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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

५०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किया तो वह युद्ध के लिये तैयार हो गया। सारांश दैवयोग से कौरव पाण्डवों के युद्ध में दुर्योधनादि बैरी परिवार
सहित मारे गये। युद्ध समाप्त हो जाने के बाद धर्मराज राजसिंहासन पर बैठा, तब उसके अंतःकरण में विचार
उठा कि "पृथ्वी पर महापातकी एक मैं ही हूँ।" मैंने उसे राज्य पर बिठाया तो वह बोला, मैंने अनेक ब्राह्मण
गुरुओं को मारा, कर्ण दुःशासन को मैंने मारा, और राजा दुर्योधन भी मेरे हाथों मारा गया। यहाँ वास्तव में
उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकर्त्ता एक ईश्वर ही होते हुए, धर्मराज इन सबका 'कर्त्ता मैं हूँ' ऐसे कहने लगा।
देहाभिमान के कारण वह अत्यन्त पश्चात्ताप से स्वयं को अपने ही कुलगोत्र का विनाश करने वाला महापातकी
कहने लगा। तब उसका समाधान करने के लिये मैं भीष्मनिर्वाह का मौका पाकर उसे उनके पास ले गया और
उससे प्रश्न पुछवाये धर्म ने किये हुए प्रश्न अब सुनो। उसने 'राजधर्म' पूछा; 'दानधर्म' पूछा; आपद्धर्म पूछा और
मुख्य रूप से सबसे उत्तम 'मोक्ष धर्म' भी पूछा। वही अब सुनो।
तानहं तेऽभिधास्यामि देवव्रतमुखाच्छ्रुतान्।
ज्ञानवैराग्यविज्ञानश्रद्धाभक्त्युपबृंहितान्॥ १३॥
भीष्म के मुख से निकले वे अति उत्तम मोक्षधर्म मैंने श्रवण किये। उनके योग से संसार का भ्रम दूर होता
है और सारा कर्म दग्ध हो जाता है। ज्ञान, विज्ञान, श्रद्धा, भक्ति, अनित्य की नश्वरता तथा वैराग्यस्थिति आदि के
सम्बन्ध में भीष्म ने धर्म को बताया। वही मैं तुम्हें यथार्थ रीति से बताता हूँ। भीष्म को 'देवव्रत' कहते हैं। इसका
कारण वह भगवान पर चित्त रखकर, निश्चयपूर्वक आत्मानुसंधान धारण कर, स्वस्थ अंतःकरण से शरपंजर पर
लेटा हुआ था। उसने मोक्षधर्म बतलाया। उसमें मुख्य रूप से प्रथम 'ज्ञान' बतलाया। वही उत्तम ज्ञान पुरुषोत्तम
सुना रहे हैं, श्रवण करें।
नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै।
ईक्षेताथैकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥ १४॥
प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, पंचतन्मात्रा अर्थात् पाँच सूक्ष्म भूत और अहंकार आदि मिलाकर तत्त्वों की संख्या
नौ है। कुछ लोगों के अनुसार वह 'ग्यारह' है, अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन और पाँच
अर्थात् पंचमहाभूत होते हैं और 'तीन' अर्थात् सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण होते हैं। इन सब तत्त्वों की संख्या
मिलाने पर 'अट्ठाईस' होती है। ये सारे तत्त्व सभी प्राणिमात्र में समसमान भाव से विचरण करते रहते हैं। ब्रह्मदेव
से लेकर स्थावर तक में ये सारे तत्त्व समान रूप में भरे हुए हैं। उसी प्रकार इनमें 'जीवचैतन्य' भी समसमान रूप
में ही प्रतिबिम्बित हुआ है और यही सबका नाम, रूप और अभिमान प्रकाशित करता है। जलाशय में, कुएँ में
अथवा समुद्र में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब एक जैसा ही होता है, उसी प्रकार ब्रह्मदेव से लेकर मक्खी तक सबके
शरीर में जीव भी एक समान ही होता है। प्राणिमात्र में चैतन्य समसमान होने के कारण सबका आत्मा एक है यह
समझना यही 'शुद्ध ज्ञान' है और मेरा भी यही मत है। अब विज्ञान का भी लक्षण तुम्हें बताता हूँ। इसे श्रीकृष्ण
आधे श्लोक में वर्णन कर रहे हैं। पहले से ही देखते रहने के अनुसार व्यापक परब्रह्म से देहादिक सारे तत्त्व भरे
हुए हैं यह वह निश्चित रूप से देखता है। जिस प्रकार घटादिकों में आकाश ही व्याप्त रहता है, उसी प्रकार सारे
संसार में चिदाभास ही व्याप्त है। ऐसा शुद्ध ज्ञान ज्ञेयप्राप्ति का कारण होता है और ज्ञेय प्राप्त होते ही वह ज्ञान
वृत्ति के साथ लुप्त हो जाता है। (यही विज्ञान है) वह केवल ज्ञान से ही जाना जाता है इसलिये उसे 'ज्ञेय' कहते
हैं। और ज्ञेय प्राप्त होते ही जिस प्रकार सूर्य के तेज से जुगनू शरमा जाता है उसी प्रकार वह ज्ञान भी लज्जित हो

उन्नीसवाँ अध्याय ५०३
उठता है। नमक पानी में मिलने पर उसका स्वभाव ही नष्ट हो जाता है। उसी प्रकार ज्ञेय प्राप्त होने के बाद ज्ञान
का ज्ञातापन ही समाप्त हो जाता है। ज्ञेय की यथार्थ प्राप्ति होने के बाद, स्वरूप में केवल चिन्मात्रता ही रह जाती
है, फिर व्याप्य-व्यापक अथवा साधक-बाधक जैसी बात नहीं रह जाती। सूर्योदय होने के बाद जिस प्रकार
चन्द्रमा नक्षत्रों के साथ लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञेय की प्राप्ति के आगे सारे संसार के साथ ज्ञानसम्पत्ति का
भी लोप हो जाता है। इस प्रकार का साङ्ग अपरोक्ष ज्ञान जब तक नहीं हो जाता तब तक वह प्रपंच के स्वरूप
और संसार को आत्मा से भिन्न समझता है और केवल ब्रह्मज्ञान की बकवास करता है। ऐसा जो शाब्दिक ब्रह्मज्ञान
है वह भी त्रिगुणात्मक ही रहता है और परब्रह्म तो निराकार और निर्गुण है, उसे न जन्म है न मरण। जितना भी
कुछ त्रिगुणात्मक है वह सब नाशवान है। इसी विषय पर नाशवान और साकार का निरूपण अब श्रीकृष्ण स्वयं
कर रहे हैं।
एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत्।
स्थित्युत्पत्त्यप्ययान् पश्येद् भावानां त्रिगुणात्मनाम्॥ १५॥
यदि नाशवान न होता तो सगुण को सत्य ही मानते। यहाँ तीन गुण हैं जिन्हें उत्पत्ति, स्थिति और लय है।
रजोगुण से उत्पत्ति, सत्त्वगुण से स्थिति और तमोगुण से अन्त में नाश होता है। यह गुणों की वृत्ति का स्वभाव ही
है। इन गुणों में परब्रह्म रहता ही है; उसी के योग से कार्य प्रकाशित होता है; लेकिन वह वस्तु जन्ममरणादि दोषों
से अलिप्त रहती है और अविनाशी ही रहती है जो वस्तु तीनों गुणों पर आश्रित नहीं होती, जिसके योग से ही
गुणों के कर्म चलते हैं, वह तीन गुणों से बिल्कुल अलग है। यही बात श्रीकृष्ण बताते हैं।
आदावन्ते च मध्ये च सृज्यात् सृज्यं यदन्वियात्।
पुनस्तत्प्रतिसंक्रामे यच्छिष्येत तदेव सत्॥१६॥
गुणों के पूर्व, मध्य और अन्त में, उसी प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय के समय जो अविनाशी
रूप से विद्यमान रहता है, वही 'संत' अर्थात् शाश्वत है ऐसा मैं समझता हूँ। वह 'संततत्त्व' ऐसा है जिसके
आधार पर संसार टिका हुआ है और जो संसार में अंतर्बाह्य भरा हुआ है और जिसके कारण संसार प्रकाशित होता
है। यह संसार ही है जो उत्पन्न होता है और इसका लय होता है; लेकिन वह तत्त्व कायम ही रहता है। ऐसी जो
आत्मवस्तु है, वही सच है, यह तुम जान लो। जिस प्रकार घट और मठ होते हैं और चले जाते हैं, लेकिन
आकाश वैसे ही रहता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और लय होने पर भी परब्रह्म उसी अवस्था में एकत्र
रहता है। अलंकार बनाने से पूर्व का सुवर्ण, अलंकार तैयार होने पर भी सुवर्ण के ही रूप में रहता है अथवा
अलंकार टूटने पर भी सुवर्ण ही रहता है। उसी प्रकार चराचर को व्यापने वाला परब्रह्म अखण्ड ही रहता है।
कैसा भी आकार या विकास हो लेकिन इससे परब्रह्म को कोई विकार नहीं होता। इस प्रकार अखण्ड रहने वाली
जो परब्रह्म रूप वस्तु है, उसके चार प्रमाण हैं। उनके आधार पर उस वस्तु को जानें और प्रपंच को मिथ्या समझें।
श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम्।
प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते॥ १७॥
यत्र-तत्र-सर्वत्र एक अद्वैत परब्रह्म ही है, अन्य कुछ नहीं है। उस परब्रह्म में यह प्रपंच मिथ्या आभास ही
है। इसका प्रमाण वेदों में भी है। देह की क्षणभंगुरता हम साक्षात देखते ही हैं। यही प्रपंच की अधिकता का
दूसरा प्रत्यक्ष प्रमाण है। मार्कण्डेय और भुशुंडी ने कोटि-कोटि कल्पांत के समय प्रपंच को शख होते अपनी

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आँखों से है। बड़े-बड़े लोगों के मुख से हमने अनेक बार यह सुना है जो प्रपंच की नश्वरता का तीसरा
ऐतिहासिक प्रमाण है। शास्त्र प्रमाण तथा अनुमान से भी प्रपंच का भास मिथ्या ही है। वह मृगजल की तरह
दिखाई देता है। उसमें वास्तविकता नहीं है। रस्सी वास्तव में रस्सी के ही रूप में रहती है लेकिन भ्रम से वह
अनेक आकारों में दिखायी देती है। यह लकड़ी है या साँप है या मोतियों की लड़ी है? या पानी की धारा बह
रही है? कुछ भी समझ में नहीं आता। उसी प्रकार परब्रह्म एक है तथा चैतन्यधन है। उसके सम्बन्ध में भ्रम से
अनेक प्रकार के विवाद शुरु हो जाते हैं। कोई शून्य कहता है, कोई सगुण कहता है। कर्मधर्माचरण को भी मिथ्या
कहा जाता है। इस प्रकार अनुमान-प्रमाण के आधार पर भी प्रपंचभास मिथ्या ही दिखायी देता है। उद्धव ! वेदांत
का सच्चा और प्रामाणिक मत यही है। तंतु के बिना वस्त्र अलग से दिखायी नहीं देता, उसी प्रकार प्रपंच भी ब्रह्म
से अलग सत्यरूप में नहीं है। प्रपंच का मिथ्यापन श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य तथा अनुमान इन चार प्रमाणों से सिद्ध
होता है इसलिये इस प्रपंच की विषयासक्ति को त्याग कर वैराग्य धारण करना चाहिये। इसी विषय का निरूपण
स्वयं श्रीकृष्ण कर रहे हैं। विषयों का चिन्तन मिथ्या है तथा इस लोक में परलोक में भी अमंगल ही है।
कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्चादमङ्गलम्।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥ १८॥
यज्ञ याग आदि कर्मसाधनों से जो लोक प्राप्त होता है, वह नश्वर रहता है, इसे ध्यान में रखो। ब्रह्मलोक
आदि जो लोक हैं वे सारे नश्वर होने के कारण अमंगल ही हैं। उस लोक में जिस सुख की बात होती है वह
विष मिलाकर तैयार किये गये अन्न की तरह होती है। विषययुक्त अन्न खाते समय मधुर लगता है लेकिन अन्त में
मृत्यु होती है। प्रकार स्वर्ग में रहने वाले का भी अन्त में अधःपतन होता है। यह लोक जैसा यहाँ दिखायी देता
है, वैसा ही स्वर्ग भोग वहाँ भी दिखायी देता है। दोनों ही नाशवान हैं। कुत्ता काला हो या सफेद हो अमंगलता में
दोनों ही एक जैसे हैं। उसी प्रकार नश्वरता की दृष्टि से इहलोक और परलोक दोनों समान हैं। इसीलिये हे
उद्धव ! इहलोक अथवा परलोक के सुखोपभोग के सम्बन्ध में हमेशा विरक्ति ही धारण करनी चाहिये। इसी का
नाम वैराग्य है। अब तुमने अपने पहले प्रश्न में मेरी भक्ति के सम्बन्ध में पूछा था, उसी को मैं तुम्हें अपने मत के
अनुसार बता रहा हूँ।
भक्तियोगः पुरैवोक्तः प्रीयमाणाय तेऽनघ।
पुनश्च कथयिष्यामि मद्भक्तेः कारणं परम्॥ १९॥
भक्ति के माहात्म्य के सम्बन्ध में मैं तुम्हें पूर्व में बता ही चुका हूँ। उस भक्ति पर तुम्हारा अत्यन्त प्रेम होने
के कारण मैं तुम्हें उसे पुनः बता रहा हूँ। हे पुण्यमूर्ति उद्धव! सुनो! जिसे मेरी भक्ति की चाह होती है वह सारे
त्रिभुवन में मुझे प्रिय रहता है क्योंकि मेरे भजन से ही मेरे भक्तों को परमपद की प्राप्ति होती है। उस भक्ति का
लक्षण भगवान प्रारम्भ से ही बता रहे हैं। इसलिये श्रोतागण सावधान होकर सुनें।
श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम्।
परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभिः स्तवनं मम॥ २०॥
अमृत जैसी मेरी कथाओं का श्रवण करने से अमृत भी फीका लगता है और तत्काल भक्तिमार्ग की चाह
उत्पन्न होती है। देवतागण अमृतपान करते हैं लेकिन वे भी अन्त में मर जाते हैं, लेकिन जो मेरे कथामृत का
सेवन करते हैं वे कलिकाल को भी समाप्त कर देते हैं। कथासारामृत सेवन करने से वे अत्यन्त उन्मत्त हो जाते हैं

उन्नीसवाँ अध्याय ५०५
और मृत्यु को ही मारने लगते हैं। इससे उनके भय से ही सारा संसार भागने लगता है। मेरे कथामृतसार को प्राशन
करने से उनका अंतःकरण मेरी भक्ति में रंग जाता है। वे अत्यन्त उल्हास से मेरे गुण और चरित्र का गायन करते
हैं। मेरा नाम, मेरे पद, अद्वैत बोध से, नानाप्रकार के छंदों में, कीर्तनों में आनन्दपूर्वक गाते हैं और परमानन्द में
डोलते रहते हैं। बड़े समारोह में अत्यन्त प्रेमपूर्वक नामसंकीर्तन का गजर करते रहते हैं और नामघोष के साथ
तालियाँ बजाते हैं जिससे महापापों की होली जल जाती है। कीर्तन की ऐसी चाह उत्पन्न होने पर शास्त्रविधियुक्त
प्रायश्चित्तों का कहीं ठौर नहीं रह जाता, तीर्थ लाचार हो जाते हैं और जप-तप के संकट नष्ट हो जाते हैं। कीर्तन
का गजर सुनकर यमलोक का व्यापार रुक जाता है। उन्हें कोई काम न रहने के कारण वे खाली हाथ घूमते रहते
हैं। शमधर्म अपने अस्त्र छिपा कर रखता है। कीर्तन की चाह देखकर भगवान दौड़ा-दौड़ा आता है, वैकुण्ठ से
वह कूद कर आता है। इस प्रकार जो कीर्तन का नित्य निरन्तर गजर करता है, उसके अधीन मैं श्रीकृष्ण हो जाता
हूँ। कीर्तन का मुझे वास्तव में इतना सम्मोहन होता है। कीर्तन की ही तरह वह मेरे गरुड़ध्वज की पूजा भी बड़े
आदर से करता है। सुगन्धित पुष्पादिक सामग्री से देवता की पूजा करता है। इस प्रकार अत्यन्त निष्ठा से मेरी
पूजा कर मेरा स्तुतिस्तोत्र भी गाता रहता है। आधा क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता।
आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥ २१ ॥
वह अपने इन्द्रियों की योजना पूजाविधान की ओर करता है; 'वाणी' हरिकीर्तन को अर्पण करता है;
'हृदय' मेरे ध्यान में मग्न रखता है और 'अष्टांग' नमस्कार की ओर लगाता है। इस प्रकार वह अंतर्बाह्य अपनी
इच्छा से मुझ पर ही समर्पित रहता है लेकिन मेरे भक्तों को देखते ही वह आनन्द में मेरे पास आना ही भूल जाता
है। मेरे भक्त बड़े भाग्य से ही मेरे घर आते हैं। उस दिन को दीपावली या दशहरा की तरह समझना चाहिये।
लड़की जिस प्रकार ससुराल से मायके आती है, उसी प्रकार यहाँ सारे तीर्थ दौड़ते हुए आते हैं। भक्तपूजा की
शोभा देखने के लिये सनकादिकों के भी झुण्ड आते हैं। नारद, प्रह्लाद आदि भक्तों की टोलियाँ दौड़ती हुई आती
हैं। उस स्थान पर असंख्य सिद्ध एकत्र होते हैं। बड़े-बड़े देवताओं की तो बाढ़ आ जाती है। महात्माओं के झुण्ड
इकट्ठा होते हैं और पितर दौड़ते-हाँफते चले आते हैं। वेदों का तो वहाँ प्रवेश ही नहीं हो पाता; विधि विधान
लजाकर पीछे मुड़ जाते हैं। इस प्रकार मेरे भक्त की पूजा के कौतुक से द्वार पर भीड़ उमड़ पड़ती है। बड़े उत्कर्ष
से मेरे भक्त की पूजा देखकर मैं कृष्ण भी मोहित हो जाता हूँ फिर औरों की क्या बात की जाय ? भक्तपूजा का
ऐसा माहात्म्य है। मेरी पूजा को भी पीछे छोड़कर जो मेरे भक्त की प्रेम से पूजा करता है तो उसे मुझ श्रीकृष्ण के
सकल लोकों के साथ सपरिवार पूजा करने का श्रेय प्राप्त होता है क्योंकि मेरी मूर्तियाँ अचेतन व्यक्ति तथा भक्त
मेरी चलती बोलती मूर्तियाँ हैं। उनकी यथाविधि पूजा करने से मुझ भगवान को संतोष प्राप्त होता है। जो मद्भाव
मेरे भक्त के प्रति रखते हैं वही भाव सारे भूतों के प्रति रखना चाहिये क्योंकि भूताकृति अलग होने पर भी सब में
आत्मास्थिति एक जैसी होती है। देह का केशवपन करने से वह विधवा हो जाती है लेकिन आत्मा विधवा नहीं
होती। दहकते अंगारे विभिन्न आकारों में दिखायी देते हैं लेकिन उनमें अग्नि एक ही होता है। उसी प्रकार सारे
प्राणि मत्स्वरूप ही हैं। दीवार पर बने हुए चित्रों में अनेक आकृतियाँ दिखायी देती हैं लेकिन जिस प्रकार उनमें
दीवार एक ही रहती है, उसी प्रकार मैं चिदात्मा समस्त प्राणिमात्र में भरा हुआ हूँ इसे निश्चित समझना चाहिये।
दूसरी बात यह है कि दूजेपन का अहंकार त्याग कर समस्त प्राणिमात्र में मेरी भावना रखना यही मेरी सबसे श्रेष्ठ

५०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पूजा है और मुझे वह अत्यन्त प्रिय है। इस प्रकार जो मेरी पूजा करता है वह मेरा अत्यन्त चहेता होता है, मैं
सर्वांग से उसके घर में काम करता हूँ क्योंकि उसका मुझ पर स्वामित्व रहता है। उसकी प्रत्येक कृति मेरा भजन
ही रहता है। यही बात श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।
मय्यर्पणं च मनसः सर्वकामविवर्जनम्॥२२॥
लौकिक कर्म हो अथवा अन्य कोई भी शरीर कर्म हो उस कर्म द्वारा मेरी भक्ति उत्पन्न होती है। उद्धव! मेरे
भजन का स्वरूप बड़ा निराला है। वह भक्त बाहर चबूतरे पर बैठकर गपसड़ाका भी करे लेकिन उसमें मेरा
कीर्तन उत्पन्न होता है। उसकी रसाल वाणी मेरे गुण के गायन की गर्जना करती है। वह जो स्वधर्म कर्म क्रिया
करता है, वह भी मुझे ही अर्पण करता है। मेरे सिवा अन्य कुछ भी करना उसकी समझ में नहीं आता है। उसके
सारे इन्द्रियों के कर्म में मेरी भक्ति अपने आप उत्पन्न होती है। मेरे नाम के सिवा अथवा मेरे गुणानुवाद के सिवा
उसकी वाणी को और कुछ भी मालूम नहीं होता। उसे जो कुछ अच्छा लगता है वह सब वह मुझे ही अर्पण
करता है और अन्त में वह अपना मन भी मुझे अर्पण करता है। अब मन किस प्रकार मेरे स्वरूप में अर्पण होता
है, इसका निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च।
इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद् व्रतं तपः॥२३॥
मैं जो परमात्मा हूँ, वही सच्चा स्वार्थ है, ऐसा निश्चय कर, अपना परमार्थ साधने के लिये लोग धन-धान्य
आदि सर्वस्व खर्च करते हैं। परमार्थ पूरी तरह साधने के लिये मन में सच्चा वैराग्य होना आवश्यक होता है
इसलिये मुझ श्रीकृष्ण से मिलने के लिये वे सारे सुखोपभोग का त्याग करते हैं। छत्र, चामर, हाथी, घोड़े आदि
सारा वैभव छोड़कर रंक बन जाते हैं। मुझ तक यदि पहुँचना है तो प्रखर वैराग्य चाहिये। मेरा निजसुख प्राप्त
करने के लिये पत्नी, बच्चे, धनधान्य आदि का झट त्याग कर देते हैं। उन्हें इतना अधिक अनुताप होता है। चाह
कर मेरा भजन करने से वे भोग को भूलने लगते हैं। सच्चा भक्त मेरी प्राप्ति के लिये एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने
देता। मुझे प्राप्त करने के उद्देश्य से ही श्रौत स्मार्त कर्म करता है। अग्निहोत्र, यज्ञयाग, बड़े-बड़े व्रत वह मेरे लिये
करता रहता है। मेरा चिद्रूप प्राप्त करने के लिये गायत्री आदि मंत्रों का जाप करता है। दुर्धर तप भी मत्स्वरूप की
प्राप्ति के लिये करते हैं। मैं विश्वंभर सर्वव्यापी और सर्वतोमुखी होने के कारण वह गरीबों को अन्नदान करता है,
उससे मैं सुखी होता हूँ। हृदय में मैं स्वतः सिद्ध ही रहता हूँ, मेरा आवाहन कर वह भोजन करता है और वह भी
मुझे ही अर्पण करता है। प्रत्येक ग्रास के साथ हरि का स्मरण करने से वह अन्न पूर्ण ब्रह्म हो जाता है। इस प्रकार
मेरे भक्त स्वयं ही अपने सारे कर्म मुझे अर्पण करते हैं। इस प्रकार जो सदासर्वदा अपने सारे कर्म कृष्णार्पण करता
है, उसका मन भी मुझे ही अर्पण होता है। उसी का निरूपण भगवान करते हैं।
एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम्।
मयि संजायते भक्तिः कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते॥२४॥
लोहे को तैयार कर, उस पर उत्तम मुलम्मा लगाया जाय तो उसका दर्पण बन जाता है। उसी प्रकार सारे
कर्म मुझे अर्पण करने से मन भी शुद्ध हो जाता है। सोने को जितना तपाया जाय उतना उसका तेज बढ़ता है;
वस्त्र जितना अधिक धोया जाता है उतना अधिक वह स्वच्छ होता है। उसी प्रकार सारे कर्म मुझे अर्पण करने से

उन्नीसवाँ अध्याय ५०७
मन भी निर्मल होता है और मन शुद्ध होते ही वह मेरे स्वरूप में अर्पण होने लगता है। नदियों में बाढ़ का पानी
मिलने से वे समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी प्रकार मन निर्मल होते ही वह मेरे स्वरूप में आकर मिलता है। मेरे
स्वरूप में मन जब स्थिर होता है, उस समय आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी ये तीनों प्रकार समाप्त हो जाते हैं और चौथा
प्रकार 'भक्ति' उत्पन्न होती है। भक्ति ही मेरी पूँजी है। उसमें दूसरी, तीसरी या चौथी समझना साधकों का भ्रम है।
मेरी अनेक भक्तियाँ नहीं हैं। वही एक मेरी श्रेष्ठ भक्ति इस साधन से प्राप्त होती है; ब्रह्मदेव, शंकर, सनकादिक
आदि इसी भक्ति के कारण मेरे भक्त कहलाते हैं। अहंकार पूरी तरह नष्ट होने पर सारे प्राणि आत्मस्वरूप दिखायी
देने लगते हैं। उद्धव! मेरे स्वरूप की जो 'सहजास्थिति' है वही मेरी श्रेष्ठ भक्ति है। इस श्रेष्ठ भक्ति का यदि एक
अंश भी प्राप्त हो जाय तो आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी संज्ञान होकर विचरण करने लगते हैं। वे सच्चे साधक बन
कर अपना स्वार्थ साधते हैं। यही भक्ति आर्त के मन में परमार्थ के विषय में आर्तता उत्पन्न करती है। मन में
भगवत्प्राप्ति की तीव्र व्यथा उत्पन्न होना, यही परमार्थ की 'आर्तता' है। जो भगवान की प्राप्ति के लिए चट्टान पर
से कूदने में भी नहीं डरता और जलती आग में भी प्रवेश करना चाहता है उसको ही वास्तव में 'आर्त' कहते हैं।
आर्त की स्थिति ऐसी होती है; किन्तु जिज्ञासु ऐसे साहस का निवारण करता है। वह कहता है, मनुष्यदेह
ब्रह्मप्राप्ति का साधन है। आत्महत्या से उसका विनाश नहीं करना चाहिये। पूर्व के भक्तों ने किस प्रकार
भगवद्भक्ति सम्पादित की, वह रीति जानने के लिये जो जीवप्राण हो उस युक्ति पर चलता है उसका ही नाम है
'जिज्ञासु'। मुझे जानने की जो इच्छा है उसी का नाम है 'जिज्ञासा'। वही मेरे स्वरूप को प्रकाशित करती है।
इसीलिये मैं उन्हें 'जिज्ञासु' कहता हूँ। परब्रह्म तक पहुँचने के लिये जिस युक्ति का प्रयोग होता है, उसी का नाम
है 'शुद्ध जिज्ञासा'। वेदशास्त्र के अर्थज्ञान सम्बन्ध से जो प्रयास किया जाता है उसे लौकिक जिज्ञासा कहते हैं।
उसी प्रकार प्रत्येक अर्थ में मुझे माँगना या मुझे ही खोजना, इसे 'शुद्ध अर्थार्थी' कहते हैं, यह ध्यान में रखो। अर्थ
की अर्थात् द्रव्य की इच्छा करनेवाले को जो अर्थार्थी कहते हैं वे उस शब्द का गलत अर्थ लगाते हैं। संसार में
अनेक अर्थ अथवा वस्तु दिखाई देती हैं, उनका विचार कर जो परमार्थ की ओर दृष्टि लगाता है, उसी को
'अर्थार्थी' कहते हैं। उसमें भी मेरी भक्ति प्रकाशित होती है। इस प्रकार आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी इनमें मेरी
'सहजभक्ति' प्रकाशित होती है। भक्त अपनी कल्पना भ्रान्ति से मेरी भक्ति के चार प्रकार मानते हैं। लेकिन वह
गलत है। मेरी जो निजभक्ति है वह 'एकमेव' है। ऐसी मेरी निजभक्ति कैसे प्राप्त की जाती है, आत्मनिवेदन की
स्थिति कैसी होती है, उसे हे उद्धव! मैंने तुम्हें स्पष्ट रूप से बतला दिया है। जिन भक्तों के हाथ में मेरी इस भक्ति
का सार सचमुच आ जाता है, उनके सारे व्यापार मद्रूप हो जाते हैं। वह जिधर ध्यान देते हुए बैठ जाता है वह
दिशा मैं ही बन जाता हूँ। वह जिधर अपने कदम बढ़ाता है, वहाँ की धरती भी मैं ही बन जाता हूँ। वह भोजन
करने बैठता है तो मैं षडरस बन जाता हूँ और प्राशन करने के लिये जल भी मैं ही बन जाता हूँ। वह निजपदों से
चलने लगता है तो मैं निजबोध से सामने का दृश्य समुदाय नष्ट कर देता हूँ और शान्ति पहले से ही पाँवड़े
बिछाये पग-पग पर उसकी नजर उतारती जाती है। शम-दम हाथ जोड़े आज्ञाधारी सेवक की तरह हाथ जोड़े
खड़े रहते हैं। ऋद्धि-सिद्धि घर में दासी की तरह खटती रहती हैं और विवेक तो उसके घर के रोज के चाकर
की तरह काम करता रहता है। उसका बैठने का स्थान मैं ही बन जाता हूँ। वह शान्ति से सो सके इसलिये मैं ही
उसके लिये समाधि का बिस्तर तैयार कर देता हूँ। वह जिन शब्दों का उच्चार करता है उसमें निःशब्द ब्रह्म ही
शब्द रूप में प्रकट होता है। इसलिये सुनने वालों को भी उससे समाधान होता है। वह सहज ही कुछ बोलने
लगता है तो उस बोल के साथ मेरे गुणानुवाद प्रकट होते हैं। इसलिये उसकी बातें सुनते समय स्वाभाविक रूप

५०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
से ही श्रोतागण उसके गले में बाहें डाल देते हैं। वह परावाणी के ऊपर चढ़ते समय बैकुण्ठ और कैलास की
सीढ़ियाँ बनाता है और उस उन्मनी अवस्था को दूर भगाकर सुखशय्या पर शयन करता है। चारों मुक्ति एकत्र
होकर उसके घर पानी भरती हैं। मैं श्रीकृष्ण भी लक्ष्मी के साथ उसके घर में काम करता हूँ। फिर औरों की
महत्ता की बात क्या करें ? सहसा उसके मुख से किसी के लिए 'तुम्हारा उद्धार हो गया' यह सुनते ही मैं हृषीकेश
उसे अपने मस्तक पर बिठाया हूँ और उसके वचन के कारण उसे निजधाम पहुँचाता हूँ। जिन्हें मेरी सहजभक्ति
प्राप्त हो जाती है उसके लाड़ मैं इस प्रकार पूरे करता हूँ। उद्धव ! और क्या-क्या बताऊँ ? समझ लो कि मैं देह हूँ
और वह आत्मा है। वह मेरा जीव, मेरा प्राण रहता है। यह बात केवल निजभक्तों की ही मालूम रहती है। वह
जब सहजभक्ति में विचरण करता है, उस समय मैं भगवान हूँ और वह मेरा भक्त रहता है। अन्यथा मैं पूर्णतयः
उसके भीतर और वह मेरे भीतर होता है। इस प्रकार हम दोनों एकरूप से निरन्तर रहते हैं। नाम से भले ही दोनों
बाहर हों। जो मेरे साथ एकरूपता के लिये आये वे 'मैं' ही बनकर रह गये; लेकिन जो इस प्रकार मुझे भजते हैं
उन्हें मैं 'भक्त' समझता हूँ। उद्धव ! एकरूपता से भी अधिक मधुर मेरी भक्ति है; इसी निरूपण की तुम्हें चाह थी
यह जानकर ही तुम्हें यह स्पष्ट करके बताया। मेरे ऐसे भक्तों को दूसरा कोई लाभ शेष ही नहीं रह जाता। मैं
श्रीहरि उनके निजभाव से ही पूर्णतयः सन्तुष्ट होता हूँ। भागवतशास्त्र भक्तिप्रधान है। उसके निजभक्ति का सार
मैंने तुमसे आदरपूर्वक निवेदन किया। तुम्हारी पसन्द के बहाने मैंने अपनी अत्यन्त गुप्त वस्तु 'भक्ति' तुम्हें
मिष्ठान्न के रूप में प्रस्तुत की है। जिस ढंग से मैंने तुम्हें बताया उसी ढंग से मेरी श्रेष्ठ भक्ति का आचरण करना
चाहिये। ऐसा कहते हुए भगवान ने उद्धव को प्रेम से उठाया। पीताम्बर पीछे सँवारा, शंख चक्र फेंक दिया और
उद्धव को उठा लिया। फिर भी भगवान का प्रेम कम होने का नाम नहीं ले रहा था। दो हाथ कम पड़ रहे थे
इसलिये उन्होंने चारों हाथ फैलाये और उद्धव को प्रेम से गले लगा लिया। हृदय से हृदय मिल गया। इस प्रकार
श्रीकृष्ण ने अपना सर्वस्व उद्धव के हृदय में उड़ेल दिया। श्रीहरि अवाप्त काम और इच्छारहित थे, लेकिन उसे
भी भक्ति की चाह थी। उद्धव उसे इतना प्यारा लगा कि उसने स्वानंद से उसके सारे लाड़ पूरे किये। उद्धव से
उनकी इतनी प्रीति थी कि वे आलिंगन में बँधे उद्धव को छोड़ना ही भूल गये और देखो। कृष्ण के हृदय से हृदय
मिल जाने के कारण उद्धव भी अपने आप को भूल गया। इस प्रकार दोनों आनन्द और चाव से निष्काम प्रेम में
डूब गये। उद्धव तो भक्तिसुख की समृद्धि में डूब ही गया। कृष्ण ने अपना सर्वस्व उद्धव के हृदय में उड़ेल दिया
लेकिन उद्धव को इसकी जानकारी नहीं होने दी। श्रीहरि का यह बहुत बड़ा चमत्कार था क्योंकि (भगवान कहते
हैं) उद्धव को यदि मेरे हृदय की यह बात मालूम हुई तो वह मेरे पास ऐक्य के लिये आयेगा; फिर आगे की
सरस कथा किसे सुनाई जाय ? उद्धव के साथ निरन्तर प्रेम से बोलना अच्छा लगता है। इसका कारण यह है कि
वैसा कोई अन्य श्रोता नहीं मिल पाता। भक्तिसुख की महत्ता बताने का शौक मैं किसके सामने पूरा करूँगा
इसलिये उद्धव की आड़ में प्रेम छिपा दिया। सूर्य से किरणों निकलती है उसी प्रकार उसके आलिंगन का बन्धन
छूटा और कृष्ण और उद्धव अलग हो गये। फिर भी उनकी अभिन्नता नहीं टूटी। अस्तु! (टीकाकार श्री एकनाथ
कहते हैं) अगली कथा का सन्दर्भ और श्लोक का सम्बन्ध छूट गया, इसलिये श्रोतागण अन्यथा न सोचें। मूल
अर्थ का विचार करें। मूल पद संक्षेप में है। उसका मैंने केवल विस्तार किया है। इसे व्यर्थ की बकवास न
समझें। इस पर श्रोतागण बोले, कैसा आश्चर्य है। मूल में पद अत्यन्त गूढ़ था, तिस पर तुमने श्रीहरि के मन से
भक्ति सारामृत निकाल लिया। तुम्हारे हृदय में श्रीकृष्णनाथ प्रकट होकर, अपना हृद्गत ग्रन्थ में तुम्हारे द्वारा
कहलवा रहे हैं, यह हमने अच्छी तरह जान लिया है। यह भक्तिसारामृत श्रवण करते ही चित्त में चैतन्य जगने

उन्नीसवाँ अध्याय ५०९
लगता है। तुम ग्रन्थ का अर्थ यथार्थ ढंग से बता रहे हो। संतों का यह भाषण सुनकर एकाजनार्दन को हर्ष हुआ
और उसने श्रीचरणों में मस्तक रख दिया। अब आगे का निरूपण सुनें। श्रीकृष्ण अपनी भक्ति को आदरपूर्वक दृढ़
करने के लिये अपने निरूपण की पुनरावृत्ति कर रहे हैं।
यदात्मन्यर्पितं चित्तं शान्तं सत्त्वोपबृंहितम्।
धर्मं ज्ञानं सवैराग्यमैश्वर्यं चाभिपद्यते॥ २५॥
अपना अंतःकरण मुझे अर्पण कर देने से मेरी भक्ति उल्हास के साथ बढ़ती है, इस सम्बन्ध में मैं पहले ही
बता चुका हूँ। अब मन को मेरे स्वरूप में अर्पण करने का एक सरल उपाय बताता हूँ, सुनो। मेरा नामस्मरण
करने से पापों का विनाश होता है। मन की कोई कामना रख नामस्मरण करने से वह नाम ही उस कामना को
पूर्ण करता है और बिना इच्छा किये नामस्मरण करने से समस्त पालकों का विनाश करता है और पाप भस्म हो
जाने पर रज और तम को जीत कर अपने आप ही धर्मपरायण तथा धार्मिक सत्त्वगुण बढ़ने लगता है। सत्त्वगुण
के कारण वैराग्य हमेशा के लिये अटल हो जाता है। वैराग्य के कारण विषय का निर्मूलन होता है जिससे
आत्मज्ञान प्रकट होता है। विवेक के साथ ज्ञान बढ़ने से स्वरूप का अनुसंधान होता है और शान्ति का समाधान
बढ़ता जाता है, उस समय मन मुझे अर्पण होता है। मन मेरे प्रति अर्पण होने पर निजभक्ति प्रकट होती है। उसका
सारा निरूपण मैंने पिछले श्लोक में किया ही है। निजभक्ति पूर्णरूप से प्राप्त होने पर अष्टमहासिद्धि स्वयं होकर
उसके आँगन में खड़ी हो जाती हैं। उन सिद्धियों की ओर वह आँख उठा कर भी नहीं देखता। उसके लिये
अप्राप्य कोई भी वस्तु नहीं रहती। मेरे भक्तों का मुझसे ऐक्य होने के बाद उन्हें मेरी पूरी सत्ता प्राप्त होती है। मेरी
ऐसी भक्ति को न प्राप्त कर तथा आत्मस्थिति का लाभ न उठाकर, विषयासक्ति से व्यवहार करने पर बहुत बड़े
अनर्थ का सामना करना पड़ता है।
यदर्पितं तद्विकल्पे इन्द्रियैः परिधावति।
रजस्वलं चासन्निष्ठं चित्तं विद्धि विपर्ययम्॥ २६॥
जो वेदशास्त्र को नहीं मानता, परमार्थ पर जो विश्वास नहीं करता; जो घर, स्त्री, बच्चे और सम्पत्ति पर
आसक्त होकर विषयों पर ही लुब्ध रहता है, उसमें विषय की अधिकता से रजोगुण अत्यन्त क्षुब्ध हो उठता है
और उसका चित्त ज्ञान के प्रति अन्धा हो जाता है। ज्ञान का अर्थ उसे विपरीत ही दिखायी देने लगता है। जो लोग
उसे विषयोपभोग के अनेक उपाय सुझाते हैं, उसे वह बड़ा 'ज्ञानी' मानता है और जो छलवाद की युक्ति से मुँह
बन्द करता है, उसे पण्डित कहते हैं। जिसके पीछे बहुत बड़ा प्रपंच रहता है, उसे 'भाग्यवान' समझते हैं और जो
नाना उपभोगों से अपने शरीर का पोषण करता है उसे 'पुण्यवान' पुरुष मानते हैं। परमार्थ विषयों में अनुतापी
रहता है उसे बड़ा 'दुःखी' कहते हैं; जो अनेक प्रकार के विषयों का पोषण करता है उसे बहुत बड़ा 'सुखी'
मानते हैं। जिसके शाप से मनुष्य की मृत्यु होती है, उसे 'सिद्ध' मानते हैं। जिसके आचार में दंभ होता है, उसे
बड़ा 'पवित्र' मानते हैं और स्त्रियों को तथा शूद्रों को मंत्र देता है उसे बहुत बड़ा 'ज्ञाता' कहते हैं। जो अनुतापी
और वैराग्यशील होता है, उसे 'भाग्यहीन' कहते हैं और जो सबके समक्ष विषयों का उपभोग करता है उसे
'राजयोगी' मानते हैं। जो स्वयं धन का अभिलाषी होता है वह धन खर्च करने वाले को 'मूर्ख' कहता है और
खर्च न करने वाले को 'विचारी' तथा 'धर्मज्ञ' मानता है। जिसकी गाँठ में काफी द्रव्य रहता है, वह सबको
अत्यन्त 'पूज्य', 'पवित्र' तथा 'ज्ञानी' लगता है। ऐसा विपरीत ज्ञान उन्हें होने लगता है। वह स्वयं सर्वात्मा और

अध्याय १९ से २४: ज्ञान-भक्ति लक्षण, गुण-दोष विवेक व सांख्य-दर्शन

५१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
सर्वेश है यह बिलकुल भूलकर वह अपने को अधर्मी, अकर्मी, दीनदुबला तथा अज्ञानी मानने लगता है। ऐसी
स्थिति में मेरी भक्ति कैसे उत्पन्न होगी ? और मेरी प्राप्ति भी कैसे होगी ? इस प्रकार संसार के भवसागर में फँस
कर कितने लोग चक्कर खा रहे हैं, उनकी कोई गिनती नहीं है। परमात्मा को प्राप्त करने के चार उपाय हैं और
वे चारों अत्यन्त गुप्त हैं। अंतःकरण के वात्सल्य के कारण श्रीकृष्ण उद्धव को वे उपाय बताते हैं। धर्म की प्रमुख
भूमिका है भजन, उससे उत्पन्न होता है ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य। ये चार उपाय मेरी प्राप्ति के लिये आवश्यक
हैं। उनके सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो।
धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम्।
गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७॥
उद्धव ! अब मैं असली मर्म तथा गुह्य में गुह्य बात तुम्हें बताता हूँ। मेरी प्रेमयुक्त भक्ति वही सबसे अच्छा
धर्म है, यह जान लो और ऐक्य से एकात्मता का जो साक्षात बोध होता है और फिर कभी भेद उत्पन्न नहीं होता,
उसी का नाम है, 'शुद्धज्ञान' ऐसा परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ने कहा। धनधान्य का ढेर सामने पड़ा हो या उर्वशी
सेज पर आयी हो लेकिन जिसे वह सब तुच्छ मालूम होता है उसे ही हम 'वैराग्य' कहते हैं। हे बुद्धिमान उद्धव !
सुनो ! मेरी अष्ट महासिद्धि हैं जो मुझसे कभी दूर नहीं होती, वे अटल हैं। मेरी श्रेष्ठ भक्ति के निश्चय से जो
एकात्मता प्राप्त कर मेरी पदवी पा लेता है, उसके घर में मेरी सिद्धियाँ दासी बनकर रहती हैं। सिद्धि उसकी सेवा
करती हैं इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? मैं लक्ष्मी के साथ भक्तों की भक्ति करता हूँ। 'ऐश्वर्य' का प्रमुख
लक्षण है, स्वयं भगवान की योग्यता प्राप्त कर भगवद्-ऐश्वर्य से अत्यन्त सम्पन्न होना। यह मेरे गुप्त भण्डार की
चाभी है। उसे लेकर आत्मानंद का कमरा खोलो और अपनी सुखसिद्धि का उपभोग करो। श्लोक के चार शब्दों
का ऐसा गहन प्रतिपादन सुनकर उद्धव को बड़ा आश्चर्य हुआ। 'धर्म' आदि को लेकर चार शब्दों का अर्थ
भगवान ने विचित्र-सा बताया, उसी प्रकार अब यम आदि का अर्थ भी भगवान से पूछा जाय ताकि श्रीकृष्ण
उसका गुप्त अर्थ बताएंगे, यह बात मन में लाकर ही परमार्थ को पूर्णरूप से जानने के लिये उद्धव स्वयं ही यम
आदि के प्रश्न पूछ रहा हो। पाँच श्लोकों में उसने गहन ज्ञान के पैंतीस प्रश्न पूछे हैं। उनके उत्तर सुनने पर
'जीव' और 'शिव' दोनों का समाधान होगा। पहले श्लोक में छह प्रश्न हैं; दूसरे में नौ हैं तथा तीसरे और चौथे
में आठ-आठ हैं और पाँचवें में चार प्रश्न हैं।
उद्धव उवाच
यमः कतिविधः प्रोक्तो नियमो वारिकर्शन।
कः शमः को दमः कृष्ण का तितिक्षा धृतिः प्रभो ॥ २८ ॥
अहंकाररूपी शत्रु का विनाश करने वाले श्रीकृष्ण ! 'यम' और 'नियम' के कितने प्रकार हैं ? 'शम' और
'दम' किसे कहते हैं ? उसी प्रकार, 'तितिक्षा' और 'धृति' कैसी रहती है ?
किं दानं किं तपः शौर्यं किं सत्यमृतमुच्यते।
कस्त्यागः किं धनं चेष्टं को यज्ञः का च दक्षिणा ॥ २९ ॥
यहाँ 'दान' क्या है और 'तप' क्या है ? 'शौर्य' क्या है और 'सत्य' कैसा रहता है ? उसी प्रकार जिसे
'ऋत' कहते हैं उसका यथार्थ ढंग से वर्णन करें। इसी प्रकार 'त्याग' क्या है ? पुरुष के लिये इष्ट धन कौन सा
होता है ? 'यज्ञ' किसे कहते हैं ? और उसमें 'दक्षिणा' क्या होती है ?

उन्नीसवाँ अध्याय ५११
पुंसः किं स्विद् बलं श्रीमन् भगो लाभश्च केशव।
का विद्या हीः पराका श्रीः किं सुखं दुःखमेव च॥ ३०॥
पुरुष के पास 'बल' की कौन-सी शक्ति होती है? किस स्थिति को 'दया' कहते हैं? उसी प्रकार हे
कृपामूर्ति श्रीकृष्ण 'लाभ' क्या है, इसे भी बतायें। यहाँ 'सुख' कौन-सा है और कैसा है? इसे भी कृपापूर्वक
बतायें। उसी प्रकार सुख के साथ जो 'दुःख' होता है उसका स्वरूप भी कथन करें।
कः पण्डितः कश्च मूर्खः कः पन्था उत्पथश्च कः।
कः स्वर्गो नरकः कः स्वित् को बन्धुरुत किं गृहम्॥ ३१॥
'पण्डित' का क्या लक्षण है? किस गुण के कारण मूर्ख कहते हैं? 'सुमार्ग' कौन-सा होता है? उसी
प्रकार 'दुर्मार्ग' का भी निरूपण करें। 'स्वर्ग' किसे कहते हैं? 'नरक' को कैसे पहचानें? 'सखा', 'बन्धु' किसे
कहा जाय? और मेरा 'घर' कौन सा है?
क आढ्यः को दरिद्रो वा कृपणः कः क ईश्वरः।
एतान् प्रश्नान् मम ब्रूहि विपरीतांश्च सत्पते॥ ३२॥
'सम्पन्न' हम किसे कहें? 'दरिद्र' को कैसे पहचाना जाय? 'कंजूस' किसे कहा जाय? 'ईश्वर' को कैसे
पहचाना जाय? ये मेरे प्रश्न हैं। जो लौकिक अर्थ से भिन्न और परमार्थ के लिये साधन बन सके ऐसा अर्थ स्पष्ट
करके बतलायें। लौकिक दृष्टि से जो विरुद्ध होता है उसे ही 'विपरीत' कहते हैं। इसलिये उन सबका मतितार्थ
परिमार्थ के सन्दर्भ में बताएँ। संतमूर्ति ज्ञान से सम्पन्न रहते हैं लेकिन तुम उनके भी स्वामी हो। इसीलिये शास्त्रार्थ
से लोग तुम्हें 'सत्पत्ति' कहते हैं। हे श्रीपते! परमार्थ प्राप्ति के लिये मुझे मेरे प्रश्नों का यथार्थ दृष्टि से उत्तर दें,
ऐसी विनती उद्धव ने श्रीकृष्ण से की। भक्त की यह विनती सुन कर नारायण के मन में कृपा उपजी। अतः उसके
परमार्थपरक प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण 'यम' और 'नियम' का विशद निरूपण करेंगे और जो शेष अत्युत्तम प्रश्न है
उनका उत्तर अध्याय के अन्त में देंगे।
श्रीभगवानुवाच
अहिंसा सत्यमस्तेयमसङ्गो हीरसंचयः।
आस्तिक्यं ब्रह्मचर्यं च मौनं स्थैर्यं क्षमा भयम्॥ ३३॥
पहले श्लोक में यम के बारह लक्षणों का वर्णन है। प्रश्न के अनुसार श्रीकृष्ण उसका उत्तर दे रहे हैं। आगे
अनेक प्रश्न हैं अतः यम नियमों का उत्तर श्रीकृष्ण संक्षेप में दे रहे हैं। काया, वाचा अथवा मन से किसी को
पीड़ा न हो, इसका नाम है 'अहिंसा'। और जो यथार्थ हों उसका वर्णन करना ही 'सत्य' है। अब 'अचौर्य' का
भी लक्षण सुनो। अपने हाथ से चोरी न करना, इतना ही नहीं बल्कि किसी के धन के बारे में मन में भी इच्छा न
करना यही 'अस्तेय' अर्थात् चोरी न करने का लक्षण है। लोग यात्रा पर जाते हैं उस समय जिस प्रकार साथ में
एकत्र लोगों के प्रति आसक्ति नहीं होती, उसी प्रकार घर-बार होते हुए भी जिसकी उसके प्रति आसक्ति नहीं
होती। स्फटिक को जिस रंग पर रख दिया जाय, उसी रंग का वह दिखायी देता है लेकिन भीतर से वह निर्विकार
ही रहता है। उसी रूप में जो शरीर में रहता है उसे 'असंगता' कहते हैं। निंद्यकर्म से जिसे मन से ही घृणा रहती
है और लोकजीवन में निंद्यकर्मों से लज्जित होना, इसी का नाम 'लज्जा' है। इहलोक में जिसे संग्रह करना

५१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मालूम ही नहीं रहता क्योंकि देह प्रारब्ध के अधीन है यह वह जानता है, उसी प्रकार स्वर्ग के सुखोपभोग के
लिये वह पुण्य का भी संचय नहीं करता; क्योंकि जिस पुण्य से स्वर्गभोग प्राप्त होते हैं उसी पुण्य का क्षय होते
ही पुनः जन्म लेना पड़ता है; इसलिये पुण्य सम्पत्ति का क्षय होगा इसलिये मेरे भक्त संग्रह नहीं करते। इसी का
नाम है 'असंचय' अर्थात् संग्रह न करना। अब 'आस्तिक्य' का लक्षण यह है कि सर्वत्र सब जगह मेरा
ब्रह्मस्वरूप ही व्याप्त है, यह देखना। ब्रह्म का अभाव वह कहीं नहीं देखता। 'ब्रह्मचर्य' का अर्थ है कि आश्रम
के अनुसार शास्त्रों में जो आचार बताया गया है उसे निश्चयपूर्वक पालन करना। झूठ और अनुचित भाषण न
करने का ही अर्थ है, 'मौन'। नित्य वेदपठन, गायत्री स्मरण अथवा भगवान का नामस्मरण करना चाहिये (यह
भी मौन ही है) वृत्ति आत्मस्वरूप में, स्वधर्म में अथवा साधु की संगत में स्थिर होने का अर्थ है 'स्थिरता'। कोई
देह का वन्दन करे अथवा मारे लेकिन दोनों ही समय क्षमा एक जैसी। देह का भोग प्रारब्ध पर निर्भर है, वह
विचार कर वह सदा क्षमाशील रहता है। अभय को पहचानने का ढंग है कि जो-जो पराया दिखाई देता है, उसे
अपना ही समझना। आत्मा भी एक है और पंचमहाभूत भी एक ही है। यदि देखा जाय तो इसके सिवा कुछ भी
नहीं है। इसकी प्रतीति होते ही भय का महादुःख समाप्त हो जाता है। इसी का नाम है 'अभय'। दूजेपन की बात
ही समाप्त होने पर संसार में दवा के लायक भी भय नहीं मिलता। इस प्रकार अभय के आनन्द की पुष्टि
आत्मदृष्टि से हो जाती है। इन्हीं का नाम है बारह यम! उद्धव! इनका रहस्य तुम्हें बतलाया। अब जिसे 'नियम'
कहते हैं उसके नियम भी सुगम दृष्टि से बताता हूँ। सुनो।
शौचं जपस्तपो होमः श्रद्धाऽऽतिथ्यं मदर्चनम्।
तीर्थाटनं परार्थेहा तुष्टिराचार्यसेवनम्॥ ३४॥
'शौच' अर्थात् स्वच्छता का प्रकार ऐसा है। विचारों से अंतःकरण की शुद्धि करें और बाह्य शौच अर्थात्
शुद्धि वेदाज्ञा के अनुसार मृत्तिका और जल से करें। अब 'जप' का विचार सुनो। जिसे जैसा अधिकार प्राप्त हो
उसके अनुसार मंत्र का जप करें अथवा अलग से किये गुरु का नाम अथवा गुरु ने दिया हुआ मंत्र जपें।
'वेदघोष' ब्राह्मण का जप है और 'ओंकार' संन्यासी का जप है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन जातियों को
'द्विजन्मा' कहते हैं। उन्हें आगमोक्त मंत्र का जप करना चाहिये। नाममंत्र तो सभी के लिये लागू है। अब जिससे
अंतःकरण की शुद्धि होती है, वह तप का प्रमुख प्रकार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने धर्म का आदरपूर्वक
आचरण करना चाहिये। शरीर शोषण को 'तप' कहना मूर्खों का प्रयास है। हृदय में सत्त्वरूप श्रीहरि का चिन्तन
करना ही सबसे श्रेष्ठ तप है। अब 'होम' के बारे में सुनो। 'अग्नि' देवता का मुख है। इसके लिये पंचमहायज्ञ,
अग्निहोत्र आदि करना 'होम' कहलाता है। उद्धव! मेरे भजन की अत्यन्त चाह रखना अथवा धर्म के प्रति प्रेम
रखना इसी का नाम मूर्तिमंत 'श्रद्धा' है। समय पर अन्न अथवा धन न होने पर भी सत्कार से समाधान करता है,
दीन-दुखियों के चरणों का वन्दन कर मधुर भाषण से उन्हें सन्तुष्ट करता है। जो सचमुच ही दीन है उसे देखकर
उसे अत्यन्त नम्र होकर यथाशक्ति द्रव्य अर्पण करना, इसी का नाम 'आतिथ्य' है। अंतःकरण की सच्ची आकुलता
से, प्रेम से लोकसमाज के साथ बड़े समारोह से मुझ भगवान की विधिपूर्वक पूजा करना, अथवा ब्राह्मणों का
समुदाय एकत्र कर उनकी षोडशोपचार पूजा करने से मुझ श्रीहरि को सन्तोष प्राप्त होता है, क्योंकि ब्राह्मणों की
पूजा अत्यन्त पवित्र वस्तु है। उसी प्रकार अंतःकरण शुद्ध करने के लिये तीर्थयात्रा पर जाते रहना चाहिये।
तीर्थयात्रा में श्रद्धा रखने का ही नाम है 'तीर्थाटन'। पग-पग पर मेरे नाम की जय-जयकार तथा मेरा गुणानुवाद

उन्नीसवाँ अध्याय ५१३
करते हुए, इच्छामुक्त होकर यात्रा करने का ही नाम है 'तीर्थयात्रा' । जिस प्रकार पर्वत परोपकार के ही लिये
खनिज पदार्थ तथा वनस्पतियों का भार वहन करते हैं, उसी प्रकार केवल परोपकार के लिये निरन्तर कर्म कर
सदासर्वकाल उपकार करते रहना चाहिये। चन्द्र की किरणें जिस प्रकार स्पर्श होते ही शान्ति प्रदान करती हैं, उसी
प्रकार उसका आचरण उपकार से ही जन-जन को सुखी करता है। दैव से जो कुछ प्राप्त होगा, उसने पर ही वह
संतोष कर समय व्यतीत करता है। मन में समविषम भाव ही उत्पन्न नहीं होता। इसी का नाम है 'यदृच्छा लाभ
संतुष्ट' अर्थात् प्राप्त स्थिति में सन्तुष्ट रहना। काया, वाचा, मन और धन गुरु को अर्पण कर जो गुरु की शरण में
जाता है, उसके संसार का बन्धन नष्ट हो जाता है। इसी का नाम है 'गुरुसेवा'। शौच के दो गुण तथा जप आदि
दूसरे दस लक्षण मिला कर बारह 'नियम' हैं। इस प्रकार स्वयं श्रीकृष्ण ने वर्णन किया।
एते यमाः सनियमा उभयोर्द्वादश स्मृताः ।
पुंसामुपासितास्तात यथाकामं दुहन्ति हि ॥ ३५ ॥
इस प्रकार दो श्लोकों में यमनियमों का अच्छी तरह निरूपण किया। प्रत्येक के बारह-बारह लक्षण
बतलाये। इसी को शास्त्रार्थ में 'परमगुह्य' कहते हैं। इनकी उपासना यदि कोई पुरुष कामना के साथ करेगा तो
यही यम और नियम कामधेनु की तरह उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण करेंगे। अथवा इन यम-नियमों की निष्काम
उपासना करने से उस पुरुष को मेरे स्वरूप की सहज प्राप्ति होगी। अब हे उद्धव ! तुम्हारे शमदमादिक जो
प्रश्न हैं, जिनके कारण ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है वह गुह्य निरूपण तुम्हें भी बताता हूँ, सुनो। श्रीकृष्ण उन
प्रश्नों का उत्तर देंगे। उनका श्रवण करने से तत्काल ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होगी। बालक की भूख शान्त करने के
लिये उसकी माँ अपने हाथ से उसे खिलाती है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी उद्धव को ब्रह्मज्ञान दे रहे हैं। जो रस
पिता को अच्छा लगता है वह उसे अपने बच्चे को भी पिलाता है। उसी प्रकार श्रीकृष्ण उद्धव को ब्रह्मरस
पिला रहे हैं। वैसे भी माँ को बालक से अत्यन्त प्रेम रहता है, तिस पर यदि बालक स्तन में मुँह ही लगा दे,
फिर क्या पूछना ? उस आनन्द के कारण उसके स्तन में दूध फूट पड़ता है। उसी प्रकार श्रीकृष्ण स्वयं ही
ब्रह्मज्ञान देने को तत्पर, जिस पर उद्धव ने प्रश्न पूछे उससे उन्हें परम सन्तोष हुआ। पहले से ही पर्जन्य वृष्टि
होने लगे, तिस पर हवा और विद्युत का भी सहयोग मिल जाय, फिर क्या पूछना ? उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान देने
के लिये तत्पर भगवान को उद्धव के प्रश्न का बहाना मिल गया। इससे श्रीकृष्ण स्वानंद से प्रसन्न हो गये और
अब वे उसे पूर्ण ब्रह्म ही सौंप रहे हैं। मुफ्त में मिलने वाले नमक के टुकड़ों के ऐवज में यदि चिन्तामणि हाथ
में आ जाये, या ईंट देकर पारस मिल जाय तो उसे जो स्वीकार नहीं करेगा, वह अपने ही लाभ से वंचित हो
जायगा। उसी प्रकार उद्धव के थोड़े से प्रश्नों से उसे पूर्ण ब्रह्म प्राप्त हो रहा है। इसलिये एकाजनार्दन विनती
करता है कि श्रोतागण मेरी ओर ध्यान दें। उद्धव के चौंतीस प्रश्न थे। उनमें से यम और नियम के सम्बन्ध में
बतलाया। शेष बत्तीस प्रश्न रह गये, उनके बारे में भी विचार सुनिये। प्रश्नों में दया के सम्बन्ध में उत्तर
श्रीकृष्ण ने नहीं बताया। लेकिन उसके ऐवज में उन्होंने ध्वनितार्थ से 'षड्गुणैश्वर्य' सूचित किया है। दया के
लिये सम्पूर्ण भाग्य बताने के कारण श्रीकृष्ण आगे बताएँगे। सारांश, अब इकतीस प्रश्न बच गये। इसमें
श्रीकृष्ण एक अधिक बतायेंगे, वह 'कर्मस्वसंगम' अर्थात् शौच है। कार्यकारण सम्बन्ध आने के कारण ही यह
बताना पड़ा। इस पर ये सारे तैंतीस प्रश्न हुए। उनके बारे में श्रीकृष्ण व्याख्या देंगे। इस प्रकार वे उद्धव को
हथेली पर 'ब्रह्मज्ञान' परोसेंगे।

५१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रिय संयमः।
तितिक्षा दुःखसम्मर्षो जिह्वोपस्थ जयोधृतिः ॥ ३६ ॥
विवेकयुक्त बुद्धि असार छोड़ कर सार को ही ग्रहण करती है। ऐसी बुद्धि मन की विभिन्न वृत्तियों को
सँभालते हुए, जिस पर नमक समुद्र से मिल जाता है उसी प्रकार सारी वृत्तियों के साथ परमात्मा से मिल जाती
है। समुद्र में नमक घुलते ही वह समुद्रस्वरूप हो जाता है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप से मिलकर बुद्धि भी
चैतन्यधन हो जाती है। इस प्रकार बुद्धि के शान्त स्वरूप होने का शम कहना चाहिये। लेकिन इससे पहले दम
करना आवश्यक है। शत्रु का दमन करना इस अर्थ में यहाँ 'दम' नहीं है, बल्कि इसका अर्थ इन्द्रियों के दमन से
है। उसका भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। जिससे 'शम' को सहायता मिले ऐसे ढंग से इन्द्रियों को अपने वश में
रखना शास्त्रीय विधि के अतिरिक्त उन्हें किसी प्रकार का भोग नहीं देना, रातदिन वैराग्य से उन पर नियंत्रण
रखना इसी का नाम 'दम' है। अब 'तितिक्षा' का भी लक्षण बताता हूँ, सुनो। कोई बड़ा सुख प्राप्त होने पर वह
उसका जिस उल्हास से

उन्नीसवाँ अध्याय ५१५
में लगा हुआ है उसे जो महावीर जीत लेता है उसे ही सच्चा शूरवीर समझना चाहिये। "मैं सदा सदाचरण ही कर
रहा हूँ, निःसन्देह ज्ञानी हूँ, मेरी पवित्र ब्राह्मण देह है" यही जीव का जीवभाव है। देह के माथे पर वर्णाश्रम,
आश्रम के माथे पर कर्म, उस कर्म पर जिसे अत्यन्त अभिमान है, उसे अपार देहभ्रम रहता है। इसलिये
जीवस्वभाव को जीत कर, चिदानंद के राज्य पर बैठकर, अपने आत्मरूप स्वराज्य वैभव का सुख भोगना यही
'शौर्य' का बड़प्पन है। अब जिसे 'सत्य' कहते हैं उसके बारे में भी तुम्हें निश्चित रूप से बताता हूँ। उद्धव !
सदासर्वदा सर्वत्र समब्रह्म देखना, यही 'परम सत्य' है। 'परब्रह्म' को सर्वत्र समान रूप से भरा न देख उसे विषम
अर्थात् भिन्न-भिन्न देखना, यही अत्यन्त दुर्गम 'असत्य' है और ब्रह्म सर्वव्यापी तथा सर्वत्र सम है। ऐसा समझना
'सत्य' है। सारांश केवल सत्यभाषण ही निज सत्य नहीं है। इस सम्बन्ध में श्रीकृष्ण और भी निरूपण कर रहे हैं।
ऋतं च सूनृता वाणी कविभिः परिकीर्तिता ।
कर्मस्वसंगमः शौचं त्यागः संन्यास उच्यते ॥ ३८ ॥
कितने ही लोग 'ऋत' को ही सत्य कहते हैं। प्रवृत्ति की दृष्टि से देखने पर वह सच है। किन्तु निवृत्ति की
दृष्टि से सम ब्रह्म को 'सत्य' कहना ही उचित है। श्रोताओं का दुःख सम्बन्ध रहित हित करने वाली सत्यवाणी
को ही वास्तव में 'ऋत' कहना चाहिये। जिस प्रकार चित्त में देखने पर भिन्नता दिखायी देती है लेकिन वह
दीवार जिस पर चित्र बना रहता है, वह सदा सम ही रहती है उसी प्रकार संसार विषम अर्थात् भिन्न-भिन्न दिखाई
पड़ने पर भी ज्ञाताओं को निजबोध के कारण सर्वत्र समब्रह्म ही दिखायी देता है। इसी का नाम 'सत्य' है यह
ध्यान में रखो। उद्धव ने जो प्रश्न किये थे उसमें 'शौच' के सम्बन्ध में प्रश्न नहीं था, लेकिन भगवान स्वयं होकर
उसका निरूपण कर रहे हैं। अंतःकरण की शुद्धि न हो तो त्याग अथवा संन्यास सम्भव नहीं है। इसलिये
अंतःकरण की शुद्धि के लिये पूर्ण शौच अर्थात् निर्मल स्वरूप का जो स्वधर्माचरण है उसका निरूपण श्रीकृष्ण
कर रहे हैं। अंतःकरण में कर्मों का मैल रहता है उसका क्षालन स्वधर्म से करना चाहिये। कर्म से ही कर्म का
निर्दलन कर स्वयं निष्कर्म हो जाना चाहिये। स्वधर्म से फल की आशा छोड़ने से कर्म के बन्धन टूट जाते हैं।
इसलिये फल के प्रति निराश होकर अंतःकरण की शुद्धि कर लेनी चाहिये। नैराश्य वृत्ती से स्वधर्माचरण करने से
अंतःकरण के मलों का क्षालन हो जाता है। इसी का नाम शौच है। अंतःकरण की ऐसी शुद्धता ही संन्यासग्रहण
की भूमिका की नींव है। इसीलिये प्रश्न न करने पर भी श्रीकृष्ण ने उसका निरूपण किया। सारे संकल्पों का
त्याग करना ही उत्तम 'संन्यास' है। ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। वे इसे उत्कृष्ट त्याग भी कहते हैं। मैं ही देह हूँ ऐसी
कल्पना मन में रहती है इसलिये संकल्प-विकल्प के कारण मन में नित्य नयी छटपटाहट होती रहती है। बाह्य
आडम्बरों में दण्ड, कमण्डल, भगवा वस्त्र यह साज तो मात्र लौकिकता है।
धर्म इष्टं धनं नृणां यज्ञोऽहं भगवत्तमः ।
दक्षिणा ज्ञानसंदेशः प्राणायामः परं बलम् ॥ ३९ ॥
धन धान्य, गायें-भैंसें आदि प्राणी का लाभकारी धन नहीं है, मोक्ष के मार्ग में सबल धर्म ही हितकारी धर्म
है। घर में जो धन गाड़ कर रखा जाता है वह घर में ही रह जाता है लेकिन धर्म साथ में रहने वाला धर्म है। वह
अपने साथ किसी प्रकार का बन्धन नहीं रखता। धार्मिक व्यक्ति जैसा कंजूस मैंने कहीं नहीं देखा। क्योंकि मरने
पर पर भी वह स्त्री-पुत्रों को ठग कर सारा धन साथ ही ले जाता है। उन्होंने अपना धन धर्मार्थ खर्च कर मुझ
नारायण को उसका भण्डारी बना दिया है। इसलिये उन्हें जब भी जिस वस्तु की आवश्यकता पड़ती है वह मैं

५१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसे स्वयं ही देता रहता हूँ। इसलिये धर्म ही इष्ट धन है। यही मेरा यथार्थ वचन है। अब 'यज्ञ' का अर्थ सुनो।
उसे भी समझाता हूँ। अग्नि मेरा मुख है और यज्ञ का भोक्ता मैं नारायण हूँ, यह जान लो। अधिक क्या कहूँ, सारा
यज्ञ ही मैं श्रीकृष्ण हूँ। इसका वेद में भी प्रमाण है। उसमें ब्राह्मण मेरा स्वरूप है। यज्ञ दीक्षा लिये हुए जो दीक्षित
ब्राह्मण हैं उन्होंने भक्तिभाव से मेरा यजन कर मेरा पूर्ण सुख प्राप्त कर लिया है। लेकिन जो अधर्म से धन एकत्र
कर, अविधि से केवल ढोंग के लिये यज्ञ करते हैं और वह याग मेरे मुँह में पड़ते हुए भी स्वयं कोरे के कोरे रह
जाते हैं। विधि से वे पशु का वध अवश्य करते हैं लेकिन उस अवदान से मैं सन्तुष्ट नहीं होता। दंभ के कारण वे
अवश्य कुंभीपाक महारौरव नरक में जाते हैं। समस्त प्राणिमात्र के मुख में जो कुछ अर्पण करना चाहिये वह मुझ
यज्ञपुरुष को ही पहुँचता है लेकिन यह दीक्षारहस्य यज्ञकर्ताओं को न मालूम होने के कारण हिंसादोष के कारण
नरक में जाते हैं। जो मेरे भक्ति भाव की दीक्षा लेकर, सारा विश्व ही मेरा मुख है यह सोचकर प्राणिमात्र के मुख
में अवदान करते हैं, उनका यज्ञ मैं अर्थात् मैं नारायण हूँ। अब 'दक्षिणा' का भी अर्थ समझ लो। यज्ञ का कोई
मोल नहीं है। उसमें ज्ञान यही अमूल्य दक्षिणा है। वह प्राप्त होते ही याज्ञिक को 'महासुख' प्राप्त होता है।
ज्ञानस्वरूप दक्षिणा मिलने पर याज्ञिक लोग अत्यन्त सम्पन्न होकर रहते हैं। वह धन कल्पांत में भी खर्च नहीं
होता। इससे जीव और शिव दोनों का ही समाधान होता है। सबमें प्राण अत्यन्त प्रबल है प्राण से ही सबको बल
प्राप्त होता है। प्राण के ही कारण मन चपल बनता है। प्राण के स्पंदन से ही वह अत्यन्त चपल हुआ है। प्राण
इतना बलवान है और मन निरन्तर प्राण के ही अधीन रहता है। ऐसे प्राण को जीतना, इसी का नाम 'बलवंत' है।
प्राण को बिना जीते, केवल हाथी का पैर पकड़ कर उसे फेंक देना अथवा एक घाव में सिंह को चकनाचूर कर
देना यह किसी शूर के बल का प्रमाण नहीं है क्योंकि जीव और मन दोनों प्राण के ही अधीन रहते हैं। उस प्राण
का दमन कर वह स्वयं उसे अपने नियंत्रण में रखता है, इसी का नाम है 'अतिबल' अर्थात् अपार सामर्थ्य ! जब
प्राणायाम अच्छी तरह सध जाता है तो बड़ा देवता भागा-भागा उससे मिलने आता है और जब एक बार आ जाता
है तो आलिंगन नहीं छोड़ता। प्राणायाम करने वाला संसार में इतना बलिष्ट हो जाता है।
भगो मे ऐश्वरो भावो लाभो मद्भक्तिरुत्तमः ।
विद्याऽऽत्मनि भिदावाधो जुगुप्साहीरकंर्मसु ॥ ४० ॥
उद्धव ने 'दया' किसे कहते हैं, यह प्रश्न पूछा था उसका उत्तर न देकर श्रीकृष्ण 'महद्भाग्य' का ही
निरूपण करने लगे। इसका कारण यही है कि भाग्य के बिना दया व्यर्थ है। इसलिये श्रीकृष्ण भाग्य का ही लक्षण
बताते हैं। तुम कहोगे कि एकआध कंजूस भी भाग्यवान रहता है, लेकिन वह भाग्यवान होते हुए भी अभागा है।
इसलिये जो दया का ही पोषण करता है, उसका ही भाग्य उत्तम है। उस उत्तम भाग्य का सम्पूर्ण लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। उस भाग्य की उत्कृष्टता रहस्यपूर्वक बताता हूँ, सुनो। 'ज्ञान' और 'पूर्ण वैराग्य', 'लक्ष्मी' और
'औदार्य', 'ऐश्वर्य' और 'यश' ये छह गुण ही 'महाभाग्य' है। ये षड्गुण ही मेरा भाग्य है। ऐसा भाग्य जिसे
सौभाग्य से प्राप्त होता है, वही दया का विधिपूर्वक पोषण कर सकता है। इन छह गुणों से जो परिपूर्ण रहता है,
वही 'दीनदयालु' है। वही दानसम्मान करना जानता है और दारिद्रय भी दूर कर सकता है। ऐसे भाग्यवान से भेंट
होने के लिये भी वैसा ही भाग्य चाहिये। सारांश मेरे जैसा भाग्य संसार में किसी को नहीं मिलेगा इस ऐश्वर्य से
जो सम्पन्न रहता है, वही 'दया' का मायका है। वही उसका लाड़-प्यार करता है और उसके ही कारण दया
समर्थ हो उठती है। इसीलिये भाग्य की बात बतायी। जिसके अंतःकरण में भूतदया है वह संसार में कभी अभागा

उन्नीसवाँ अध्याय ५१७
नहीं रहेगा। अब 'लाभ' क्या होता है ? यह प्रश्न भी तुमने पूछा है। उसका भी लक्षण सुनो। मेरी जो उत्तम भक्ति
है, वही सम्पूर्ण 'लाभ' है। मेरी उत्तम भक्ति करने से चारों मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़ती हैं। बड़े-बड़े देवतागण
भी दण्डवत करते हैं। भक्ति से मुख्य रूप से मुझ लक्ष्मीपति का लाभ होता है। यह लाभ प्राप्त न कर धन आदि
का होने वाला लाभ नरक गति देनेवाला तथा हानि प्रदान करने वाला है। इसलिये सबसे श्रेष्ठ लाभ मेरी भक्ति ही
है। क्योंकि उसके द्वारा मुझ श्रीपति का लाभ होता है। अब 'विद्या' के बारे में स्पष्टीकरण सुनो। उसे मैं यथार्थ
रूप से बताता हूँ। वासना से दृढ़ सम्बन्ध जोड़कर जो आत्मा को जीवरूप प्रदान करती है तथा अभेद में भेद
उत्पन्न करती है उसे 'अविद्या बाधा' कहते हैं। देह के माथे वर्णाश्रम और आश्रम के माथे कर्म और उस कर्म के
प्रबल अभिमान के कारण 'मैं ही देह हूँ' ऐसी बुद्धि उत्पन्न होती है। यही 'जीवधर्म' है। जो जीव की बाधा नष्ट
कर उसे चिदानंद स्वरूप प्राप्त कराती है, उसी का नाम शुद्ध 'आत्मविद्या' है। बाकी सब एकझार 'अविद्या' ही
हैं। जो अविद्या को नष्ट करती है, वही 'शुद्धविद्या' कहलाती है। अन्य शास्त्र आदि जो चौदह विद्या हैं वे पल्लव
निकली हुई अविद्या ही हैं। जीव की बाधा जिसके योग से नष्ट होती है, उसी को शुद्ध 'आत्मविद्या' कहते हैं;
अब 'ह्री' अर्थात् 'लज्जा' का स्वरूप सुनो। निंद्य कर्म के प्रति लज्जा का अनुभव होना यही वास्तव में लज्जा है।
केवल इन्द्रियों को ढँकने को ही 'लज्जा' कौन कहेगा ? तो जीवप्राण भी चला जाय तो भी अकर्म नहीं करना,
यही वास्तव में 'लज्जा' है।
श्रीर्गुणा नैरपेक्ष्याद्याः सुखं दुःखसुखात्ययः।
दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित्॥ ४१॥
चौदह भुवनों के साम्राज्य वैभव के साथ यदि लक्ष्मी प्राप्त हो जाय तो भी जो उसकी ओर नहीं देखता,
उसकी जो यह निरपेक्षता है, वही उत्कृष्ट 'श्री' है। श्रीमंत को मैं श्रीकृष्ण भी प्रणाम करता हूँ, फिर इतरों की
क्या बात की जाय ? जिसे लक्ष्मी की भी आकांक्षा नहीं है वह निरन्तर मेरे मस्तक पर ही रहता है। उसकी अपेक्षा
लाडला मुझे कोई नहीं है। उद्धव ! सुख और महादुःख इन दोनों को समाप्त कर जो 'स्वाभाविक' आनन्द प्रकट
होता है उसी का नाम है 'सुख'। जहाँ दूसरे की आवश्यकता नहीं पड़ती, इन्द्रियों की कमी नहीं पड़ती और
विषयों की भी आवश्यकता नहीं होती; ऐसी स्थिति में हृदय में जो आनन्द उत्पन्न होता है, उसका नाम है,
'निजात्मसुख'। इस आत्मसुख को भूलकर विषय की इच्छा करना इसी का नाम है 'महादुःख' जिसका सेवन
शुद्ध मूर्ख ही करते हैं। रोज-रोज भी यदि विषय प्राप्त हो जायँ तो भी इच्छा की तृप्ति नहीं होती। विषय की
इच्छा ही मनुष्य को दुःख के भँवर में डालती है। जो बंध और मोक्ष को जानता है, 'अनुमान' नहीं करता वही
'पण्डित' है। ऐसी अवस्था न प्राप्त कर केवल वेदशास्त्रों का अध्ययन कर 'सज्ञान' होना ऐसा विद्वत्ता का
अभिमान यहाँ काम नहीं करता। तो जिसे सच्ची 'शान्ति' और वास्तविक समाधान प्राप्त हुआ है, 'बंध' और मोक्ष
का यथार्थ ज्ञान है, वही 'महापण्डित' है ऐसा श्रीकृष्ण कहते हैं।
मूर्खो देहाद्यहंबुद्धिः पन्था मन्निगमः स्मृतः।
उत्पथश्चित्तविक्षेपः स्वर्गः सत्त्वगुणोदयः॥ ४२॥
वेदशास्त्र न जानने वाले को लोग मूर्ख कहते हैं लेकिन यहाँ मूर्ख का वह अर्थ नहीं है। तो जो केवल
देहाभिमानी होता है उसे ही 'मूर्ख' समझा जाता है। जो नष्ट होने वाले देह को ही 'मैं' समझ लेता है और हर्षित
होता है तथा देह के अभिमान से नरक भोगता है उससे अधिक मूर्ख कौन है ? अशौच से ही देह की उत्पत्ति

५१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
होती है; अशौच से ही देह की वृद्धि होती है और अशौच में ही देह का निधन होता है। इस प्रकार देह के पास
ही अशौच की बस्ती होती है। ऐसे इस देह का स्वरूप देखें तो अस्थि, चर्म, विष्ठा और मूत्र। ऐसे ही देह को जो
'मैं' कहकर अभिमान करता है वह वास्तव में 'मूर्ख' है। देह के इसी अभिमान का नाम 'मूर्खता' है। मेरे
वेदमार्ग पर चलना ही 'सन्मार्ग' है। जिसका चित्तभ्रंश हुआ है वही गुरु और परमात्मा की निन्दा करता है। जो
वेदशास्त्र नहीं मानता वही गलत रास्ते पर गिर पड़ता है। जो ईर्ष्यावश गुरु में दोष देखता है, जो सुहृद और
सम्बन्धियों से अशिष्ट व्यवहार करता है जो माता-पिता का धिःकार करता है उसका नाम है 'चित्तविक्षेप'। जो
दूसरों का दोष गिनता है, जो दूसरों की निन्दा करता है, जो स्त्री की बात पर विश्वास करता है उसे चित्तभ्रंश का
विकार हुआ है यह मान लो। जो सन्मार्ग से भटक कर अधर्म अथवा अकर्म में पड़ता है उसे भी हे उद्धव!
चित्तभ्रंश हुआ समझ लो। मैं सचमुच परब्रह्म हूँ यह मानना ही उत्तम 'वेदमार्ग' है। यह न जानकर लालच से
व्यवहार करना ही बड़ा 'असन्मार्ग' है। अब स्वर्ग का अर्थ जिससे आत्मसुख की प्राप्ति होती है ऐसे सत्त्वगुण से
इन्द्रलोक पहुँचने का नाम स्वर्ग नहीं है क्योंकि इस प्रकार इन्द्रलोक पहुँचने वाले वापस लौट आते हैं लेकिन जो
शुद्धसत्त्व में मिल जाते हैं और निजसुख तक पहुँच जाते हैं ऐसे उस सत्त्वगुण को 'स्वर्ग' समझना चाहिये। अब
तुम्हें नरक का लक्षण बताता हूँ।
नरकस्तमउन्नाहो बन्धुर्गुरुरहं सखे।
गृहं शरीरं मानुष्यं गुणाढ्यो ह्याढ्य उच्यते ॥ ४३॥
काम, क्रोध और लोभ का जो उद्रेक होता है, उससे महामोह खौल उठता है, वह ज्ञान के साथ-साथ
विवेक को भी डुबो देता है; उस समय अकेला तमोगुण ही बढ़ता रहता है। अरुणोदय के समय चारों ओर
धुँधलका ही छाया रहता है, गहरा अँधेरा रहता है और सूर्य चन्द्रमा दोनों ही दिखाई न देने के कारण दिन है या
रात है यह भी मालूम नहीं होता। इस प्रकार मन में अंधतम वृत्ति बढ़ती जाती है और क्या कर्तव्य है और क्या
अकर्तव्य है इसका भान नहीं रहता। इस प्रकार तमोगुण का जो उद्रेक होता है, उसी का नाम 'महानरक' है।
यमयातना के दुःख को नरक नहीं कहना चाहिये क्योंकि यमयातना से पाप झड़ जात' है। यमलोक के नरक
उसके सामने तुच्छ हैं। महामोह के नरक को ही महानरक समझना चाहिये। काम, क्रोध और लोभ ये तीनों ही
नरक देने वाले हैं, उसमें महामोह भी मिल जाय तो 'अंधतम' बनता है। इतना समुदाय जब एकसाथ मिलता है
तो उसे 'तमउन्नाह' कहते हैं। ऐसी स्थिति जिस पुरुष की हो जाय उसे 'नरकरूप' ही समझना चाहिये जो घोर
नरक में जाता है उसका वहाँ से उद्धार हो जाता है; लेकिन जिसे 'तमउन्नाह' प्राप्त होता है उसका महाकल्पांत में
भी उद्धार नहीं होता। ऐसे 'तमउन्नाह' की ख्याति सुनकर उद्धव का मन ऊब गया और वह मन ही मन विचार
करने लगा कि ऐसी तमोवृत्ति में डूबने वाले जीवों का कौन उद्धार करेगा? उद्धव के मन की बात जानकर
देवाधिदेव बोले, ऐसे डूबने वाले लोगों का सखा जो गुरु है, वह उद्धार करता है। अब, ऐसा गुरु कौन है? तो
नित्य जिसका पैर छूते हैं, जो चिन्मात्र ब्रह्मरूप प्राप्त कराता है, उसी को 'गुरु' कहते हैं। सचमुच, उस गुरु की
योग्यता ब्रह्मा से भी अधिक है क्योंकि ब्रह्मा केवल 'यह ब्रह्म है' इतने का ही प्रतिपादन करता है अन्यथा ब्रह्म
की बात कौन पूछता है? जो अज है, अव्यय है; उसी प्रकार अनंत, अच्छेद्य और अपरिमित है, ऐसे ब्रह्मा की
महिमा संसार में सद्गुरुओं ने ही प्रस्तुत की है। इसे सद्गुरु की कीर्ति श्रवण करने से जड़जीवों का उद्धार होता
है। 'गुरु' नाम की बहुत ख्याति है। उसे सुनकर यम और काल भी काँप उठते हैं। उस सद्गुरु की महिमा ही

उन्नीसवाँ अध्याय ५१९
डूबते का उद्धार करती है और जन्म-मरण का बन्धन समाप्त कर शिष्य को समाधान देता है। शिष्य का आप्त,
सखा, बन्धु सभी सद्गुरु होते हैं यह प्रसिद्ध है। वही नरक से बचा कर परमानंद सुख प्रदान करने वाला है। अब
तुम्हें 'गृह' का लक्षण बताता हूँ। मंजिलें, अट्टालिकायें, बंगले ये सब घर नहीं हैं। बल्कि मनुष्य देह यही गृहाश्रम
है, उसमें ही मैं पुरुषोत्तम विशेष रूप से रहता हूँ। उस गृह के स्वधर्म कर्म करने से आत्माराम सन्तुष्ट होता है।
जिस नरदेह की प्राप्ति की इच्छा इन्द्रादि देवता भी करते हैं और वेद भी जिस देह की कीर्ति का वर्णन करते हैं,
उस नरदेह में ही मोक्ष प्राप्त होता है। इसलिये जिसे अपना 'घर' कहते हैं उसे नरशरीर समझना चाहिये। अब
आढ्यता (घमण्ड) का भी विचार सुनो। जो ज्ञानगुण से अत्यन्त सम्पन्न रहता है, जो धन कल्पांत में भी समाप्त
नहीं होता, उसी को 'आढ्य' अर्थात् श्रीमान कहना चाहिये क्योंकि और सभी धन नश्वर है। नश्वर धन की
घमण्ड निश्चित रूप से अधःपात का कारण बनती है, किन्तु ज्ञानधन की सम्पन्नता से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः।
गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४४ ॥
अब दरिद्र का लक्षण सुनो। करोड़ों की सम्पत्ति पास में होने पर भी जिसका मन तृप्त नहीं होता उसी का
नाम है 'दरिद्र'। किन्तु जिसकी गाँठ में एक कौड़ी भी नहीं है किन्तु मन में संतोष है, वही संसार में 'सम्पन्न' है,
यह जान लो। पास में धन होते हुए भी जो पेट भर नहीं खाता, सदा सर्वदा मन में लालच भरी रहती है, इसी का
नाम है 'दरिद्रलक्षण'। अब इसके बाद कृपण (कंजूस) किसे कहते हैं, यह भी सुनो। जिस प्रकार राजा को
उसके सेवक बाँध कर रखें, उसी प्रकार वह इन्द्रियों के वश में रहता है। अपने स्वरूप का विचार करें तो सबके
राजा हम स्वयं हैं। यह भूलकर वह दीन होकर इन्द्रियों के अधीन हो जाता है। वास्तव में मन आत्मा का चाकर
होता है और इन्द्रियाँ मन की चाकरी करती हैं किन्तु यह उनका भी दासानुदास बनता है। इस प्रकार इन्द्रियों के
अधीन होने के कारण 'कृपणत्व' दीनता आती है। अपने चाकरों के चाकर जो इन्द्रिय हैं, उनकी यह पूजा करता
रहता है। इस प्रकार इन्द्रियों को महत्त्व देने से शरीर में 'कृपणता' आती है। अब हे उद्धव! ईश्वरत्व का
वास्तविक लक्षण बताता हूँ। उद्धव! जिसे कनक और कामिनी अच्छी नहीं लगती, वही सचमुच त्रिभुवन का
'ईश्वर' है। मेरी यह बात त्रिवार सत्य है। तुमने जितने प्रश्न पूछे थे उतने ही गुण जिसके पास होते हैं, लेकिन
जो उनसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार 'ईश्वर' यह नाम शोभा देता है। लेकिन उद्धव! कनक और कामिनी से
जिसे मन से आसक्ति रहती है, वह संसार का 'अनीश्वर' है इसे निश्चयपूर्वक जान लो। इस प्रकार शमादि प्रश्नों
का उत्तर मैंने बतलाया। उनके विपरीत जो लक्षण हैं, अर्थात् अशमादिक गुणों का होना, यही 'अनीश्वरत्व' है,
यह जान लो।
एत उद्धव ते प्रश्नाः सर्वे साधु निरूपिताः।
किं वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयोः ॥ ४५ ॥
उद्धव! मैंने तुम्हारे सारे प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर दिया। जिससे ब्रह्मस्वरूप प्राप्त हो सके, ऐसा ही
व्याख्यान दिया। संसार में गुणदोषों की संख्या असंख्य है। कहने से कम नहीं होगी। गुणदोषों का विवेचन करना
अत्यन्त कठिन है। इसलिये मौन रहना ही अच्छा है क्योंकि गुणदोषों को न कानों से सुनना चाहिये, न आँखों से
देखना चाहिये और न मुँह से कहना चाहिये। गुणदोषों के बारे में मन में भी नहीं सोचना चाहिये। अब ब्रह्मज्ञान
के लक्षण का निरूपण बहुत अधिक नहीं है। उसे श्रीकृष्ण आधे ही श्लोक में बता रहे हैं।

५२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः ॥ ४६ ॥
सर्वत्र एक परिपूर्ण ब्रह्म ही है। इसमें दोष कौन से और गुण कौन हैं? अविद्या क्षुब्ध होती है, तभी गुणदोष
बढ़ते हैं। इसलिये जो गुणदोषों को देखने लगता है, समझ लो उसकी अविद्या क्षुब्ध हो गयी और जो गुणदोष
नहीं देखते, वह समझ लो ब्रह्मसम्पन्न हो गया। दूसरों के गुणदोष देखना यही सबसे बड़ा दोष है और गुणदोष न
देखना यही सबसे अच्छा गुण है। ब्रह्म में कोई गुणदोष नहीं है यह सर्वथैव सत्य है। अर्थात् जो गुणदोष देखता
है उसमें ब्रह्मत्व नहीं है। यह सहज सिद्ध है। जो गुणदोष देखने लगते हैं, उनका ब्रह्मत्व किस तरह लुप्त होता
है ? क्या वह उनसे रूठ कर चला जाता है ? जिस समय राहु रविबिंब को ग्रसता है, उस समय दिन में भी नक्षत्र
दिखायी पड़ते हैं। उसी प्रकार अविद्या जब ब्रह्मत्व को ग्रस लेती है, तो गुणदोष दिखायी पड़ने लगते हैं। श्रीकृष्ण
आदरपूर्वक कहते हैं कि जीव को किसी का भी गुणदोष नहीं देखना चाहिये। संसार में चौरासी लाख योनी हैं
उनमें से यदि मनुष्य योनि के ही गुणदोष न देखो तो उतने से ही तुम नित्यमुक्त हो जाओगे। अब शायद तुम यह
कहोगे कि स्वधर्माचरण करते समय गुणदोष तो देखने ही चाहिये। लेकिन उद्धव ! यह बात बिलकुल गलत है
क्योंकि स्वधर्माचरण की प्रकृति बिलकुल भिन्न है। अपने दोषों को नष्ट करने के लिये ही स्वधर्माचरण किया
जाता है और वही अगर गुणदोष देखने लगे तो वह नंगी दौड़ जैसा होगा। धान पैदा करने के लिये खेत में पत्ते
आदि जलाकर जमीन को तैयार करते हैं, यदि उसके बदले फसल को ही जला दें तो किसान को मिट्टी ही खानी
पड़ेगी। दोषों का क्षालन करने के लिये ही वेदों ने धर्म की प्रवृत्ति बतायी है; यदि उस स्वधर्म से दोष ही देखने
लगे तो वह अपने हितों से ही वंचित हो जायेगा। स्त्री पुरुष स्वांग बनाकर अनेक प्रकार के हावभाव दिखलाते
हैं, अनेक प्रकार की शृंगारिक बातें करते हैं, लेकिन वह भाव वे अपने मन से नहीं करते। उसी वृष्टि से स्वधर्म
का आचरण करना चाहिये। बिना गुण-दोष देखे, बिना स्वधर्म की मर्यादा छोड़े स्वधर्म का आचरण करना
चाहिये, यही स्वधर्म कर्म का प्रमुख लक्षण है। ऐसे स्वधर्माचरण से कर्म के मैल धुल जाते हैं। ऐसे स्वधर्माचरण
से कर्म के मैल धुल जाते हैं। गुणदोष की बात छोड़ने पर ही साधकों को निजात्मपद की प्राप्ति होती है। गुणदोष
देह में होते हैं लेकिन आत्मा तो नित्य विदेही ही रहती है। सिद्ध को तो वे दिखायी ही नहीं देते। तिस पर भी
यदि उसे गुणदोष दिखायी देने लगे तो दोनों की खैर नहीं। इससे साधक की हानि होती है और उसकी सिद्धि
तत्काल नष्ट हो जाती है। इस प्रकार उद्धव ! गुणदोषों का यह संकट दोनों ओर एक जैसा है। सारा संसार
गुणदोषों से भरा हुआ है लेकिन हमें उधर ध्यान ही नहीं देना चाहिये। यही बात श्रीकृष्ण ने अत्यन्त भावुक
होकर उद्धव को बतलायी। यदि गुणदोषों को देखना इतना निषिद्ध है तो फिर श्रीकृष्ण ने वेदमुख से इतना स्पष्ट
क्यों बताया है ? ऐसा प्रश्न उद्धव आगे कहने वाला है। उस पर व्यास का निरूपण सुनकर जीव और शिव दोनों
को ही शान्ति मिलेगी। इसमें श्रीकृष्ण सकाम-भक्ति और निष्काम भक्ति के अधिकार विशद करेंगे। वह कथा
अत्यंत अद्भुत है। अतः संत उधर ध्यान दें और श्रोता सावधान हो जाएँ। ऐसी विनती एकाजनार्दन कर रहा है।
अगला निरूपण रस से सराबोर है।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकार टीकायां
भगवदुद्धव संवादे एकोनविंश अध्यायः ॥ १९ ॥

बीसवाँ अध्याय

हे ओंकारस्वरूप चित्समुद्र, सद्गुरुराया ! तुम्हें मेरा प्रणाम ! मुक्तरूपी मोतियों को तुझमें ही आश्रय प्राप्त
होता है और ज्ञानवैराग्यरूपी सीप के रूप में तुम उसे भाग्यवान पुरुषों को देते हो । तुम्हारा आवास तो असीम है।
उसमें नाना प्रकार के चिद्रत्न भरे हुए हैं। निजबोधरूपी चन्द्रमा को देखते ही तुम में ज्वार आता है जिसमें
स्वानंद में उफान आने पर भी तुम गुरुमर्यादा का उल्लंघन नहीं करते हो। स्वानंद की लहरें निरन्तर तुम्हारी सतह
पर उछलती रहती हैं। ब्रह्मविद्या एक बहुत बड़ा बन्दरगाह है जिसमें निजभक्ति नाम का बहुत बड़ा जहाज है।
उसे चलाने वाले नाविक तुम हो। तुम्हीं उस पर प्रेम की पाल लगाते हो और भक्त, संत और ज्ञानसम्पन्न लोगों को
उस पार लगाते हो। उनका वार-बार आना-जाना सचमुच हीं रुक जाता है। किसी किनारे पर लाकर भवसागर में
विचरण कराते हो। उसे महाकल्पांत में भी डूबने की बाधा नहीं आती। जो भक्तिरस में डूबता है उसे शेषशायी के
पास पहुँचा देते हो, किसी को अटल स्थान पर पहुँचा देते हो जहाँ से ब्रह्मादिक देवता भी नहीं हिला सकते।
तुम्हारे सागरपन का गुण ऐसा है कि किसी को तिलमात्र के लिये भी विजातीय नहीं रहने देते हो। तुम्हारी यह
शक्ति बड़ी अद्भुत है। यह जब प्रलय काल में भी ऊपर चढ़ता जाता है, उस समय संसार नाम का गाँव भी डूब
जाता है। यह वैकुण्ठ, कैलास के भी ऊपर चढ़ता जाता है। आगे, पीछे सर्वत्र यही दिखायी देता है। ऐसे इस
सद्गुरुरूपी समुद्रोदक में एकनाथ एकता से खो गया। उसमें गिरते ही जनार्दन ने उसका अंगीकार किया। उस
जनार्दन ने ही स्वयं एकादश स्कन्ध पर यह भाष्य तैयार किया। उसने अभंग में एकनाथ का नाम देकर लोगों को
उसके कवित्व से परिचय कराया। जनार्दन को एकत्व प्रिय है। मैं एका उनसे मिलने के कारण, निजात्मभाव से
दोनों में एकत्व स्थापित हुआ और उन्होंने अपने निजसुख का मुझे उपभोग कराया। निजसुख की कथा वह स्वयं
कहता है और श्रोता भी वह स्वयं ही बनता है। फिर उसके अर्थ का समाधान भी वह स्वयं ही करता है। इस
प्रकार उस जनार्दन ने यह एकादश स्कन्ध सुलभ करा दिया। उन्नीसवें अध्याय के अन्त में गुण-दोषों की कुछ
बातें उद्धव को बतायी थीं। वह यह कि गुणदोष देखने को सबसे बड़ा 'दोष' मानना चाहिये और गुणदोष न
देखना सबसे बड़ा गुण मानना चाहिये। यह बात मुझ श्रीकृष्ण को स्वीकार है। भगवान का यह भाषण सुनकर
उद्धव को बड़ा चमत्कार लगा। उसने कहा, घर-घर में गुणदोषों का विचार क्या लोगों ने किया है ? आपने स्वयं
ही वेदमुख से गुणदोषों का लक्षण बताया है। आपकी वेद की बातें कैसे अस्वीकार कर दी जाएँ ? विधिनिषेध
लक्षण का विचार करने पर वह वेद का ही वचन मालूम होता है ? ऐसा होते हुए श्रीकृष्ण उसका निषेध क्यों
करते हैं ? यही प्रश्न उद्धव स्वयं पूछ रहे हैं। बीसवें अध्याय में गुणदोष लक्षण बताने के लिये भक्ति, ज्ञान और
कर्म इन तीन भिन्न-भिन्न अधिकारों के बारे में भगवान बतायेंगे। उद्धव ने कहा, हे श्रीकृष्ण ! तुमने स्वयं ही वेद
के रूप में गुणदोषों का विवेचन किया है। उसी को हम प्रमाण मान कर चल रहे हैं। यह विधि और निषेध, तुम्हें
वेद स्वयं ही स्पष्ट कर रहे हैं। वह वेदानुवाद में तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ। सुनो।
उद्धव उवाच
विधिश्च प्रतिषेधश्च निगमो हीश्वरस्य ते।
अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम् ॥ १ ॥