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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 869 में से

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पृष्ठ 526

५१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
सर्वेश है यह बिलकुल भूलकर वह अपने को अधर्मी, अकर्मी, दीनदुबला तथा अज्ञानी मानने लगता है। ऐसी
स्थिति में मेरी भक्ति कैसे उत्पन्न होगी ? और मेरी प्राप्ति भी कैसे होगी ? इस प्रकार संसार के भवसागर में फँस
कर कितने लोग चक्कर खा रहे हैं, उनकी कोई गिनती नहीं है। परमात्मा को प्राप्त करने के चार उपाय हैं और
वे चारों अत्यन्त गुप्त हैं। अंतःकरण के वात्सल्य के कारण श्रीकृष्ण उद्धव को वे उपाय बताते हैं। धर्म की प्रमुख
भूमिका है भजन, उससे उत्पन्न होता है ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य। ये चार उपाय मेरी प्राप्ति के लिये आवश्यक
हैं। उनके सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो।
धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम्।
गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७॥
उद्धव ! अब मैं असली मर्म तथा गुह्य में गुह्य बात तुम्हें बताता हूँ। मेरी प्रेमयुक्त भक्ति वही सबसे अच्छा
धर्म है, यह जान लो और ऐक्य से एकात्मता का जो साक्षात बोध होता है और फिर कभी भेद उत्पन्न नहीं होता,
उसी का नाम है, 'शुद्धज्ञान' ऐसा परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ने कहा। धनधान्य का ढेर सामने पड़ा हो या उर्वशी
सेज पर आयी हो लेकिन जिसे वह सब तुच्छ मालूम होता है उसे ही हम 'वैराग्य' कहते हैं। हे बुद्धिमान उद्धव !
सुनो ! मेरी अष्ट महासिद्धि हैं जो मुझसे कभी दूर नहीं होती, वे अटल हैं। मेरी श्रेष्ठ भक्ति के निश्चय से जो
एकात्मता प्राप्त कर मेरी पदवी पा लेता है, उसके घर में मेरी सिद्धियाँ दासी बनकर रहती हैं। सिद्धि उसकी सेवा
करती हैं इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? मैं लक्ष्मी के साथ भक्तों की भक्ति करता हूँ। 'ऐश्वर्य' का प्रमुख
लक्षण है, स्वयं भगवान की योग्यता प्राप्त कर भगवद्-ऐश्वर्य से अत्यन्त सम्पन्न होना। यह मेरे गुप्त भण्डार की
चाभी है। उसे लेकर आत्मानंद का कमरा खोलो और अपनी सुखसिद्धि का उपभोग करो। श्लोक के चार शब्दों
का ऐसा गहन प्रतिपादन सुनकर उद्धव को बड़ा आश्चर्य हुआ। 'धर्म' आदि को लेकर चार शब्दों का अर्थ
भगवान ने विचित्र-सा बताया, उसी प्रकार अब यम आदि का अर्थ भी भगवान से पूछा जाय ताकि श्रीकृष्ण
उसका गुप्त अर्थ बताएंगे, यह बात मन में लाकर ही परमार्थ को पूर्णरूप से जानने के लिये उद्धव स्वयं ही यम
आदि के प्रश्न पूछ रहा हो। पाँच श्लोकों में उसने गहन ज्ञान के पैंतीस प्रश्न पूछे हैं। उनके उत्तर सुनने पर
'जीव' और 'शिव' दोनों का समाधान होगा। पहले श्लोक में छह प्रश्न हैं; दूसरे में नौ हैं तथा तीसरे और चौथे
में आठ-आठ हैं और पाँचवें में चार प्रश्न हैं।
उद्धव उवाच
यमः कतिविधः प्रोक्तो नियमो वारिकर्शन।
कः शमः को दमः कृष्ण का तितिक्षा धृतिः प्रभो ॥ २८ ॥
अहंकाररूपी शत्रु का विनाश करने वाले श्रीकृष्ण ! 'यम' और 'नियम' के कितने प्रकार हैं ? 'शम' और
'दम' किसे कहते हैं ? उसी प्रकार, 'तितिक्षा' और 'धृति' कैसी रहती है ?
किं दानं किं तपः शौर्यं किं सत्यमृतमुच्यते।
कस्त्यागः किं धनं चेष्टं को यज्ञः का च दक्षिणा ॥ २९ ॥
यहाँ 'दान' क्या है और 'तप' क्या है ? 'शौर्य' क्या है और 'सत्य' कैसा रहता है ? उसी प्रकार जिसे
'ऋत' कहते हैं उसका यथार्थ ढंग से वर्णन करें। इसी प्रकार 'त्याग' क्या है ? पुरुष के लिये इष्ट धन कौन सा
होता है ? 'यज्ञ' किसे कहते हैं ? और उसमें 'दक्षिणा' क्या होती है ?