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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 613, कुल 869 में से

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पृष्ठ 613

एक ओर ढकेल दिया तो वह कहता है कि जहाँ ले जाकर सम्मान के साथ मेरी पूजा करते हैं, वहाँ भी पृथ्वी
ही रहती है और अपमान करके जहाँ ढकेल देते हैं, वहाँ भी वही पृथ्वी रहती है। ऐसी स्थिति में मान हो या
अपमान हो, वह तो मन की कल्पना ही है। ऐसा विचार कर सज्जन पुरुष शान्त वृत्ति के कारण किसी का द्वेष
नहीं करता। अनेक प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियों से साधु को लोभ के पीछे लगाकर लोग उसे फँसाते हैं और
उसका धन छीनकर, उलटे उसकी भर्त्सना करते हैं। उनकी निन्दा करने से मुझे दोष लगेगा इसलिये उसके मन
में क्रोध नहीं आता और उसकी पूर्ण शान्ति में अन्तर नहीं पड़ता। साधु यह समझ लेता है कि 'अर्थ है वहाँ
अनर्थ' है यह तो शास्त्रवचन है फिर उस अनर्थ से जो साधु को निवृत्त करता है, उसका द्वेष करते हैं वे लोग
मूर्ख हैं। अज्ञानी लोग सद्गुणों पर दोषारोपण करते हैं, निन्दा करते हैं, इसमें ही हमारा हित है ऐसा समझते हैं।
वही सचमुच मेरे तारनहार हैं। माता के हाथ तो केवल बाहर का मल धोते हैं लेकिन ये तो मेरे बाप के समान
हैं क्योंकि ये मेरा भीतर का और बाहर का मल भी अपने जिह्वाग्र से धो देते हैं। ऐसे लोगों का छल करने से
तो मेरा ही अहित होगा। ऐसा विचार कर वह साधु के गुण अथवा दोषों का उच्चार नहीं करता। इसीलिये
उसके शरीर की शान्ति बढ़ जाती है। जिससे आजीविका चलती है, वह धन, अथवा जमीन छल या जबर्दस्ती
से कोई छीन लेता है, तो भी साधु को क्रोध नहीं आता। इस लोक में लाभ होना या न होना केवल दैव के
अधीन है, उन्हें देने वाला और लेने वाला वही है यह कह कर वह किसी का द्वेष नहीं करता और शान्ति का
गुण नहीं छोड़ता। दुष्ट लोग साधु की जमीन-जायदाद से ही संतोष नहीं करते। वह बहुत बड़ा अन्यायी है, यह
कह कर उसे बाँधते हैं, उसके मुँह पर थूकते हैं और जो अत्यन्त दुष्ट होते हैं वे उसके सिर पर मूतते हैं। कोई
मारता है, कोई गिराता है, कोई अनेक प्रकार का छल करता है लेकिन सज्जन पुरुष में विवेक होने के कारण
उसके मन की शान्ति नहीं ढलती। थूक और मूत दोनों देह से ही निकलते हैं और देह पर ही पड़ते हैं, उस पर
गुस्सा क्यों किया जाय ? साधु को कोई पकड़ता है या मारता है तो वह कहता है, "देखो ! देह पंचमहाभूतों से
ही उत्पन्न हुआ है अर्थात्, मारने वाला और मार खानेवाला दोनों एक ही हैं। तो कौन किसके लिये दुःख करे ?
ऐसे विचारों से जिसे शान्ति प्राप्त होती है, उसके पास चारों युक्तियाँ दासी बन कर रहती हैं। मैं श्रीकृष्ण भी
उसका चाकर बनता हूँ। इससे अधिक और क्या लाभ होगा ? उसमें भी जो मोक्षार्थी है उसे सभी प्रकार से
शान्ति का पालन करना चाहिये। वही दुःखरूपी समुद्र से सुरक्षित उस पार पहुँचायेगा। वैराग्य, योग, ज्ञान
अथवा ध्यान इनका जो फल है, वही शान्ति है। उस शान्ति को पूर्ण रूप से साध कर ही साधु अपना उद्धार
कर लेते हैं। इसलिये उद्धव ! शीत-ऊष्ण, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों में जो कठोरता है उसे सहन कर परिपूर्ण
शान्ति साधनी चाहिये और पूर्ण ब्रह्मस्वरूप तक पहुँचना चाहिये। पूर्णब्रह्म तक पहुँचने के बाद जन्म-मरण की
बात ही समाप्त हो जाती है और परमानन्द के गले लगते ही संसारभय नष्ट हो जाता है। श्रीकृष्ण का यह
भाषण सुनकर उद्धव आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा, यह जो अभी सुख दुःखादि द्वंद्वों की पीड़ा सुनी वह
मुझे सहन नहीं होगी। ऐसी शान्ति की बातें हमने कभी सुनी भी नहीं है, देखने की कौन कहे ? ऐसी शान्ति
जिसके अंतःकरण में होगी, ऐसा पुरुष सारी पृथ्वी में भी नहीं होगा। हे कृष्ण! जो न कभी देखी और न सुनी
ऐसी शान्ति तुम कहाँ से ले आये ? तुम्हारा यह भाषण सुनकर मेरी बुद्धि तो भय से कुंठित हो गयी है। ऐसी
शान्ति जिसे प्राप्त हुई है ऐसा कोई न पहले कोई हुआ है और आगे भी नहीं होगा। भगवान ने जो निग्रह
बतलाया वह हमारे लिये असाध्य है जिन द्वंद्वों का तुमने वर्णन किया है वे योगियों के सहने लायक भी नहीं
हैं। फिर हम कैसे सहन करेंगे ? यही बात भगवान से पूछ रहे हैं।"