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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 529, कुल 869 में से

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पृष्ठ 529

उन्नीसवाँ अध्याय ५१३
करते हुए, इच्छामुक्त होकर यात्रा करने का ही नाम है 'तीर्थयात्रा' । जिस प्रकार पर्वत परोपकार के ही लिये
खनिज पदार्थ तथा वनस्पतियों का भार वहन करते हैं, उसी प्रकार केवल परोपकार के लिये निरन्तर कर्म कर
सदासर्वकाल उपकार करते रहना चाहिये। चन्द्र की किरणें जिस प्रकार स्पर्श होते ही शान्ति प्रदान करती हैं, उसी
प्रकार उसका आचरण उपकार से ही जन-जन को सुखी करता है। दैव से जो कुछ प्राप्त होगा, उसने पर ही वह
संतोष कर समय व्यतीत करता है। मन में समविषम भाव ही उत्पन्न नहीं होता। इसी का नाम है 'यदृच्छा लाभ
संतुष्ट' अर्थात् प्राप्त स्थिति में सन्तुष्ट रहना। काया, वाचा, मन और धन गुरु को अर्पण कर जो गुरु की शरण में
जाता है, उसके संसार का बन्धन नष्ट हो जाता है। इसी का नाम है 'गुरुसेवा'। शौच के दो गुण तथा जप आदि
दूसरे दस लक्षण मिला कर बारह 'नियम' हैं। इस प्रकार स्वयं श्रीकृष्ण ने वर्णन किया।
एते यमाः सनियमा उभयोर्द्वादश स्मृताः ।
पुंसामुपासितास्तात यथाकामं दुहन्ति हि ॥ ३५ ॥
इस प्रकार दो श्लोकों में यमनियमों का अच्छी तरह निरूपण किया। प्रत्येक के बारह-बारह लक्षण
बतलाये। इसी को शास्त्रार्थ में 'परमगुह्य' कहते हैं। इनकी उपासना यदि कोई पुरुष कामना के साथ करेगा तो
यही यम और नियम कामधेनु की तरह उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण करेंगे। अथवा इन यम-नियमों की निष्काम
उपासना करने से उस पुरुष को मेरे स्वरूप की सहज प्राप्ति होगी। अब हे उद्धव ! तुम्हारे शमदमादिक जो
प्रश्न हैं, जिनके कारण ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है वह गुह्य निरूपण तुम्हें भी बताता हूँ, सुनो। श्रीकृष्ण उन
प्रश्नों का उत्तर देंगे। उनका श्रवण करने से तत्काल ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होगी। बालक की भूख शान्त करने के
लिये उसकी माँ अपने हाथ से उसे खिलाती है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी उद्धव को ब्रह्मज्ञान दे रहे हैं। जो रस
पिता को अच्छा लगता है वह उसे अपने बच्चे को भी पिलाता है। उसी प्रकार श्रीकृष्ण उद्धव को ब्रह्मरस
पिला रहे हैं। वैसे भी माँ को बालक से अत्यन्त प्रेम रहता है, तिस पर यदि बालक स्तन में मुँह ही लगा दे,
फिर क्या पूछना ? उस आनन्द के कारण उसके स्तन में दूध फूट पड़ता है। उसी प्रकार श्रीकृष्ण स्वयं ही
ब्रह्मज्ञान देने को तत्पर, जिस पर उद्धव ने प्रश्न पूछे उससे उन्हें परम सन्तोष हुआ। पहले से ही पर्जन्य वृष्टि
होने लगे, तिस पर हवा और विद्युत का भी सहयोग मिल जाय, फिर क्या पूछना ? उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान देने
के लिये तत्पर भगवान को उद्धव के प्रश्न का बहाना मिल गया। इससे श्रीकृष्ण स्वानंद से प्रसन्न हो गये और
अब वे उसे पूर्ण ब्रह्म ही सौंप रहे हैं। मुफ्त में मिलने वाले नमक के टुकड़ों के ऐवज में यदि चिन्तामणि हाथ
में आ जाये, या ईंट देकर पारस मिल जाय तो उसे जो स्वीकार नहीं करेगा, वह अपने ही लाभ से वंचित हो
जायगा। उसी प्रकार उद्धव के थोड़े से प्रश्नों से उसे पूर्ण ब्रह्म प्राप्त हो रहा है। इसलिये एकाजनार्दन विनती
करता है कि श्रोतागण मेरी ओर ध्यान दें। उद्धव के चौंतीस प्रश्न थे। उनमें से यम और नियम के सम्बन्ध में
बतलाया। शेष बत्तीस प्रश्न रह गये, उनके बारे में भी विचार सुनिये। प्रश्नों में दया के सम्बन्ध में उत्तर
श्रीकृष्ण ने नहीं बताया। लेकिन उसके ऐवज में उन्होंने ध्वनितार्थ से 'षड्गुणैश्वर्य' सूचित किया है। दया के
लिये सम्पूर्ण भाग्य बताने के कारण श्रीकृष्ण आगे बताएँगे। सारांश, अब इकतीस प्रश्न बच गये। इसमें
श्रीकृष्ण एक अधिक बतायेंगे, वह 'कर्मस्वसंगम' अर्थात् शौच है। कार्यकारण सम्बन्ध आने के कारण ही यह
बताना पड़ा। इस पर ये सारे तैंतीस प्रश्न हुए। उनके बारे में श्रीकृष्ण व्याख्या देंगे। इस प्रकार वे उद्धव को
हथेली पर 'ब्रह्मज्ञान' परोसेंगे।