श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 525, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय ५०९
लगता है। तुम ग्रन्थ का अर्थ यथार्थ ढंग से बता रहे हो। संतों का यह भाषण सुनकर एकाजनार्दन को हर्ष हुआ
और उसने श्रीचरणों में मस्तक रख दिया। अब आगे का निरूपण सुनें। श्रीकृष्ण अपनी भक्ति को आदरपूर्वक दृढ़
करने के लिये अपने निरूपण की पुनरावृत्ति कर रहे हैं।
यदात्मन्यर्पितं चित्तं शान्तं सत्त्वोपबृंहितम्।
धर्मं ज्ञानं सवैराग्यमैश्वर्यं चाभिपद्यते॥ २५॥
अपना अंतःकरण मुझे अर्पण कर देने से मेरी भक्ति उल्हास के साथ बढ़ती है, इस सम्बन्ध में मैं पहले ही
बता चुका हूँ। अब मन को मेरे स्वरूप में अर्पण करने का एक सरल उपाय बताता हूँ, सुनो। मेरा नामस्मरण
करने से पापों का विनाश होता है। मन की कोई कामना रख नामस्मरण करने से वह नाम ही उस कामना को
पूर्ण करता है और बिना इच्छा किये नामस्मरण करने से समस्त पालकों का विनाश करता है और पाप भस्म हो
जाने पर रज और तम को जीत कर अपने आप ही धर्मपरायण तथा धार्मिक सत्त्वगुण बढ़ने लगता है। सत्त्वगुण
के कारण वैराग्य हमेशा के लिये अटल हो जाता है। वैराग्य के कारण विषय का निर्मूलन होता है जिससे
आत्मज्ञान प्रकट होता है। विवेक के साथ ज्ञान बढ़ने से स्वरूप का अनुसंधान होता है और शान्ति का समाधान
बढ़ता जाता है, उस समय मन मुझे अर्पण होता है। मन मेरे प्रति अर्पण होने पर निजभक्ति प्रकट होती है। उसका
सारा निरूपण मैंने पिछले श्लोक में किया ही है। निजभक्ति पूर्णरूप से प्राप्त होने पर अष्टमहासिद्धि स्वयं होकर
उसके आँगन में खड़ी हो जाती हैं। उन सिद्धियों की ओर वह आँख उठा कर भी नहीं देखता। उसके लिये
अप्राप्य कोई भी वस्तु नहीं रहती। मेरे भक्तों का मुझसे ऐक्य होने के बाद उन्हें मेरी पूरी सत्ता प्राप्त होती है। मेरी
ऐसी भक्ति को न प्राप्त कर तथा आत्मस्थिति का लाभ न उठाकर, विषयासक्ति से व्यवहार करने पर बहुत बड़े
अनर्थ का सामना करना पड़ता है।
यदर्पितं तद्विकल्पे इन्द्रियैः परिधावति।
रजस्वलं चासन्निष्ठं चित्तं विद्धि विपर्ययम्॥ २६॥
जो वेदशास्त्र को नहीं मानता, परमार्थ पर जो विश्वास नहीं करता; जो घर, स्त्री, बच्चे और सम्पत्ति पर
आसक्त होकर विषयों पर ही लुब्ध रहता है, उसमें विषय की अधिकता से रजोगुण अत्यन्त क्षुब्ध हो उठता है
और उसका चित्त ज्ञान के प्रति अन्धा हो जाता है। ज्ञान का अर्थ उसे विपरीत ही दिखायी देने लगता है। जो लोग
उसे विषयोपभोग के अनेक उपाय सुझाते हैं, उसे वह बड़ा 'ज्ञानी' मानता है और जो छलवाद की युक्ति से मुँह
बन्द करता है, उसे पण्डित कहते हैं। जिसके पीछे बहुत बड़ा प्रपंच रहता है, उसे 'भाग्यवान' समझते हैं और जो
नाना उपभोगों से अपने शरीर का पोषण करता है उसे 'पुण्यवान' पुरुष मानते हैं। परमार्थ विषयों में अनुतापी
रहता है उसे बड़ा 'दुःखी' कहते हैं; जो अनेक प्रकार के विषयों का पोषण करता है उसे बहुत बड़ा 'सुखी'
मानते हैं। जिसके शाप से मनुष्य की मृत्यु होती है, उसे 'सिद्ध' मानते हैं। जिसके आचार में दंभ होता है, उसे
बड़ा 'पवित्र' मानते हैं और स्त्रियों को तथा शूद्रों को मंत्र देता है उसे बहुत बड़ा 'ज्ञाता' कहते हैं। जो अनुतापी
और वैराग्यशील होता है, उसे 'भाग्यहीन' कहते हैं और जो सबके समक्ष विषयों का उपभोग करता है उसे
'राजयोगी' मानते हैं। जो स्वयं धन का अभिलाषी होता है वह धन खर्च करने वाले को 'मूर्ख' कहता है और
खर्च न करने वाले को 'विचारी' तथा 'धर्मज्ञ' मानता है। जिसकी गाँठ में काफी द्रव्य रहता है, वह सबको
अत्यन्त 'पूज्य', 'पवित्र' तथा 'ज्ञानी' लगता है। ऐसा विपरीत ज्ञान उन्हें होने लगता है। वह स्वयं सर्वात्मा और