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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 869 में से

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पृष्ठ 520

५०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आँखों से है। बड़े-बड़े लोगों के मुख से हमने अनेक बार यह सुना है जो प्रपंच की नश्वरता का तीसरा
ऐतिहासिक प्रमाण है। शास्त्र प्रमाण तथा अनुमान से भी प्रपंच का भास मिथ्या ही है। वह मृगजल की तरह
दिखाई देता है। उसमें वास्तविकता नहीं है। रस्सी वास्तव में रस्सी के ही रूप में रहती है लेकिन भ्रम से वह
अनेक आकारों में दिखायी देती है। यह लकड़ी है या साँप है या मोतियों की लड़ी है? या पानी की धारा बह
रही है? कुछ भी समझ में नहीं आता। उसी प्रकार परब्रह्म एक है तथा चैतन्यधन है। उसके सम्बन्ध में भ्रम से
अनेक प्रकार के विवाद शुरु हो जाते हैं। कोई शून्य कहता है, कोई सगुण कहता है। कर्मधर्माचरण को भी मिथ्या
कहा जाता है। इस प्रकार अनुमान-प्रमाण के आधार पर भी प्रपंचभास मिथ्या ही दिखायी देता है। उद्धव ! वेदांत
का सच्चा और प्रामाणिक मत यही है। तंतु के बिना वस्त्र अलग से दिखायी नहीं देता, उसी प्रकार प्रपंच भी ब्रह्म
से अलग सत्यरूप में नहीं है। प्रपंच का मिथ्यापन श्रुति, प्रत्यक्ष, ऐतिह्य तथा अनुमान इन चार प्रमाणों से सिद्ध
होता है इसलिये इस प्रपंच की विषयासक्ति को त्याग कर वैराग्य धारण करना चाहिये। इसी विषय का निरूपण
स्वयं श्रीकृष्ण कर रहे हैं। विषयों का चिन्तन मिथ्या है तथा इस लोक में परलोक में भी अमंगल ही है।
कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्चादमङ्गलम्।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥ १८॥
यज्ञ याग आदि कर्मसाधनों से जो लोक प्राप्त होता है, वह नश्वर रहता है, इसे ध्यान में रखो। ब्रह्मलोक
आदि जो लोक हैं वे सारे नश्वर होने के कारण अमंगल ही हैं। उस लोक में जिस सुख की बात होती है वह
विष मिलाकर तैयार किये गये अन्न की तरह होती है। विषययुक्त अन्न खाते समय मधुर लगता है लेकिन अन्त में
मृत्यु होती है। प्रकार स्वर्ग में रहने वाले का भी अन्त में अधःपतन होता है। यह लोक जैसा यहाँ दिखायी देता
है, वैसा ही स्वर्ग भोग वहाँ भी दिखायी देता है। दोनों ही नाशवान हैं। कुत्ता काला हो या सफेद हो अमंगलता में
दोनों ही एक जैसे हैं। उसी प्रकार नश्वरता की दृष्टि से इहलोक और परलोक दोनों समान हैं। इसीलिये हे
उद्धव ! इहलोक अथवा परलोक के सुखोपभोग के सम्बन्ध में हमेशा विरक्ति ही धारण करनी चाहिये। इसी का
नाम वैराग्य है। अब तुमने अपने पहले प्रश्न में मेरी भक्ति के सम्बन्ध में पूछा था, उसी को मैं तुम्हें अपने मत के
अनुसार बता रहा हूँ।
भक्तियोगः पुरैवोक्तः प्रीयमाणाय तेऽनघ।
पुनश्च कथयिष्यामि मद्भक्तेः कारणं परम्॥ १९॥
भक्ति के माहात्म्य के सम्बन्ध में मैं तुम्हें पूर्व में बता ही चुका हूँ। उस भक्ति पर तुम्हारा अत्यन्त प्रेम होने
के कारण मैं तुम्हें उसे पुनः बता रहा हूँ। हे पुण्यमूर्ति उद्धव! सुनो! जिसे मेरी भक्ति की चाह होती है वह सारे
त्रिभुवन में मुझे प्रिय रहता है क्योंकि मेरे भजन से ही मेरे भक्तों को परमपद की प्राप्ति होती है। उस भक्ति का
लक्षण भगवान प्रारम्भ से ही बता रहे हैं। इसलिये श्रोतागण सावधान होकर सुनें।
श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम्।
परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभिः स्तवनं मम॥ २०॥
अमृत जैसी मेरी कथाओं का श्रवण करने से अमृत भी फीका लगता है और तत्काल भक्तिमार्ग की चाह
उत्पन्न होती है। देवतागण अमृतपान करते हैं लेकिन वे भी अन्त में मर जाते हैं, लेकिन जो मेरे कथामृत का
सेवन करते हैं वे कलिकाल को भी समाप्त कर देते हैं। कथासारामृत सेवन करने से वे अत्यन्त उन्मत्त हो जाते हैं