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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 611, कुल 869 में से

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पृष्ठ 611

बाईसवाँ अध्याय ५९५
बात है, जिसे ध्यान में रखो। सूर्य जिस प्रकार मृगजल की सृष्टि करता है, उसी प्रकार आत्मा संसार करता है।
संसार केवल कल्पनामय है और आत्मा निर्विकार और ज्ञानरूप है। इस पर उद्धव ! तुम शायद यह कहोगे कि
जब संसार मिथ्या ही है तब साधन करने के फेर में क्यों पड़ें ? बाँझ स्त्री के लड़के के विवाह के लिये जैसे कोई
प्रयास नहीं करता या मृगजल पर बाँध बनाकर कोई नहर नहीं निकालता, उसी प्रकार यदि संसार बंधन मिथ्या है
तो फिर श्रवण, मनन, चिंतन, विवेक, वैराग्य, ध्यान आदि का व्यर्थ प्रयास लोग क्यों करते हैं ? उद्धव ! देखा
जाय तो बगुले का भय मिथ्या ही होता है, किन्तु बालक को यह सच ही लगता है। उसी प्रकार संसार के मिथ्या
संकट से ही जीव को बन्धन प्राप्त होता है। इसी अर्थ का सिद्धान्त श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं क्योंकि संसार के
सम्बन्ध में जो दुःख हैं, वे भ्रमिष्ट लोगों को भ्रम के ही कारण पीड़ा देते हैं।
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषय्यनस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ५५ ॥
विचार किया जाय तो स्वप्न मिथ्या ही रहता है किन्तु उसमें के विषय सेवन से सुख-दुःख की अत्यन्त
बाधा होती है। स्वप्न में पुत्र प्राप्ति होती है, अथवा राजा के हाथों सत्कार होता है लेकिन उसी आनन्द में स्वप्न
देखने वाला मस्त होता रहता है अथवा स्वप्न में ही सारा धन चला गया इस दुःख से वह रोने लगता है।
इसलिये, उद्धव ! उसे यदि जागृत न किया जाय तो स्वप्न की सुख-दुःख की पीड़ा कभी समाप्त नहीं होती।
जो लोग विषयासक्त होते हैं जिन्हें निरन्तर विषय का ही ध्यान रहता है, देहाभिमान जिन्हें सदा विषय में ही
पिरोता रहता है, उनकी विषयासक्ति दूर करने के क्या उपाय हैं ? इसी अर्थ का सिद्धान्त श्रीकृष्ण उद्धव को बता
रहे हैं। यदि श्रवण और मनन न करें, विचारों का ज्ञान नहीं साधा, अथवा परिपूर्ण वैराग्य नहीं धारण किया तो
संसार का भय समाप्त नहीं होता। लेकिन संसार मिथ्या है इतना कह भर देने से सुख-दुःख का भय समाप्त
नहीं होता, जन्म-मरण का चक्र तथा अहंममता नहीं छूटती। ऐसे जो अज्ञानी लोग हैं, उन्हें अवश्य ही साधन
करने चाहिये। विवेक से परिपूर्ण वैराग्य धारण करने से संसार का बंधन नष्ट होता है। इसलिये उद्धव ! सभी
साधनों का मूल और जिससे ब्रह्मज्ञान हाथ लगता है उस वैराग्य को पूर्ण रूप से साध्य करें। अब विरक्ति के
मार्ग के बारे में सुनो। तो जिस प्रकार आग धधकती है, उसी प्रकार देह में वैराग्य दहकना चाहिये। तभी
ब्रह्मप्राप्ति का अधिकार प्राप्त होता है। ऐसे जो पूर्ण मुमुक्षु लोग होते हैं और जिनकी कृपा से सद्गुरु थपथपा
कर जागृत करते हैं, जो देहादिक के अभेद भाव से पुष्ट रहते हैं, माया के गुणों की त्रिपुटी जिन्हें मिथ्या लगती
है, ब्रह्मावंड से सृष्टि भर जाती है, ऐसा अप्रत्याशित लाभ जिस वैराग्य विवेक से हाथ लगता है, उसी वैराग्य
का वर्णन श्रीकृष्ण उद्धव से कर रहे हैं।
तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियैः ।
आत्माग्रहणनिर्भातं पश्यवैकल्पिकं भ्रमम् ॥ ५६ ॥
विषय की आसक्ति ही परमार्थ के लिये बाधक होती है। इसलिये विषय को ही त्याग दो और पुनः उसे
स्पर्श न करो। वृत्ति आसक्त होने पर इन्द्रियों से चिपक जाती है और उसे अत्यन्त लुब्ध होने के कारण विषयों के
भोग भोगने की इच्छा होती है। यही संसार का बड़ा रोग है। इसलिये उसका त्याग करना चाहिये। उत्तम पकवान
हो लेकिन उसमें यदि विष पड़ा हो तो उसका एक ग्रास खाते ही प्राण निकल जाता है। लेकिन विष से प्राण एक
ही बार जाता है और विषय बार-बार प्राण लेते रहते हैं। अब तुम कहोगे कि प्रारब्ध के अनुसार भोग आते हैं,