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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 869 में से

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पृष्ठ 614

५९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उद्धव उवाच
यथैवमनुबुध्येयं वद नो वदतां वर।
सुदुःसहमिमं मन्ये आत्मन्यसदतिक्रमम्॥५९॥
विदुषामपि विश्वात्मन् प्रकृतिर्हि बलीयसी।
ऋते त्वद्धर्मनिरतान् शान्तांस्ते चरणालयान्॥६०॥
जो लोग वेदशास्त्र का अर्थ पूर्णरूप से जान कर उसे बता सकते हैं वही सच्चे वक्ता हैं। उन वक्ताओं में
तुम श्रेष्ठ हो। क्योंकि वेदों का प्रमुख वक्ता तुम ही हो। तुम्हारी ही युक्ति ले कर शास्त्र तुम्हारा वर्णन करते हैं,
लेकिन परोक्षवाद से वे भी कुंठित हो जाते हैं। वेद तो 'वह नहीं, वह नहीं' कह कर पीछे हट जाते हैं। वह
तुम्हारे ही मुखसे तुम्हारे ही ज्ञान की उक्ति, हे कृपामूर्ति! तुम्हारी कृपा से सुनने को मिलती है। मैं अपने कानों का
भाग्य किन शब्दों में व्यक्त करूँ? जो सुनते हैं, वे धन्य हैं। इस प्रकार अनेक युक्तियों से उद्धव ने श्रीकृष्ण की
प्रार्थना और अत्यन्त प्रेम से हाथ जोड़ कर विनती की। भगवान ने जो भाषण दिया वह अत्यन्त गहन है। यह
भाषण अत्यन्त पवित्र है। लेकिन मेरे अंतःकरण में उसका बोध नहीं होता क्योंकि दूसरों के अपराध कौन सहन
करेगा? यह कर्म अत्यन्त कठिन और मानव स्वभाव के विरुद्ध है। इसलिये इस महान उपदेश पर आचरण करना
नितांत कठिन है क्योंकि कोई द्वंद्व किस उपाय से सहन कर सकता है? यदि कोई बड़ा आदमी कभी-कभार कोई
अपराध करता है तो करोड़ लोगों में से कोई तो उसका अपराध सहन करेगा। लेकिन किसी नीच द्वारा किया गया
छल कोई, कभी सहन नहीं करेगा। जिसका मुँह कभी न देखना पड़े उसे नमस्कार करना भी उचित नहीं है, फिर
उसकी लात कौन सहन करेगा? जिसके शरीर में प्राण जरा भी शेष न हो वही ऐसा अपमान सहन करेगा।
लेकिन जो जीवित है वह इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन जो सचमुच ज्ञानी होते हैं वे भी अपनी किसी
आज्ञा का उल्लंघन सहन नहीं करते, फिर अपमान कौन सहन करेगा? कपिल महामुनि को भी क्रोध हुआ था
इसलिये उन्होंने सगरों को शाप देकर उन्हें भस्म कर दिया। नारद ने कुबेर के लड़के को शाप देकर वृक्ष बनाकर
छोड़ा। दुर्वासा की कथा तो बहुत लम्बी है। शृंगी ऋषि के अंतःकरण में क्रोध हुआ और उसने पिता के गले में
मृतसर्प डालने वाले परीक्षित को शाप दिया। सनकादिक वस्तुतः शान्त थे लेकिन वैकुण्ठ पहुँचने पर जयविजय
ने उनका रास्ता रोका इसलिये उन्होंने क्रोध में आकर जय विजय को शाप दिया। जब ज्ञानसम्पन्न लोगों की यह
स्थिति है, तो औरों की क्या स्थिति होगी? गोविन्द दूसरों का अपराध सहन करने की शक्ति त्रिभुवन में भी दुर्लभ
है। प्रकृति अपने गुणों से प्रबल हुई है। वह जरा से कारण से भी गुणों को तत्काल क्षुब्ध करती है। जो पूर्ण साधु
और सज्जन होते हैं, उन्हें भी क्रोध विकल कर देता है। जिसे तुम्हारी परिपूर्ण भक्ति प्राप्त होती है जिसे तुम्हारी
कृपा का पूर्ण लाभ होता है, तुम्हारे चरणों में जो अत्यन्त लीन रहता है, उसे ही ऐसी शान्ति प्राप्त होती है। तुम तो
त्रिभुवन में विश्वात्मा हो। तुम्हारे सामने मैं कोई बात चुरा कर नहीं रख सकता। मैं सच कहता हूँ कि यह
दूजाभाव और द्वंद्व मैं सहन नहीं कर सकता। श्रीकृष्ण, यह तुम भी जानते हो। शान्ति अत्यन्त पवित्र वस्तु है और
क्रोध नितान्त निन्दनीय है इसका प्रतिपादन बुद्धिमान लोग भी करते हैं किन्तु उन्हें भी द्वंद्व सहन नहीं होते। द्वंद्व
वास्तव में दुःसह ही हैं। इसलिये हे कृपामूर्ति! द्वंद्व सहन करने का उपाय मुझे बताइये। अन्य साधनों को साध्य
किया जा सकता है लेकिन यह सहिष्णुता मेरे मन को नहीं भाती। इसीलिये मुझे भी वैसी शान्ति प्राप्त हो ऐसी
मुझ पर कृपा कीजिये। शान्ति के योग से प्राप्त होने वाले कल्याण का मुझे लाभ हो ऐसी पूर्ण कृपा मुझ पर करें।