और अविनाशी है। उस देह की नौ अवस्थाएँ होती हैं, जिनका वर्णन श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं।
निषेकगर्भजन्मानि बाल्यकौमारयौवनम्।
वयोमध्यं जरामृत्युरित्यवस्थास्तनोर्नव ॥ ४६ ॥
देह की नौ अवस्थाएँ हैं, उनकी भी स्थिति सुनो। उन भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का विस्तार भी सुनो। पिता के
देह में शुक्लरूप प्राप्त कर माता के उदर में प्रवेश करने को 'निषेक' कहते हैं। यही उस देह की पहली अवस्था
है। फिर माता के उदर में रक्तयुक्त संचित होकर, पिण्ड बनता है और धीरे-धीरे बड़ा होकर उसे 'गर्भ' का
स्वरूप आता है। यह देह की दूसरी अवस्था है। फिर प्रसूति वायु के आघात से पेट से बाहर आना, इसे 'जन्म'
कहते हैं। यह देह की तीसरी अवस्था है, यह अच्छी तरह जान लो। स्तनपान ही सबसे अच्छा लगता है, माता
ही सबसे श्रेष्ठ तथा रोने में ही सारा बल दिखायी देता है यह देह की चौथी 'बाल्यावस्था' है। केवल अज्ञान के
कारण मलमूत्र में लोटता है, सारे इन्द्रियों की शक्ति गुप्त रहती है, विचार करने की बिलकुल शक्ति नहीं रहती,
मधुर, कोमल, तुतला कर बोलता यह पंचवार्षिक 'बाल्यावस्था' है। फिर इन्द्रियों की शक्ति बढ़ती जाती है, किन्तु
शरीर में विषय का स्वार्थ नहीं होता, खेल पर ही मन आसक्त रहता है, यह उस देह की पाँचवीं 'कुमारावस्था'
है। इसके बाद 'युवावस्था' उसमें इन्द्रियों में परिपूर्ण शक्ति आती है और मन में बुद्धिमान होने का अभिमान
हिलोरें मारने लगता है। उस समय मन में स्त्री की वासना उत्पन्न होने लगती है, धन का लोभ बढ़ने लगता है,
घर-बार से प्रेम होने लगता है और समाज में नाम रूप की कीर्ति बढ़ने लगती है। सम्पत्ति के मद से मन में
अहंकार भरा रहता है, बाल-बच्चों में ही मन रमता है। बढ़ती आशा के कारण अधिक से अधिक भोग भोगने की
चाह होती है; और काम क्रोध का बड़ा-सा चक्र चारों ओर घूमता रहता है। कोई अपमान करता है तो वह सहन
नहीं होता। कोई 'तू' कहता है तो तैश में उठ कर खड़ा हो जाता है। ऐसी अनर्थकारी 'यौवनावस्था' देह की
छठवीं अवस्था है। पन्द्रह से पचीस वर्ष तक पूर्ण यौवन का जोर रहता है। उसमें नाना प्रकार के विकारों से

व्याप्त हुआ मन पर्याप्त देहाभिमान एकत्र कर लेता है। फिर चालीस से साठ वर्ष तक देह की उतरती कला पूर्ण
होकर शरीर पर झुर्रियाँ आने लगती हैं और काल उन इन्द्रियों की शक्ति नष्ट करने लगता है। जब काल शरीर को
क्षीण करना प्रारम्भ करता है, वह देह की सातवीं 'उत्तरावस्था' है। इस अवस्था का हाथ पकड़ कर आने वाली
'वार्धक्यावस्था' बड़े-बड़े शूरवीरों को भी विचलित कर देती है। इन्द्रियों के सुख विलास के व्यापार और
उत्तमोत्तम आहार शरीर को सहन नहीं होते। उस जरा ने शरीर की रचना अस्तव्यस्त कर दी होती है। दाँत टूट
कर वहाँ गड्ढे बन जाते हैं, भय से केश सफेद हो जाते हैं और मस्तक काँपने लगता है। वार्धक्य शरीर को
बिलकुल क्षीण कर देता है, फिर भी विषयों की इच्छा प्रबल रहती है। चिन्ता अपार और भयंकर ! आशा तो पूर्ण
नहीं होती। आँखों का तेज जाता रहता है, कानों से सुनायी नहीं पड़ता, मुँह से लार गिरने लगती है, फिर भी वह
देहाभिमान को बढ़ाता ही रहता है। समय आने पर मानसिक और शारीरिक रोग प्रकट होने लगते हैं, महामोह से
बुद्धि भ्रमित हो जाती है और विचार करने की शक्ति तो बिलकुल नष्ट हो जाती है। चलते समय पैर आपस में
लड़खड़ाने लगते हैं और सहारे के लिये लाठी लेनी पड़ती है। जीभ भारी हो जाती हे और शब्द स्पष्ट सुनाई नहीं
पड़ते। होंठ चूहे की तरह हिलते रहते हैं। आँखों से कीचड़ निकलता है, मुँह में लार भर जाती है, नाक से
निकलने वाला मल होठों पर बहने लगता है। मुख का चुम्बन भी कोई नहीं माँगता क्योंकि वह देने वाली स्त्री
थूक देख कर दूर भाग जाती है। खाँसी के कारण क्षण भर के लिये विश्राम नहीं मिलता, साँस फूलती है और
खाँसी का दौर चलता रहता है। शरीर काँपता रहता है, फिर भी देहाभिमान कम नहीं रहता। 'कल के बच्चे'
कहकर वह लोगों को पुरानी बातें सुनाने बैठ जाता है। अपानवायु का वाद्य तो निरन्तर बजने लगता है। इस
प्रकार जीवित अवस्था में ही जीव का उपहास करने वाली वह 'जरा' इस देह की आठवीं अवस्था है। जिस
प्रकार सुई के पीछे धागा रहता है, उसी प्रकार 'जरा' के साथ 'मरण' लगा हुआ है। जरा जब शरीर को क्षीण
करता है तो मृत्यु का झंडा लहराने लगता है। देह की नाड़ियाँ पोली होने लगती हैं, आवाज लड़खड़ाने लगती है,
फिर देह का आकर्षण रहता ही है। स्त्री और बच्चों की चाहत पहले से अधिक बढ़ने लगती है। मेरे बाद ये
अनाथ हो जायेंगे, इन्हें कौन सँभालेगा ? इस विचार से वह बच्चों को गले लगा कर फुक्का फाड़ कर रोने लगता
है। धन का लोभ तो बहुत कठिन है। अन्तकाल में भी वह स्वयं खर्च नहीं करता। औरों को दूर रखकर, केवल
अपने ही विश्वासपात्र लोगों को अपने खजाने की जानकारी देता है। वासना का चमत्कार आश्चर्यजनक है। देह
का विस्मरण कर जिस बात का सर्वाधिक स्मरण होता है, उसी वस्तु से वह तद्रूप हो जाता है। इस देह की
सम्पूर्ण स्मृति तत्काल नष्ट हो जाती है, और चेतना के साथ प्राण निकल जाता है। इसी का नाम है देह की मृत्यु।
यह नौवीं अवस्था है। इस प्रकार गर्भ से लेकर मृत्यु तक देह की नौ अवस्थाएँ हैं। जो विकारी होता है उसी को
देह की अवस्थाएँ होती हैं। आत्मा अविकारी होने के कारण अलिप्त ही रहता है। अब तुम कहोगे कि देह तो
जड़ है, उसमें विकार कैसे होता है ? सूर्य स्वयं होकर किसी को नहीं जगाता। उसके उदय होते ही लोग अपने
आप जग जाते हैं। इसलिये इन लोगों का क्रिया कर्म सूर्य के शरीर को स्पर्श नहीं करता। उसी प्रकार विकार
प्रकट कर आत्मा अलिप्त ही रहता है। सूर्य किरण निकलते ही जिस प्रकार सूर्यकान्त मणि अपने शरीर से अग्नि
उत्पन्न करने लगता है, फिर उस अग्नि से यज्ञकार्य भी होते हैं और आग भी लगती है, किन्तु उस कर्म से सूर्य
अलग ही रहता है। उसी प्रकार चैतन्य के प्रकाश से मन शुभ-अशुभ कर्म करता रहता है। लेकिन चैतन्यपूर्ण
आत्मा उस मनोविकार से अलिप्त ही रहता है। इसलिये ये सारे विकार मन के ही किये हुए हैं। कर्माकर्म भी मन
ने ही किये हैं, यह जान लो। जन्म-मरण भी मन की ही क्रिया है और स्वर्ग या नरक में जाना यह भी मन की

ही क्रिया है। लक्ष्यालक्ष्य भी मन ने ही किया है और बंध तथा मोक्ष भी मन ने ही किये हैं। यही निरूपण साक्षात
श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनूः ।
गुणसङ्गादुपादत्ते क्वचित् कश्चिज्जहाति च ॥ ४७ ॥
अभिमान से युक्त मन, संस्कार विकार का आभास कराता है और स्वर्ग और नरक में जाना यह भी
देहाभिमान के कारण होता है। इससे आत्मा स्वभावतः भिन्न है। वह ज्ञानमय तथा ज्ञानस्वरूप है। उसे मन स्पर्श
भी नहीं कर सकता और शुद्ध तत्त्व में अभिमान भी नहीं रहता। मन और अभिमान को माया ही उत्पन्न करती है,
अभिमान ने ही गुणों को उत्पन्न किया है और उन गुणों ने मायात्मक विकार सामग्री के साथ यह देह तैयार किया
है। देह के पास जिस प्रकार छाया रहती है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में मिथ्यारूप माया रहती है। ऐसे
आत्मस्वरूप में जन्म-मरण के साथ इस देह के प्रवेश के लिये स्थान ही नहीं है। आत्मा शुद्ध और देह मलिन है।
उसी प्रकार देह जड़ तथा आत्मा चैतन्यस्वरूप है। आत्मा अजन्मा, अव्यय और परिपूर्ण है। जन्म-मरण केवल
देह को है। तीन गुण, तीन अवस्था, कार्य, कर्म, मैं कर्त्ता यह अभिमान, ये सब देहाभिमान के विकार हैं। आत्मा
सर्वथा अलिप्त ही है। इस प्रकार आत्मा स्वभाव से ही चैतन्यस्वरूप होने के कारण, विकारों से भिन्न ही है। अब
तुम कहोगे कि 'जीव को ही देहाभिमान है', तो उसके बारे में भी सुनो। जीव माया के गुणों से अलिप्त रहता है।
स्फटिक जिस रंग पर रखिये, उस रंग का वह दिखायी देता है। लेकिन स्फटिक मूलतः शुद्ध होने के कारण वह
उस रंग से भिन्न रहता है। उसी प्रकार सत्त्वादि गुणों में खेलते हुए भी जीव सचमुच अलिप्त ही रहता है।
स्फटिक को काजल पर रखो तो वह काला दिखाई देता है किन्तु वह कालेपन से भिन्न रहता है। उसी प्रकार
तमोगुण से जीव मलिन दिखाई दे, फिर भी वह तमोगुण से अलग रहता है। उसी स्फटिक को यदि लाल रंग पर
रख दिया जाय तो उसकी प्रभा लाल दिखायी देती है, लेकिन फिर भी वह लाल रंग से अलग रहता है। जीव
रजोगुण में रहकर भले ही राजसी लीलाएँ करे फिर भी वह सब भोग कर जीवात्मा अलग ही रहता है। श्वेत रंग
पर स्फटिक रखने से उसका रंग श्वेत दिखायी देता है लेकिन वह श्वेत रंग से बिलकुल अलग रहता है। उसी
प्रकार जीवात्मा सत्वगुण में रहने पर बड़ा ज्ञानसम्पन्न दिखायी देता है, लेकिन वह गुण और ज्ञान से अलग रहता
है। इस प्रकार जीव तीन गुणों से किस प्रकार अलिप्त रहता है, यह तुम्हें बताया। अब वह देह में रहते हुए भी
किस प्रकार युक्त रहता है, यह बताता हूँ। जिस प्रकार घट में रहने वाला पानी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब घट में लाता
है, उसी प्रकार जीवत्व शुद्ध आत्मा को देह में देहाभिमान के रूप में देखता है। घट निश्चल हो तो बिम्ब भी
निश्चल रहता है। घट हिलता है तो बिम्ब भी हिलता है। उसी प्रकार ये सारी अवस्थाएँ देह की हैं लेकिन
जीवात्मा उसे अपनी ही मानता रहता है। घट में काजल घोलने से पूरा पानी काला हो जाता है लेकिन उसके
अन्दर के बिम्ब को अथवा प्रतिबिम्ब को कालिख नहीं लगती। उसी प्रकार देह के सुख-दुःख की अथवा पाप
पुण्य की बात जीव के अथवा आत्मा के माथे पर नहीं आती। अहंकार के कारण देह ही वह सब कुछ भोगता
रहता है। इस घड़े का पानी उस घड़े में भर दें तो उसमें भी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखायी ही देता है। उसी
प्रकार इस देह का जीव उस देह में चला जाता है, इसीलिये उसे जीवात्मा कहते हैं। चन्द्रमा आकाश में अलिप्त
ही रहता है। वह मिथ्या ही प्रतिबिम्ब रूप में घट में भासमान होता है। उसी प्रकार आत्मतत्व परब्रह्मस्वरूप में
स्थिर रहता है तथा देहात्मसंयोग से ही उसे जीव की चाह लगी रहती है। इस प्रकार देह धारण करने वाला जीव

५९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीन गुणों से भिन्न होकर देहसंग से भी अलिप्त रहता है। इस प्रकार मैंने जीव और शिव का साद्यंत दर्शन करा
दिया। लेकिन यह सब लोगों की समझ में न आने के कारण देहात्मवाद से वे भ्रांति में पड़े हैं। इससे अभिमान
उन्हें स्वर्ग-नरक के चक्र में डालकर नाना प्रकार की योनियों का भ्रमण कराता है। द्विज देह से प्रारम्भ कर
परमेष्ठी देह तक जाते हैं और सभी प्रकार के स्वर्गसुख को भोगते हैं। लेकिन जो पापी होता है वह अधोमुख
होकर ब्राह्मण से नीचे की जाति में जन्म लेकर अनेक प्रकार की दुःख योनियों को भोगता है। पाप और पुण्य का
कर्माचरण ही जन्म-मरण बढ़ाता है। उसमें भी जन्म-मरण के चक्र को काटने वाला कोई विरला भाग्यवान होता
है। जिन्होंने इच्छारहित रह कर पुण्य की राशियाँ बटोरी हैं, जिन्होंने स्वधर्म का जोड़ प्राप्त किया है, जिनके
अंतःकरण में प्राणिमात्र के प्रति दया रहती है और ब्राह्मण भजन में जिन्हें प्रेम रहता है, जो अहिंसा का मैका है,
'वसुधैव कुटुम्बकं' जिनका मन अद्वैतयुक्त है, जो सारासार राजहंस हैं और जो जीवन-मरण के चक्र से ऊब चुके
हैं जो उपनिषदों का अर्थ चातक की तरह ग्रहण करते हैं जो जीव के उत्पादक का संशोधन करते हैं, जो
आत्मतत्त्व के साधक हैं और जो सचमुच ही भावार्थी हैं, संतचरणों पर जिनकी पूर्ण भक्ति है और जो गुरुवचन
पर बिक चुके हैं, वे मेरी कृपा से इसी देह में विदेहता प्राप्त करते हैं। वे ही आत्मज्ञान के योग से देह का बन्धन
तोड़कर, जन्म-मरण के करोड़ों फेरे बचाकर सायुज्य की पताका लहराते हैं और उस पार पहुँचते हैं। जिस प्रकार
मृगजल में डूबने का भय नहीं है, उसी प्रकार संसाररूपी भँवर उन्हें बचाकर निकल गये। लेकिन मुक्त पुरुष
संसार में बहुत कम ही दिखायी देते हैं। सारा संसार ढूँढ़ने पर एकआध ही कोई दिखायी देता है। अस्तु ! लेकिन
यदि ऐसा कोई दिखायी दिया तो उसे पहचानेगा कौन ? क्योंकि उद्धव ! वहाँ भी आत्मा दिखायी नहीं देता।
ज्ञानसम्पन्न व्यक्ति यदि पास आकर मिला भी और उसका देह प्रपंच में व्यवहार करते दिखायी भी दिया तो भी
उसके भीतर का आत्मा किसी को दिखायी नहीं देता। आत्मा आया-गया ऐसा कहते अवश्य हैं किन्तु उसका
आना-जाना कोई देखता नहीं है। उसी की उत्पत्ति श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ।
न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षणः ॥ ४८ ॥
पिता का आत्मा गया इसलिये पिता का देह नष्ट हो गया ऐसा कहते हैं लेकिन उसे जाते हुए कोई नहीं
देखता। कोई कहता है, पुत्र का जन्म होते ही आत्मा का जन्म होता है। लेकिन पुत्रोत्सव मनाते समय उसके देह
का ही गौरव किया दिखाई देता है। आत्मा दुर्गम ही रहता है, वह दिखायी नहीं देता। इसलिये इस संसार में
आत्मा का आना-जाना वास्तव में नहीं होता। इस दृष्टांत से सिद्ध होता है कि जन्म और मरण देह के ही लिये
है। आत्मा साक्षीरूप में अविनाशी ही है। इसी अर्थ का विवेचन श्रीकृष्ण विशद करके बता रहे हैं।
तरोर्बीजविपाकाभ्यां यो विद्वाज्जन्मसंयमौ।
तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥
पर्वत पर बीज की उत्पत्ति और वृद्धि होने के कारण पर्वत उस वृक्ष का साक्षी होता है। लेकिन उस वृक्ष
को काटने से पर्वत को कोई दुःख नहीं होता। उसी प्रकार द्रष्टा देह का साक्षी है। प्रत्येक देह को द्रष्टा साक्षी है
किन्तु इस देह के धर्म द्रष्टा पर लागू नहीं होते। वह देह में रहते हुए भी विदेही ही रहता है। इसलिये उसे
संसारबंधन का स्पर्श नहीं होता। लेकिन यह रहस्य न जानकर लोग इस संसार से जुड़े हुए हैं। यही बात स्वयं
श्रीकृष्ण पाँच श्लोकों में वर्णन कर रहे हैं।

बाईसवाँ अध्याय ५९३
प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्यबुधः पुमान्।
त्वेन स्पर्शसम्मूढः संसारं प्रतिपद्यते॥५०॥
कर्म, अकर्म अथवा कर्त्तापन आत्मा के लिये नहीं है। इस अर्थ का निरूपण पहले ही आ चुका है। आत्मा
इनमें से किसी भी गुण का स्पर्श नहीं करता। देह में रहने वाला आत्मा देह से बिलकुल भिन्न रहता है क्योंकि
पुरुष प्रकृति से भिन्न है। यह आत्मज्ञान जिसे नहीं होता वही व्यक्ति संसार में घरजमाई बन कर बैठ जाता है।
उसने देहाभिमान से सामंजस्य स्थापित कर लिया है। विषय का सुख यही उसका पुरुषार्थ है, ऐसा दृढ़ निश्चय
होने के कारण वही इस संसार में शुभाशुभ कर्म के योग से नाना योनि का भोग भोगने को बाध्य करता है। विषय
सुख के अभिमान से देहाभिमान ही पुनः जन्म और पुनः मरण इस प्रकार नाना प्रकार की योनियों में फेरे लगाने
को बाध्य करता है। लेकिन उन अनेक योनियों में गर्भवास का दुःख मूर्ख लोग देहाभिमान के कारण ही भोगते
हैं। इसलिये उन नाना तत्त्वों का रूपक श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
सत्त्वसङ्गादृषीन् देवान् रजसासुरमानुषान्।
तमसा भूततिर्यक्त्वं भ्रामितो याति कर्मभिः॥५१॥
उद्धव! देहाभिमान के कारण इन तीन गुणों के कर्म घटते रहते हैं और उनके योग से तीन प्रकार के संसार
पीछे लग जाते हैं। वे इस प्रकार हैं—कृष्णार्पण किये बिना सात्त्विक कर्म करने से सत्त्वगुण क्षुब्ध होकर उत्तम देह
में जन्म होता है और उस सत्त्वगुण का अत्यन्त उत्कर्ष होने पर देवर्षि, ब्रह्मर्षि होकर उस सत्त्वगुण की समसाम्य
स्थिति से वे अजानबाहु तथा कल्प तक जीवित रहने वाले दीर्घायुषी हो जाते हैं। सत्त्वगुण युक्त कर्म घटने पर वे
स्वर्ग के देवता बन कर रहते हैं और वहाँ का भोग भोगने के बाद पुण्य समाप्त होने पर उनका अधःपात हो जाता
है और वे पुनः इस योनी में जन्म लेकर सत्त्वगुणसम्पन्न बन जाते हैं। राजस लोग रजोगुण का आश्रय लेकर राजसी
कर्म का आचरण करते हैं और जब राजसगुण क्षुब्ध हो जाता है तो वह किस योनी में जन्म दिलाता है? तो जो
लोग राजस कर्म ब्रह्मार्पण कर देते हैं, वे दैत्य जन्म लेकर भी भगवद्भक्त होते हैं और जो रजोगुण के उत्कर्ष से
सुखोपभोग की इच्छा करते हैं, वे महायोद्धा असुर होते हैं। जो रजोगुण से ही स्वकर्माचरण करते हैं, वे उस कर्म
के कारण ही ब्राह्मणजन्म पाते हैं और इसी रजोगुण के कम या अधिक परिमाण से चारों वर्णों का जन्म होता है।
तामस की संगति से तामस कर्माचरण करने से तमोगुण क्षुब्ध होता है, जो भयंकर नीच योनी में जन्म दिलाता है
और भूत, प्रेत, पिशाच, पक्षी, पाषाण आदि अनगिनत योनी के भोग भोगने को बाध्य करता है। (आशंका) कर्म
वास्तव में त्रिगुणात्मक है, किन्तु कर्मफलों का भोक्ता ईश्वर है यह निश्चय वेदशास्त्रों के आधार पर आपने कर ही
लिया। देह का साक्षी वह आत्मा निराला ही है, ऐसा सिद्धान्त आपने पिछले श्लोक में निश्चित किया था तो
कर्मफलों का भोक्ता यदि कर्म से अलग है तो फिर वह कर्मों का फल कैसे भोगता है? इस प्रकार की आशंका से
युक्त उद्धव का अंतःकरण जानकर श्रीकृष्ण इसी अर्थ का उत्तर विशद करके बता रहे हैं।
नृत्यतो गायतः पश्यन् यथेवानुकरोति तान्।
एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥५२॥
सभापति यदि कला-कौशल में निपुण हो और उसके सामने नृत्य और संगीत का कार्यक्रम हो रहा हो तो
नाचने-गाने वाले के सुर पर वह भी ताल देने लगता है। अब यदि यह पूछोगे कि वह ताल कैसे देता है, तो
प्रकृति केवल जड़ का अंश है और आत्मा ज्ञाता है। इसीलिये उसे भोक्ता कहते हैं। सभा में जो शांत बैठा रहता

५९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, वह भी नृत्यगायन के सुरों पर ठेका देता रहता है। इस प्रकार प्रकृति से अलग होते हुए भी पुरुष प्रकृति की
लीला का अनुसरण करता है। (आशंका) प्रकृति का अनुकरण कर यदि आत्मा सचमुच नित्यमुक्तता नष्ट हो
जायेगी क्योंकि जो कर्मफल का उपभोग करेगा, उसी पर कर्म का बन्धन लागू होगा और उस कर्म से आत्मा को
भी जन्म-मरण लगा हुआ है, यह कहना पड़ेगा और यदि वैसा हुआ तो आत्मा नित्यमुक्त और विकारातीत है यह
बात बहुत दूर चली गयी। अर्थात् आत्मा सांसारिक, गुणविकारी तथा बद्ध है। उद्धव! ऐसी शंका तुम करोगे।
किन्तु आत्मा गुणकर्म से अलिप्त है यह बात श्रीकृष्ण और दृष्टांत देकर बताते हैं।
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः॥५३॥
जिस प्रकार कोई आदमी नदी के किनारे पर के वृक्ष को पानी में बहते हुए देखता है, उसी प्रकार माया के
गुणों के संसर्ग से आत्मा में भी विकार का आभास होता है। जिसकी आँखों के आगे चक्कर आता है उसे सारी
पृथ्वी के ही घूमने का आभास होता है। उसी प्रकार इस माया के विकारों का समुदाय भी आत्मा के लिये मिथ्या
ही है। जो घोड़े पर बैठकर पानी के प्रवाह की ओर देखता है उसे स्वयं पानी में ही बहने का आभास होता है।
इस प्रकार आत्मा नित्य और निर्विकार है और उसमें अनेक गुण हैं जो मायात्मक हैं। वे वास्तव में कल्पनामय
होने पर भी, लोग उन्हें सच मान लेते हैं, ब्रह्मदेव से लेकर तृण तक जो असंख्य योनी हैं, वे विकारयुक्त हैं और
उनमें कर्म, क्रिया, फल का भोग ये सारी बातें मन से ही उत्पन्न हुई हैं। भगवान की ये बातें सुनकर उद्धव को
अतीव आनन्द हुआ और उस आनन्द के आवेग में वह भी वैसी ही लीलायें करने लगा। उद्धव के मन का ताप
दूर करने के लिये सर्वज्ञ श्रीकृष्ण स्वयं ज्ञानोपदेश कर रहे थे। इसलिये. जिससे उद्धव को आनन्द प्राप्त हो ऐसा
ही निरूपण श्रीकृष्ण करते थे।
यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा।
स्वप्नदृष्टाश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥५४॥
आत्मा नित्ययुक्त और अविकृत ही है। लगता है वह संकल्प से ही विकारी हो गया है। वास्तव में वह
असंसारी ही है किन्तु मनोविकारों से ही उसे संसारी कहते हैं। इस प्रकार वहाँ दूसरा कोई न होने के कारण कथा
वार्त्ता कुछ भी नहीं कहा जा सकता। श्रोता और वक्ता अलग-अलग हों तभी यह सम्भव है। अकेला आदमी
चलते-चलते थक जाने पर स्वयं ही राजा बन जाता है और अपना मनोराज्य चलाता है और शत्रु के आने की
कल्पना कर युद्ध के लिये तैयार होता है और उस युद्ध के लिये उसमें इतना अधिक स्फुरण होता है कि वह
अपने ही स्थान पर उछलने-कूदने लगता है। इतने में पैर किसी वस्तु में फँस कर वह लड़खड़ा कर गिर पड़ता
है। इस प्रकार वह मिथ्या भ्रम और भ्रान्ति में पड़ जाता है और चलते-चलते मृगजल से उस पार जाने के लिए
उसमें कूद पड़ता है। आकाश में जब बड़े-बड़े बादल एकत्र हो जाते हैं तो उसमें बड़े-बड़े, महल और
अट्टालिकाएँ दिखायी देने लगती हैं लेकिन जोर की हवा चलने पर वहाँ शून्याकार हो जाता है। इस प्रकार यह
संसार ही काल्पनिक होने के कारण उसके सुख-दुःख भी मेरे भक्तों को मायिक मालूम होते हैं। दाशार्ह वंश में
जन्म लेकर तुम उत्तम स्थिति तक पहुँचे हो। स्वप्न के सुखोपभोगों को जिस प्रकार हम स्वप्न में ही सच मानते
हैं, उसी प्रकार संसार एक दीर्घ स्वप्न है, इसलिये वह केवल मिथ्या और मायिक है। जागृत होने पर जिस प्रकार
स्वप्न मिथ्या मालूम होता है, उसी प्रकार निरहंकार में स्वप्न भी मिथ्या ही है। उद्धव! ब्रह्मज्ञान की यही प्रमुख

बाईसवाँ अध्याय ५९५
बात है, जिसे ध्यान में रखो। सूर्य जिस प्रकार मृगजल की सृष्टि करता है, उसी प्रकार आत्मा संसार करता है।
संसार केवल कल्पनामय है और आत्मा निर्विकार और ज्ञानरूप है। इस पर उद्धव ! तुम शायद यह कहोगे कि
जब संसार मिथ्या ही है तब साधन करने के फेर में क्यों पड़ें ? बाँझ स्त्री के लड़के के विवाह के लिये जैसे कोई
प्रयास नहीं करता या मृगजल पर बाँध बनाकर कोई नहर नहीं निकालता, उसी प्रकार यदि संसार बंधन मिथ्या है
तो फिर श्रवण, मनन, चिंतन, विवेक, वैराग्य, ध्यान आदि का व्यर्थ प्रयास लोग क्यों करते हैं ? उद्धव ! देखा
जाय तो बगुले का भय मिथ्या ही होता है, किन्तु बालक को यह सच ही लगता है। उसी प्रकार संसार के मिथ्या
संकट से ही जीव को बन्धन प्राप्त होता है। इसी अर्थ का सिद्धान्त श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं क्योंकि संसार के
सम्बन्ध में जो दुःख हैं, वे भ्रमिष्ट लोगों को भ्रम के ही कारण पीड़ा देते हैं।
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषय्यनस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ५५ ॥
विचार किया जाय तो स्वप्न मिथ्या ही रहता है किन्तु उसमें के विषय सेवन से सुख-दुःख की अत्यन्त
बाधा होती है। स्वप्न में पुत्र प्राप्ति होती है, अथवा राजा के हाथों सत्कार होता है लेकिन उसी आनन्द में स्वप्न
देखने वाला मस्त होता रहता है अथवा स्वप्न में ही सारा धन चला गया इस दुःख से वह रोने लगता है।
इसलिये, उद्धव ! उसे यदि जागृत न किया जाय तो स्वप्न की सुख-दुःख की पीड़ा कभी समाप्त नहीं होती।
जो लोग विषयासक्त होते हैं जिन्हें निरन्तर विषय का ही ध्यान रहता है, देहाभिमान जिन्हें सदा विषय में ही
पिरोता रहता है, उनकी विषयासक्ति दूर करने के क्या उपाय हैं ? इसी अर्थ का सिद्धान्त श्रीकृष्ण उद्धव को बता
रहे हैं। यदि श्रवण और मनन न करें, विचारों का ज्ञान नहीं साधा, अथवा परिपूर्ण वैराग्य नहीं धारण किया तो
संसार का भय समाप्त नहीं होता। लेकिन संसार मिथ्या है इतना कह भर देने से सुख-दुःख का भय समाप्त
नहीं होता, जन्म-मरण का चक्र तथा अहंममता नहीं छूटती। ऐसे जो अज्ञानी लोग हैं, उन्हें अवश्य ही साधन
करने चाहिये। विवेक से परिपूर्ण वैराग्य धारण करने से संसार का बंधन नष्ट होता है। इसलिये उद्धव ! सभी
साधनों का मूल और जिससे ब्रह्मज्ञान हाथ लगता है उस वैराग्य को पूर्ण रूप से साध्य करें। अब विरक्ति के
मार्ग के बारे में सुनो। तो जिस प्रकार आग धधकती है, उसी प्रकार देह में वैराग्य दहकना चाहिये। तभी
ब्रह्मप्राप्ति का अधिकार प्राप्त होता है। ऐसे जो पूर्ण मुमुक्षु लोग होते हैं और जिनकी कृपा से सद्गुरु थपथपा
कर जागृत करते हैं, जो देहादिक के अभेद भाव से पुष्ट रहते हैं, माया के गुणों की त्रिपुटी जिन्हें मिथ्या लगती
है, ब्रह्मावंड से सृष्टि भर जाती है, ऐसा अप्रत्याशित लाभ जिस वैराग्य विवेक से हाथ लगता है, उसी वैराग्य
का वर्णन श्रीकृष्ण उद्धव से कर रहे हैं।
तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः ।
आत्माग्रहणनिर्भातं पश्यवैकल्पिकं भ्रमम् ॥ ५६ ॥
विषय की आसक्ति ही परमार्थ के लिये बाधक होती है। इसलिये विषय को ही त्याग दो और पुनः उसे
स्पर्श न करो। वृत्ति आसक्त होने पर इन्द्रियों से चिपक जाती है और उसे अत्यन्त लुब्ध होने के कारण विषयों के
भोग भोगने की इच्छा होती है। यही संसार का बड़ा रोग है। इसलिये उसका त्याग करना चाहिये। उत्तम पकवान
हो लेकिन उसमें यदि विष पड़ा हो तो उसका एक ग्रास खाते ही प्राण निकल जाता है। लेकिन विष से प्राण एक
ही बार जाता है और विषय बार-बार प्राण लेते रहते हैं। अब तुम कहोगे कि प्रारब्ध के अनुसार भोग आते हैं,

५९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
फिर उनका त्याग कैसे होगा ? और विषय त्याग का उपाय खोजने से वैराग्य कैसे प्राप्त होगा ? प्रारब्ध से ही
विषयभोग आते हैं और वही साधक को दुःख देते हैं। दावानल में फँसे हिरन जिस प्रकार झुलस जाते हैं उसी
प्रकार उन्हें भी वह स्थिति भोगनी पड़ती है। बाघ के मुँह में गाय पड़ जाय, उसी प्रकार जब विषयों का भोग
करने वाला छटपटाता है तभी उस अनुताप से वैराग्य उत्पन्न होता है। सच्चा वैराग्य उत्पन्न होने पर सद्गुरु की
कृपा हाथ लगती है और गुरुकृपा के प्रभाव से ही द्वंद्व के साथ सारा संसार समाप्त हो जाता है। गुरुकृपा प्राप्त
होने पर चारों ओर परब्रह्म ही दिखायी देने लगता है। फिर वहाँ कर्म कैसा और जन्म-मरण भी कैसा ? संसार
भ्रम का नाम पता ही नहीं रह जाता। उस समय दीपक की सहायता से देखने पर भी संसार नहीं दिखाई देता
जिस प्रकार भ्रम नष्ट हो जाने के बाद रस्सी का सर्प नहीं दिखायी देता, अथवा लट्टू जब तक घूमता रहता है
तब तक वह सीधा ही दिखायी देता है, उसी प्रकार जब तक भ्रम का साम्राज्य रहता है, तब तक संसार सत्य ही
मालूम होता है। बिलकुल परिपूर्ण जो भ्रम है उसी का नाम संसार है। वैसे, परब्रह्म तो शुद्ध ही है। वहाँ जन्म भी
नहीं है और कर्म भी नहीं है। इस प्रकार का ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो भी जाय तो भी चाक से मटका निकाल लेने पर
जिस प्रकार चाक घूमता ही रहता है, उसी प्रकार प्रारब्ध का भोग भोगना ही पड़ता है। वृक्ष को समूल उखाड़ा
जा सकता है लेकिन उसकी आर्द्रता को उखाड़ नहीं सकते। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान होने पर भी प्रारब्ध उसे नहीं
छोड़ता। उस प्रारब्ध के अनुसार यदि विषयभोग आ भी जाएँ तो उसका प्रतिकार करने का प्रयत्न नहीं करना
चाहिये। उसे शान्तिपूर्वक सहन करना चाहिये। जो विवेक सम्पन्न और क्षमाशील साधु होते हैं, वे विषयभोग आने
पर देह में परिपूर्ण शान्ति रख कर आनन्दपूर्वक आचरण करते हैं। उसी शान्ति का लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
शान्ति से हमारा जो कल्याण होता है, जिसके कारण जीव को समाधान प्राप्त होता है, उसका सुमधुर निरूपण
श्रीकृष्ण दो श्लोकों में कर रहे हैं।
क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भिः प्रलब्धोऽसूयितोऽथवा।
ताडितः संन्निबद्धो वा वृत्त्या वा परिहापितः ॥५७॥
निष्ठितो मूत्रितो वाज्ञैर्बहुधैवं प्रकम्पितः।
श्रेयस्कामः कृच्छ्रगत आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत् ॥५८॥
देहाभिमान रखने वाले जो तामसी, दुष्ट और दुर्जन होते हैं, वे यदि साधुओं का छल करते हैं तो साधु
शान्त होने के कारण कभी क्रोध के अधीन नहीं होते हैं। जो ज्ञानसम्पन्न होते हैं, वे छोटे-मोटे उपद्रव में क्रुद्ध
नहीं होते। अत्यधिक छल होने पर भी वे अति कोपायमान नहीं होते। कायिक, वाचिक और मानसिक आदि
तीन प्रकार की पीड़ायें हैं। किन्तु साधु पुरुष अपनी अटल शान्तवृत्ति के कारण अपने विवेक से सब कुछ सहन
करते हैं। साधु यदि युक्तिपूर्वक सरल ढंग से भाषण करता है लोग उस पर आक्षेप लेकर उसका उपहास करते
हैं, उसे झटक कर उसकी भर्त्सना करते हैं, इतना ही नहीं, अपितु भरी सभा में उसका अपमान करते हैं। शब्दों
का ही छल कर उसे दुष्ट, दुर्जन, दुःशील, अपवित्र और अमंगल चांडाल कहते हैं। ऐसे दुर्जन कितना ही दुष्ट
भाषण क्यों न करें, लेकिन अपनी शांत वृत्ति से वह सब सहन करता है। उस शान्ति के उत्पन्न होने के कारण
और विवेक के स्वरूप के बारे में सुनो। दूसरे की जीभ और होंठ जो हिलते हैं वे मेरे शरीर पर प्रहार नहीं
करते, ऐसी उसकी समझ होने के कारण उसके मन में क्रोध आता ही नहीं है। उसकी शान्ति भी नहीं ढलती।
सभा में मान के साथ उसकी पूजा की अथवा आसन के नीचे गिरा दिया, उसे लतियाया, उसका अपमान कर

एक ओर ढकेल दिया तो वह कहता है कि जहाँ ले जाकर सम्मान के साथ मेरी पूजा करते हैं, वहाँ भी पृथ्वी
ही रहती है और अपमान करके जहाँ ढकेल देते हैं, वहाँ भी वही पृथ्वी रहती है। ऐसी स्थिति में मान हो या
अपमान हो, वह तो मन की कल्पना ही है। ऐसा विचार कर सज्जन पुरुष शान्त वृत्ति के कारण किसी का द्वेष
नहीं करता। अनेक प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियों से साधु को लोभ के पीछे लगाकर लोग उसे फँसाते हैं और
उसका धन छीनकर, उलटे उसकी भर्त्सना करते हैं। उनकी निन्दा करने से मुझे दोष लगेगा इसलिये उसके मन
में क्रोध नहीं आता और उसकी पूर्ण शान्ति में अन्तर नहीं पड़ता। साधु यह समझ लेता है कि 'अर्थ है वहाँ
अनर्थ' है यह तो शास्त्रवचन है फिर उस अनर्थ से जो साधु को निवृत्त करता है, उसका द्वेष करते हैं वे लोग
मूर्ख हैं। अज्ञानी लोग सद्गुणों पर दोषारोपण करते हैं, निन्दा करते हैं, इसमें ही हमारा हित है ऐसा समझते हैं।
वही सचमुच मेरे तारनहार हैं। माता के हाथ तो केवल बाहर का मल धोते हैं लेकिन ये तो मेरे बाप के समान
हैं क्योंकि ये मेरा भीतर का और बाहर का मल भी अपने जिह्वाग्र से धो देते हैं। ऐसे लोगों का छल करने से
तो मेरा ही अहित होगा। ऐसा विचार कर वह साधु के गुण अथवा दोषों का उच्चार नहीं करता। इसीलिये
उसके शरीर की शान्ति बढ़ जाती है। जिससे आजीविका चलती है, वह धन, अथवा जमीन छल या जबर्दस्ती
से कोई छीन लेता है, तो भी साधु को क्रोध नहीं आता। इस लोक में लाभ होना या न होना केवल दैव के
अधीन है, उन्हें देने वाला और लेने वाला वही है यह कह कर वह किसी का द्वेष नहीं करता और शान्ति का
गुण नहीं छोड़ता। दुष्ट लोग साधु की जमीन-जायदाद से ही संतोष नहीं करते। वह बहुत बड़ा अन्यायी है, यह
कह कर उसे बाँधते हैं, उसके मुँह पर थूकते हैं और जो अत्यन्त दुष्ट होते हैं वे उसके सिर पर मूतते हैं। कोई
मारता है, कोई गिराता है, कोई अनेक प्रकार का छल करता है लेकिन सज्जन पुरुष में विवेक होने के कारण
उसके मन की शान्ति नहीं ढलती। थूक और मूत दोनों देह से ही निकलते हैं और देह पर ही पड़ते हैं, उस पर
गुस्सा क्यों किया जाय ? साधु को कोई पकड़ता है या मारता है तो वह कहता है, "देखो ! देह पंचमहाभूतों से
ही उत्पन्न हुआ है अर्थात्, मारने वाला और मार खानेवाला दोनों एक ही हैं। तो कौन किसके लिये दुःख करे ?
ऐसे विचारों से जिसे शान्ति प्राप्त होती है, उसके पास चारों युक्तियाँ दासी बन कर रहती हैं। मैं श्रीकृष्ण भी
उसका चाकर बनता हूँ। इससे अधिक और क्या लाभ होगा ? उसमें भी जो मोक्षार्थी है उसे सभी प्रकार से
शान्ति का पालन करना चाहिये। वही दुःखरूपी समुद्र से सुरक्षित उस पार पहुँचायेगा। वैराग्य, योग, ज्ञान
अथवा ध्यान इनका जो फल है, वही शान्ति है। उस शान्ति को पूर्ण रूप से साध कर ही साधु अपना उद्धार
कर लेते हैं। इसलिये उद्धव ! शीत-ऊष्ण, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों में जो कठोरता है उसे सहन कर परिपूर्ण
शान्ति साधनी चाहिये और पूर्ण ब्रह्मस्वरूप तक पहुँचना चाहिये। पूर्णब्रह्म तक पहुँचने के बाद जन्म-मरण की
बात ही समाप्त हो जाती है और परमानन्द के गले लगते ही संसारभय नष्ट हो जाता है। श्रीकृष्ण का यह
भाषण सुनकर उद्धव आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा, यह जो अभी सुख दुःखादि द्वंद्वों की पीड़ा सुनी वह
मुझे सहन नहीं होगी। ऐसी शान्ति की बातें हमने कभी सुनी भी नहीं है, देखने की कौन कहे ? ऐसी शान्ति
जिसके अंतःकरण में होगी, ऐसा पुरुष सारी पृथ्वी में भी नहीं होगा। हे कृष्ण! जो न कभी देखी और न सुनी
ऐसी शान्ति तुम कहाँ से ले आये ? तुम्हारा यह भाषण सुनकर मेरी बुद्धि तो भय से कुंठित हो गयी है। ऐसी
शान्ति जिसे प्राप्त हुई है ऐसा कोई न पहले कोई हुआ है और आगे भी नहीं होगा। भगवान ने जो निग्रह
बतलाया वह हमारे लिये असाध्य है जिन द्वंद्वों का तुमने वर्णन किया है वे योगियों के सहने लायक भी नहीं
हैं। फिर हम कैसे सहन करेंगे ? यही बात भगवान से पूछ रहे हैं।"

५९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव उवाच
यथैवमनुबुध्येयं वद नो वदतां वर।
सुदुःसहमिमं मन्ये आत्मन्यसदतिक्रमम्॥५९॥
विदुषामपि विश्वात्मन् प्रकृतिर्हि बलीयसी।
ऋते त्वद्धर्मनिरतान् शान्तांस्ते चरणालयान्॥६०॥
जो लोग वेदशास्त्र का अर्थ पूर्णरूप से जान कर उसे बता सकते हैं वही सच्चे वक्ता हैं। उन वक्ताओं में
तुम श्रेष्ठ हो। क्योंकि वेदों का प्रमुख वक्ता तुम ही हो। तुम्हारी ही युक्ति ले कर शास्त्र तुम्हारा वर्णन करते हैं,
लेकिन परोक्षवाद से वे भी कुंठित हो जाते हैं। वेद तो 'वह नहीं, वह नहीं' कह कर पीछे हट जाते हैं। वह
तुम्हारे ही मुखसे तुम्हारे ही ज्ञान की उक्ति, हे कृपामूर्ति! तुम्हारी कृपा से सुनने को मिलती है। मैं अपने कानों का
भाग्य किन शब्दों में व्यक्त करूँ? जो सुनते हैं, वे धन्य हैं। इस प्रकार अनेक युक्तियों से उद्धव ने श्रीकृष्ण की
प्रार्थना और अत्यन्त प्रेम से हाथ जोड़ कर विनती की। भगवान ने जो भाषण दिया वह अत्यन्त गहन है। यह
भाषण अत्यन्त पवित्र है। लेकिन मेरे अंतःकरण में उसका बोध नहीं होता क्योंकि दूसरों के अपराध कौन सहन
करेगा? यह कर्म अत्यन्त कठिन और मानव स्वभाव के विरुद्ध है। इसलिये इस महान उपदेश पर आचरण करना
नितांत कठिन है क्योंकि कोई द्वंद्व किस उपाय से सहन कर सकता है? यदि कोई बड़ा आदमी कभी-कभार कोई
अपराध करता है तो करोड़ लोगों में से कोई तो उसका अपराध सहन करेगा। लेकिन किसी नीच द्वारा किया गया
छल कोई, कभी सहन नहीं करेगा। जिसका मुँह कभी न देखना पड़े उसे नमस्कार करना भी उचित नहीं है, फिर
उसकी लात कौन सहन करेगा? जिसके शरीर में प्राण जरा भी शेष न हो वही ऐसा अपमान सहन करेगा।
लेकिन जो जीवित है वह इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन जो सचमुच ज्ञानी होते हैं वे भी अपनी किसी
आज्ञा का उल्लंघन सहन नहीं करते, फिर अपमान कौन सहन करेगा? कपिल महामुनि को भी क्रोध हुआ था
इसलिये उन्होंने सगरों को शाप देकर उन्हें भस्म कर दिया। नारद ने कुबेर के लड़के को शाप देकर वृक्ष बनाकर
छोड़ा। दुर्वासा की कथा तो बहुत लम्बी है। शृंगी ऋषि के अंतःकरण में क्रोध हुआ और उसने पिता के गले में
मृतसर्प डालने वाले परीक्षित को शाप दिया। सनकादिक वस्तुतः शान्त थे लेकिन वैकुण्ठ पहुँचने पर जयविजय
ने उनका रास्ता रोका इसलिये उन्होंने क्रोध में आकर जय विजय को शाप दिया। जब ज्ञानसम्पन्न लोगों की यह
स्थिति है, तो औरों की क्या स्थिति होगी? गोविन्द दूसरों का अपराध सहन करने की शक्ति त्रिभुवन में भी दुर्लभ
है। प्रकृति अपने गुणों से प्रबल हुई है। वह जरा से कारण से भी गुणों को तत्काल क्षुब्ध करती है। जो पूर्ण साधु
और सज्जन होते हैं, उन्हें भी क्रोध विकल कर देता है। जिसे तुम्हारी परिपूर्ण भक्ति प्राप्त होती है जिसे तुम्हारी
कृपा का पूर्ण लाभ होता है, तुम्हारे चरणों में जो अत्यन्त लीन रहता है, उसे ही ऐसी शान्ति प्राप्त होती है। तुम तो
त्रिभुवन में विश्वात्मा हो। तुम्हारे सामने मैं कोई बात चुरा कर नहीं रख सकता। मैं सच कहता हूँ कि यह
दूजाभाव और द्वंद्व मैं सहन नहीं कर सकता। श्रीकृष्ण, यह तुम भी जानते हो। शान्ति अत्यन्त पवित्र वस्तु है और
क्रोध नितान्त निन्दनीय है इसका प्रतिपादन बुद्धिमान लोग भी करते हैं किन्तु उन्हें भी द्वंद्व सहन नहीं होते। द्वंद्व
वास्तव में दुःसह ही हैं। इसलिये हे कृपामूर्ति! द्वंद्व सहन करने का उपाय मुझे बताइये। अन्य साधनों को साध्य
किया जा सकता है लेकिन यह सहिष्णुता मेरे मन को नहीं भाती। इसीलिये मुझे भी वैसी शान्ति प्राप्त हो ऐसी
मुझ पर कृपा कीजिये। शान्ति के योग से प्राप्त होने वाले कल्याण का मुझे लाभ हो ऐसी पूर्ण कृपा मुझ पर करें।

बाईसवाँ अध्याय ५९९
कहकर उद्धव ने भक्तिभाव में श्रीकृष्ण के चरण पकड़ लिये। उद्धव की विनती सुनकर श्रीकृष्ण को बहुत सन्तोष
हुआ और चातक की तृषा के लिये मेघ जिस प्रकार गर्जना कर त्रिभुवन को पर्जन्यवृष्टि से तृप्त करता है, उसी
प्रकार भक्त की विनती सुनते ही प्रफुल्लित होने वाला श्रीकृष्ण उद्धव के अंतःकरण पर शान्ति का ठप्पा कैसे
लगायेंगे ? उदार, सुन्दर और गुण गम्भीर शार्ङ्गधर अब शान्ति का भण्डार खुला कर स्वयं उद्धव के प्रश्न का उत्तर
देंगे। श्रीकृष्ण की वर्णन करने की पद्धति आश्चर्यजनक होगी। युक्ति और चातुर्य के वैभव की वर्षा ही होगी।
जिससे शान्ति गले लग जाय ऐसी अपूर्व युक्ति वह बतायेगा। श्रीकृष्ण के मुख से ज्ञानपूर्ण शब्द सुनकर शान्ति
स्वयं ही साक्षात प्रकट होती है। इसलिये ऐसा भाषण सुनने के लिये उद्धव भी सावधान होकर बैठ गया। जिस
प्रकार हाथी को पकड़ने के लिये शेर सावधान होकर बैठता है उसी प्रकार शान्ति का लाभ लेने के लिये उद्धव
भी तैयार होकर बैठ गया। उसी 'भिक्षुगीता' का निरूपण श्रीकृष्ण अगले अध्याय में करेंगे और जिससे
अंतःकरण में परिपूर्ण शान्ति अंकित हो सके ऐसे लक्षण बतायेंगे। जिन्हें परमार्थ की इच्छा हो, उन्हें अन्य साधनों
के द्वार छोड़ कर इस शान्ति साधन पर ही दृढ़ श्रद्धा रखनी चाहिये। अब श्रीकृष्ण शान्ति का विस्तार वर्णन करेंगे
इसलिये उद्धव भी ध्यान लगाकर बैठेगा। इसलिये जनार्दनरूपी एकनाथ भी श्रोताओं से विनती करते हैं कि वे भी
मेरी ओर ध्यान दें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे एकाकार टीकायां
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे द्वाविंशतितमोध्यायः ॥ २२॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।