श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 527, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय ५११
पुंसः किं स्विद् बलं श्रीमन् भगो लाभश्च केशव।
का विद्या हीः पराका श्रीः किं सुखं दुःखमेव च॥ ३०॥
पुरुष के पास 'बल' की कौन-सी शक्ति होती है? किस स्थिति को 'दया' कहते हैं? उसी प्रकार हे
कृपामूर्ति श्रीकृष्ण 'लाभ' क्या है, इसे भी बतायें। यहाँ 'सुख' कौन-सा है और कैसा है? इसे भी कृपापूर्वक
बतायें। उसी प्रकार सुख के साथ जो 'दुःख' होता है उसका स्वरूप भी कथन करें।
कः पण्डितः कश्च मूर्खः कः पन्था उत्पथश्च कः।
कः स्वर्गो नरकः कः स्वित् को बन्धुरुत किं गृहम्॥ ३१॥
'पण्डित' का क्या लक्षण है? किस गुण के कारण मूर्ख कहते हैं? 'सुमार्ग' कौन-सा होता है? उसी
प्रकार 'दुर्मार्ग' का भी निरूपण करें। 'स्वर्ग' किसे कहते हैं? 'नरक' को कैसे पहचानें? 'सखा', 'बन्धु' किसे
कहा जाय? और मेरा 'घर' कौन सा है?
क आढ्यः को दरिद्रो वा कृपणः कः क ईश्वरः।
एतान् प्रश्नान् मम ब्रूहि विपरीतांश्च सत्पते॥ ३२॥
'सम्पन्न' हम किसे कहें? 'दरिद्र' को कैसे पहचाना जाय? 'कंजूस' किसे कहा जाय? 'ईश्वर' को कैसे
पहचाना जाय? ये मेरे प्रश्न हैं। जो लौकिक अर्थ से भिन्न और परमार्थ के लिये साधन बन सके ऐसा अर्थ स्पष्ट
करके बतलायें। लौकिक दृष्टि से जो विरुद्ध होता है उसे ही 'विपरीत' कहते हैं। इसलिये उन सबका मतितार्थ
परिमार्थ के सन्दर्भ में बताएँ। संतमूर्ति ज्ञान से सम्पन्न रहते हैं लेकिन तुम उनके भी स्वामी हो। इसीलिये शास्त्रार्थ
से लोग तुम्हें 'सत्पत्ति' कहते हैं। हे श्रीपते! परमार्थ प्राप्ति के लिये मुझे मेरे प्रश्नों का यथार्थ दृष्टि से उत्तर दें,
ऐसी विनती उद्धव ने श्रीकृष्ण से की। भक्त की यह विनती सुन कर नारायण के मन में कृपा उपजी। अतः उसके
परमार्थपरक प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण 'यम' और 'नियम' का विशद निरूपण करेंगे और जो शेष अत्युत्तम प्रश्न है
उनका उत्तर अध्याय के अन्त में देंगे।
श्रीभगवानुवाच
अहिंसा सत्यमस्तेयमसङ्गो हीरसंचयः।
आस्तिक्यं ब्रह्मचर्यं च मौनं स्थैर्यं क्षमा भयम्॥ ३३॥
पहले श्लोक में यम के बारह लक्षणों का वर्णन है। प्रश्न के अनुसार श्रीकृष्ण उसका उत्तर दे रहे हैं। आगे
अनेक प्रश्न हैं अतः यम नियमों का उत्तर श्रीकृष्ण संक्षेप में दे रहे हैं। काया, वाचा अथवा मन से किसी को
पीड़ा न हो, इसका नाम है 'अहिंसा'। और जो यथार्थ हों उसका वर्णन करना ही 'सत्य' है। अब 'अचौर्य' का
भी लक्षण सुनो। अपने हाथ से चोरी न करना, इतना ही नहीं बल्कि किसी के धन के बारे में मन में भी इच्छा न
करना यही 'अस्तेय' अर्थात् चोरी न करने का लक्षण है। लोग यात्रा पर जाते हैं उस समय जिस प्रकार साथ में
एकत्र लोगों के प्रति आसक्ति नहीं होती, उसी प्रकार घर-बार होते हुए भी जिसकी उसके प्रति आसक्ति नहीं
होती। स्फटिक को जिस रंग पर रख दिया जाय, उसी रंग का वह दिखायी देता है लेकिन भीतर से वह निर्विकार
ही रहता है। उसी रूप में जो शरीर में रहता है उसे 'असंगता' कहते हैं। निंद्यकर्म से जिसे मन से ही घृणा रहती
है और लोकजीवन में निंद्यकर्मों से लज्जित होना, इसी का नाम 'लज्जा' है। इहलोक में जिसे संग्रह करना